कुछ पंक्तियाँ मैं भी लिख लेता था
बसंत आते ही
जैसे ही तुम गर्म शाल उतार
कर दुपट्टा ओढ़ती
सरसों की फूल सा शृंगार
शब्दों से सजाने लगता
पलाश की फूलों से
तेरे गालों का रंग भरता
कलकतिया गुलाब से अधर सजाता
और अमराई से तेरी गेसुओं की ख़ुशबू
बसंती चुनरी से ख़ुद खेलने लग जाता
हर साल यही लगता कि
यह सोलहवाँ फागुन है
रात खुली आँखों से सपने बुनता
और दिन मदमस्त अलसाई सी
आज
पता ही नहीं चलता कि
कब फागुन का रंग चढ़ा और धूल गई
किसे कौन याद रहा और
कौन कब भूल गई ।
©️nitesh