शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

बैलगाड़ी की सफ़र

 बैलगाड़ी की सफ़र 

अब बहुत कम ही लोग बचे होंगे जिन्होंने बैलगाड़ी की सफ़र की हो ।और उसमें से एक जीव मैं भी बचा हुआ हूँ ,जिसे हिचकोले वाली मस्तमौला बेफ़िक्री यात्रा का आनंद आज भी याद है ।उस वक़्त पिताजी के साथ धनबाद में रहना होता था,गाँव आने के लिए ट्रेन का सफ़र गाँव से सात किलोमीटर पहले ही ख़त्म हो जाता था ,उस समय कोई फ़ोन या मोबाइल तो था नहीं की गाँव से बाबा कोई बेल गाड़ी स्टेशन भेजते !सो स्टेशन उतर कर पिताजी ख़ुद बेल गाड़ी को तय करते ,दो या तीन रुपया में किराया तय हो जाता ।माँ चुकि गाँव की बहू होती इसलिए बैलगाड़ी के ऊपर एक साड़ी या कपड़े से ढक कर तंबू नुमा बना देते जिसे ओहार कहते थे ,बैलगाड़ी का फ़र्श बांस का होता सो उस पर पुआल रख कर गद्देदार बना दिया जाता ।और सफ़र शुरू हो जाता ,बैल अपनी मस्ती में चलता रहता ना कोई स्पीड पकड़ाने की आतुरता ना धीमे चलने की शिकायत ,सब बैल की कार्यक्षमता पर निर्भर होता ।कच्ची सड़क और बैल गाड़ी के हिचकोले बहुत मज़ा देता मानो कोई आज की ब्रेक डाँस वाली झूला हो जो प्रदर्शनी वाली मेला में लगा होता है ।कभी रात का सफ़र होता तो और भी मज़ा आता ,बैलों की गले की घंटी की आवाज दूसरों के लिए हॉर्न होता लेकिन मुझे तो लोरी की संगीत लगती ,और मैं सो जाता । बेल गाड़ी के नीचे एक लालटेन टंगा होता जिससे रास्ता भी दिख जाता ।उस समय का वही हेड लाइट था इस गाड़ी का ।

अच्छा अपने गाँव की सीमा यानी सिवान (सीमान ) लांघते समय कुछ टोटका भी होता था पाँच मिट्टी के धेला से माथे पर घुमा कर उसे उल्टा फेकना पड़ता ,माँ को ये दादी बताई थी ताकि बाहर की बुरी नज़र गाँव में प्रवेश ना करे ।गाँव में घर पर प्रवेश करते समय सबसे पहले लोटा में पानी लेकर पैर धुलाया जाता ,फिर कुल्ला करवाया जाता ,और भी कुछ कुछ टोटका होता तब जाकर आँगन में प्रवेश होता ,

    बैलगाड़ी वाले को उसके किराए के बाद उसे कुछ नस्ता भी करवाया जाता तब कही वापस जाने दिया जाता ।जाते जाते गाड़ी वान कुछ पुआल भी माँग लेता बेल को खिलाने के लिए ।

  मुझे गाँव में रहने के बाद पता चला की बैलगाड़ी की भी रजिस्ट्रेशन होता है ,बैलगाड़ी पर विज़िटिंग कार्ड इतना साईंज का टीन का नंबर प्लेट लगा होता है ।शायद उस समय इसका एक साल का रोड टैक्स आठ आना होता था ,लेकिन पकड़े जाने पर जुर्माना एक रुपया था ,सो लोग चेकिंग से डरते भी थे ।रोड इंस्पेक्टर होते थे जो इसे चेक करते थे और वहीं गाँव पर आकर यह नंबर प्लेट दे जाते ।ये मुझे इसलिए भी याद है की वे रोड इंस्पेक्टर मेरे घर पर आए थे मेरे बैलगाड़ी में नम्बर प्लेट लगाने ,बोले नहीं लगायेंगे तो मैं सड़क पर पकड़ूँगा तो जुर्माना देना होगा ।धोती कुर्ता में बड़ी रुआबदार थे वो इंस्पेक्टर ।

         उस वक्त बड़ी शान की बात थी  उन्नत क़िस्म का बैल रखना और और बैलगाड़ी रखना ।आज की किसी टोयोटा वाली फ़ीलिंग होती थी उस बैल गाड़ी में ……!उस बचपन के भी अनोखे दिन थे ……काश कोई लौटा देता वो दिन ।

