रविवार, 22 अक्टूबर 2017

कार्तिक पर्व के मायने

मैं बिहार के मिथिला से हूँ ,बचपना मिथिला भूमि की  धूल में बीता है,वहां की संस्कृति की बहुत सारी छाप आज भी स्मृति में शेष है ,वक़्त बदलता गया ,हम आधुनिक बनते गए ,गांव से शहर की ओर पलायन करते गए लेकिन वो पुरातन पर्व व उत्सव को भुला नही पाए जो पूरे समाज को एक सूत्र में बांध रखा था।हिन्दू पंचांग का कार्तिक माह यहाँ के लोगों के लिए उत्सव का माह होता था, खरीफ की खेती से निश्चिंत किसान धान की कटाई   का समय आने तक यानि कार्तिक पूर्णिमा तक लोग बाग गृहस्थ कार्य से इतर विभिन्न प्रकार के उत्सव में लग जाते थे, जीतिया, धन तेरस,दीपावली,गोधन,भर दुतिया,हुरा होरी, गोपाष्टमी,फिर छठ,सामा चकेवा, आदि कई अन्य पर्व औरआखिरी में कार्तिक पूर्णिमा तक उत्सव ही उत्सव रहता था ।फिर होता था धान की कटनी और गेंहू का बोआई ।
विभिन्न त्योहारों का इतिहास से कोई न कोई मतलब होता है ,हिन्दू त्योहार ,रीति रिवाजमें  उत्सव के साथ एक उद्देश्य भी छुपा  रहता है बेशक आज के परिवेश में वो शून्य दिखता हो,लेकिन पहले लोग इसी के सहारे जीवन चर्या को पटरी पर चलाते थे। पहले हिन्दू महिलाओ में एक गोदना का निशान होना आवश्यक होता था,एक बिन्दी ही सही लेकिन सभी महिलाएं गोदना गोदवाती अवश्य थी,इसके लिए सुअर की चर्बी में काला रंग डाल कर सुई के नोक से किसी अंग पर गोदा जाता था ,उद्देश्य था अतीत के आततायी मुसलमानों से बचने का तरीका, कोई भी मुसलमान गोदना वाली महिला को अपना हवस का शिकार नही बनाता,ठीक इसी तरह महिलाएं गले में ढोलना पहनती थी,जो चांदी का खोखला बना होता था और उसमें सुअर की हड्डी डाली जाती थी ,इस कारण भी ढोलना पहनी महिलाओं को आततायी  स्पर्श नही करते, उस समय हमलावर मुसलमानों से बचने के लिए ये एक रिवाज के तौर पे अपनाए जाने लगा था जो आज तक भी देखने को मिल जाता है,फैशन के दौर में आधुनिक महिलाएं इसे कम ही अपना रही है । ठीक इसी तरह दीपावली के बाद 'हुराहुरि'का खेल होता था , लोग अपने मवेशी को आततायी मुसलमानों से बचाने के लिए इस उत्सव का आयोजन करने लगे ,नुक्कड़ चौराहों पर किसान अपने मवेशी को सुअर के बच्चे जिसे 'पाहुर'कहते थे उससे लड़वाते थे ,सभी मवेशी अपने हूर (सिंघ) से उसे मारते थे ,जिससे सभी का मवेशी सुअर से स्पर्श होजाता था, ।इसतरह उत्सव के साथ साथ अपनी मवेशी की रक्षा भी कर लेते थे ,आज के दौर में ये उत्सव मिथिला के कुछ ही गांवो में बचा है ।
गांव की संस्कृति,पर्व,उत्सव,रीति रिवाज बेशक आज बासी और अनुपयुक्त लगे लेकिन जो रस, उल्लास,भाईचारा,और उत्साह उसमे है आज के आधुनिक क्लब या पूर्व नियोजित मेला या तथाकथित इवेंट में नही है ।मुश्किल है कि हम आज के मशीनी युग मे इसे सहेज कर रख पाएं। लेकिन अपने अतीत की इस वैभव को खोकर हम सब कुछ खो देंगे , हमे अपने पुरातन संस्कार संस्कृति,पर्व त्योहार, उत्सव,गीत,रीति रिवाज को बचा कर रखने के लिए भरपूर कोशिश करनी चाहिये,आज के युवाओं को भी आगे आना चाहिए , नही तो यह इतिहास भी बताने वाला कोई नही बचेगा।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

पत्रकार की हत्या

गाजीपुर में एक पत्रकार की हत्या हुई है । वह एक व्यक्ति भी था, किसी घर का चिराग भी था,अब वो इस दुनिया मे दुबारा नही आ सकता,लेकिन हम आप तो इस जग में है ।कब तक यूपी को जंगल राज बनाते रहेंगे?कब तक अपराधियो को पालते रहेंगे?कब तक एक दूसरे पर खीज निकालते रहेंगे? कब तक स्वयं की हत्या का इंतज़ार करते रहेंगे?अब तो योगी जी को बताइये की ये सपा सरकार नही है फिर हत्या,लूट,और बलात्कार का रेला क्यूँ??क्या यही राम राज है??
#पत्रकार !!!!सावधान अगला नम्बर कहीं आपका तो नही ?नींद में है तो जाग जाइये,सत्ता नही स्वस्थ समाज बनाइये,अपनो के दुःख में अपना बनिये।

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

वैराग्य

अपनो से जब आस टूटती है आँसू जब दो बूंद टपकती है
उसी दिन बन्धन टूटता है
उसी दिन वैराग्य पनपता है
दर्द में एक आध्यत्म उमड़ता है
उम्मीद में भी ईश्वर दिखता है
भ्रम का धुंआ छटता है
खुद का विश्वास बढ़ता है
जिस दिन विश्वास को लुटता है
उसी दिन वैराग्य पनपता है

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

मैथिल

मिथिला मेरी भावनाओ का उपज हो
मेरी संस्कारो की खेती हो
मेरे रोम रोम का स्पंदन हो
मधुर स्वर की स्फुटन से
नित्य नेह का बंधन हो।
तब मैं मैथिल कहलाऊं।
ना कोई लेख पत्र में समझाए
ना उत्सव में बुला मैथिल बनाए,
ना कोई जाति की अहसास कराये
ना कोई सीमा रेखा में मुझे दर्शाये
जब स्वयं पाग पहन इतराऊं
तब मैं मैथिल कहलाऊं।

आज के हम

आज से 40 साल पहले मैं मनुष्य को ईश्वर का अनमोल कृति समझता था। गांव में रहता था ,चेहरे तो कम दिखते थे,अनपढ़ होते थे लेकिन मेहनतकश और आदर्श होते थे , स्वतः सम्मान उत्पन्न होता था उनके लिए,भाषा और पहनावा से मन में श्रद्धा भाव उत्पन्न होता था ,बरबस सोचने को बाध्य होना पड़ता कि बड़े होकर इनके तरह ही बनूँगा।परन्तु आज लोग पढ़े लिखे ,और बड़े बड़े डिग्री वाले है ,लोगो की भीड़ भी बहुत है ,बड़े शहर में किसी ऊँचे स्थान से देखे तो कीड़े मकोड़े की तरह रेंगते नज़र आ ते है, भाव शून्य है, परिधान में भी कई प्रश्न है। ममता और श्रद्धा कहीं गायब है।फिर तो लगता है ईश्वर ने अन्य जानवरों की तरह मनुष्य को भी बनाया है ,संवेदना तो पशुओं के तुल्य भी नही रह गया,इस भीड़ में कहीं मनुष्य खो गया ।