#मेरा_एकांतवास 17
बाबा के परलोक सिधारने के बाद मैं धनबाद से वापस गांव रहने आ गया था, यही कोई 11 वर्ष की उम्र रही होगी। गांव की आबो हवा मेरे लिए अचरज भरा था, चावल कैसे बनता है उस समय तक नही जानता था, बाद में तो शनै शनै यह भी जानने लगे कि मडुआ की खेती कैसे होती है, महुआ कैसे बिना जाता है,बहुत जल्दी ही अल्प उम्र में ही खेती किसानी भी जान गया था, सब कुछ हल बैल और मजदूर पर ही निर्भर था , हाँ,उस समय हर व्यक्ति का अपना मजदूर होता था खेती करने वाला ,बदले में उसे कुछ खेत और मजदूरी में अलग से भेंट भी मिलता था , जिसे डिक्शनरी में बंधुआ मजदूर कह सकते थे। उस समय कृषि उपज आज की तरह उन्नत नही था, उस पर बाढ़ और सूखा लगभग हर तीसरे साल तबाह कर जाता था, दो जून के भोजन आज की तरह तो कत्तई नही मिलता था, कुछ धनाढ्य शायद दो तीन प्रकार के सब्जी खा लेते हो ,अन्यथा आम घरों में मेहमान आने पर ही ऐसी व्यवस्था हो पाती थी। मिथिला में चूड़ा दही एक सामान्य और प्रतिष्ठित रेडीमेड भोजन था, लगभग हर घर मे यह तैयार रहता था, मेहमान का सबसे त्वरित स्वागत इसी से होता था, मुझे इसका स्वाद प्रसाद के रूप में लगा। हर गांव में एक दो ठाकुरबाड़ी होता था, जहां नित्य सुबह शाम भोग लगाई जाती थी।मेरे घर के पड़ोस में एक ठाकुर बाड़ी था, शाम के भोग की जैसे ही घण्टी और शंख ध्वनि बजने लगता मैं ठाकुर बाड़ी की ओर भागता। भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी.... सुर में मिलाकर गाने लगता , कभी घण्टा या घण्टी भी बजाने लगता। फिर हथेली पर प्रसाद में 50 ग्राम चूड़ा दही और गुड़ और तुलसी दल मिश्रित मिलता। वो प्रसाद मेरे लिए अमृत समान होता, मन की जितनी तृप्ति इस प्रसाद से होती उतना किसी भी व्यंजन से नही । यही कारण है कि आज भी गांव से लेकर शहर तक मे जब चूड़ा दही को भोजन के रूप में ग्रहण करता हूँ तो वह ठाकुर जी का प्रसाद ही समझ मे आता है , बचपन मे मनमस्तिष्क में बैठा सम्बद्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत मुझे आज भी चूड़ा दही प्रसाद स्वरूप ही लगता है, हो भी क्यूँ न , इससे शुध्द कोई भोजन भी नही होगा । केले के पात पर चूड़ा हो ,दही हो, गुड़ या चीनी हो , साथ मे रसगुल्ला हो तो मिथिला का अप्रतीम भोजन कहलाता है, हर शुभ अवसर पर यह आज भी सर्वोच्च भोजन है, अब मौसम के अनुसार इसमे अचार, आम , सब्जियों को भी जोड़ दिया जा रहा है लेकिन रसगुल्ला इसका पर्याय अवश्य है। आप अगर मिथिला में जाये तो दही चूड़ा अवश्य खाये, चूड़ा दही से बेहतर है दही चूड़ा। जिसमे दही की मात्रा अधिक और चूड़ा की मात्रा कम होता है।
©nitesh
क्रमशः
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