गुरुवार, 29 मार्च 2018

बोली


मुझे लगता है भोजुपरी अपनी शालीनता(कुछ फिल्मी अश्लीलता के बावजूद) के कारण देश विदेश के कई कोने में पहुंच गया, और मैथिली स्वम्भू होने की दशा में संवैधानिक मान्यता के बावजूद, अंगिका बज्जिका, में विभक्त हो रहा है, क्षेत्रीयता भी सीमांचल, मिथिलांचल, कोशियांचाल, अंग क्षेत्र, बज्जिका क्षेत्र में बट रहा है, ये स्थिति रही तो कुछ दिनों बाद गिनेचुने लोगो की बोली बनकर रह जायेगी मैथिली। मैथिली में सब को समाहित करने का लय जब तक नही मिलेगा, लोग तबतक इस ओर आकर्षित नही होंगे। साहित्यकार भी अपनी क्षेत्रीयता और जुगाड़ तकनीकी तक ही सिमट रहे है,

मंगलवार, 27 मार्च 2018

बलात्कार के बाद निर्मम हत्या -एक सामाजिक अपराध भी है

बलात्कार और उसका निर्मम हत्या को रोकना किसी कानून या शासन की अकेले वश की बात नही,अन्यथा निर्भया कांड के बाद कठोर कानून और सज़ा के बावजूद इस मे इज़ाफ़ा ही हो रहा है , यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बुराई है इसमें समाज के सभी वर्ग को आगे आकर अपने पुराने संस्कार को संरक्षित करना होगा, एक सामाजिक बहस छेड़नी होगी आधुनिकता और अश्लीलता में अंतर समझना होगा।आज सबसे ज्यादा हिंसा और यौन शोषण करीबियों के द्वारा घटित होती है ,90 प्रतिशत घटना कानून के दरवाजे तक पहुच नही पाती ऐसे में किसी कानून या उसके पालन करने वाले इस तरह की घटनाओं पर पाबंदी नही लगा सकती,दूसरी तरफ कठोर कानून का भय और दुरुपयोग भी सामान्य घटना के बाद बलात्कार और हत्या को उद्वेलित करता है,ऐसे में बदलते रहन सहन और मोबाइल इंटरनेट के युग मे इसे रोक पाना भी असम्भव है, अतःसमाज और समुदाय में एक स्वच्छन्द बहस की जरूरत है,

विश्व रंगमंच दिवस

विश्व *रंगमंच दिवस* आपके लिए
आप महान हो
जो अपनी भावनाओं में
हर किरदार को जी लेते हो ,
दिल की दर्द को छुपाकर मुस्कुरा लेते हो,
आग पेट मे लगी होती है
और सामने मधुर स्वर निकाल लेते हो,
दर्द किसी का भी हो ब्यक्त आप कर लेते हो,
धन्य हो आप रूप सबका धर लेते हो,
बस खुद का कभी नही समझ पाते हो
प्रणाम आप रंगकर्मी को
जो समाज को सबरंग दिखा देते हो
©नितेश भारद्वाज

शनिवार, 3 मार्च 2018

ताजमहल जैसी एक कलाकृति बिहार में भी है

मित्रों ,मेरी ली हुई दो तस्वीर आपके समक्ष प्रस्तुत है,मेरे ख्याल से समानान्तर अध्ययन आवश्यक है, दोनों मकराना संगमरमर के बना हुआ है,बेल बूटे, नक्कासी दोनों में उम्दा किस्म का है,दोनों का अपना इतिहास है,एक मुगलो का कृति है तो एक भारतीय हिन्दू शासक द्वारा निर्मित,एक मे प्रेम का प्रतिरूप है तो दूसरे में आस्था का स्वरूप है ।
राजनगर,मधुबनी में 18वीं सदी का निर्मित यह माँ काली मंदिर की बनावट, नक्काशी, बेलबूटों को देखने से ताजमहल जैसा ही लगता है, चमक तो आज भी ताजमहल से ज्यादा है, लेकिन दुर्भाग्य है मिथिला का,बिहार का कि इसकी देखभाल और प्रचार प्रसार  शून्य है, वीरान पड़ा यह ऐतिहासिक धरोहर दिनरात अपने पीढ़ियों के उदासीनता पर आंसू बहा रहा है।समाजसेवी,इतिहासकार,साहित्यकार,कलाकार और सरकार की घोर उपेक्षा के कारण बिहार का यह बेशकीमती धरोहर वीरान पड़ा है , सन्निकट के कई बेशक़ीमती मंदिर और इमारत धराशायी हो चुका है,। अगर इसे बचा लिया गया और प्रचारित किया गया तो निश्चित तौर पर उत्तर बिहार में लाखों लोगों को पर्यटन से रोजगार मिलने की उम्मीद जगने लगेगी,। यदि बर्बाद हो गया तो आनेवाली पीढ़ी अपने पूवजों को कभी माफ नही करेगी। उम्मीद है बिहार,और बिहार से बाहर के लोग इसे बचाने के मुहिम में मेरा साथ देंगे, अपने धरोहर को बचाने में सहयोग करेंगे,