#मेरा_एकांतवास 7
भारतीय वातावरण में मनुष्य परिस्थितियों से बहुत जल्द सामंजस्य बिठा लेता है, हर व्यक्ति अब एक लक्ष्य के प्रति दिनचर्या बना लिया है, शुरुआत में जो समस्या थी हो आदत में समाहित हो खत्म हो गयी। , अब सबकुछ नए निर्देशो के पालन करने में है, अधिकतर लोग फुरसत में है तो मीडिया वाले उन्हें अपने ढंग से खुराक भीबड़े रहे है और सोशल मीडिया में उसकी काट ,इन सब के बीच बहस में उत्तेजना,निराशा ,हताशा फिर एक बड़ी उम्मीद कि इस संकट से निकल जाएंगे।
हर आदमी का दिनचर्या एक नए ढांचे में समा गया है, सबसे खुशनुमा ढांचा ग्रामवासियों का है, सब दूर दूर भी है कोई भी अपनापन कम नही हो रहे, शहर में सब करीब करीब है और उन अपनापन का परीक्षा लिया जा रहा है, प्रेम प्रगाढ़ भी हो रहा है और समायोजित हो जीने की कला भी सिख रहे है,लेकिन यही मौका है जब सबको अपने बृद्ध जन बुजुर्गों की खास निर्देश वाली बातें, घटना याद आ रही है,लोग अपनो को याद कर घर मे एक संवाद कर के रहे है। सामाजिक विचारधारा वाले लोग समाज सेवा में भी लगे है,मेरे एक मित्र ने वीडियो कॉल से दिखाया कि कैसे पूरी फैमिली सिनेटाइजर और मास्क तैयार कर रहे है उसे बाटना है,हम हालात की ओर समायोजित होने को तैयार है, संकट काल की समाप्ति पर बेशक हम आर्थिक धरातल पर थोड़े कमजोर होंगे लेकिन पारिवारिक और सामाजिक समरसता मजबूत होगी। हर दुखबको मिल बाट कर वहन करने की क्षमता में वृद्धि होगी। राजनीतिक परिदृश्य भी बदल होगा, जनता किसी भी मजबूत तर्क में बंधने के बजाय अतार्किक बातों में उलझा हुआ मिलेगा। सामूहिक सहयोग को हम अपना नैतिक कर्तव्य समझने लगेंगे। आज जो हम अपने अधिकार के बारे में उद्वेलित तो रहते है लेकिन कर्तब्य के सम्बंध में अपना सब भूल जाते है। कुल मिलाकर यह कोरोनो जिंदगी को एक नए आयाम में गढ़ना शुरू कर दिया है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें