सोनभद्र/प्रदेश का प्राचीन उर्जाधानी, जहां एक पूरा परिवार बसता है, छोटे बड़े हज़ारो क्वार्टर, अब कुछ घर भी बनगए है, चूल्हे जरूर अलग अलग जलते है, लेकिन स्वभाव, प्रेम ,सुख दुख सब के सब एक जगह ही है, यही कारण है कि अवैध खनन वाले भी मेरे परिवार के, प्रदूषण वाले भी हमारे परिवार के, मुफ्त के जल पिलाने वाले भी परिवार के बोर्ड के गाड़ियों से डीजल निकल बेचने वाले भी , और अपने खून पसीना बहाकर बिजली बनाने वाले भी हमारे परिवार के, राशन उधार देने वाले और फर्जी बैंक के नाम पर पैसा हड़पने वाले भी हमारे परिवार के, बड़े बड़े ओहदे पर रहने वाला भी हमारा ही है और हीरोइन पीकर बर्बाद होने वाला भी हमारा है, हम सब मिलकर सबका चिंता करते है। मुझे याद नही की ओबरा में पैसे के अभाव में किसी की इलाज रुक गयी हो ,या दवा के अभाव में कोई मर गया हो! सब एक दूसरे के सुख दुख में शामिल है, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह लेकिन सामाजिक कार्य और सर्व हित के लिए सब एक है,आलोचना होती है लेकिन किसीका विरोध नही। मिल बांट कर खाना यहां की रीति है। तभी तो ओबरा एक परिवार है। पारवारिक प्रेम का नतीजा है कि लोग नॉकरी से रिटायर होने के बाद भी यहां से जाना नही चाहते। जो किसी वजह से बाहर चले गए वो आज भी दूर बैठकर भी सबका हाल समाचार पूछते रहते और यहां के लोग भी उन्हें उसी तरह याद करते मानो कोई अपना ही किसी शहर में कमाने गया है। मुझे नही लगता भारत मे शायद इस तरह का कोई दूसरा शहर हो !!!
लेकिन विगत वर्षों में कुछ खास बुनियादी बदलाव आया है ,वो या तो राजनीतिक सामाजिक कारण हो या फिर पीढ़ी का अंतर। पहले शिक्षा के क्षेत्र में ओबरा का नाम प्रदेश में शीर्ष पर था आज फिस्सडी है, पहले चिकित्सा के लिए सदैव तत्पर रहने वाला डॉक्टर आज नदारद है, खेल और एथेलेटिक्स में हमारा परचम राष्ट्रीय स्तर पर था आज घर मे भी कमजोर है,साहित्य और सांस्कृतिक समृद्धि में भी आज सेंध लग गयी है, अपनी नॉनिहलों के लिए चिन्तित समाज आज इनसे बेफिक्र है। ना जाने क्यों नही हम अपनी इस विरासत को बचाने के लिए प्रयासरत नही है? हम खुदको मजदूर के काम करने के लिए आंदोलनरत है लेकिन खुद को शिक्षा में पहले वाली गौरव पाने के लिए लापरवाह है। इलाज़ के लिए ऐसे डॉक्टर की तलाश से मरहूम है जैसे वो डॉक्टर हमारे अभिवावक जैसे होते थे। कल साधन नही था लेकिन सुविधा थी आज साधन है लेकिन सुविधा नही है। हमे फिर से एक साथ बैठ कर इस पुरातन गौर को वापस लाने के लिए प्रयासरत होना पड़ेगा, अमे अपने विशाल परिवार को बचाना पड़ेगा , हमे अपने होनहार बच्चों से प्यार करना पड़ेगा, उसे चाचा चाची ,भैया दीदी वाली बोल सिखाना पड़ेगा, उस अदब को फिर से वापस लाना पड़ेगा जिससे ओबरा शिक्षा में प्रदेश का सिरमौर हुआ करता था ।
©नितेश
शनिवार, 23 दिसंबर 2017
आज का ओबरा
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बड़े अहम सवाल हैं मगर इस आपाधापी में इनके उत्तर खोजे कौन ,बस बहते जा रहे हैं धारा के साथ ,उर्वर भी हो सकती है जमीन धारा को रोके कौन ।
जवाब देंहटाएंआज अभिभावक बच्चों को डाटने या आवश्यक दण्ड देने पर शिक्षकों के साथ अभद्रता करने एवं पुलिस केस करने को तत्पर हैं साथ ही कुछ तथाकथित पत्रकार भी ऐसे मौके पर अपनी पत्रकारिता चमकाने से बाज नहीं आते हैं।
जवाब देंहटाएंक्या ऐसे काम शैक्षणिक उन्नति में सहायक होंगे ?