शनिवार, 25 नवंबर 2017

तेरा पन्ना

पढ़ भी लूं इस पन्ने को ,तो फिर जवाब कहाँ लिखूंगा।
इम्तिहान तो हक़ीक़त का है ,तो ये ख्वाब कहाँ लिखूंगा !

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

पर्यावण प्रदूषण का निजी लाभ

#सोनभद्र
पिछले 25 वर्षों में मुझे कोई भी एक ब्यक्ति नही मिला जो सचमुच सोनभद्र के प्रकृति,पर्यावरण, पर्यटन, और प्रदूषण को बचाना चाहता हो,,संरक्षित करना चाहता हो, जिसने भी इसके लिए आवाज लगाने की कोशिश की वो भी कालांतर में प्रकृति दोहन कर धन कमाने लगे, या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूपसे इस विषय पर आर्थिक संशाधन ढूढने लगे,राजनीतिक संरक्षण ,और राजनीतिक पहचान बनाने लगे ,परिणाम ये रहा कि सोनभद्र आज लोगो का झोली भरने में जीर्ण शीर्ण हो गया है , प्रदूषित होगया है, जंगली जीव विलुप्त हो रहे है,आने वाली पीढी के लिए संकट उत्पन्न हो रहा है, लेकिन चंद लोगों के लिए ये आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक लाभ लेने का साधन है । कुछ समय के लिए आने वाले जनपद के प्रशासनिक अधिकारी इनके शब्दजाल के शिकार हो जा रहे है, फिर से कथित पर्यावरण प्रेमी ,पर्यटन प्रेमी, समाज सेवी और राजनीति के धुरंधर बन जाते है ।

