#मेरा_एकांतवास 25
8 वर्ष का था उस समय , नवरात्रि का पहला दिन था शायद, लेकिन मैं तो नवरात्रि का मतलब भी नही जानता था। उस दिन किसी के साथ देवी मंदिर चला गया था , लौटते समय मंदिर के पास दो रुपये का लाल वाली नोट मिला। बहुत खुश हुआ था मैं , उस समय का दो रुपये आज के 200 रुपये से अधिक का था। बहुत कुछ खरीद सकता था उस से। खिलौनों से घर भर सकता था, तार पर ऊपर नीचे उछलता हुआ बन्दर वाला खिलौना। हाथ की अंगूठा से टिक टाक बजाने वाला खिलौना ,बांसुरी,लेमनचूस, लट्टू, दालमोट , लाल वाला बर्फ(आइसक्रीम) ये सब भी हफ्ता भर खा सकता था। कई सपनो को सजाते घर पहुंचा था मैं। धनबाद के पाथरडीह कोलवासरी कालोनी में रहता था उस वक़्त , मुझे याद है मुहल्ला में सिंह साहब के यहाँ पहली ऑटोरिक्शा आया था, बाबूजी भी खरीदना चाहते थे लेकिन 9000 रुपया जुटाना असम्भव था। बच्चों को सफेद शर्ट नील पैंट में स्कूल जाते देख बहुत तरसता था, मैं तो खाकी वाला पैंट में ही खुश था जो बाबूजी के ड्यटी वाला कपड़ा को काटकर घर मे ही सिला जाता था,जिसे फटने पर चिप्पी लगा कर महीनों चलाते थे। झोला में किताब और अमरूद चबाते हुए सरकारी पाठशाला पहुंच जाते थे। खैर उस दिन मैं अचानक अमीर हो गया था 2 रुपये पाकर। घर आया और खुश खुश माँ को बताया। लेकिन यह क्या माँ तो बिल्कुल खुश नही हुई। बोली आज नवरात्रि का पहला दिन है कुछ ऐसा वैसा वाला यह रुपया न हो, डर लग रहा है। उस नोट को अलग रैक पर रख दिया गया , हाथ मुंह धोकर खाया फिर खेलने चला गया , रात को हल्की बुखार आयी ,और अगले दिन बुखार 102 हो गया , माँ कहने लगी कि ये सब उस दो रुपये का कमाल है।
पूरा घर परेशान। बड़ा लड़का जो था खानदान का। उस समय बुखार लगने पर कुछ नही दिया जाता खाने को बस गर्म पानी । बहुत मुश्किल था, भूख से मन छटपटाने लगा, 2 दिन बीत गया लेकिन बुखार जाने का नाम नही लेता , मैंने भी चुपके से चुरा चुरा कर अमूल दूध का पावडर दो दो चमच्च खाना शुरू कर दिया। मजा आने लगा, एक तो आम का अचार भी खाया था। तीसरे दिन रेलवे अस्पताल में डॉक्टर से दिखया गया। डॉक्टर ने बताया कि टायफाइड हो गया है, आँत का बुखार है। मैं तो डर ही गया सोचा अमूल पावडर ने तो आंत में इंफेक्शन फैलाया तो नही। फिर इंजेक्शन लगने लगा, उस समय इंजेक्शन से इतना डर लगता जितना आज ऑपरेशन से नही,टेबलेट भी खाने को मिला लेकिन अन्न के नाम पर कुछ नही ।एक टाइम पाँव रोटी, या फिर ब्रिटेनिया को दो बिस्किट बस।20 दिन से ज्यादा रहा बुखार दीवाली आने वाली थी। तांत्रिकों के पास भी मुझे ले जाया गया, हर तांत्रिक ने अपना अपना तरीका अपनाया। कई ताबीज गले मे लटक गए थे। मिर्च और लोहमान की धुंआ से मुहल्ले के भी दुष्ट आत्मा भाग गया होगा।आखिर कर उस दो के नोट को मंदिर में चढ़ा दिया गया। टायफाइड ठीक हो गया। पथ्य में रोटी को पानी मे भींगा कर , परवल को भूनकर उसकी भरता बनाकर खाया था, बिना तेल का। पथ्य के 3 दिन बाद पुराना चावल को गिला कर के माड़ के साथ खाया था। छठ तक तो स्वस्थ हो गया था ,लेकिन उछल कूद नही कर सकता था। परन्तु वो वाला 2 रुपये के नोट हाथ से निकल गया था। आज भी कोई रुपया कहीं गिरा मिलता है तो उठाने से पहले वो सारी घटना याद आने लगती है। फिर किसी बगल वाले से कहता हूं कि उस नोट को उठा ले।©nitesh
क्रमशः
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें