शनिवार, 28 दिसंबर 2019
फिर मुझे जी लेने दे
बुधवार, 4 दिसंबर 2019
मेरा अख़्स
शुक्रवार, 1 नवंबर 2019
जनसंख्या नियंत्रण
शनिवार, 26 अक्टूबर 2019
एक दीया
शुक्रवार, 13 सितंबर 2019
यात्रा
आसान नही होता
ये अंतर्मन की यात्रा
उम्मीदों की चिता जलाना पड़ता है
अपेक्षाओं आकांक्षाओ को
दफ़नाना पड़ता है
ईर्ष्या -प्रेम से मुंह मोड़ना पड़ता है
मोहपाश को तोड़ना पड़ता है
अतीत को त्याग कर
भविष्य का झोला उठाकर
फिर अज्ञात पथ पर निकलना पड़ता है
उस पथ पर जहाँ
क्लेश रंज मात्र भी नही
अंधेरा भी प्रकाश की भांति चमकता हो
संशय का नामोनिशान न हो
हर क्षण अलौकिक अहसास हो
सत्य हो और कुछ नही
खुद की समीक्षा हो
स्वयम का सम्मान हो
स्वयम ही आत्मा हो
स्वयम ही परमात्मा हो
सृष्टि का साक्षत्कार हो
शून्य ही सम्पूर्ण हो
शून्य में ही आनंद
आनन्द ही प्रकृति
शून्य ही सत्य
सोमवार, 26 अगस्त 2019
मुश्किल
बहुत मुश्किल है इस आबोहवा में
विचारों के पतंग से पेंच लड़ाना ।
झूठ फरेब ओ दहशत के फिजा में
तेरे सामने खुद को जिंदा बताना ।।
©nitesh
बुधवार, 14 अगस्त 2019
वो आखिरी सावन
यही तो महीना था सावन का
जब आखिरी बार निहार पाया था उसे
सहेलियों संग बारिश में भींग कर
खुले आसमान में
उस ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी
जो मुझे लेकर जा रहा था
लंबी से ट्रेन में एक झलक पाने को
सावन की बूंदों में आंसुओ की धार
बहा रही थी वो
जैसे ही गुजरा था उसकी निगाहों से मैं
उछल कर खूब हाथ हिलाई थी
फिर दोनों हथेलियों से मुंह ढक कर
खूब हिचकोले ली थी
तब तक ओझल हो गया था मैं
दूर बहुत दूर चला जा रहा था मैं
न जाने कैसे सम्भलकर गयी होगी वो
घर की चौखट तक
कितनी लड़खड़ाई होगी वो
कुछ नही था दूरियों के बीच
न खत न तार
न कोई सूत्रधार
आज की तरह न फोन न फेसबुक
बस एक वादा , एक भरोसा
जो उस पानी मे ही बह गया था
हाँ बचाकर रखा था एक हिचकी
जो प्रति दिन नियत समय पर
आ रहा था
यह समय भी उसीने निर्धारित की थी
शायद उसी ने मिटा दी
जाने क्यूँ वो हिचकियाँ अब नही आती
परन्तु उसकी चंद लम्हो में सदियों की बातें
आज भी तैरती है गेसुओं की खुशबू
और बिन रस्मो रिवाज की यादें।
आज भी वजूद में है वो मासूम सी
अधखुली सी अधर ,चंचल आंखों वाली
तस्वीर..........और वो दो पंक्ति की खत
©nitesh
बहन
बहन
बहन की छवि अब
घर की चहारदीवारी में हीं दिखती है
शहर की सड़कों पर
जोड़ियों में दिखती है लड़कियां
गर टोक भी दूँ तो अपमान समझती है
लड़कियाँ
स्वच्छंद जीवन शैली में
संस्कार से अनजान है लड़कियां
लाज विहीन, वस्त्र क्षीण
हमारी ही बहन
होती है लड़कियां
आंगन के बाहर बमुश्किल
मिलती है बहन स्वरूपा
भाई के भावनाओं के अभाव में
असुरक्षित है लड़कियां
भातृ भावनाओ से जुड़ने से
आज झिझकती है लड़कियां
कैसे कह दूं बहन वस्त्र सम्भल कर पहनो
हॉट सेक्सी नही अपनो की बहन बनो
आंखों की हया में सम्मान की गहना हो
हाँ कह सकूं कि तू मेरी बहना हो
वो आंखे निकाल लूँ उसकी
तेरी अंगों पर जो नजर टिके
बस संस्कारो में तुझे रहना हो
बहुत बड़ा मन करके
देखता हूँ नजरें नीचे करके
परन्तु भावनाओ में बसता नही
फैशन परस्त ये बहना
भाई की भी सम्मान हो
बहन कहने में भी अभिमान हो
तेरी हर चाहत का ख्याल रखे
संस्कारो का जब सम्मान रखे
तेरी ललाट की तेज चमके
तो उठ न पाए
बदनीयती की पलकें
छाती ठोक कर कह सकूं
हजारों में एक मेरी बहना है
मेरे घर समाज और संस्कार की गहना है।
गुरुवार, 8 अगस्त 2019
संसद में धारा370 के निरस्तीकरण पर विरोध के मायने
70 सालों में बिना कोई कठोर कदम उठाए,शान्ति और प्रेम के लिए प्रयास करते रहे। कोई नतीजा नही निकला, कई सरकारें आई और चली गयी सबके सामने कश्मीर समस्या ज्यों का त्यों रहा।अगर कांग्रेस सहित कई अन्य दल धारा 370 के हटाने के तौर तरीके पर सवाल खड़ा कर रहा है तो उसे ये सुझाव भी बतानी चाहिए जिसे पिछले 70 सालों में नही कर पाए। अगर आप जान बूझकर ये समस्या रखना चाह रहे थे ,तो बात दीगर है, हर साल सैकड़ो सैनिकों की कुर्बानी, हज़ारों नागरिक की जान जोखिम में रखे रहना , देश मे सीमा को लेकर तनाव रखना ये सब क्या था?इसका समाधान क्यूँ नही ढूंढा गया?आज जब कठोर निर्णय लिया गया तो आप (विपक्ष)उखड़ गए।
क्या देश मे दो विचारधाराएं पल रही थी ,जिसे अब बेनकाब होना पड़ रहा है ? या वोट के खातिर देश विरोधी विचारधारा को पालना चाह रहे है , कुछ ऐसी ताकतों को खुश करने के लिए विरोध कर रहे है जिससे वोट बटोरा जा सके। तो ये जान लीजिए इन वोटों के मालिक भी अब आप अकेले नही रहे। आज आपकी विरोधी विचारधारा वाली छवि , आपको और देश को पीछे ले जा रही है। इन कृत्य से देश को अपना समझने वाली जनता न तो आपकी विरोध के सुर को समर्थन कर रही है ,ना ही आपके कार्यकर्ता इन बातों से इत्तिफ़ाक़ रखती है , देश का नुकसान इस बात से है कि कांग्रेस ,सपा जैसे मजबूत विपक्ष बहुत बहुत कमजोर हो रही है , और सत्ता धारी मजबूत। बिना मजबूत विपक्ष के सत्ता बेलगाम हो जाती है। कुछ तो ऐसा कीजिये जिससे जनता को आप पर विश्वास हो और अपने लिए रख मजबूत पक्ष ने सही विपक्ष ही चुन लें। देश हित के लिए आम जनमानस की भावनाओ का सम्मान कीजिये , जबकि देशकाल के लिए बहुत जरूरी हो। केवल विरोध करने के लिए विरोध न करें। विरोध करने के लिए सत्ताधारी पार्टी की बहुत सारी कमियां मिलेंगी । जिससे अपनी राजनीतिक छवि बन जाएगी।
©नितेश
सोमवार, 22 जुलाई 2019
लाल होती मिट्टी
अमूमन शांत और कम बोलने वाला आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र आज विकास के नाम पर सभ्य दिखने वालों बहरूपिये लुटेरों के जकड़ में फंस गया है। बात विकास की थी,इनके आदिम युग वाली जनजीवन से बाहर निकाल कर शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोजगार देने की थी लेकिन जिम्मेदार इनकी बेशकीमती जंगल, खनिज और उपजाऊ जमीन इनसे छीनकर इनको प्रतिदिनसंगीन अपराधी घोषित कर जेल भेज रहे है,, इनके सदियों की आशियाना को उजाड़कर , कोई फार्म हाउस , स्कूल, आलीशान मकान, खेत, आश्रम, और व्यापार चला रहे है। कथित समाजसेवी, सफेदपोश नेता, प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी, और व्यापारी अपना साम्राज्य स्थापित कर इन्हें फिर से मजबूर कर नक्सली बनने को बाध्य कर रहे है। जबकि भोले भाले निरीह आदिवासी अब तक न तो लोकतंत्र ने अपने जीवन का अधिकार समझ पाए न ही मौलिक आवश्यकताओ तक पहुंच सके , 2004 तक घास की रोटी खाने वाले, नाले की पानी पीने वाले , और अंधविश्वास में जीने वाले ये जन जीवन अब भी जीवन के भौतिक दर्शन से परिचित नही है। जो है उसी को नियति समझ जीवन यापन कर लेते है।
ऐसे में संगठित हो अपनी जमीन और अस्मिता की रक्षा के लिए जब भी आगे आता है उसे मौत ही मिलती है। यातनाएं ही दिया जाता है ,मानो वो जीवन न हो ,वो भारत का मूल नही हो। कथित विकसित सभ्य और भोले भाले आदिवासियों के बीच की लड़ाई में अक्सर ये पराजित ही जाते है।
आजादी के बाद से इनकी ही जमीन को इनके बिना विश्वास में लिए सभी बन्दरबाँट करते रहे । न तो इनको कभी मुआवजा दिया गया ,न ही इनसे इज़ाज़त ली गयी। सभी दल के सत्ता के नुमाइंदे इनके साथ ज्यादती ही करता रहा है। चालाक, दबंग, लोगो का शिकार होना इनकी नियति बन गयी है।न्याय के द्वार पर भी इनके सहयोग करने वाले कम ठगने और विरोधी के संग गठजोड़ वाले अधिक है। राजनीति और नेतृत्व विहीन ये आदिवासी राजनीतिज्ञों का शिकार होकर सबकुछ लुटा बैठे है ।ऐसे में इनकी आवाज अगर मीडिया की आवाज बनती है तो इनका जीवन भी देश के आम नागरिकों की हैसियत से हो जाएगी।
