#मेरा_एकांतवास 4
मन सदैव गतिमान होता है और जब खाली होता है तो इसकी गति बढ़ जाती है , उच्छंखल हो जाता है।कोरोना संकट ने जीवन के आयाम को नए सिरे से गढ़ना शुरू कर दिया है।, आप आज अपनो के बीच परिवार में है, परिवार के सदस्यों की बीच केवल वार्तालाप ही नही भाव सम्प्रेषण भी हो रहा है। मन मे आशक्ति का बंधन मजबूत हो रहा है। और इस बीच एक अदृश्य भय भी व्याप्त हो रहा। एक तरफ आपकी जमा पूंजी दूसरी तरफ आपकी समृद्ध आशक्ति, और इनसब के बीच यह संकट। प्रतिपल एक छद्म आशंका घेरे हुए है। यही कुछ आपके कमरों से सैकड़ो किलोमीटर दूर गरीब मजदूर के मन मे ज्वाला बन कर फुट रहा। वह अपनो को लेकर अपनो के बीच जाना चाहता है , उसकी एक मात्र जमापूंजी उसकी अपनापन ही है। , वह कोई दृष्टिगत होने लायक नही है अदृश्य है ,अनुभव करने लायक है। वस्तुतः अपनापन और आशक्ति का जो चित्र उसके मन पर है कदाचित आलीशन कमरों में बैठे अभिजात्य के लिए नही हो सकता।इन मजदूरों की स्तिथि उस बछड़े की तरह है जिसकी मां का थन दूध से लबालब भरा है और बछड़ा बन्धन तोड़कर अपनी माता तक पहुचना चाहता है,परन्तु पालक तो दूध निकाल लेने के प्रयोजन में व्यस्त है,उसे उस बछड़े की सम्वेदना से क्या लेना देना। उसे उसकी माता का दूध से लेना देना है। दूध समुचित मिल जाये इसलिए बछड़ा का तड़पना भी जरूरी है।
न्याय सिद्धान्त भावनाओ पर आधारित नही होता, वह तो बहुसंख्य जन की न्याय को प्रभावित होने की दशा को परिभाषित करता है। वो जन कल्याण के बृह्रत योजना का प्रतिनिधित्व करता है। दिल्ली की भीड़ और इसके बाद उसकी दशा हृदय विदारक हो सकते है, लेकिन बाद के क्रंदन से बड़ा नही। इसलिए शायद हम दुखी मन से ही सही लेकिन खुद को बचाने के लिए उस भीड़ से मुंह मोड़ने लगते है। चूँकि यहाँ पहली प्राथमिकता खुद को जीना है, फिर परिवार को ,फिर समाज को,फिर राष्ट्र को।,सब एक दूसरे से बड़ा है ,और यह भीड़ इसी बीच मे आकर फंसा है।.....आंख मुंडिये और सो जाइये ,ईश्वर से मनाइए सब सही हो,सुरक्षित हो ,यह हमारे जीवन के लिए भी सही है।@nitesh
क्रमशः
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