दुनियां भर की उलझनों के बीच
एक पल तो हो
जहां हम हो और हमारी बातें
जहां सुबक कर रो भी ले
ठहाकों की गूंज भी हो
तमाम अपनो में कोई अपना तो हो
जहां खुद की शिकायत कर सकूं
अपनी गलतियों पर हंस सकूँ
जिसकी तारीफ कर
महान बन सकूँ
जो मेरी कमियों को गिनाए नही
सराहे और सुलझाए
उन आदतों में सम्मलित हो ले
जिसकी सब मजाक बनाता हो
घर की तमाम बिखरे सामानों में
एक कोना तो हो
जहां खड़े होने पर
खुद का होने का अहसास तो कर सकूं
न जाने क्यों एक छोटी सी रिक्त स्थान की
तलाश अब भी है
जहां अपना नाम लिख कर
फिर मिटा कर मुस्कुरा तो सकूँ