हालात सब एक जैसा ही है
चर्चा क्या नया करूँ
हम सब अपने घरों में कैद है
मन तो आज भी आजाद है
कैसे इसे काबू करूँ
सपनो वाली कहानियां ही ठीक है
कभी तुम मिलो कभी हम मिले
कमबख्त नींद आ जाये
और सपना देखा करूँ
भय मौत से नही भविष्य से है
दो रोटी की चिंता में
कैसे खुद को समझाया करूँ
चूल्हे की आंच मंद्धिम पड़ रहा है
दीवारे सिमट रही है
हाथ पांव बंध सा गया है
जिम्मेदारियों से अलग कैसे
किसी भी पल तुझे याद करूँ
हालात सब एक जैसा ही है
चर्चा क्या नया करूँ।
©nitesh
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