©️nitesh

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

सुधा

 “मैं आपको प्रणाम नहीं कर सकी “


 काफ़ी अरसे बाद आज भी यह वाक्य मुझे बार बार  बेचैन कर देता है , आज भी लगता है मानो मैं ही गुनहगार हूँ ।

सत्रह वर्षीय सुधा विस्तर पर बैठ कर पढ़ रही थी और उसी कमरे में मैं एक कुर्सी पर बैठा उसकी काम काजी विधवा माँ से कुछ बातें कर रहा था ।कोई बाईस तेइस साल का मैं सुधा का भाई का प्रारंभिक स्कूल शिक्षक था ,मैं ख़ुद भी अभी बहुत परिपक्व तो नहीं हो पाया था परंतु उसकी माँ की दृष्टि में एक योग्य शिक्षक था ।थोड़ी देर बाद सुधा की माँ ये कहते हुए घर से बाहर सामान  लेने चली गई कि “सर इसे भी कुछ समझाइए इसका काबिल होना बहुत ज़रूरी है ,”

“अच्छा !” मैं एक गहरी साँस खींचते हुए उसकी और देखा ।”अब तुम किस क्लास में पढ़ रही हो “ 

“आई ए फर्स्ट ईयर में “ सिर झुकाए ही बोली 

“आख़िर तुम्हारी मम्मी तुम्हारे लिए इतना चिंतित क्यों रहती है ?तुम तो ख़ुद ही बहुत समझदार हो ?” मैंने भी पूछ डाला ।

 कुछ बोली नहीं बस मेरी और देखी और सिर झुका ली 

“क्या बात है !मम्मी को तुम पर यक़ीन नहीं है क्या ? 

 “पता नहीं “

फिर यह क्या फफक कर रोने लगी ।सहसा इस प्रतिक्रिया से मैं घबरा गया ।मेरी बुद्धि एक दम शून्य में चला गया था ।कमरे में बस हम ही दोनों थे ,ऐसे में वो रो रही थी ……समझ में जजों आ रहा था कि क्या करें ।कोई आ गया तो क्या समझेगा ……! एक साथ कई मिश्रित विचार मन में कौंधने लगा ।ख़ुद को सम्भालते हुए कहा …”तुम मज़बूत और समझदार लड़की हो इस तरह कमजोर हो जाओगी तो कैसे जीवन में संघर्ष करोगी !लोग तेरी कमजोरी का फ़ायदा उठायेंगे ,फ़िलहाल चुप हो जाओ ,कोई आ गया तो क्या समझेगा !”

 लेकिन सिसकियाँ जारी थी 

“लेकिन मैं क्या करूँ “ सिसकती हुई बोल गई 

“तुम मज़बूत हो रही हो ,पढ़ लिख रही हो पूरा परिवार की रोल माडल बन सकती हो “

मेरा वाक्य ख़त्म होते ही उसने सिर मेरी और उठाया आंसू से गीली लाल लाल आँखें बड़ी लाचारी से मेरी और देखने लगी 

“इस विकलांगता से ..! “

“विकलांगता ??”

“जी मेरे दोनों पैर पोलियो ग्रस्त है  मैं क्या कर पाऊँगी ?”  एक सांस में कह गई ।मैं हतप्रभ उसे निहारता रहा ,चाँद सी सलोनी चेहरा ,उसके गाल पर अब भी आंसू की कुछ बूँदे ठहरी हुई थी ,भींगी हुई पलकों में आँखें और भी चमकने लगी !मैं उसे निहारते हुए पैर की तरफ़ देखा वो चादर से ढकी हुई थी । शायद वो समझ गई ।चादर हटा दी और सहारे से खड़े होने की कोशिस करने लगी ।अब मुझसे रहा नहीं गया ,उसकी बाँहें पकड़ कर अपने सामने रखी कुर्सी पर ठीक से बिठाया ।कमरे में थोड़ी देर एकदम सन्नाटा छाया रहा ।बड़ी गहरी साँसे लेकर वो मेरी और देखकर बोली - सर मैं एक बात बताऊँ “

“हाँ हाँ बोलो “

“सर उस दिन मैंने आपको मोतीझील में देखा था ,मैंने आपको पहचान भी लिया था “

“अच्छा !फिर मुझे टोकी क्यों नहीं ?”

“मैंने कोशिश की लेकिन आप आगे निकल गए ,मैं अपने वैशाखी के सहारे इतना तेज चल नहीं पायी की आपके पास जाकर आपको प्रणाम कर सकूँ “

मैं बिलकुल स्तब्ध था ,मानो साँस भी हलक में ही अटक कर रह गया हो ।पता नहीं कब तक हम एक दूसरे को निहारते रहे  तभी सुधा की माँ वापस आ गई और मैं बिना कुछ बोले इजाज़त लेकर लौट आया ,…….


फिर कभी वो अवसर नहीं आया कि सुधा मिल पाती ।ना जाने कहाँ और किस हाल में होगी ! लेकिन उसके वो शब्द आज  भी मेरे संग है ।


::मेरी संस्मरण से 

©️nitesh bhardwaj

बुधवार, 7 सितंबर 2022

मुझसे मेरा शब्द

मुझसे मेरा शब्द रूठ गया


बहुत ख्वाहिश नही थी 

चाँद सितारों की

ना सोने चांदी की 

मेडल पाने की 

बस बिन बन्धन उछलकूद कर सकूं

धरा की आँचल में  हरीतिमा निहार सकूं

न जाने कैसे किस पग मेरा

दिल की एक धड़कन टूट गया

फिर मुझसे

मेरा शब्द रूठ गया


अभी तो शेष जीवन का लक्ष्य साधा था

खुद से खुद को देशाटन का वादा था

कुछ अपलक ही तो निहार पाया था

न जाने किन  अपराध से 

मेरा मुझसे

 रब रूठ गया

फिर मुझसे

 मेरा शब्द रूठ गया


अब यह अवशेष लेकर क्या करूँगा

पग बन्धन तोड़ न पाऊंगा

आश्रित जीवन का मोल कहाँ

 सांस जहाँ निर्बाध चले

अब वो पल क्षण कहाँ

परन्तु

नियति को सहना है

जो है भाग्य में उसे भोगना है

जो निश्चय है उससे डर कैसा 

जो कड़ियां

टूट गया सो टूट गया


फिर मुझसे मेरा शब्द रूठ गया

©nitesh

रविवार, 27 मार्च 2022

सुनो न

 सुनो !

फाल्गुनी  बयार सी थी 

आज तेरी बातें 

पतझड़ के बाद 

नव कोंपलें खिला रही थी तुम 

पलाश की फूल की तरह 

वीरान में भी दमक रही थी तुम 

स्मृति पर धूल की परत को 

साँसो से उड़ा रही थी तुम 

तेरी गेसुओं की महक से 

आज फिर धड़कने गति पकड़ ली 

अमराइयों में फिर बहका रही थी तुम 

सुनो  न 

तेरी संगीतमय बातों में मुग्ध 

तुझे निहार भी न सका 

कुछ मुझे भी कहना था 

पर कह ना सका 

तुम आज भी हो मेरी 

यही बात 

आज फिर समझ ना सका  

कल फिर मिलोगी तो 

अधूरे बात कर लेंगे हम 

जो तुम मुझसे 

और हम तुमसे  कहना  भूल गए थे 

वो बातें कर लेना तुम 

सुनो 

कल फिर मिल लेना तुम 

@nitesh

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

उपयोग

आप अपनी क्षमता का उपयोग करना नहीं जानते तो दूसरा आपका उपयोग कर लेगा और आप सदैव उपयोग की वस्तु बनकर रह जाएँगे ।