वर्तमान परिपेक्ष्य में अपनी मूल जमीन के लिए संघर्ष के दौरान 10 गरीबो की हत्या और 16 का घायल होना मीडिया और राजनीति की सुर्खियों में है । ये घटना न तो पहली है और नही आखिरी। जब तक सोनभद्र की लाखों हेक्टेयर जमीन को सफेदपोश , नेताओ, व्यापारियों के कब्जे से मुक्त कर मूल आदिवासियों को लौटाया नही जाता। हमारी 50 मिनट की फ़िल्म "सांझ भईल" 2004 की बनी हुई है , ये उस समय की हालात को दर्शाती है कि अमूमन सामान्य जानकारी से दूर ये गरीब किस तरह सर्वे सेटलमेंट, समाजसेवी, प्रशासन, न्यायप्रणाली,पुलिस और दबंग की चक्रव्यूह में अपना सबकुछ गवां कर कालकलवित हो जाता है ,इनकी पीढ़ियों पर नक्सली की तमगा लगा दी जाती है जबकि नक्सली शब्द इन्हें मालूम भी नही है।
सोनभद्र की लूट की तत्कालीन और वर्तमान परिस्थिति को समझने में ये फ़िल्म सहायक होगी इस उद्देश्य से यह आपके समक्ष प्रस्तुत है।
मैंने सोनभद्र में1984 से छात्र जीवन से ही पत्रकारिता साप्ताहिक अखबार में लिख कर शुरु की, 1986 से आदिवासी गांवों का जीवन मेरे आकर्षण का केंद्र रहा है। इन्ही की जीवन से प्रभावित हो मैंने यह टेली फ़िल्म का निर्माण कम संसाधन और सामान्य तकनीक से किया। इसके बाद भी क्षेत्र के विकास के किये पुलिस की कम्युनिटी कार्य मे सहयोग कर इस क्षेत्र के जनजीवन स्तर बदलने में सहयोग किया जिसके किये मुझे कई प्रसस्ति पत्र भी मिले। सड़क के विकास के साथ ही सोनभद्र के नैसर्गिक सौंदर्य को पर्यटकों तक पहुचाने के लिए निरंतर फोटो, लेख , भ्रमण , ब्रोशर और सेमिनार के माध्यम से सोनभद्र को प्रचारित करने का कार्य किया। 2009 में आदिवासियों को नक्सल गतिविधियों से दूर बच्चो को शिक्षा से जोड़ने के लिए 55 मिनट की एक फ़िल्म "राह आपन भाग्य आपन" का निर्माण किया जिसकी संकल्पना तात्कालीन पुलिस अधीक्षक रामकुमार जी थे। आदिवासियों के जीवन और कम्यूनिटी पुलिसिंग, मनरेगा की उपयोगिता,पर्यटन, शिक्षा आदि अपर अब तक मैंने 60 से अधिक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म का निर्माण कर संबंधित विभागों और संस्थानों को देता रहा हूँ।
बुधवार, 17 जुलाई 2019
जमीनी विवाद में 10 की हत्या
सोनभद्र की घोरावल थाना के मूर्तिया गांव में 10 लोगों की हत्या और 24 लोगो का घायल होना, जनपद ही नही प्रदेश के लिए चिंता का विषय है, प्रश्न केवल ये नही है कि कानून व्यवस्था ही असफल है ,प्रश्न ये भी है कि स्थानीय और जिले के जिम्मेदार राजस्व विभाग इसे रोक सकता था।
पुलिस की नजरिये से देखा जाए तो एक बहुत बड़ी विफलता है कि 32 ट्रैक्टर से 300 लोगो की कब्जा करने की तैयारी और ये सभी का मौके पर पहुंच जाना स्थानीय और जिले की पुलिस पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या सब इस घटना के लिए पहले से मैनेज थे?? अपराधियो को भेज कर घटना का या जमीन कब्जा होने का इंतज़ार कर रहे थे?? क्या इसे समय रहते रोका नही जा सकता था ???
खैर ये तो तात्कालिक उपाय था लेकिन सोनभद्र में जो कभी मुफ्त का जमीन हुआ करता था आज समय के साथ बेशकीमती हो चला है उसे आदिवासियों के ही से अलग सफेदपोश ,दबंग, और राजनीतिक रुतबा वालो के नाम कर भविष्य की बड़ी बड़ी घटना को जन्म देने का काम सर्वे सेटलमेंट और राजस्व विभाग ने किया है। अनुमानतः डेढ़ लाख हेक्टेयर सरकारी और गैरसरकारी जमीन को इन लोगो ने कब्जा कर रखा है। सरकारी नुमाइंदे रिश्वत खाकर सरकारी जमीन की खोजखबर नही लेते वही गरीब अपनी बेबसी के कारण अपनी ही पुस्तैनी जमीन से हाथ धो बैठते है। अब जब ये बेशक़ीमती होने चला है तो इन गरीबो के पीछे भी कोई स्वार्थवश खड़ा हो गया है (इस घटना से ताल्लुक नही) नेपथ्य से कब्ज कब्जा की लड़ाई शुरू हो गयी है, ऐसे में ये घटना न तो पहली है और न ही आखिरी सोनभद्र के परिपेक्ष्य में। पूर्व और वर्तमान की जिम्मेदारों को जबतक जेल भेजने की कारवाई नही होगी ये घटना होती रहेगी , लोग मूकदर्शक बनकर देखते रहेंगे।
मूर्तिया गांव की घटना राजनीतिक दें नही है ये अधिकारियों ,कर्मचारियों की उपज है, इनपर अगर करवाई नही होती तो सांप की लकीर पीटने से क्या फायदा?सोनभद्र राजनीतिक और सामाजिक संवेदना शून्य है , यहाँ केवल सम्वेदनायें अवैध खनन, परिवहन के हिस्से के लिए उपजती है , ऐसे में कुछ मानवाधिकार सरीखे संघठन ,आगे आकर इनकी लड़ाई लड़कर इन क्रूरता से इनकी रक्षा करवा सकती है। नेता तो इसमें भी अपनी आर्थिक स्वार्थ ही ढूढेंगे।
रोया है आज बाढ़ भी
बहुत रोया है आज बाढ़ भी
थम सा गया पानी का वेग
धरती भी कांप गयी
मानवता का हृदय भी
आज छलनी हो गया
जब मछली की जाल में
एक मासूम का मृत शरीर
मुस्कुराता हुआ बाहर निकला
माँ की स्तनों से चिपका लाल
काल के गाल में समा गया
अकेले ही नही था बाढ़ का वारिस
उसकी माँ, बहन और भाई भी थे
सबकी लाशें आयी
पानी से उतारकर
लेकिन वो लाल अब भी
बाहें फैला कर
माँ की गोद मे जाने को जिद्द कर रहा था
पानी मे कितना गोते लगाया होगा ये
डूबते हुए भी अपनी माँ भाई बहन को
तलाशा होगा
किलकारियां मारी होगी
लेकिन काल को दया नही आई
कुछ कर तो नही सकता मानव
पर आज बहुत कोशा है सबने
क्रूर काल को,बाढ़ को
खुद को और जिम्मेदार को
बहुत रोया सबने
हृदय सूख सा गया था ,
धड़कने थम सी गयी
पानी मे फेंके जाल से निकला
ये मुस्कुराता नोनिहाल का शव
को देखकर ।
©नितेश भारद्वाज
रविवार, 14 जुलाई 2019
नाम से डरती है
(1)
देहरी पर बैठी वो
गुमसुम सी एकटक
मुझे निहार रही थी
मौन शब्द में न जाने
क्या विचार रही थी,
तेज से मद्धिम प्रकाश में
हम विदा हो रहे थे
वो यूँ ही एक टक थी
सांवली सलोनी मुखड़ा
दिल मे बसाए आ तो गया था
लेकिन उस देहरी पर ही
कुछ छोड़ आया था
लम्हो बाद गया था
आज फिर ढूढने उसे
सिवा निशान के कुछ था नही
वक़्त है वो
बदलना तो नियति थी
बदल गयी
कल वो दिल मे थी
आज किसी और की हो गयी
(2)
मुद्दतों बाद वो यूँ मिली जैसे
मातम में अपने मिलते हो
बहुत शौक जताया
ढाढस बंधाया
कुछ जख्मो को सहलाया
कुरेदा
और कुरेदने की वादा कर गई
अपनी अहसासों की
उपस्थिति दर्ज कराती रही
किसी और की है वो
ये बताती रही
दुआएं बहुत दी वो
मेरे सलामती का
बिन साथ जीने की नुख्सा
बताती रही
(3)
अब वो
मेरे इल्ज़ाम से डरती है
मेरी थी कह तो लेती है
किसी बदनाम से डरती है
भरोसा करती है
भरोसा दिलाती नही
किसी ओर के भरोसे से भी
डरती है
प्यार पाना नही खोने का नाम है
एक अहसासों से जीने का नाम है
तू ना सही
तेरी बन्द आंखे ,मौन शब्द
बची जिंदगी के लिए बहुत है
वो मेरे नाम से भी डरती है।
शनिवार, 13 जुलाई 2019
सुकूँ
मैंने अभाव को भी देखा है
धन की बहाव को भी देखा है
सुकूँ इस मे भी नही
सुकूँ उस मे भी नहीं
भूख से बिलखते बच्चे
एक खुराक दवा की जरूरतें
फटेहाली में पत्नी का तंज
ढकने को बेटियों का तन
परेशान सा
उस इंसान को भी देखा है
नोटो की गड्डियों की ढेर
रिश्वत काली कमाई वाली
अफसर
जमाखोरी ,नोटो की बिस्तर वाले
फर्जी बनिया,पत्रकार,दलाल
डॉक्टर
सबकी माथे पर
एक चिंता की लकीर देखा है
इनकी बच्चो की भूख
तो उनके बच्चों की शौक
इनकी जरूरतें तो उनकी अय्यासी
इनकी स्त्री की पारिवारिक चिंता
उनकी स्त्री की खरीददारी
इनके साथ साथ रहने से अनबन
उनके एक पल के साथ के लिए घुटन
इनकी चूल्हे चौकी की दिनचर्या
उनके सामाजिक स्टेटस की चर्चा
सुकूँ न इधर है न उधर है
एक को अभाव से निकलना है
दूसरे को बहाव में डूबने से बचना है
उसे बहुत मसक्कत से मिलती है रोटियां
इनका हर दिन बर्बाद हो जाती है रोटियां
कुछ भी तो नही है
न सुकूँ इधर है
न सुकूँ उधर है
हर पल जिसके होठो पर मुस्कान है
सुकून में आज वही इंसान है
©नितेश भारद्वाज
रविवार, 7 जुलाई 2019
स्पंदन
तेरा स्नेह
मेरे लगभग सुख चुकी
हरीतिमा की पल्लव पर
ओस की एक बूंद है
या फिर पहली बारिश की फुहार
समझ मे नही आ रहा इसे
सहेजूँ या इसमे भींग जाऊं
हवा की आवारगी सा मुझे
बहका रही है तेरी बातें
बिन कारण जग रही है ये रातें
न कोई डोर न कोई बंधन
न कोई आशा न कोई स्पंदन
न कोई उम्मीद न मौन की भाषा
न खोने का भय न कोई अभिलाषा
फिर क्यूँ.. क्यूँ क्यूँ
अपनो सी हो तुम
नव पल्लव हो तुम
सुखी डाल पर टिक नही पाओगी
तेरी रस फुहार से
कुछ हरा नही हो पायेगा
हाँ कुछ उकेरा जाएगा मृत पत्थर पर
जख्मो के निशान, लगभग मिट चुकी
कहानियां,
निःशब्द अकथनीय भावनाएं
जिसे न तो पढ़ पाओगी
न समझ पाओगी
तुम में तूफान से जूझने की
अभी अपार शक्ति है
लेकिन तिनको को रोक रखना
तेरे बस की बात नही
लौट जाओ
हाँ लौट जाओ उन हरीतिमा के वनों में
जहां तेरी कद्र है
लोगो की फिक्र है
श्रुति है संकल्प है
जहां सम्भावनाये है, सम्वेदनाएँ है
जीवन है, उम्मीद की किरण है
तेरी स्नेहिल वर्षा का आलिंगन है।
©नितेश भारद्वाज
शनिवार, 1 जून 2019
आज का युवा
आज का युवा
संस्कारो में नही बंधना चाहता
दस्तूर का दस्तक नही सुनना उन्हें
जीना है उसे अपने शर्तो पर
