#मेरा_एकांतवास 20
शायद अब कुछ लोगो को ही याद होगा कि गेहूं या मक्का से आटा बनाना आज की तरह आसान नही था, बड़े सवेरे उठकर महिलाएं महिलाएं घरों मे हाथ से चक्की चलाती थी , मुट्ठी भर अनाज दाल कर उसे पिसती रहती , कभी कभी एक ही चक्की को दो महिला मिलकर चलाती थी , साथ मे सुबह सुबह कुछ गीत भी गाती थी, ताकि काम करने में मन भी लगता और खुशी भी मिलती। इसी तरह से धान को ओखली या ढेंकी जो पैर से चलाई जाती थी उस से चावल निकाला जाता था,यानि धान कूटा जाता है, ऐसे ही चूड़ा की कुटाई छटाई होती थी, बाद में मेरे गांव में एक सम्पन्न परिवार ने आटा पीसने की चक्की और धान कूटने का मशीन लगाए, इसमे भी थोड़े सक्षम लोग ही गेहूं धान पिसवाने या कुटवाने जाते थे, बांकी लोग हाथ चक्की का ही उपयोग करते। लोग अपनी गेंहू या धान मील(चक्की) पर रख आते। जैसे ही मील चालू होता लोग भाग कर मील तक जाते ताकि गेंहू पीस जाये। इस आटा चक्की वाले मील की खास बात यह थी कि उसके साइलेंसर पर एक डिब्बा लगा रहता जो कू कू की आवाज करता, और पूरा गांव समझने लगता कि चक्की चालू है।यही चक्की का पहचान था और गांव की सम्पन्नता का द्योतक भी। उस समय चक्की चलना बड़ी व्यवसाय माना जाता था, बाद में तो हर टोले मुहल्ले में चक्की स्थापित हो गया जिस कारण गांव का पुरातन चक्की बन्द हो गया ,और ये व्यापार उस परिवार के लिए सामान्य बिजनेस हो गया जो स्टेटस के विरुध्द था। लेकिन आज भी चक्की का कू कू का आवाज गाँव मे होने का प्रतीक था, यह गांव का आवाज था जो आज के शोरगुल में कहीं गुम हो गया है।©nitesh
क्रमशः
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