#मेरा_एकांतवास 9
जब आप किसी को अपना मानने लगते हो ,या जो नैसर्गिक रूप से अपना है, इनदोनो ही परिस्थितियों में आप उस पर अधिकार जैसा होने लगता है, आपको लगता है कि किसी भी परिस्थिति में वो आपका दिल नही दुखायेगा, यही चीज़ सामने वाले के साथ होता है और यही एक अदृश्य अपेक्षा एक दूसरे से अपनापन का सम्बंध को जोर से से पकड़े रहता है, लेकिन कोई भी इसकी अवहेलना करता है तो शनै शनै यह कमजोर होने लगता है, कुछ गलतफमी में तो कुछ जानबूझकर। निकट सम्बन्धी पर यह अपनापन और इसके घेरे में रहना एक अनुशासन होता है , जीवन को अनुशासित रूप से चलने में बाध्य करता है, यही से एक संस्कार का निर्माण होता है, लेकिन जब अपनापन में प्रश्न चिन्ह आये तो यह चक्र टूटने लगता है। जिद्द , अहंकार , स्वार्थ , उन्मुक्तता इस अनुशासन चक्र को तोड़ता है ,फिर व्यक्ति एकांकी होने लगता है। समझौता, सामंजस्य, और मोह ऐसे बांधने का भरसक प्रयास करता है,लेकिन जब एक बार इस परिधि से बाहर आ गया तो मुश्किल होता है फिर से एक माला में पिरोना।
आज जब जीवन बचाने में सब बेचैन है , उसमे सबसे करीब का महत्वपूर्ण जीवन खुद का है ,संकट में सब यह उम्मीद करते है कि यह अपनापन बना रहे ताकि एक दूसरे का जीवन बचा रहे, यह अपनापन का अधिकार है कि आपको एक दूसरे निर्देश दे रहे है, उम्मीद कर रहे है, परिधि से बाहर जाने पर आप एक दूसरे से अलग एकांकी हो जाएंगे, किसीको किसी से भावनात्मक सम्बन्ध नही रहेगा। आज फिर से संयुक्त परिवार की अवधारणा को बल मिलना शुरू हो रहा है, हमारी उन्मुक्तता, जिद्द, अहंकार, स्वार्थ सब अब जीवन संघर्ष में बौना लगने लगा है, जिस आभासी दुनिया, कृतिम सम्वेदना के सहारे खुद को जी रहे थे, स्वम्भू समझ रहे थे आज सब धराशाही हो रहा है, आज किसी भी वस्तु से ज्यादा मूल्यवान है आपका खुद का जीवन है और यह भावनात्मक परिवार में ही सुरक्षित रह सकता है, जहां ,सुरक्षा, आत्मबल, संस्कार, और भरोसा बरकरार है।
एक बार पुनः सोचिये की हमने उस संयुक्त परिवार की देहरी को क्यूँ लांघकर कंक्रीट के घोषले में दुबक गए।
@nitesh
क्रमशः
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