#मेरा_एकांतवास 19
सरकारी क्वार्टर और उसकी कालोनी का एक अलग संस्कृति होती है , न तो शहर जैसा न ही गांव जैसा। लेकिन उसमें भी सम्पूर्ण भारत मे रेलवे कॉलोनी की रहन सहन और संस्कृति लगभग एक जैसी ही है। अधिकतर रनिंग स्टाफ होते है ,कुछेक इंजीनियरिंग स्टाफ, लेकिन सब मे समानता यह कि छोटे छोटे कमरे में एक बड़ा संसार बसा लेते है, अलग अलग प्रदेश से आये हुए , विभिन्न मजहब, जाति, रंग रूप, विभिन्न ओहदे वाले सभी कालोनी में एक परिवार जैसे बन जाते है। चाचा, चाची, भैया, दीदी, गोलू,भोलू, लड्डू डब्बू, सब एक जैसे शब्द गूँजने लगते है, जब मैं रेलवे कॉलोनी में बाबूजी के साथ रहने आया तो , लगा मेरे अभिभावक केवल पिताजी ही नही सम्पूर्ण कालोनी के वो लोग है जो बाबूजी के साथ ड्यूटी करते है, सबका आदर अपने परिवार के सदस्य जैसा ही करना पड़ता, सबके सामने अलग से फैशनेबुल बनना या तेज आवाज में बोलना भी मुश्किल ही था, शायद यही कारण था कि कोई बुरी आदत या नशा पत्ती नही सीख पाया। बाबूजी के साथ मैं अकेले रहता था, पढ़ने के खातिर । उस जमाने मे कई चीज आज की तरह उन्नत नही था, खाना बनाने के लिए प्रतिदिन कठिन प्रयोजन करना पड़ता। लोहे के चादर से बना चूल्हा में अंदर की तरफ मोटी परत की मिट्टी चढ़ाई जाती थी ,जिसे प्रतिदिन गीली मिट्टी से पोता जाता था ,फिर उसमें थोड़ा सा मोबिल युक्त जुट डाला जाता था , जो रेलवे से ही निकला कबाड़ रहता था ,उस जुट के ऊपर चार से छः लकड़ी डालकर कोयला बोझ दिया जाता था फिर नीचे से आग लगा दी जाती थी , कोयला का धुंआ खत्म होने तक इंतजार करना पड़ता था, आंच आने पर झटपट खाना बना लेने की जल्दी होती थी, बिना कुकर दाल भी देर से बनती थी, इसलिए अरहर की जगह मूंग मसूर का दाल ज्यादा पसंद था,। कभी खाना बनाने के बीच मे आंच कम हो जाये तो फिर कोयला डालना पड़ता और कमसे कम 30 मिनट के बाद ही पुनः आंच आता। ऐसे में खाना बनने में बिलम्ब हो जाता। ऐसे अवसर पर अक्सर बाबूजी से डांट सुनना पड़ता। ज्यादा व्यंजन के लिए दो चूल्हा जलाना पड़ता, बाद में तो डांट से बचने के लिए एक्स्ट्रा चूल्हा बोझकर रखा रहता था।
रात को खाने के बाद टहलना एक रूटिंग था, इसी दौरान खाश मित्रो से गप्प करते समय ही नही पता चलता। उस समय पढ़ने का टाइमटेबल खाने से पूर्व का ही होता था , या फिर सुबह सवेरे, आज कीतरह मजदूरों की तरह पढ़ाई करने वाले कम ही होते थे,फिर मैं तो औसत विद्यार्थी ही था। कालोनी में बड़े पुरुष महिला जो चाचा चाची थे उनका प्यार किसी कीमत पर अपने माता पिता से कम नही था, एग्जाम के समय तो कई लोग अपने घर मे मुझे बुलाकर खिलाते।
कालोनी में खेल भावना भी सभी को एक सूत्र में बांधे रखता, हर युवा किसी न कि किसी खेल से जुड़ा रहता, कुछ आलसी मेरी तरह सांस्कृतिक कार्यक्रम में व्यस्त रहते । आखिर कालोनी में इसकी भी जरूरत रहती थी। चार आना ,आठ आना चंदा करके खेल मैदान में पर्दे पर फ़िल्म दिखाने की व्यवस्था भी कर लेते थे। एक फ़िल्म को किराए पर लाते लेकिन कुछ रेलवे के पार्सल वाले चाचा जी के सहयोग से सिनेमा हाल तक जाने वाले रील को भी पहले यही देख लेते। यानि एक रात में दो फ़िल्म देखते। फ़िल्म देखने के लिए चटाई या टाट लेकर पहुंचते। चंदा में पैसा कम पड़ता तो मुंगफली बेचने वाले दुकानदार से भी टैक्स वसूल कर लेते। कालोनी ग्राउंड में फ़िल्म देखने का वो अंदाज आज के किसी भी मॉल संस्कृति से बेहतर और रोचक हुआ करता था।वो था बचपन....!@nitesh
क्रमशः
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