बुधवार, 8 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 14

#मेरा_एकांतवास 14
आप कितना भी अपनी आत्मबल को मजबूत बनाये, कठोर और धैर्यवान बनने की कोशिश करें लेकिन सम्वेदनाओं को झकझोरने वाली घटना जल्दी मनस्थिति से मुक्त नही होता।, उन्हें  इस आपात स्तिथ में  मैं रात्रि 8 बजे के आसपास इरजेंसी में BHU अस्पताल छोड़ आया था, वापस आने पर बैचेन सा खुद को महसूस कर रहा था, नींद तो मुश्किल ही था। तभी रात को दो बजे एम्बुलेंस से उनका मृत शरीर आया। साथ मे थे एक पत्नी जो अभी अभी विधवा हुई थी, एक किशोरवय बेटा, और एक विधवा मां,इनसब के साथ मे एक दूर के बुजुर्ग रिस्तेदार। मेरे सामने की बरामदे पर उन्हें लेटा दिया गया जिसे बॉडी कहकर पुकारा जाने लगा।  रात के इस क्रूर अंधेरा में कोई नही आया , मां और पत्नी दो विधवा सुबक कर रो रही थी, बेटा हिम्मत बनाये हुए था। ।वो रिस्तेदार वही जमीन पर बैठ गया सुबह तक के इंतजार में, शव के अंतिम संस्कार के लिए कुछ अपने करीबी रिश्तेदार के इंतज़ार में इन्हें 70 किलोमीटर दूर से आना था , लॉक डाउन में परेशानी की सबब थी। दो बेटे में बड़े बेटे को पिछले साल उन्होंने अमेरिका भेज दिया था। छोटा साथ मे था ही।
मैं क्या करता !!पहले ही एकांतवास में था और अब !!मेरे सामने मृत शरीर पड़ा था सुबह होने में 4 घण्टे बचे थे ,  बस मुझे निहारना ही था,  मूक !!! मृतक के किस बात का चर्चा इन परिजनों से करके इन्हें ढांढस बंधाता!!! वो प्रोफेसर थे,दो लाख से अधिक का वेतन था, दो आलीशन अपार्टमेंट्स नुमा घर बनवाये थे, जिससे एक लाख की अतिरिक्त आमदनी थी। विदेशों में गेस्ट प्रोफेसर  का काम भी कर लेते थे जिससे साल के 7 से 10 लाख अतिरिक्त जुटा लेते थे। धन का संग्रह उनका बहुत बड़ा शौक था।  उन्हें अपने करीबियों में धनवान होने की प्रतिस्पर्धा थी। लेकिन भोग नगण्य था , कहते थे भोग में व्यस्त हो जाऊंगा तो क्या बचेगा।  साधारण भोजन तक कि कटौती रहती थी। अभी तक कि 20 साल की नॉकरी में उन्होंने साइकल या फिर पुरानी मोटर साइकिल से ही काम चलाये, 5 साल से ऊपर हो गया होगा कि कोई नया कपड़ा सिलवाया हो उन्होंने, मितव्ययिता की सीमा से बहुत आगे निकल गए थे, सुख साजोसामान की कोई वस्तु नही रखते। अभी तक वाटर फिल्टर की जरूरत नही समझा। समाजिक सरोकार भी नगण्य था, तीज त्योहार पर भी न किसी के घर जाते न कोई आता। कसी रिस्तेदारो को भी कभी कभार आते नही देखा। आसपड़ोस से तो सम्बन्ध बिल्कुल ही नही था। 6 साल पहले डाइबिटीज,हो गया था, ब्लडप्रेसर भी था, लेकिन दवा लेने और परहेज से बचते रहे, नतीजा किडनी फेल हो गई, विभागीय इलाज चलता रहा। विभाग की ओर से उच्च चिकित्सा के लिए मेदांता रेफर किया गया लेकिन वहाँ डॉक्टर से मिल भर आए ,भर्ती नही हुए कि यहां तीमारदारी कौन करेगा, और तीमारदार का खर्चा बढ़ जाएगा, मजबूरन सप्ताह में दो दिन डायलेसिस होने लगा। चारपहिया गाड़ी से डायलिसिस के लिए अस्पताल जाना खर्चीला लग रहा था सो प्रति 3 दिन पर  मोटरसाइकिल से जाते और डायलेसिस करवा कर चले आते। उस दिन जब अधिक रक्तस्राव होने लगा था तो मैं ले गया था अस्पताल ,लौटने पर बताया था कि 8 साल और जी लेता तो बच्चों के लिए कुछ और ठीक व्यवस्था हो जाती!!अपनी चिंता अब भी नही थी। और अब ...मिट्टी का ढेर पड़ा था , सभी ऊंची ऊची लक्ष्य,ख्वाहिशें, महल, बैंक बैलेंस, रसूख, अमीर बने रहने का कल्पना , लोगो से आगे दिखने की चाहत ...सब मेरे सामने ही राख बना पड़ा था।  मुझे लगा कि एक बार पूछ लूं कि इन अपार धन से आपको कौन सा सुख मिला, दुनिया मे शायद आप कुछ दिन और जी सकते थे , दुनिया को देख सकते थे अपनो को देख सकते थे। जितना दिन आपने जिया उतने दिन अपनी कमाई धन से कौन सा सुख लिया??जिसकी प्रतिस्पर्धा में आप आगे जा रहे थे वो आपके शव के इर्दगिर्द भी नही।जिसे सुख देने की चाहत थी, जिसके लिए संग्रह कर रहे थे वो आज आपके आखिरी समय मे पिता कहकर संबोधित भी नही कर सका।ये धन ये वैभव किस काम का। सब आपकी ही तरह शव बना पड़ा है।......लेकिन इन तमाम प्रश्नों के उत्तर देने के लिए बचे ही कहाँ थे,मृत, और बेबस शव ।
सवेरा हुआ आसपास के लोग बाहर से ही झांकते चले गए।सबकी जुबान पर यही चर्चा थी, बहुत कमाकर रख गए लेकिन अभाव में मर गए खैर छोटे वाले बेटे को भी नौकरी मिल ही जाएगी।।गांव से पांच लोग आए और दाहसंस्कार के लिए ले गए। 
आज 21 दिन की गृह कारावास में  पूरा देश आत्मावलोकन में है कि जीने के लिए कितनी जरूरते कम है, अधिक परेशान तो हम दिखाने के लिए रहते है। धन का संग्रह भी जरूरी है आपात काल के लिए, कुटुंब की सहायता के लिए, मजबूरों में दान के लिए, स्वस्थ जीवन के लिए। इन सब के बिना उपयोग के धन किस काम का!वह कब तक रुका रहेगा।©nitesh
क्रमशः

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