शनिवार, 25 अप्रैल 2020

मेरा एकान्तवास 26

#मेरा_एकांतवास 26
 70 वर्षीय महेश बाबू आज वृद्धा आश्रम के तंग कोठरी में पड़े पड़े अपने अतीत को कुरेद रहे थे। फिर गहरी सांस लेकर मुस्कुराये। अकेले में विचारों के प्रवाह में मुखमंडल पर भी आभा टपक पड़ती है। फिर वापस कमरे से दरवाजे की ओर एकटक देखने लगे।अभी थोड़ी देर पहले ही तो टीवी पर समाचार देखकर अपने कमरे में लगे 6x3 की लकड़ी की चौकी पर लेटे थे। महेश बाबू का अतीत बहुत ही सुंदर था, दो बेटे का सुखी परिवार।  पत्नी 25 साल पूर्व ही साथ छोड़ गई थी।  दोनों बेटे अपनी पत्नी के साथ खुशी खुशी जीवन यापन कर रहे थे बड़ा बंगलोर में तो छोटा दिल्ली में। दोनों के पास दो दो कमरे का शहरी फ्लैट था।  पत्नियों का आदर करते हुए बेटों ने पिता को अपने साथ रखना मुनासिब नही समझा।  बेटों के यह अप्रत्यक्ष अनादर के कारण महेश बाबू गांव में भी रहना उचित नही समझे, गांव के दरवाजे पर हर आने जाने वाला ताना देकर चला जाता। ""जिसके दो दो होनहार पुत्र वो इस हाल में जीये!!जरूर कोई पूर्व जन्म का पाप होगा""...ये सब सुन सुन कर तंग आ गए थे।  अपनी बची खुची जमा पूंजी लेकर वृद्धा आश्रम में ही  शेष जीवन गुजारना उचित समझा।  बेटो ने कभी कभार फोन कर लेता था लेकिन महेश बाबू का मन इन सब से टूट चुका था वो अब किसी बेटों का या अपनो का फोन नही उठाते। स्वयं में मस्त रहना सीख लिए थे। एकांतवास में जीवन की सच्चाई को भलीभांति समझने लगे थे।  6 वर्ष हो गए थे इस आश्रम में रहते हुए। हर ईंट चौखट इन्हें अपना लगने लगा था। हाँ एक बात की भय सदा रहती कि आखिरी वक्त कैसे बीतेगा। खुद की मृत्यु की खबर से मेरे अपनो पर क्या प्रभाव पड़ेगा?  लेकिन इसका भी हल था कि जब जीते जी जिसे हम पसन्द नही तो मरने पर  अंतिम संस्कार के लिए अपनो को बहुत कष्ट उठाना पड़ेगा। अब एक ही चिंता थी कि अंतिम संस्कार में अपनों को कोई कष्ट न हो। कोई मृत शरीर पर भी ताना ना दे जाए। 
टीवी पर कोरोना का खबर से रोज आहत होते थे महेश बाबू । लेकिन आज टीवी समाचार देखकर आने विस्तर पर गए तो न जाने बहुत खुश थे।  दरवाजे पर टकटकी लगाए देख रहे थे मंद मंद मुस्कुरा भी रहे थे। आखिरकार नही रह गया और उठकर दरवाजे से बाहर जाने लगे। चौकीदार न कहा  रात हो रही है कहाँ जाना छह रहे है??बाहर लॉक डाउन है। पुलिस पकड़ लेगी। "
फिर क्या करेगी पुलिस??महेश बाबू उत्सुकता से पूछा।
 "बस पकड़ कर किसी अस्पताल में  14 दिन के लिए कोरोनटाईन कर दिया जाएगा। उसमे कोई कोरोना का मरीज हुआ तो आपको भी हो जाएगा " चौकीदार ने डराते हुए महेशबाबू से कहा। 
तब ठीक है""  काश!! मेरी मृत्यु कोरोना से ही हो जाता""
 महेश बाबू बोलते हुए आगे बढ़ने लगे  चौकी दर ने बांह पकड़ कर सहारा देते हुए अंदर लाने की कोशिश करने लगा।
इतनी बड़ी महामारी से आप क्यूँ मरना चाहते है। हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है। "
एक कुर्सी पर लगभग जबरदस्ती बिठाते हुए चौकीदार ने कहा।
 महेश बाबू एक बार फिर मुस्कुराये और बोलने लगे:
आज ही टीवी में देखरहा था ,कोरोना से मरने वालों के अंतिम संस्कार में उसका कोई अपना नही जाता। सरकार की व्यवस्था से ही अंतिम संस्कार होता है। किसी कफ़न या रस्मोरिवाज की जरूरत नही पड़ती। फिर मेरे जैसो के लिए तो ऐसा ही मौत उचित है। जहां अपनो को मेरे मृत्यु का पता न चले। जहां अंतिम संस्कार के लिए किसी को कष्ट उठाना न पड़े। किसी रस्मोरिवाज के नाम पर चंद रुपये खर्च न करना पड़े। इससे अच्छा मौत और क्या हो सकता है। भला हो कोरोना का। 
चौकीदार की आंखे डबडबा गयी। बस इतना ही कहा था उसने" मैं हूँ ना अंतिम समय तक के लिए""
©nitesh bhardwaj
क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें