बुधवार, 22 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 21

#मेरा_एकांतवास 21
 गांव जीवों का सम्पूर्ण दुनियां होता है ,जबकि शहर का जीवन टुकड़ो टुकड़ो में होता है।शहर में सुखों का रसास्वादन हम चम्मच में कर पाते है जबकि गांव खुशियों का दरिया है। शहर में बदलते परिवेश के आनंद लेते है जबकि गांव वालों के लिए वो चकाचौन्ध लगता है, चकाचौन्ध देखना तो चाहते है लेकिन उसमें रमन नही चाहते। उन्हें सदैव भय बना रहता है कि कहीं इसमे हमारी पीढियां गुम न हो जाये। गांव के जीवन मे पेड़ पौधे से लेकर हर जीव के लिए हृदय में स्थान रहता है जबकि शहरी को ब मश्किल खुद के लिए  चिंता करने में पेशोपेश होना पड़ता है। प्रेम का वास्तविक स्वरूप भी गांव में ही दर्शन होते है ,शहर में तो प्रेम व्यावसायिक ही होता है, वर्षो का सम्बन्ध चंद रुपये के लिए तार तार हो जाता है। शहर हम सम्पन्न होने को जाते है लेकिन गांव हम जीने के लिए रह जाते है, जहां अपनी पुरखो का इतिहास  कण कण में बिखरा पड़ा है।  हर वो व्यक्ति जिसका जड़ कभी गांव से जुड़ा रहा है, अपने बच्चों में बड़ा चाव से कहानियां सुनाता है ,लेकिन कान्वेंट शिक्षित बच्चों को वो दकियानूसी लगता है, बोर होने लगता है।  भारत के हर गांव में लगभग एक जैसी ही कहानी रही है, इसलिए जब मैं अपनी गांव की किस्सा शुरू करता हूँ तो सभी को अपने जैसा ही लगता है। वो धूल उड़ाती पगडंडी। किसी भी वातानुकूलित से ज्यादा शीतल आम का बगीचा, पीपल का पेड़ और उससे जुड़े दर्जनों कहानियां। बांस की झुरमुट  जिसमे दिन में भी लोग डर कर रखते थे, वो कुँआ जिसका पानी आज की विसलेरी से ज्यादा शुध्द होता था।  हर गांव में आधा दर्जन से भी कम पेट्रोमेक्स जिसे एक दूसरे से मांग कर उत्सव में काम चलाया जाता था, पेट्रोमेक्स का जलना यानि कुछ खास बात होना। हर गांव में कम्युनिटी शामियाना   जिसे जरूरत पर उपलब्ध कराया जाता था, गुलाबजल का फब्बारा भी गांव में एक दो ही होता था, इसी तरह पालकी, चवर, बैलगाड़ी, और शाही ड्रेश भी सभी लोगो के लिए कम्युनिटी ही होता था।  
आज से ज्यादा गरीब होते थे ग्रामीण , लेकिन  भूख से मरने की घटना कम ही होता था, किसी का अकाल मृत्यु सम्पूर्ण गांव के लिए अशुभ माना जाता था, गांव में आने वाले विपदा,प्राकृतिक प्रकोप भी किसी अपराध या पाप का  प्रतिक्रिया समझा जाता था।
एक बार मेरे गांव के कुछ लोग बंदर के आतंक से परेशान हो गए ,फिर किसी तरह दो बंदरो को पकड़ कर उसे जिंदा ही जमींदोज कर दिया गया, यही कोई 1983 का अप्रैल का महीना था ,घटना के एक सप्ताह के अंदर ही गांव में जोरदार आंधी तूफान के साथ 250 ग्राम तक के ओले पड़े , सम्पूर्ण गांव के खपरैल छत बर्बाद हो गया, कई पेड़ पौधे उखड़ गए, किसानों का रवि फसल बर्बाद हो गया, इन सब मे एक खास बात यह थी कि सारी आपदा मेरे ही गांव की सीमा तक थी। आस पड़ोस के गांव के किसी छत को कोई नुकसान नही हुआ। बुजुर्गों ने उस बन्दर का जमींदोज करने की सजा बताया।  विज्ञान और मौसम का कुछ भी कारण हो ओले गिरने का लेकिन गांव वाले अपनी गलती भी सहज स्वीकार कर लेते है ,ये एक बड़ी बात थी ,  काश आज भी हम अपनी गलती को सहजता से स्वीकार कर लेते तो शायद बहुत सारी मुसीबतों से बच जाते।©nitesh
क्रमशः

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