इतनी मितव्ययिता से परिवार कुपोषण का शिकार तो होगा ही , सरकारी टूर के पैसा बचा कर साधारण बोगी में यात्रा करना और प्लेटफार्म के नल से घर से ले गए बोतल में पानी भर लेना, दो दिन तक घर रोटी और सुखी सब्जी से काम चलाना, यह सब स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव तो छोड़ता ही है। , पिछले कुछ दिन से बीमार रहने लगे, लेकिन किसी से बताने में भी मितव्ययिता बरतने लगे, अब रिपोर्ट आई कि उनके दोनों किडनी फेल हो गयी है। और सप्ताह में दो दिन डायलिसिस हो रहा है, । हर दो दिन पर पुत्र के साथ मोटरसाइकिल पर बैठकर जाते है डायलेसिस करवाने और फिर बेसुध उसी मोटरसाइकिल से वापस आ जाते है।,चारपहिया गाड़ी रखे नही है , और भाड़े की गाड़ी मोटरसाइकिल की खर्च से ज्यादा पड़ता है।
कुशल क्षेम पूछने पर उन्होंने बताया कि बहुत परेशानी है प्रति डायलेसिस 5 से 6 हजार का खर्च है, वो तो मेरा विभाग वहन कर लेता है, वरना तो मैं मर ही गया होता। 8 साल और नौकरी बची है पूरा कर लेता तो बच्चों के लिए कुछ ठीक ठाक व्यवस्था हो जाती, मुश्किल लग रहा है, किडनी ट्रांसप्लांट का सोच रहा हूँ लेकिन सब साथ दे तब न। बगल में बैठी पत्नी निरुत्तर रहती है, चूँकि किडनी देने का बारी इन्ही की है, चुप!!!फिर कहते है रोज रोज का यह डायलिसिस से यूनिवर्सिटी में पढ़ाने में भी मुश्किल है, किसी तरह 8 साल तो जीना ही पड़ेगा। थोड़ी देर में एक गहरी सांस खिंचकर कहते है , खैर मेरे जाने के बाद भी इसे कोई दिक्कत नही होनी चाहिए , यूनिवर्सिटी में कोई न कोई नौकरी तो मिल ही जाएगी, इस व्यवस्था को मेरी तरह ही सम्भाल ले तो जीवन मे परेशानी नही होगी।......मैं थका हारा वापस घर में कुर्सी पर बैठा सोच रहा हूँ कि जीने केलिए कितने पैसे चाहिए?? संचय और संग्रह जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्या ?जिसके लिए संग्रह कर रहे है उनकी भी तो कुछ जिम्मेदारी होगी अपने जीवन के प्रति ! क्या संग्रह का मोह जीवन और भारी पड़ने लगा है, लॉक डाउन ने तो सबको आईना दिखा दिया है कि हमारी मूलभूत आवश्यकता कितना कम है, बाकि तो हम दिखावे या संग्रह के लिए व्याकुल रहते है। कहते है न धन का तीन ही श्रृंगार है, या तो भोग कर लीजिए, या दान करने की आदत बनाइये या तो वह नाश हो जाएगा, यही संचित धन आपके मृत्यु और मृत्युतुल्य पीड़ा का कारण बनेगा।©nitesh
क्रमशः
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