#मेरा_एकांतवास 11
आज मेरे गांव में सभी का घर पक्का का है, किसी भी वर्ग में कोई भी मकान कच्चा नही है, एक समय था कि मेरा घर सहित गांव के अधिकतर मकान कच्चा यानी मिट्टी का था या टट्टर का। ईंट और मिट्टी के गारे से बना मकान का परिवार धनी माना जाता था, और सम्पूर्ण पक्का वाले मकान का परिवार महाधनी या जमींदार माना जाता था। धनी माने जाने वाला तनिक शोषण प्रवृत्ति के हुआ करते थे , महाधनी वालो में यह प्रवृत्ति नही था । बाकी सभी कच्चा मकान वाले एकही परिवार जैसे थे, दो जून की रोटी बमुश्किल मिल पाता था, कच्ची सड़को पर धूल उड़ा कर चलना ही शानो शौकत था। लेकिन अदब, और संस्कार का आभूषण ग्रामीण परिवेश की पहचान थी। रिस्तेदार किसी का भी हो सम्पूर्ण गांव का मेहमान माना जाता था, गरीबी थी, लोग कर्ज देते थे और पीढियां इन कर्जो में ही डूबी रहती थी, गेंहू यानि रवि की फसल के समय चावल खाने को तरसते थे और धान की फसल के समय रोटी खाने को , गांव के भोज के लिए हफ़्तों इंतज़ार रहता था, दरवाजे पर चाहर दिवारी नही होती थी इसलिए कोई भी किसी के घर कभी भी आ जा सकता था, शिकायत किसी को नही होती। अभाव था लेकिन तनाव नही था। लोगो को पूरा विस्वास था कि भोजन ईश्वर दे ही देंगे इसलिए आपस का प्रेम बना रहता था, आज भोजन है , सुख संसाधन है लेकिन प्रेम नही,कभी एक छत के नीचे रहनेखाने वाले आज टुकड़ो टुकड़ो में पक्के मकान में रह रहे है , पिता से पुत्र अलग है, भाई तो लाजमी ही है, चूँकि पत्नी ने सबके साथ रहने से मना कर दिया था, आज उन्हें कोई फर्क नही पड़ता कि बगल के कमरे में भाई भूखा है या पिता।, बड़ी सी चाहर दिवारी उसपर ग्रिल और उसके अंदर तन्हा tv के सहारे एकांत। बजुर्ग को छोडकर सभी प्रदेश में है कुछ कमाने तो कुछ पढ़ने के लिए ,जो है उन्हें दुसरो की खुशी या दुखी प्रभावित नही करता, खुद का अकेलापन सालता बहुत है, परन्तु झूठी अकड़ में सब सहता जाता है, एक उम्मीद रहता है प्रवासी हुए पुत्र से ,..जिसकी लौ भी मंद्धिम पड़ती जाती है, और फिर आखिरी में तलाशता है वह पुराना गांव अभाव था लेकिन तनाव नही था, खिलखिलाकर हंस लेते थे। आज गांव भी शहर से कम नही या यूं कहें बदतर है। शहर की तरह एकांगी तो हो गए है, फासले मतलब रखने में शहर जैसे तो हो गए लेकिन यह मानने को तैयार नही की मकान सबका पक्का क्यूँ है। स्थानीय राजनीति ,खाली समय का कोपभाजन, और हम किसी से कम नही की सोच में आज गांव भी तन्हा है।
जो कुछ कर रहे है वो लोग तो गाँव से बाहर है ,जो कुछ नही कर रहे वो नजदीक के कस्बा और शहर में पुरखो का बड़ा सा प्लाट बेचकर छोटे से कंक्रीट के घोषले में आशियाना बना कर रह रहे है ,बस यह कहकर कि गाँव अब रहने लायक नही रहा, एकांगी रहने की जिजीविषा अपने बुजुर्ग से अलग रहने का बहाना भी खूब ढूंढते है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए शहर आना पड़ा, वस्तुतः वो छुपाना चाहते है कि बहु को गांव रास नही आ रहा।
आज गाँव उन्ही को याद है, जिसने कच्ची सड़को पर धूल उड़ाया है, पुआल की ढेरों में खेला है, दादी या नानी से भूत की कहानी सुना है,खेतो में साग तोड़ा है, भुट्टा खाया है,और मुट्ठी भर धान या अनाज के बदले चॉकलेट या नमकीन खरीदा है,जिसने लालटेन की शीशा को बार बार साफ कर जलाया है , उसके फीते को कैची से काटा है ताकि तेज लौ हो सके। जिसे अपने शिक्षक की मार याद है ,जिसे अपने बुजुर्गों की डांट और अदब याद है। बांकियो कि लिए गांव एक पिछड़ा और बिगड़ा जगह है आज, कस्बा ही सही घुटन ही सही एकांगी तो है अपना नितांत निजी मिया बीबी और छोटे बच्चे के साथ।
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