उसे आगे निकलना है
सबसे आगे,
बहुत तेज दौड़ना है
रुकना पसन्द नही
टोकना पसन्द नहीं
जिद्द है कुछ करने की
कल को नही ढोना उसे
उसे आज में जीना है
कल की चिंता भी नही
नीर छीर नही चाहिए
रिश्ते नाते कसमे वादे
नही चाहिए
रुकना नही चाहता
झुकना नही चाहता
पुराने ख्यालो को ढोना नही चाहता
अपनो से दूर रहकर
अपना बनाना चाहता है वो
मुट्ठी में दुनिया बसाना चाहता है वो
विज्ञान का सल्तनत बसाना चाहता है वो
नही चाहिए उसे पोथी
पेड़ का छांव,ताल तलैया
खेत खलिहान,दादा का दलान
मां का आँचल, काले बादल
आंखों के नीर, बातें गम्भीर
मीठी पकवान, ममता मयी मुस्कान
ये सब बना लेता है अब कम्प्यूटर में
चीख चिल्ला लेता है मोबाइल पर
घर बसा लेता है नेट पर
उसे नही चाहिए धूल से ढका संस्कार
बड़ो बुजुर्गो का प्यार
उसके सोशल मीडिया पर
बस गया है घर संसार।
©नितेश भारद्वाज
सोमवार, 27 मई 2019
कालजयी कवि नागार्जुन
मिथिला के दो युगों के कवि विद्यापति और नागार्जुन में मैं नागार्जुन को ज्यादा पढ़ना पसन्द करूँगा। जिन्होंने मानव वृति का उल्लेख अपने कविता में किया। भाग्य और कर्म के बीच का गिद्ध को पहचाना। जिन्होंने समाज को उसीका आईना उसी को सौंप कर विद्रोही बने। ता उम्र अपनी कलम को किसी के आगे गुलाम नही होने दिया। विद्यापति जिन्होंने श्रृंगार और भक्ति, को समाज का मुख्य स्तम्भ माना, भक्ति पूर्ण साहित्य व्यक्ति /समाज को अपनी ही नियति में बाँधे रखा जबकि नागार्जुन ने इस बन्धन को तोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये अलग बात है कि स्वामिभक्त के अभाव में नागार्जुन अंतिम समय तक दर दर भटके। विद्यापति के सहयोगी साक्षात शिव थे तो नागार्जुन के सहयोगी साक्षात नारायण।
हम बाबा विद्यपति को पूजते हैं लेकिन नागार्जुन को समझते है, बस इतना सा अंतर है। क्यों न विद्यापति समारोह का रंगारंग उत्सव की जगह नागार्जुन का भी मानव उत्सव हो??
बुधवार, 22 मई 2019
अपील
#अपील
कल चुनाव परिणाम आ रहे है, स्वतंत्र भारत का सबसे ज्यादा रोमांच रखने वाला यह परिणाम यह बताने के लिए काफी है कि हम अपने देश से और लोकतांत्रिक व्यवस्था से कितना प्रेम करते है।इस जीत हार को अपने जीवन का हिस्सा मानकर चलना पड़ेगा। असहमति को दुश्मन की तरह न देखे ये भी लोकतंत्र की एक भूमिका है इसके बेगैर लोकतांत्रिक व्यवस्था मूर्त रूप नही ले पाएंगी। नेता आपस मे कभी नही लड़ते ,उनके विचारधारा लड़ती है, उन सबके व्यक्तिगत सम्बन्ध आपस में मधुर है। इस लिए पिछले दिनों चुनाव के बयानों, आरोप प्रत्यारोप, अफवाह इन सबको मिटा दें,जो भी परिणाम मिले उसे स्वीकार करें, सरकार जिसकी भी बनेगी वो आपकी ही होगी, सम्पूर्ण समाज समुदाय पर इनकी नीतियां बराबर की हिस्से में लागू होगी। देश महत्वपूर्ण है और उससे पहले आपका प्रेमपूर्वक समाज का रहना महत्वपूर्ण है। अपनी रोजी रोजगार ,पढ़ाई, व्यवसाय, चुनोतियाँ को सम्भाले, देश सम्भालने वाला कल के बाद मिल जाएगा। हम सुखी रहेंगे, शांत रहेंगे, मिलजुल कर रहेंगे तो देश समृद्ध रहेगा। परिणाम की प्रतीक्षा और उसे सहज उत्साह पूर्वक स्वीकार करने के लिए तत्पर रहते हुए आप सभी मित्रों को शुभकामनाएं, जयहिंद
आपका भाई/मित्र
नितेश भारद्वाज
गुरुवार, 16 मई 2019
गोडसे-देश भक्त या हत्यारा
1948 में गोडसे हत्यारा था, ठीक उसी तरह जैसे भगत सिंह आतंकी थे, लेकिन समय ने इनके विचारों के समर्थन में हुजूम बना दिया और बहुसंख्यक के लिए भगत सिंह आज़ादी के परवाने है और गोडसे देश भक्त। दोनों का कृत निजी तो कत्तई नही था, गांधी के विचारों के अनुनायी के लिए गोडसे आतंकी और हत्यारा है, भगत सिंह भी उपद्रवी है, लेकिन इसके विपरीत विचारधारा वालों के लिए दोनों ही देश प्रेमी है। ....देश को सम्भल कर चलना पड़ेगा कि सम्भव है भविष्य में इंदिरा गांधी का हत्यारा और राजीव गांधी का हत्यारा भी देश भक्त न हो जाये। इस गलती की शुरुआत गांधीवादी सोच ने किया था, भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद आज इन सिद्धांत के षडयंत्र का शिकार नही हुआ होता तो, आज भी गोडसे सर्वमान्य हत्यारा होता, या गांधी मारा ही न गया होता।
चुनाव में आदिवासियों की उम्मीद
आज सोनभद्र का सुदूर आदिवासी अंचल के भ्रमण किया।चुनाव के बाबत इन मूल निवासियों से विचार जानने की कोशिश की। उत्तर भी वही था जिसका मुझे उम्मीद था। ये आदिवासी राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा नही है,इन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण अपनी जीवन से जुड़ी समस्या है। इस अंचल में विकास तो हुआ है काया पलट की तरह, इस विकास मे तीनो सरकार का योगदान है,अब ये सामान्य जिंदगी जीना चाहते है, भौतिक साधनों के साथ, ये भी नेता बनना चाहते है,इनके बच्चों को भी अधिकारी बनना है। इसलिए ये अपने समाज के नेता को ढूढते है। उन्ही की दिखाए रास्ते पर चलना चाहते है। और चुनाव पर गजब का चुप्पी बनाये हुए है,वो इस इंतज़ार में है कि मेरा नेता ,मेरे समाज का नेता मुझे भरोसा दिलाये।कोई भी दल ये दावा नही कर सकता कि आदिवासी का मत किसी एक पक्ष को ही मिलेगा। यह उनके स्थानीय और समाज के नेता पर निर्भर है। उनके लिए सभी दल एक जैसे ही है। हाँ मोदी का नाम खूब सुन रखा है ,ये दें इनकी हाथों में चिपका मोबाइल का है। लेकिन वोट इन्ही को दें जरूरी नही। नई पीढ़ी में गजब का उत्साह है, उन्हें तो मोबाइल वाला नेता ही पसंद है लेकिन बुजुर्गो को अपने जैसा कोई अपना नेता चाहिए ,उनकी आंखें ऐसे को ही अब भी ढूंढ रहा है। वे बताते है कि आज के लड़के (युवा नेता) न जाने क्या क्या समझा जाते है लेकिन कोई नही कहता कि कल तुम्हारा वृद्धा पेंशन चालू करवा देंगे।
लगभग 15 गांवों के घुमंतू में ये निष्कर्ष पर पहुंचा कि इन्हें अपना यानी अपने समाज के नेता की तलाश है जिसे ये अपनी बात बिना किसी भय या संकोच के कह सके।
©नितेश भारद्वाज