मैं बिहार के मिथिला से हूँ ,बचपना मिथिला भूमि की धूल में बीता है,वहां की संस्कृति की बहुत सारी छाप आज भी स्मृति में शेष है ,वक़्त बदलता गया ,हम आधुनिक बनते गए ,गांव से शहर की ओर पलायन करते गए लेकिन वो पुरातन पर्व व उत्सव को भुला नही पाए जो पूरे समाज को एक सूत्र में बांध रखा था।हिन्दू पंचांग का कार्तिक माह यहाँ के लोगों के लिए उत्सव का माह होता था, खरीफ की खेती से निश्चिंत किसान धान की कटाई का समय आने तक यानि कार्तिक पूर्णिमा तक लोग बाग गृहस्थ कार्य से इतर विभिन्न प्रकार के उत्सव में लग जाते थे, जीतिया, धन तेरस,दीपावली,गोधन,भर दुतिया,हुरा होरी, गोपाष्टमी,फिर छठ,सामा चकेवा, आदि कई अन्य पर्व औरआखिरी में कार्तिक पूर्णिमा तक उत्सव ही उत्सव रहता था ।फिर होता था धान की कटनी और गेंहू का बोआई ।
विभिन्न त्योहारों का इतिहास से कोई न कोई मतलब होता है ,हिन्दू त्योहार ,रीति रिवाजमें उत्सव के साथ एक उद्देश्य भी छुपा रहता है बेशक आज के परिवेश में वो शून्य दिखता हो,लेकिन पहले लोग इसी के सहारे जीवन चर्या को पटरी पर चलाते थे। पहले हिन्दू महिलाओ में एक गोदना का निशान होना आवश्यक होता था,एक बिन्दी ही सही लेकिन सभी महिलाएं गोदना गोदवाती अवश्य थी,इसके लिए सुअर की चर्बी में काला रंग डाल कर सुई के नोक से किसी अंग पर गोदा जाता था ,उद्देश्य था अतीत के आततायी मुसलमानों से बचने का तरीका, कोई भी मुसलमान गोदना वाली महिला को अपना हवस का शिकार नही बनाता,ठीक इसी तरह महिलाएं गले में ढोलना पहनती थी,जो चांदी का खोखला बना होता था और उसमें सुअर की हड्डी डाली जाती थी ,इस कारण भी ढोलना पहनी महिलाओं को आततायी स्पर्श नही करते, उस समय हमलावर मुसलमानों से बचने के लिए ये एक रिवाज के तौर पे अपनाए जाने लगा था जो आज तक भी देखने को मिल जाता है,फैशन के दौर में आधुनिक महिलाएं इसे कम ही अपना रही है । ठीक इसी तरह दीपावली के बाद 'हुराहुरि'का खेल होता था , लोग अपने मवेशी को आततायी मुसलमानों से बचाने के लिए इस उत्सव का आयोजन करने लगे ,नुक्कड़ चौराहों पर किसान अपने मवेशी को सुअर के बच्चे जिसे 'पाहुर'कहते थे उससे लड़वाते थे ,सभी मवेशी अपने हूर (सिंघ) से उसे मारते थे ,जिससे सभी का मवेशी सुअर से स्पर्श होजाता था, ।इसतरह उत्सव के साथ साथ अपनी मवेशी की रक्षा भी कर लेते थे ,आज के दौर में ये उत्सव मिथिला के कुछ ही गांवो में बचा है ।
गांव की संस्कृति,पर्व,उत्सव,रीति रिवाज बेशक आज बासी और अनुपयुक्त लगे लेकिन जो रस, उल्लास,भाईचारा,और उत्साह उसमे है आज के आधुनिक क्लब या पूर्व नियोजित मेला या तथाकथित इवेंट में नही है ।मुश्किल है कि हम आज के मशीनी युग मे इसे सहेज कर रख पाएं। लेकिन अपने अतीत की इस वैभव को खोकर हम सब कुछ खो देंगे , हमे अपने पुरातन संस्कार संस्कृति,पर्व त्योहार, उत्सव,गीत,रीति रिवाज को बचा कर रखने के लिए भरपूर कोशिश करनी चाहिये,आज के युवाओं को भी आगे आना चाहिए , नही तो यह इतिहास भी बताने वाला कोई नही बचेगा।
विभिन्न त्योहारों का इतिहास से कोई न कोई मतलब होता है ,हिन्दू त्योहार ,रीति रिवाजमें उत्सव के साथ एक उद्देश्य भी छुपा रहता है बेशक आज के परिवेश में वो शून्य दिखता हो,लेकिन पहले लोग इसी के सहारे जीवन चर्या को पटरी पर चलाते थे। पहले हिन्दू महिलाओ में एक गोदना का निशान होना आवश्यक होता था,एक बिन्दी ही सही लेकिन सभी महिलाएं गोदना गोदवाती अवश्य थी,इसके लिए सुअर की चर्बी में काला रंग डाल कर सुई के नोक से किसी अंग पर गोदा जाता था ,उद्देश्य था अतीत के आततायी मुसलमानों से बचने का तरीका, कोई भी मुसलमान गोदना वाली महिला को अपना हवस का शिकार नही बनाता,ठीक इसी तरह महिलाएं गले में ढोलना पहनती थी,जो चांदी का खोखला बना होता था और उसमें सुअर की हड्डी डाली जाती थी ,इस कारण भी ढोलना पहनी महिलाओं को आततायी स्पर्श नही करते, उस समय हमलावर मुसलमानों से बचने के लिए ये एक रिवाज के तौर पे अपनाए जाने लगा था जो आज तक भी देखने को मिल जाता है,फैशन के दौर में आधुनिक महिलाएं इसे कम ही अपना रही है । ठीक इसी तरह दीपावली के बाद 'हुराहुरि'का खेल होता था , लोग अपने मवेशी को आततायी मुसलमानों से बचाने के लिए इस उत्सव का आयोजन करने लगे ,नुक्कड़ चौराहों पर किसान अपने मवेशी को सुअर के बच्चे जिसे 'पाहुर'कहते थे उससे लड़वाते थे ,सभी मवेशी अपने हूर (सिंघ) से उसे मारते थे ,जिससे सभी का मवेशी सुअर से स्पर्श होजाता था, ।इसतरह उत्सव के साथ साथ अपनी मवेशी की रक्षा भी कर लेते थे ,आज के दौर में ये उत्सव मिथिला के कुछ ही गांवो में बचा है ।
गांव की संस्कृति,पर्व,उत्सव,रीति रिवाज बेशक आज बासी और अनुपयुक्त लगे लेकिन जो रस, उल्लास,भाईचारा,और उत्साह उसमे है आज के आधुनिक क्लब या पूर्व नियोजित मेला या तथाकथित इवेंट में नही है ।मुश्किल है कि हम आज के मशीनी युग मे इसे सहेज कर रख पाएं। लेकिन अपने अतीत की इस वैभव को खोकर हम सब कुछ खो देंगे , हमे अपने पुरातन संस्कार संस्कृति,पर्व त्योहार, उत्सव,गीत,रीति रिवाज को बचा कर रखने के लिए भरपूर कोशिश करनी चाहिये,आज के युवाओं को भी आगे आना चाहिए , नही तो यह इतिहास भी बताने वाला कोई नही बचेगा।