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मनोरंजन का घरेलू उद्द्योग

आज तकनीकी सुलभता के कारण रचमात्मक  सोच को बढ़ावा मिल रहा है , हर तरफ कुछ नया करने की ललक दिख रहा है, शिक्षित ही नही अशिक्षित लोग भी रचनात्मकता में भाग ले रहे है,यही कारण है कि देश मे मनोरंजन के क्षेत्र प्रतिदिन कुछ नया हो रहा है।मनोरंजन उद्द्योग महानगरों से निकल कर शहर और कस्बो में आ चुका है। क्षेत्रीय फ़िल्म , म्यूजिक एलबम और यू ट्यूब के लिए  आज जोर शोर से निर्माण कार्य चल रहा है।सफलता की परवाह किये बिना भी लोग आकर्षण के मोहपाश में पैसा और समय ब्यय कर रहे है।हरयाणवी, राजस्थानी,पंजाबी,भोजपुरी जैसे क्षेत्रीय फ़िल्म तो उद्द्योग का दर्जा पा चुके है और उसमें कइयों का भाग्य भी शिखर तक पहुच चुका है ,लेकिन इस आकर्षण में एक दूसरी पंक्ति के लोग भी है जो इस उद्द्योग के नाम पर युवाओ को बरगलाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है ,खास बात तो ये है कि जो इस मनोरंजन उद्द्योग में असफल हो गए है वही अपना ऑफिस खोल कर दुसरो को सफल बनाने की तालीम दे रहे है,और हर दिन असफल लोग कुछ और असफल गायक कलाकार निर्देशक और निर्मार्ता की फौज तैयार कर रहे है ,बिहार के तो कई जिले फ़िल्म और अल्बम के लिए गृह उद्द्योग बन चुके है ,अब ऐसे कला व्यवसाई का एक फ़ौज तैयार हो चुका है जो बाइज़्ज़त सरकार से अपनी मांगे रखने के लिए योजना बना रहे है।कई क्षेत्र में तो स्थिति ऐसी बन गयी है कि दर्शक कम है और कलाकार व निमार्ता निर्देशक अधिक।दरअसल इस तरह के मनोरंजन के घरेलू उद्द्योग  के पीछे का सबसे बड़ा कारण अकुशल बेरोजगार है। जिन्होंने ने शिक्षा के लिए ज्ञान से ज्यादा प्रमाणपत्र को महत्व दिया । कम पढेलिखे लोगो के लिए रोजगार का यह आसान तरीका समझ मे आने लगा, चमक और आकर्षण के कारण बेरोजगारों को इसमें लाना भी आसान रहता है।केवल बिहार यूपी में ही प्रति वर्ष 8000 नए गायक  और इतने ही अभिनेता अभिनेत्री इस घरेलू उद्द्योग को मिलता रहता है। जो अपने माता पिता की जमा पूंजी से स्टूडियो,कैमरा मैन ,कैमरा-!लाइट, सप्लायर,यू ट्यूब चैनल के उपलोडकर्ता और निमार्ता निदेशको के व्यापार को सुदृढ़ करता है।फिर यही असफल कलाजगत के लोग खुद को निमार्ता निर्देशक बन कर नए बेरोजगारों को मनोरंजन जगत के लिए तैयार करते है।
इस तरह के मनोरंजन के घरेलू उद्द्योग में निर्मित फ़िल्म तकनीकी और साहित्यिक रूप से बहुत कमजोर होते है जिसे निमार्ता खुद ही प्रदर्शन के लिए नही लाता, अगर कुछ पर्दे पर आ गया तो किराये के सिनेमा हाल में  प्रदर्शन के लिए भी कलाकारों से ही पैसा वसूला जाता है ,मुमकिन है कि दर्जन भर दर्शक मिल जाये लेकिन  इस फ्लॉप फिल्म के कई हीरो और हीरोइन इस बाजार के लिए तैयार हो जाते है।लगभग 95 प्रतिशत इस तरह के फ़िल्म बिना किसी प्रयोजन का बनता है जिसे प्रदर्शित नही किया जाता।यही हाल शार्ट फिल्मो का है, वो तो भला हो यू ट्यूब का जिसपर  लोग उपलोड कर अपनी  इतिश्री कर लेते है।आजकल कम्पनी के नाम पर बने यू ट्यूब चैंनल पर एक गाने के उपलोड का भी एक हज़ार से तीन हज़ार तक  नए गायको से वसूल कर लेते है।फिर बेसुरे और संगीत से दूर रहने वाले कथित गायको को भी ब्रांड गायक बनने का लॉलीपॉप दे दिया जाता है।
रुपहले पर्दे के मनोरंजन के इस खेल में बहुत तेज़ी लाखो युवा दिग्भर्मित हो रहे है, कई तो आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो रहे है , इस उद्द्योग के आड़ में यौन शोषण और सेक्स का ब्यापार भी तेजी से पांव पसार रहा है , दरअसल मनोरंजन का यह नशा जिसे एकबार लग जाये फिर वो यंहा से निकल कर कोई दूसरा रोजगार करने में खूद को सहज नही  पाता। इस कारण इसी धंधे में नए लोगो को फ़ौज तैयार करता है । कम पढेलिखे अभिवावक भी  अपने बच्चों पर इस तरह शार्ट कट सफल होने की उम्मीद में  पैसा खर्च करने लगते है।
मनोरंजन के इस घरेलू खेल में समय से संज्ञान नही लिया गया तो जल्द ही स्थिति भयावह हो जावेगी, युवा रोज ठगे जाएंगे और घर परिवार टूटता जाएगा।अपराध, सेक्स,और आत्महत्या जैसी हालात बढ़ने लगेंगे। इसलिए सरकार को इस पर पहल करनी चाहिए , क्षेत्रीय फ़िल्म और मनोरंजन के लिये भी अकादमी ,स्कूल खोलने चाहिए, योग्य कलाकार और  निर्माताओ को काम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करना चाहिए। ऐसे नियम बनने चाहिए कि क्षेत्रीय फिल्मो को आसानी से सिनेमा हाल में प्रदर्शित किया जा सके। फ़िल्म और मनोरंजन के क्षेत्र में जाने के लिए प्रशिक्षण और ऑडिशन की व्यवस्था सरकारी स्तर पर हो ताकि आर्थिक और यौन शोषण से बचा जा सके। क्षेत्रीय मनोरंजन  को भी लोक कला की तरह प्रोत्साहन और संरक्षण की आवश्यकता  है।अन्यथा यह घरेलू मनोरंजन उद्द्योग विषबेल साबित होगी।

