#मेरा_एकांतवास 24
बहुत कम लोगो को याद होगा भाप इंजन वाली रेलगाड़ी की सफर। जिन्हें याद है वो आज की एक्सप्रेस जिंदगी से कहीं बहुत अधिक आनंद लिए थे इन सफर का। काला सफेद धुंआ उगलती ,छुक छुक करती रेलगाड़ी जीवन का मधुर संगीत था। यात्रा का नाम सुनते ही उन दिनों एक रोमांच होता था रेलगाड़ी का सफर। मेरे जैसे कुछ छात्रों का नित्य का दिनचर्चा बनगया था यह छुक छुक। चोपन से मिर्ज़ापुर हर एक दिन के अंतराल पर या कभी कभी नित्य क्लास करने कन्हैयालाल बसंतलाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय (KBDC जो बाद में KBPG हो गया) जाना होता था, बाबूजी के रेलवे पास जिंदाबाद था मेरे लिए। इसके बाद भी कोई दिक्कत हो तो कालेज का id कार्ड काम कर जाता, नही तो चाचा कहने पर सब समस्या हल हो जाती। आज की तरह sir कहने की चलन उस जमाने मे कम ही था, चाचा जी कहने से बड़ी से बड़ी समस्या हल हो जाती थी। चुनार से गोमो वाली दोपहर की पैसेंजर ट्रेन वापसी का होता था। दक्षिणाचल कि लगभग सभी लोगो को यह ट्रेन याद होगा । चुनार स्टेशन का वह गर्म पकौड़ी भी हर यात्रियों का पसंदीदा स्नेक्स था। बस प्लेटफार्म 5 पर पकोड़ी ही मिलता था लेकिन स्वाद में वर्षो तक कोई अंतर नही आया, वेंडर पकौड़ी का हाफ फ्राई तो घर से ही लाता लेकिन फूल फ्राई करके ताज़ा ताज़ा चटनी के साथ बेचता। मुझे आज तक याद नही कि कभी वेंडर के पास पकौड़ा बच गया हो। अक्सर यात्रियों को नही मिल पाता। चुनार से गाड़ी खुलने के बाद सरसोग्राम में इंजन पानी लेता ,फिर खूब भाप बनाकर अर्धवृत्ताकार रेल लाइन से गुजरते हुए पहाड़ चढ़ता , इंजन की मेहनत देखते बनती थी। कभी धुंआ उड़ेलता तो कभी खूब भाप फेकता। आखिरकार लुसा स्टेशन पहुँचकर सकून मिलता। वहाँ का नन्हा नन्हा तिकोना शुद्ध खोए का पेड़ा खाने को मिलता, गाड़ी खड़ी होते ही दुकानदार की तरफ लोग दौड़ पड़ते। एक दुकान भी तो होता था। दूसरा छोटे छोटे समोसा बेचता तीखी चटनी के साथ। फिर वही नल का पानी, या ,घड़ा रखकर पियाऊ वाला रेलकर्मचारी पिलाता। यह सब काम के लिए इतना समय मिलता जितने में स्टेशन मास्टर के कार्यालय से पोटर ड्राइवर को टोकन देने और पानी पिलाने जाता। उस जमाने मे रेलवे का सिग्नल आज की तरह बिजली वाला इलेक्ट्रॉनिक नही था। रेलवे के नियम के अनुसार मैदानी भागों में सिग्नल नीचे की ओर झुका होता, तो ड्राइवर चलने का संकेत मान लेते थे लेकिन पठारी और पहाड़ में इसे क्षैतिज रेखा में खड़ा हो तब हरा यानि चलने का संकेत माना जाता। रात के समय मिट्टी तेल वाली दीपक ही डाला जाता था संकेत के लिए जो सिग्नल के अनुसार लाल या हरा हो जाता। पीला का कोई ऑप्शन नही था उन दिनों। घाटियों से गुजरती हुई यह छुक छुक ट्रेन प्रतिदिन के लिए एक नयी कहानी ही गढ़ता।
एक बार चुनार स्टेशन पर गाड़ी खुलने में समय रहते हम मित्रो ने अपने बैग और गमछा सीट पर रखकर स्टेशन से बाहर एक नम्बर प्लेटफॉर्म की ओर पकौड़ा से अलग कुछ खाने को निकले। नास्ता पानी करते समय का अंदाजा नही रहा, कमबख्त घड़ी भी तो नही था आने पास।वापस आने पर ट्रेन जा चुकी थी। दिन के 2 बजे के बाद ट्रेन देर शाम ही मिलती। परेशानी बढ़ गयी ,उसमे पुस्तक वाली बैग और गमछा भी ट्रेन में ही चला गया। अब मिलना शायद मुश्किल ही था। रोना आ गया था अपनी गलतियों पर। बहुत ही मुश्किल था उस जमाने मे एक गमछा भी, और कॉपी किताब तो महंगे थे ही। ऊपर से डांट पड़ती सो अलग। स्टेशन मास्टर के पास रुआँसा सा मुंह लेकर पहुँचा। खैर कई बार चाचा जी कहने पर उन्होंने अगली स्टेशन को कंट्रोल के माध्यम से ओवर ओवर करके सूचना दी। और हमलोगों की बैग और गमछा सुरक्षित हो गया। थोड़ी देर बाद वही चाचा जी एक मालगाड़ी से हमलोगों की जाने की व्यवस्था भी कर दिए। गार्ड वैन में बैठ कर आनंदमयी सफर किये हमलोग। हम आगे जा रहे थे और रेल की पटरी पीछे छूटती जा रही थी। लेकिन उसदिन लुसा का पेड़ा खाने को नही मिला।
©nitesh
क्रमशः
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