#मेरा_एकांतवास 12
मेरे कई अभिन्न मित्र मुझसे सवाल करते है कि हमे सदैव घुमक्कड़ी पसन्द था, भ्रमण मेरा शौक था तो ऐसे में यह 21 दिन कैसा लग रहा है?? घुमक्कड़ी यात्रा मन की बहुत सी अतृप्त जिज्ञासा को तृप्त करती है, मेरा जीवन कितना मूल्यवान है, कितना महत्वपूर्ण है इसे आप प्रकृति के बीच जाकर समझ सकते है, जीवन की विभिन्न रंगों को समझ सकते है, जो हम नही कर सकते वो दुसरो के हौसलों में देख सकते है, जो मुझे कठिन, असम्भव, या आश्चर्य लगता है वो इन रंगों से इस यात्रा से हमे आसान लगने लगता है, विभिन्न संस्कृति, रंग, वेश भूषा, पर्व त्योहार और रहनसहन का विविध रंग मुझे एक ही जीवन मे कई जन्मों का सुख देता है। फिर इस अनुभव से तैयार अतीत भविष्य का धरोहर बनता चला जाता है। यात्रा धार्मिक हो या पर्यटन का दोनों ही स्तिथि में जो मानसिक तृप्ति होती है वह किसी पुस्तक या किसी चलचित्र की कहानियों से नही हो सकती। यात्रा में होने वाली घटना ,रोमांच सब जीवन को बहुरंगी बनाने में सहायक होता है, दूर बहुत दूर जब आप प्रकृति के गोद मे विचरण करने लगते है, उन्मुक्त स्वछंद उछलकूद करने लगते है तो वास्तव में प्रकृति के लिए तत्क्षण एक खिलौना होते है, प्रकृति भी आपसे खेलती है, यह प्राकृतिक साक्षात्कार आसान नही।जीवन का बहुमूल्य पाठ है आपका घुमक्कड़ी।
अब हम घर मे है तो क्या यात्रा थम सा गया है ?? मित्रो के प्रश्न ने मुझे तनिक हिलाया था परन्तु नही आज भी मैं यात्रा में ही हूँ, अन्यर्यात्रा..हाँ अन्यर्यात्रा बाह्य यात्रा से और भी कठिन है, आप स्वयं में प्रकृति है और स्वयं ही आगंतुक, स्वयं का विस्तार भी कम नही है, कहाँ से शुरू कहाँ से खत्म पता नही। बहुत पथरीले कांटो युक्त सफर है तो कई सुंदर अनुभूति भी , आप अवलोकन करते रहिए, अपने और अपने से जुड़े सम्बन्धो पर आपकी क्रिया प्रतिक्रिया , आपका उचित अनुचित निर्णय भी इस अंतर्यात्रा का पड़ाव है, वहाँ ठिठक कर आनंद ले सकते है, आपके आसपास बिखरे वस्तु आपको आपसे जोड़ता है, फिर इसे त्यागना है इसके लिए भी रोमांच उतपन्न होता है, जो वस्तु आज आपके बहुत करीब है वो कल बहुत दूर होगा, जीवन को आसान बनाने में यह अंतर्यात्रा बहुत सहयोगी है, आपका एकांत भी आपका प्रिय मित्र हो सकता है यह तो मैंने इस एकांतवास में ही जान पाया। अभी तक एकांतवास की महत्ता पुस्तको, पुराणों और आध्यात्मिक कहानियों में ही सुना करते थे ,परन्तु अनुभव और साक्षात्कार का अवसर तो अभी ही मिला है। मैं आज भी और अभी भी घुमक्कड ही हूँ, कल वाह्य जगत में आज अन्तर्जगत में।@nitesh
क्रमशः
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