100 का नोट

उस दिन मेरे जेब मे केवल 100 रुपया था, बैंक अकाउंट भी जीरो बैलेंस पर था,,फक्कड़ बना था, लेकिन ये मेरे लिये कुछ नया नही था, मेरा ये डाक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माण का धंधा ही कुछ ऐसा ही है , किसी महीने खाने पीने , गाड़ी में तेल भरवानेऔर मकान का किराया देने से भी अधिक कुछ मिल जाता था जिसे मैं अपनी रहाइशी समझता था,बाकि तो कई महीने तक तो फाकाकशी ही चलता है,लेकिन उस दिन का एक सौ का नोट मुझे देश का सबसे अमीर होने का अहसास दिला रहा था,लग रहा था मानो बड़े बड़े धन्ना सेठ भी मेरे जैसा ही है। जितना वो खर्च कर सकता उतना मैं भी ही हूँ। जी वो 8 नवम्बर का रात्रि के 8 बजे के बाद का हालात था। अमीर गरीब सब सामान्य थे ,सामान्य ही क्यूँ, अमीर लोगोंके लिए तो ये अकूत धन आत्महत्या या सदमे के कारण अस्पताल में भर्ती हो रहे थे।सुबह से बैंक के लाइन में सभी साधारण आम जन हो गए थे । लेकिन धन्य है भारत के लोग जल्दी ही जुगाड़ के कारण अपने रौब में लौटने लगे , फिर होने लगी राजनीति , नफा नुकशान की नाप तौल, अब एक साल बीत गया इस नाप तौल में, अभी तक निष्कर्ष तो नही निकल पाया, लेकिन आज तक कोई भी मेरे सामने सीना तान कर अमीरी दिखाने की कोशिश नही की, शान शौकत में भी बदले हुए नए नॉट का धौंस नही दिख पाया,। सच बताऊं आलोचकों का बस यही कष्ट है , पैसा तो सबने उल्टे सीधे तरीके से बदल लिए लेकिन कोई गर्व से अमीर जैसा दिखने की चमक नही बना पाया। बस यही खुशी मुझे आज साल भर से फाकाकशी में अमीर जैसा फील करवा रहा है, न जाने कब तक इस तरह का कथित अमीर बना रहूंगा।
©नितेश

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

वो तुम हो

वो सारे शब्द तश्वीर में बदल गयी,
लड़खडाती उम्मीदें  सम्भल गयी,
यादों की मरुभुमि में वो बरसी छम से,
मुर्झायी सी ये ज़िंदगी फ़िर से मचल गयी !!!

बुधवार, 1 नवंबर 2017

विमोचन के बहाने

विमोचन के बहाने.....
सोनभद्र में पत्रकार संगठन के विस्तार के क्रम में एक पत्रकार संगठन ने अपने पत्रकार परिचायिका का विमोचन कार्यक्रम  रखा , प्रमाणिकता और ब्रांडिंग के लिए अतिथि व मुख्य अतिथि भी थे,कुछ वयोवृद्ध पत्रकार के साथ संघर्षशील पत्रकारबन्धु भी उपस्थित रहे।खुशनुमा माहौल में हुए विमोचन कार्यक्रम में कई सुर्ख पल भी दिखने को मिला,
लीक पर चल रहे पत्रकारों से अलग संगठन एक लाबी की प्रक्रिया के तहत कई परम्परा से अलग होने का भी प्रयास था,  मसलन कलमकारों द्वारा मां सरस्वती का माल्यार्पण न होना, दीप प्रज्वलित न होना, लीक के पत्रकारों को हासिये पर रखना, ताज़्ज़ुब है पत्रकारों के हित के लिए बनने वाली संगठन कुछ खास लोगो के ब्रांडिंग के लिए कैसे हो सकता है ! फिर भी सभा मे उपस्थित 90 प्रतिशत पत्रकार जिले के कई अन्य पत्रकार संगठन के सदस्य भी थे,कुछ तो दो या उससे अधिक संगठन के सदस्य थे,निदेशक मंडल के सदस्य तो कई नामी गिरामी संगठन के पुरोधा भी थे। इससे बड़ा आश्चर्य ये की कोई भी निदेशक की उपस्थिति नगण्य थी, तो फिर इस तरह के संगठन की क्या आवश्यकता थी क्या पूर्व के संगठनसे उम्मीद खत्म था कि दोहरे संगठन की सदस्य बनना पड़ा या संगठन ही बनना पड़ा,गुफ्तगू में कई अन्य अनसुलझे सवाल भी थे ,लेकिन सवाल पत्रकारों के हित से जुड़ा था, इसलिए सबको चुप रहना ही मुनासिब था ,लेकिन इससे किसका हित होगा और किसका अहित ? यदि पत्रकारों का भला होता है तो आयोजक,और संयोजक को मेरी ओर से बधाई ,दिन दूना और रात चौगुना! मेरे जैसे निरीह के लिए लड़ाई लड़ें ,सबकी दुआ उनके साथ है!