सोमवार, 6 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 8

#मेरा_एकांतवास 8
 मेरा एकांतवास भी एक यात्रा है, एकदम शांत वातावरण में जब सभी वैद्युत उपकरण को बंद कर 3 से चार घण्टे खुद से जूझता हूँ तो अतीत के अनुभव यात्रा से बाहर आता हूँ, इस चौराहे पर खड़ा भविष्य का एक सामान्य से साधारण सा लीक ढूंढता हूँ, वास्तव में जीवन यात्रा  जितना कठिन है उतना ही आसान भी , हर व्यक्ति ने अपनी जीने की कला खुद से तैयार की है, किसी की इस कला में अपनों ने भी रंग भरा है, लेकिन जो कला आपने खुद से बनाई है वह विशुद्द रूप से आपकी है, उस  लीक पर कोई दूसरा नही चल सकता।  आप जीते है और जीने की उद्देश्य तलाशते है,फिर उसपर जीना शुरू करते है, जिम्मेदारी भी एक बड़ी उद्देश्य बनाती है। उसे पूरा करने को ही जीना समझते है ,इसे ही जन्दगी समझ लेते है,यह जीवन यात्रा का सामान्य नियम है , लेकिन इन अनुभवों से सीखना , और उस जिम्मेदारी के प्रति मोहपाश होना  दोनों के बीच का संघर्ष ही जीवन संघर्ष है। खुद का आत्ममंथन हमे इन दोनों से दूर निकालता है। आवश्यकता, अपेक्षा , मोह ,लोभ , को अगर घटाने लगे तो क्रोध और वासना भी नही होगी,  फिर मन मे अजीब सी शांति मिलेगी , बहुत सारी इन वस्तुओं को इग्नोर कर दें , लोगो की बातों को अनसुना कर के भी आप खुद को शांत क्लांत कर सकते है, संवेदनशील मनोभाव को दूसरे का कटाक्ष बहुत उद्वेलित करता है, और चतुर लोग ऐसे सीधे साधे मनोभाव वालो के साथ यह कृत्य करते रहते है। अतः हमें इन चीजों को पहचानने की जरूत है।
अतीत की यात्रा से बाहर  एक सुखद पड़ाव होता है ,आप वहां से सकुशल आगे की यात्रा कर सकते है , बस तय करना है कि आपको ही चलना है बाकी लोग भी चल रहे है, इसलिए निश्चिंत होकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त संसाधनो के माध्यम से सफर तय हो सकता है।एक शोक जो आपको और डरा सकता है वो कि आपकी यात्रा के बाद आपका अस्तिव!शायद यह भय भी आपको क्लेश की दलदल में खड़ा कर देगा, वस्तुतः यह आपकी संस्कार में पिरोया हुआ भय है, लेकिन अतीत से अनुभव ले तो ये सब मिथ्या है, सहज रूप से किया हुआ कार्य स्वयं ही यात्रा के बाद का अस्तित्व है।, आपका निमित्तमात्र का कार्य भी अस्तित्व ही है और फिर इस अस्तित्व का अस्तित्व का भी उम्र बहुत अधिक नही होता। जब सब परिवर्तनशील है तो इस  भय पर चिन्ता क्यूँ।  बस सफर पर निकल पड़िये, बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी अपेक्षा का , यात्रा समाप्ति के बाद कुछ अवशेष नही रहता , जो रहता है दीपक की तरह वह भी बुझ जाता है , परिवर्तन की बारिस सबको मिटा देता है , फिर शोक कैसा।@nitesh
क्रमशः

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