@nitesh

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

सोनभद्र

पिछले एक दशक में आदिवासी जनपद सोनभद्र के विकास की पथ पर जिस रफ्तार से दौर लगाई है वह एक मिसाल है। कभी नक्सल गतिविधियों और घटनाओं से कराहती यह सोनभद्र की वादियां आज सोन की चमक पेड़ो की झुरमुटों से सुंदर गीत गाने लगे है। पहाड़ो की गले मे हार की तरह सजी सड़कें, सुंदर वन,प्री वेडिंग और फिल्मों की शूटिंग करते लोग, एडवेंचर के लिए सुदूर से आते पर्यटक, रोक पेंटिंग, काला हिरन, पहाड़, नदी, सुरम्य वन और धुवाँ उगलती  औद्योगिक चिमनिया ,बिजली से जगमग जंगल के गांव, जुगैल, बसुहारी, चकरिया, झारखंड और बिहार सीमा तक पहुचने वाली लक्सरी कार, कितना सबकुछ बदल गया है, बिल्कुल सपनो की तरह।।वक्त था  जब सुदूर अंचल में मानव का जीवन जंगली जानवरों जैसा था।  अभी एक दशक पहले ही लोग नदी नाले की पानी पीने को मजबूर थे,दो जून की रोटी न के बराबर ही मिलती थी, चकवड़ की घास की रोटी से जीवन गुजारते थे, गंभीर से गम्भीर बीमारी में तंत्र मंत्र, भूत प्रेत, टोना टोटका पर ही आधारित थे, किसी को अस्पताल लाना हो तो दो दिन लग जाता था चारपाई पर ढ़ो कर  लाने में। बसुहारी,कोन, मांची, जुगैल, भाट क्षेत्र, आदि से लोग 6 महीने में एक बार अपने लिए नमक और मिट्टी तेल आदि खरीदकर लाते थे वो भी वनोपज के बदले। टपकती और  उजड़ते कच्चे मकानों में जिंदगी गुजरते थे। मुझे याद है गावँ के लोगों 6 महीने में कभी चावल का भात खाने को नसीब होता था। ऐसे में भोले भाले आदिवासी नियति के भरोसे ही जीवन यापन करते थे । इसी का फायदा उठाकर बिहार झारखंड के नक्सली सोनभद्र ,मिर्ज़ापुर और चंदौली में अपना डेरा जमा लिया।  आये दिन पुलिस को चुनौतियां मिलने लगी।  स्थानीय नागरिक के साथ पुलिस के जवान भी मारे जाने लगे। ट्रैक्टर, घर, गाड़ी, पुलिस थाना जलाए जाने लगे, राष्ट्रीय स्तर पर सोनभद्र में नक्सली  जमावड़ा की चर्चा होने लगी। भोले भाले स्थानीय आदिवासी को नक्सली गतिविधियों में सम्मलित कर कानून की नजर में अपराधी बनाये जाने लगे। ठीकेदार, वन विभाग के अधिकारियों से लेवि वसूलने की खबर आने लगी। तब जाकर केंद्र और राज्य सरकारों को चार राज्यो से घिरी इस जनपद पर चिंता सताने लगी। फिर शासन ने युवा और तेज तर्रार पुलिस अधिकारियों को यहां नियुक्ति कर भेजना शुरू किया। राजस्व विभाग और उसके कर्मचारी अधिकारी भय के कारण इस क्षेत्र में कोई भी विकास कार्य करने से डरते थे। 
          तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रघुवीर लाल और के सत्यनारायणा ने पुलिस बल के साथ जंगलो में प्रवेश कर नक्सलियों को चुनौती देना प्रारम्भ किये। जनता से संवाद करना प्रारंभ कर दिया, लोग बाग अब पुलिस को जानने लगे, आईपीएस के.सत्यनारायणा ने तो नक्सलियों के गतिविधियों को बारीकी से अध्ययन कर उस पर एक वृहद पुस्तक भी लिखी "दुश्मन को पहचानो"  बाद में यह पुस्तक बाद के पुलिस अधिकारी और देश के विभिन्न नक्सल क्षेत्र के पुलिस के लिए उपयोगी साबित हुआ। इसके बाद पुलिस अधीक्षक जो शैक्षणिक रूप से आई आई टी  इंजीनियर थे आईपीएस रामकुमार ने  नक्सल क्षेत्र में बुनियादी बातों पर शोध और अध्ययन कर एक रूपरेखा तैयार किया। जिससे यहाँ की आदिवासियों की जीवनशैली में बदलाव हो।बुनियादी ढांचों में विकास हो और लोग मुख्य धारा से जुड़ सके। एक तरफ तो इन्होंने कम्युनिटी पुलिसिंग पर जोर लगा दी,लोगो के बीच साइकल,राशन,बर्तन और जरूरत की समान का मुफ्त विरतण शुरू करवाया,तो दूसरी तरफ आदिवासियों के बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित करवाया इस से सम्बंधित एक फ़िल्म "राह आपन भाग्य आपन"  बनाकर जनजागरूकता  की।इन्होंने केंद्र सरकार को कई विकास कार्य की मसौदा को भेजा जिसे गृहमंत्रालय ने त्वरित स्वीकृति दे दी। परिणाम स्वरूप नक्सल क्षेत्र में सड़क,पुल  बनना प्राम्भ हो गया,चांचीकला का पुल,पटवध बसुहारी सड़क मार्ग, पनौरा बसुहारी मार्ग,  मांची आदि की सड़क  इन्ही का प्रयत्न रहा है।  वर्तमान में अपर पुलिस महानिदेशक श्री रामकुमार अपने उस काल को स्मरण करते हुये आज भी कहते है कि--------

