#मेरा_एकांतवास 18
किसी जमाने मे गांव की समझ , संस्कार, संस्कृति, शिक्षा , अनुशासन आज की शहरों से बेहतर हुआ करता था। लोगो मे एकरूपता होती थी ,सामाजिक कार्य मे बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे, इन्ही सामाजिक सरोकार की अनुपम कृति थी गांव का एक पुस्तकालय। मिट्टी और मिट्टी के गारे से जुड़ा इट के पाए पर खड़ा एक विशाल भवन । बीच मे एक बड़ा हाल, दोनों तरफ दो कमरा, भवन के दोनों तरफ 60x 10 फिट का बरामदा, साथ ही 2 विस्वा का कैम्पस। 60 की दशक में इसे गांव के जन सहयोग से तैयार कराया गया था, किसी ने जमीन दिया ,किसी ने श्रम दान किया, किसी छप्पर के लिए लकड़ी, बांस तो किसी ने खिड़की दरवाजा। उस समय के युवा इसे बड़ी शिद्दत से तैयार किये थे। बहुतेरे ज्ञानवर्धक, मूल्यवान पुस्तक भी रखा गया था , लोग पढ़ने भी आते थे। बाद में शायद एक होमियोपैथिक के डॉक्टर को भी रखा गया था। समय बदलते गया कुछ दिन तक उसमे एक स्कूल भी चला , लेकिन सामूहिक सोच से बनाने वाले युवा अब बुजुर्ग हो चले थे, नई सोच के नई पीढ़ी को शायद इसकी जरूरत नही समझ आई। और एक समय ऐसा निर्धारित हुआ कि किसी ने खिड़की उखाड़ा, किसी ने दरवाजा, आते जाते लोग एक एक ईट भी लेते गए , फिर इसे गिरने दिया गया,और विशाल भवन धराशाही हो गया,लोग छप्पर का खपड़ा और लकड़ी बांस तक भी उठा ले गए, गांव के प्रतिष्ठित जिम्मेदार मूक देखते रह गए। जिन लोगो ने जमीन दिया था उसकी तीसरी पीढ़ी ने उस जमीन को एक दूसरे को बेच दिया, इसतरह एक सामूहिक सोच वाली श्रम का धरोहर नष्ट हो गया। अब तो नई पीढ़ी शहरी हो गया है इसलिए शायद इस तरह के सामूहिक या कम्युनिटी वर्क की जरूरत समाप्त हो गयी है, हम नितांत स्वयं में सिमट कर रह गए है। निजी लाभ ही सर्वोपरि है। धन्य थे हमारे पूर्वज जो अपनी भावी पीढ़ी के लिए अच्छी सोच रखते थे लेकिन आज की पीढ़ी इस धरोहर का कद्र करना भूल गयी। तभी तो हम अक्सर कहते है अब गांव भी शहर से बदतर है।©nitesh
क्रमशः
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