बुधवार, 17 अप्रैल 2019

सोनभद्र लोकसभा 80

#सोनभद्र_लोकसभा_80
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र,जहां इनकी संख्या कम औऱ गैर जनपद,गैर आदिवासियों की संख्या में तेजी बढ़ोतरी हो रही है, नए नए कलकारखानों, बिजली घर ,खनिज खदान के कारण बाहरी लोग यहां रोजगार तलाशते आ गए है ,अच्छी आमदनी भी होने लगी, शांत और प्राकृतिक वातावरण के कारण लाखों लोग यही के होकर रह गए,लेकिन स्थानीय की हालत उतनी गति से बदली जितनी गति से मेहनतकश रोजगार के तलाश में आये लोग, लेकिन इन सबसे बड़ी बात ये रही कि आदिवासियों के हक के लिए बनाया गया लोकसभा क्षेत्र  सुरक्षित तो कर दिया गया लेकिन जागरूकता के अभाव में राजनीतिक रुचि नही रही आदिवासियों में, एक मात्र स्व0 रामप्यारे पनिका इस क्षेत्र के नेता और सांसद हो पाए जिसे पाकर लोग राजनीतिक कारोबार से निश्चिंत हो गए, उनके निधन के बाद फिर से कोई इनकी तरह चमत्कारी नेता नही हो पाए, सांसद बनने के लिहाज से रामसकल जी भी दो बार सांसद रहे, स्व0 सूबेदार प्रसाद भी कुछ कार्यकाल तक बने रहे लेकिन ये संसद में अपनी उपस्थिति के अलावा जनपद की समस्याओं से देश को वाकिफ नही कराया।
लोकसभा क्षेत्र सुरक्षित रहने के कारण गैर जनपद वासी लोगो में भी यहां के राजनीतिक रुचि नही पनप पाया।नतीजा राष्ट्रीय राजनीतिक शून्य वाला जनपद बनकर रहगया सोनभद्र। सपा बसपा भी स्थानीय राजनीति में जातीय कुचक्र का शिकार हो गई। जाति में भी स्थानीय और बाहरी का षडयंत्र चला गया। राजीनीतिक शून्यता के कारण गम्भीर समस्या भी पहाड़ की तरह बढ़ता चला जा रहा है। भौगोलिक क्षेत्र भी जनपद के विकास को दो भागों में बंट दिया। समतल क्षेत्र में सुविधाएं तो आसानी से पहुंचने लगी लेकिन दूर दराज को भगवान भरोसे ही छोड़ना उचित समझा, दूसरी बात जागरुकता भी समतल क्षेत्र के बीच ही रखा गया पहाड़ो में इसे परहेज रखना उचित समझा यहां के राजनीतिज्ञों ने। जिला मुख्यालय इसका जीता जागता उदाहरण है। प्रदूषण ,फ्लोराइड समस्या, चिकित्सा व्यवस्था, शिक्षा, उच्च शिक्षा, रेल यातायात, और स्थानीय रोजगार की समस्या आज भी जस का तस है।प्रचुर सम्पदा वाला यह जनपद अपने गरीब वासियो पर आंसू बहा रहा है,। प्रदेश के अन्यलोग ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह यहां की सम्पत्ति और रुपया अपने यहाँ तो ले जाते है लेकिन इस जनपद को दिनोदिन कंगाल बना रहे है। व्यापारियों अधिकारियों और कथित समाज सेवियों के लिए यह एक सुंदर चारागाह है।
2019 का लोक सभा चुनाव में भी आज को स्थानीय मुद्दा या समस्या नही है,राष्ट्रीय मुद्दा से स्थानीय को को इत्तिफाक भी नही है।ऐसे में सभी प्रत्याशी जो बाहरी है उनसे क्या उम्मीद किया जा सकता। पकौड़ी लाल कोल, भाई लाल कोल , और छोटेलाल खरवार को आजमाया जा चुका है, भगवती प्रसाद चौधरी जी भी बाहरी ही है उन्होंने मिर्ज़ापुर के लिए कुछ किया होगा लेकिन यह जनपद उनके प्यार के लिए तरसता ही रह है। देर से अपना नाम प्रत्याशी में सुमार करने वाली रूबी प्रसाद भी देखा जाय तो बाहरी ही है, उनकी जातीय प्रमाण पत्र का विवाद 5 साल तक चर्चा में रहा है, विधायक रहते उनकी छवि प्रशासनिक जरूर रही है, जनपद में रहने के कारण लोगो से आसानी से मुखातिब रहना उनकी खासियत हो सकती है लेकिन लोकसभा में स्थानीय मुद्दों को सही से रख पाए संदेह ही है।आज भी बहुत सारी जनता उनपर आंख मूंद कर विश्वास करने से परहेज करती है,  किसी दल  में स्थिर न होने के कारण लोगों को अपने मत पर विश्वास नही हो रहा, निर्दल,कांग्रेस,सपा की आंगन वो पहले ही घूम चुकी है ,नई पार्टी  साथ कब तक है ये भ्रम बना हुआ है। लेकिन इन सभी उम्मीदवारों में रूबी प्रसाद स्थानीय राजनीतिक जोड़ तोड़ में आगे निकल रही है, कारण राष्ट्रीय राजनीतिक कारों की उम्मीदवार चयन में सोनभद्र  को अनदेखी करना है। सोनभद्रवासी कहीं इसे दिल पर ले ले तो , भाजपा,कांग्रेस,और गठबंधन वालो के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। परिणाम तो भविष्य के गर्भ में है।
©नितेश भारद्वाज

