मंगलवार, 15 नवंबर 2022

सुधा

 “मैं आपको प्रणाम नहीं कर सकी “


 काफ़ी अरसे बाद आज भी यह वाक्य मुझे बार बार  बेचैन कर देता है , आज भी लगता है मानो मैं ही गुनहगार हूँ ।

सत्रह वर्षीय सुधा विस्तर पर बैठ कर पढ़ रही थी और उसी कमरे में मैं एक कुर्सी पर बैठा उसकी काम काजी विधवा माँ से कुछ बातें कर रहा था ।कोई बाईस तेइस साल का मैं सुधा का भाई का प्रारंभिक स्कूल शिक्षक था ,मैं ख़ुद भी अभी बहुत परिपक्व तो नहीं हो पाया था परंतु उसकी माँ की दृष्टि में एक योग्य शिक्षक था ।थोड़ी देर बाद सुधा की माँ ये कहते हुए घर से बाहर सामान  लेने चली गई कि “सर इसे भी कुछ समझाइए इसका काबिल होना बहुत ज़रूरी है ,”

“अच्छा !” मैं एक गहरी साँस खींचते हुए उसकी और देखा ।”अब तुम किस क्लास में पढ़ रही हो “ 

“आई ए फर्स्ट ईयर में “ सिर झुकाए ही बोली 

“आख़िर तुम्हारी मम्मी तुम्हारे लिए इतना चिंतित क्यों रहती है ?तुम तो ख़ुद ही बहुत समझदार हो ?” मैंने भी पूछ डाला ।

 कुछ बोली नहीं बस मेरी और देखी और सिर झुका ली 

“क्या बात है !मम्मी को तुम पर यक़ीन नहीं है क्या ? 

 “पता नहीं “

फिर यह क्या फफक कर रोने लगी ।सहसा इस प्रतिक्रिया से मैं घबरा गया ।मेरी बुद्धि एक दम शून्य में चला गया था ।कमरे में बस हम ही दोनों थे ,ऐसे में वो रो रही थी ……समझ में जजों आ रहा था कि क्या करें ।कोई आ गया तो क्या समझेगा ……! एक साथ कई मिश्रित विचार मन में कौंधने लगा ।ख़ुद को सम्भालते हुए कहा …”तुम मज़बूत और समझदार लड़की हो इस तरह कमजोर हो जाओगी तो कैसे जीवन में संघर्ष करोगी !लोग तेरी कमजोरी का फ़ायदा उठायेंगे ,फ़िलहाल चुप हो जाओ ,कोई आ गया तो क्या समझेगा !”

 लेकिन सिसकियाँ जारी थी 

“लेकिन मैं क्या करूँ “ सिसकती हुई बोल गई 

“तुम मज़बूत हो रही हो ,पढ़ लिख रही हो पूरा परिवार की रोल माडल बन सकती हो “

मेरा वाक्य ख़त्म होते ही उसने सिर मेरी और उठाया आंसू से गीली लाल लाल आँखें बड़ी लाचारी से मेरी और देखने लगी 

“इस विकलांगता से ..! “

“विकलांगता ??”

“जी मेरे दोनों पैर पोलियो ग्रस्त है  मैं क्या कर पाऊँगी ?”  एक सांस में कह गई ।मैं हतप्रभ उसे निहारता रहा ,चाँद सी सलोनी चेहरा ,उसके गाल पर अब भी आंसू की कुछ बूँदे ठहरी हुई थी ,भींगी हुई पलकों में आँखें और भी चमकने लगी !मैं उसे निहारते हुए पैर की तरफ़ देखा वो चादर से ढकी हुई थी । शायद वो समझ गई ।चादर हटा दी और सहारे से खड़े होने की कोशिस करने लगी ।अब मुझसे रहा नहीं गया ,उसकी बाँहें पकड़ कर अपने सामने रखी कुर्सी पर ठीक से बिठाया ।कमरे में थोड़ी देर एकदम सन्नाटा छाया रहा ।बड़ी गहरी साँसे लेकर वो मेरी और देखकर बोली - सर मैं एक बात बताऊँ “

“हाँ हाँ बोलो “

“सर उस दिन मैंने आपको मोतीझील में देखा था ,मैंने आपको पहचान भी लिया था “

“अच्छा !फिर मुझे टोकी क्यों नहीं ?”

“मैंने कोशिश की लेकिन आप आगे निकल गए ,मैं अपने वैशाखी के सहारे इतना तेज चल नहीं पायी की आपके पास जाकर आपको प्रणाम कर सकूँ “

मैं बिलकुल स्तब्ध था ,मानो साँस भी हलक में ही अटक कर रह गया हो ।पता नहीं कब तक हम एक दूसरे को निहारते रहे  तभी सुधा की माँ वापस आ गई और मैं बिना कुछ बोले इजाज़त लेकर लौट आया ,…….


फिर कभी वो अवसर नहीं आया कि सुधा मिल पाती ।ना जाने कहाँ और किस हाल में होगी ! लेकिन उसके वो शब्द आज  भी मेरे संग है ।


::मेरी संस्मरण से 

©️nitesh bhardwaj