बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

रत्नगर्भा

#रत्नगर्भा
मैं हरदी सोन पहाड़ी हूँ
मत छेदों मेरे छाती को
अपनी समृध्दि के खातिर
नष्ट न करो मेरे थाती को
मुझे अक्षुण्ण रहने दो 
मेरा गर्भ स्वर्ण भरा है
समृद्द होने की लालसा में
मेरे गर्भ पर न आघात करो
तनिक स्मरण तो करो
युगों युगों से तेरा पेट भरा है
मेरे गर्भ 
मेरा अपराध क्या है
आम स्त्रियों की तरह ही
तेरे विपत्ति काल का सहचरी हूँ
तुम बुद्धिमान हो ,शक्तिमान हो
तुम जान गए 
मेरा अन्तः पहचान गए
कुछ स्नेह दिखलाओ
मेरे देह पर कुछ हरित लहराओ
स्वर्ण से भी बहुमूल्य 
पवन पानी जीवन लाओ
स्वार्थ समृध्दि के खातिर
न क्षत विक्षत करो छाती को
बहुत पीड़ा होता है 
संरक्षित रखो थाती को
अब तक सोन पहाड़ी हूँ
 मत छेदों मेरे छाती को!!!!
©nitesh bhardwaj

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

आत्महत्या

#आत्महत्या
अभी चार दिन पहले बनारस में मानवीय भावनाओं को पीड़ा देने वाली एक घटना घटी, एक दम्पति अपने दो मासूम के साथ आत्महत्या कर लिए, एक उच्च वर्गीय परिवार, जिनके बच्चे भी  उच्च स्तरीय स्कूल में पढ़ रहे थे, अपनी पिता की परेशानी में इस कदर शामिल हुए की मरने के लिए पिता से कहा  कि पहले नींद की दवा खिला देना फिर गला दबा देना।......मासूम की इस बात पर तनिक गौर करें, ...इस भौतिक वादी युग मे अपनी सफ़लता  असफलता का मापदंड  दूसरे की  सफलता से लगाते है, इस प्रतिस्पर्धा ने पिछड़ जाना हमे इस कदर नागवार गुजरता है कि अपना कुनबा ही समाप्त कर लेना चाहते है,  असफलता के लिए पिता तुलस्यान खुद ही आत्म हत्या कर सकता था लेकिन पूरे परिवार को इसके लिए क्यों तैयार किया??ताकि उसके मरने के बाद  उसकी बीवी ,बच्चे को दुनिया मे तकलीफ न हो। उसने  अपनी तरह बच्चों को भी कायर बनाया, असुरक्षा की भावना का बीजारोपण परिवार का मुख्य कार्य था, वो जिस जीवन स्तर को जी रहा था उससे समझौता नही करना चाहता था और न ही बच्चों को उससे कम देना चाहता था, यह भी सम्भव था  कि बच्चे होनहार हो और भविष्य में पिता से ज्यादा सुखसाधन जुटा लेता, लेकिन पिता को उस पर विश्वास नही था, उसे तो अब खुद पर भी विश्वास नही था, नतीजतन सबको उसने भविष्य से डराया और आत्महत्या के  लिए तैयार कर लिया, बच्चे मौत से डर रहे थे लेकिन उससे भी ज्यादा डर उसे भविष्य से था इसलिए पिता को अपने मरने का सुगम रास्ता सुझाया,, बच्चे ने अपने पिता का प्यार का कर्ज भी अदा किया, उसे मारने की इजाज़त भी खुशी खुशी दे दी। इतना प्रेम भी आज की दौर में करोड़ो में एक ही होता है,
  लेकिन क्या आत्महत्या उचित था या यह ही अंतिम विकल्प था??? जब हम अपने आसपास के वातावरण से इतर हो खुद में जीने लगते है तो हर परिस्थितियों का जिम्मेदार खुद होना पड़ता है, ऐसे में विपरीत स्थितियों में हमे कोई दूसरा सहारा नही सूझता, कोई विकल्प ढूढने में असमर्थ  हो जाते है और फिर इस तरह के कदम उठाने पड़ते है,  यह भी सच है कि यह विचार मात्र कुछ घण्टे में उतपन्न हुआ हो ऐसा नही है, कई दिनों तक इस पीड़ा में गहन विचार किया गया होगा, सबको अपनी असुरक्षा के लिए चिंतित होने पड़ा होगा, बच्चों की आधुनिक पढ़ाई  किताबो से अलग नही रहा होगा, वरना पिता के विचारों में उसकी भी अपनी बात कहने का ज्ञान होता, सम्भव होता पुत्र या पुत्री अपने माता पिता को भी ढांढस देता, .....ऐसा कुछ भी नही हुआ और चार जिंदगी मौत के हवाले हो गयी, हमे उन हालात के मनोवैज्ञानिक स्थिति को समझना होगा और उसके प्रेरक को भी, आज भौतिक अभिलाषा वाली एकांकी जीवन इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार है , हम अपना विकास  की परिभाषा जीवनस्तर को उच्च बनाने को समझते है, अपनी पारिवारिक और सामाजिक दायरा  में सहिष्णुता को विकास समझना छोड़ दिये है  जिसकी परिणीति है यह घटना,
हमे घर में अपने आस पड़ोस में इस तरह की असुरक्षित मानसिकता वाले परिवारों में एक सद्भावना विकसित करनी पड़ेगी ताकि  इसतरह की हृदयविदारक घटना पर विराम लग सके।
हम हर परिस्थितियों में खुश हो कर जीना सीखे।
@nitesh

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

लहरों से संवाद

उद्वेलित मन,
अस्थिर तन
स्वयं से जब हो विवाद
तब जरूरी हो जाता है
करना
लहरों से संवाद

अन्तर्वेदनाओ की क्रंदन को
युगों युगों से लयबद्ध
संगीत बनाता रहता है सागर
लहरों की वाद्य पर छेड़ता है
एक धुन
न कोई शिकायत न कोई प्रतिवाद
फिर क्यूँ न हो
लहरों से संवाद

युगों से नियमित
असंख्य अभिलाषा, स्वप्न
हार जीत, सफल असफल
प्रसन्न और करुण हृदय
भावनाओ की बोझ लिये
इन्ही सागर में समा
करता रहा है स्वयं का श्राध्द
फिर क्यूँ न हो
लहरों से संवाद

मान अपमान  प्रिय अप्रिय
सागर भर प्रसन्नता
या सागर सा हृदय की
वेदना
सागर की तरह नित्य निखरना
या लहरों की तरह नित्य विखरना
मन के अन्तःस्थल में
बिखरते सम्बन्धो का
यही होता है पश्चाताप
फिर क्यूँ न हो
लहरों से संवाद
क्रमशः.................
©nitesh bhardwaj