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

विद्यापति जन्मस्थली

बिहार/मिथिला के महान कवि विद्यापति के जन्मस्थान मधुबनी जिले के बिस्फी गांव में जाकर उनके स्थान पर घण्टो ये सोचने पर विवश रहा कि इतने बड़े महान कवि जिसे मैथिल अपना आइकॉन समझते है और बंगाली इन्हें  अपनी भाषा का प्रणेता , उनके इस स्थान का महत्व इतना कमकर क्यूँ है??अभी पिछले सप्ताह मोदी जी बंगाल में ये कह आये की मिथिला भाषा की समृद्धि में विद्यापति का बड़ा योगदान है इतने पर हमारे कुछ मैथिल ठीकेदारों को मिर्ची लगी और फेसबुक पर उल्टियां करने लगे। देश ही नही विदेश में भी विद्यापति के नाम पर लाखों चन्दा वसूली कर सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर भद्दे नृत्य और भोजपुरी /हिंदी पाश्चात्य गीत का प्रदर्शन करवाते है।मैथिली के 99 प्रतिशत ठीकेदार मैथिल ब्राह्मण है जो देश विदेश में इनको कैश कराते है, मिथिला राज्य बनाने के नाम पर अपने वर्ग को दिग्भर्मित करते है, मैथिली भाषा को लेकर आंदोलन करते है लेकिन इनमेसे 99 प्रतिशत लोग इस जगह पर आने के लिए सोचा भी नही। किशन यादव और उनके टीम के ग्रामवासियों ने इस स्थान को अपने मेहनत से संजो कर रखा है,  पूछने पर बताते है कि कथित नेता और समाजसेवी यहां आते तो है बड़ीबड़ी बातें करके चले जाते , बयान भी देते है, आपके तरह ही बहुत सारी जानकारी इकट्ठा करते है लेकिन फिर दुबारा उनका दर्शन नही होता न ही कोई प्रगति हुई। पर्यटन विभाग ने एक हाल बनवा दिया है जो सदैव बैंड रहता है उसमें एक विद्यापति और उनके नॉकर उगना (जिसे साक्षात महादेव कहा जाता था) की मूर्ति है।, उसमे कबूतरों का बसेरा है, कभी कभार किसी संस्था या सहारा जैसे कम्पनी की मीटिंग होती है तब जाकर खुलता है, हम लोग किसान आदमी है,फुरसत मिलता है तो कभी कभार सफाई कर देते है, दुनिया मे विद्यापति समारोह के नाम पर लाखों बजट है लेकिन इस स्थान के लिए फूटी कौड़ी नही,फूल सिंह, संत कुमार जैसे कई लोग आए और विद्यापति की मूर्ति  और अन्य सुविधा के लिए बोल गए लेकिन दुबारा दिखे नही,। ...
ग्राम वासियों में इन कथित मैथिलों के प्रति काफी रोष है जो विद्यापति के नाम पर अपना दुकान चला रहे है या हर शहर में मिथिला को बेच रहे है, समारोह के नाम पर, साहित्य के नाम पर, सिनेमा के नाम पर, राज्य के नाम पर या राजनीति के नाम पर।उन्होंने ऐसे सभ्य लोगो से अपील भी की ऐसे ठीकेदारों को चन्दा देना बंद करे। इससे विद्यापति की आत्मा को दर्द होता है।
जन्मस्थान पर एक 20x30 का एक हाल है, बाहर एक मंच का चबूतरा है, पीछे की तरफ शौचालय है ,एक 3 फिट की मूर्ति गेट के पास लगा है, हाल का उपयोग सार्वजनिक कार्य और मतदान के लिए किया जाता है, हाल के अंदर दो मूर्ति है, दर्जनों अलमारी है जिसमे किसी किताब या साहित्य की जगह कूड़ा रखा हुआ है, हर तरफ घास फूस उग आया है,पर्यटक के नाम पर सप्ताह में एक आध लोग आ जाते है जो वहां के ग्रामीणों से चाभी मांग कर अंदर देख कर चले आते है।
हॉल के दाहिने तरफ एक फुट दीवार से घेरा हुआ जगह है जहां #सुरंग लिखा हुआ है, पूछने पर पता चला कि यही एक प्राचीनतम जगह है ,इस सुरंग के अंदर तो कोई गया नही, माना जाता है इसी के माध्यम से विद्यापति स्नान करने जाते रहे होंगे। गांव में ही एक मंदिर है ,मान्यता है इस मंदिर में विद्यापति और साक्षात महादेव जी पूजा करते थे।
विद्यापति की जन्मस्थली जहां आज तक कोई सरकारी समारोह भी नही हो पाया, और न ही इसे पर्यटन की दृष्टि से या साहित्यिक गौरव की दृष्टि से इसे ख्याति प्रदान की गई। ये मिथिला ही नही बिहार के लिए भी दुर्भाग्य है, बिहार के हाईस्कूल से लेकर दुनिया के सभी विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में इनकी कविता ,पद्य पढ़ाई जाती है लेकिन इनके गौरव को अक्षुण्ण रखने सरकार और समाज  दोनों की उदासीनता चिंतनीय है।
#अपील
मेरा एक व्यक्तिगत अपील है कि अगर आप को विद्यापति जी के नाम पर समारोह कर रहे है तो पहले जन्मस्थली हो कर आये और चन्दा से एकत्रित धन में कुछ यहाँ व्यय करें,समारोह के नाम पर कमा रहे गायक गायिका और आयोजक कुछ आय का हिस्सा यहाँ खर्च करें, बौध्दिक जन,पत्रकार,नेता सरकार से यहां के विकास के लिए मांग करें।मैथिल साहित्यकार साल में एक बार यहाँ आकर एक कार्यक्रम करें,। जो ठीकेदार विद्यपति जे नाम पर दुकान चला रहे है और अभी तक इस स्थान पर नही आये है यहां अवश्य आये ये आपके मुंह पर कालिख के समान है यहाँ आकर धूल ले। यहां कुछ साहित्यिक पुस्तक और ऑडियो वीडियो सामग्री दे जाए। और भी बहुत कार्य है जो इस स्थान के विकास के लिए कर सकते है।.और #आखिरी में विद्यपति के नाम पर नृत्य कराने से बेहतर है मैथिली या हिंदी कवि समनेलन करवाया करें।
@नितेश भारद्वाज

