सोमवार, 6 अप्रैल 2020
मेरा एकांतवास 15
बाबूजी 17 साल के उम्र ने ही गांव से किसी अपनो के साथ पश्चिम बंगाल चले गए थे नौकरी के तलाश में, अंडाल में उन्होंने रेलवे की नौकरी जॉइन किया ,पूर्व रेलवे में 42 वर्ष नॉकरी करने के बाद उत्तर प्रदेश से अवकाश ग्रहण किये, मुझे मैट्रिक के परीक्षा के बाद बाबूजी के साथ ही पढ़ने के लिए रहना पड़ा ,सो गांव की बहुत सी यादें बन्द पिटारी में ही रह गया। बाबूजी के निधन के बाद पिंड दान करने के क्रम में बाबा का भी पिंड दान करवाया गया। मन मे सहसा एक अदृश्य तरंगे उतपन्न हुई। आज बाबा को भी अनुभव करने का दिन था। छोटा सा था,बहुत कम ही सानिध्य मिला था उनका लेकिन मेरे उपर उनका वात्सल्य वाला प्रेम बहुत छलका था। सवेरे दलान पर अवस्थित कुँआ पर स्नान करवाना , फिर मेरे माथे पर रामनामी चंदन करना, , साथ मे खाना खिलाना और खाने से पहले भोजन पर तुलसी दल रखना नही भूलना! विदाई के समय डोरी वाला सफेद पजामा सिलवाकर देना, सोनार के पास जाकर 20 पैसे के सिक्का को तुड़वाकर अंगूठी बनवाकर देना,, रामु साहू से एक आना में दो मीठा पान का गिलौड़ी खिलाना। समूचे गांव में घूम घूमकर सबसे परिचय करवाकर खुद को गर्वान्वित होना, और फिर सब की मुराद के अनुसार मुझे कोई न कोई हिंदी कविता सुनाना। भई अंग्रेजी उस समय क्लास 6th के बाद ही पढ़ाई जाती थी। मुझे याद है मेरे उपनयन संस्कार ने कितने व्यस्त हो गए थे बाबा, मेरे पहनने के लिए छोटी धोती के लिए 30 किलोमीटर दूर अपनी रेले साइकल से चलाकर मधुबनी खादी भंडार से लाये थे। ताकि मैं सुंदर बटुक दिख सकूँ। बड़ा गर्व था अपने इस पोते पर ,होता भी क्यों न!घर का सबसे पहला ही सन्तान था अपनी पीढ़ी का। वो आखिरी सम्मान ,प्रेम , आशीर्वाद, और स्वर्णिम स्मरण था, उन्होंने ने ही मेरे उपनयन संस्कार के ब्रम्हा यानी गुरु बने थे। और साल पूर्ण होने से पहले ही चल बसे थे, आखिरी समय मे हम मिल भी तो नही पाए। 57 साल की उम्र में जाना भी कोई जाना था, लेकिन एक अंधविश्वास ने उन्हें दुनिया छोड़ने पर मजबूर कर दिया 22 दिन की साधारण बीमारी के बाद वो दुनिया से विदा लेलिये।
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