 बाद के आईपीएस प्रीतिंदर सिंह जो मूल रूप से एम बी बी एस डॉक्टर थे सोनभद्र की चार्ज लेने के बाद इस कार्य को बड़ी तल्लीनता  से आगे बढ़ाया, कार्यकाल की सम्पूर्ण योजना नक्सल क्षेत्र का विकास करना मुख्य रहा। स्वयं की रुचि लेकर सड़क का निर्माण करवाना, समर्पण कर चुके नक्सलियों को रोजगार मुहैया करवाना, उनके शादी व्याह में मदद करने के साथ स्वयं सम्म्लित होना, ड्राविंग प्रशिक्षण दिलवाना, पुलिस में नौकरी दिलवाने के लिए अलग से शिक्षा और कोचिंग करवाना, हर परिवार को उनके दैनिक जरूरत की समान सरकार और उद्योगपतियों के सहयोग से मुहैया करवाना, सामान्य और गम्भीर बीमार लोगो को त्वरित इलाज पुलिस के स्वयं के खर्चे से अथवा किसी सम्पन्न से सहयोग लेकर करवाना, किसी भी गरीब और मजबूर की आवश्यकतानुसार मदद करना। चूंकि उनकी पत्नी भी डॉक्टर थी  सो वे भी सप्ताह में दो दिन नक्सल क्षेत्र में से देती थी।
 ये वो काल था जहां जिलाधिकारी पंधारी यादव और  डॉ प्रीतिंदर सिंह  आपसी तालमेल से नक्सल क्षेत्र में भरपूर कार्य किये। पुलिस को राजस्व विभाग और वन विभाग का सहयोग मिला,और जनपद विकास की पथ पर सरपट दौड़ने लगा। दूसरी तरफ पुलिस  तेज तर्रार इंस्पेक्टर के सहयोग से ताबड़ तोड़ इनकाउंटर और समर्पण कराने लगे।  आईपीएस रामकुमार के समय जहां कुख्यात नक्सली शत्रुघ्न मारा गया तो डॉ प्रीतिंदर सिंह के समय  कमलेश चौधरी का इनकाउंटर कर नक्सलियो की रीढ़ लगभग पूरी तरह तोड़ दिए। अब एक भी नक्सली घटना की चर्चा बंद हो चुकी थी, ताबड़तोड़ नक्सल क्षेत्र में विकास कार्य शुरू हुए।  ततकलों अपर पुलिस महानिदेशक बृजलाल जी ने इस क्षेत्र का दौरा कर यहां एक मजबूत अमन चैन का विश्वास भी जगा गए। बाद के युवा सामाजिक सरोकार रखने वाले आईपीएस दीपक कुमार  आदिवासियों और जनपद के लोगो मे  जनसंवाद कर काफी लोकप्रिय हुए पूर्व के कार्य को मूर्त रूप देते रहे ,   कम्युनिटी पुलिसिंग के कार्यो को और भी त्रीव गति प्रदान कर चरम तक लेजाने में कठिन प्रयास किये।, बाद में इपस मोहित अग्रवाल की कार्यशैली भी आदिवासियों को पसंद आई, हालांकि उनके कार्यकाल कम ही रहा परन्तु अमित छाप छोड़ने में सफल रहे, इसके बाद आईपीएस सुभाष दुबे के कार्यकाल नक्सलियों के ताबूत का आखिरी कील साबित हुआ,  इनके कार्यकाल में  एक दशक से जनपद में आतंक मचाने वाले मुन्ना विश्वकर्मा सहित आधा दर्जन कुख्यात नक्सली जेल के सलाखों के पीछे चले गये और सोनभद्र सहित चंदौली, मिर्जापुर नक्सल विहीन हो नव विहान के गीत गाने लगे।