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

वो लड़का कुछ कह गया

बनारस में अक्सर शांत रहने वाला एक रेस्टुरेंट में अपने मित्र के साथ शाम को पहुँचा था, करीब 15 साल का सुंदर लड़का आर्डर लेने पहुंचा, एक चौमिन और कोल्डड्रिंक का ऑर्डर देकर बातों में मशगूल हो गया, थोड़ी ही देर में वो चौमिन ले आया,हमने उसे दो प्लेट में सर्व करने के लिए कहा लेकिन वो ठिठका रहा दुबारा कहने पर वो प्लेट में डालने तो लगा लेकिन उसके हांथ कांप रहे थे। मैंने पूछा "क्या हुआ क्यूँ नही डाल रहे हो ??" उसने घबराते हुए कहा"कोई गलती तो नही हो रही है मुझसे भैया ?" "नहीं" मैं समझ गया शायद ये नया नया वेटर है, "अभी यहां नया नया काम कर रहे हो क्या"मैने पूछ ही लिया।
"हाँ अभी 5 दिन पहले ही काम पकड़ा हूँ, "बड़ी मायूसी से बोला।
"कोई बात नही तुम सब सिख जाओगे, इससे पहले क्या करते थे "मुझे जिज्ञासा हुई।
कुछ नही पढ़ रहा था 10 का बोर्ड था exam देकर यहाँ काम करने आ गया" अब और उदास होकर  वो बोला।
"कोई बात नही काम कोई छोटा नही होता छुट्टी भर काम कर लो ,सफलता के लिए सबको शुरू शुरू में ऐसे काम करने पड़ते है बाद में बड़े आदमी बन जाते है,तुम्हारे पापा क्या करते है??"उसका मनोबल बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन अब उसका आंख भर आया था ।
"भैया चोरी चमारी से तो ये अच्छा ही है, पापा नही है, केवल मम्मी है और मैं ,वो बीमार रहती है, इसलिए यहां काम करना पड़ा, आज दवा लेकर जाऊंगा ,11 बजे रात को छुट्टी मिलेगी तब।"
बाल मन और उसपर उसकी हृदयस्पर्शी शब्द से मैं भी आहत हो गया, फिर उसे कुछ कहने की साहस न थी मुझमें, मैंने उसका नम्बर मांग लिया ताकि फिर उससे बात कर सकूँ, वह फिर आगे की टेबल पर चला गया जहां उसी की ही हमउम्र का लड़का अपनी सहपाठिनी के साथ बैठा उसे आर्डर देने का इंतज़ार कर रहा था।