बुधवार, 29 अप्रैल 2020

मेरा एकान्तवास 35

#मेरा_एकान्तवास 35
प्रेम एक अदृश्य शक्ति होता है, वह दिखाई नही देता लेकिन उसका सम्बल सबसे मजबूत होता है। प्रेम जताने के लिए  किसी उपमा उपधान की जरूरत नही पड़ती। मेरी दादी जिनके प्यार स्नेह  को मैं आजीवन भूल नही पाऊंगा। लोग कहते है कि माँ का प्यार अधिक छाप छोड़ता है मनुष्यो पर ,परन्तु  इसके इतर भी बहुत सारी सम्बन्ध की डोर इससे अधिक मजबूत हो जाते है। दादी गांव की पुरातन संस्कारो की धरोहर थी। बाबा के जीते जी उन्होंने समय की नियति से उपजे अभाव को देखा था, और उनके जाने के बाद तो वह भी जाता रहा। एक सन्यासिनी , तपस्विनी की तरह शेष जीवन को जिया। मेरे बाबूजी उनके इकलौते पुत्र थे। दो बुआ अपनी गृहस्थी में उलझी रहती थी। बाबूजी नौकरी के चलते सदा बाहर ही रहते।बाबूजी हमलोगों के देखभाल के कारण या स्वाभाविक मजबूरी के  कारण दादी पर कम ही ध्यान देते। मां तो शायद बिल्कुल भी नही। वो गांव में अकेले रहती। उस समय घर और गृहस्थी भी  अभाव की तंग गलियों से चलता था। लेकिन सब के बाद भी उनका प्यार स्नेह माला माल कर देता था । उनके पास आज की तरह स्नेह जताने के लिये चाकलेट, कुड़कुड़े, चिप्स, आइसक्रीम नही था, खनखनाती सिक्के भी नही थे। जिससे बच्चे खुश हो जाता। लेकिन उनका वात्सल्य स्नेह भाव का शब्द हृदय में अक्षरशः स्थायी होने लगता। झोपड़ी नुमा कच्चा मकान, और उसके एक कोने में पड़ा मिट्टी का चूल्हा उसपर काला बहुत काला दो या तीन बर्तन। लकड़ी का कठौती, ढक्कन, पलटा , फूल की थाली, ग्लास, कटोरी यही मोटी जमा पूंजी था उनके पास। फूल की कटोरी में परोसा गया दूध जिसके स्वाद से ज्यादा आनंद नाक डूबने में आता।   दादी के हाथ का बना खाना का स्वाद किसी भी फाइव स्टार भोजन से बेहतर था। न तो शानदार रेसिपी पढ़कर बनाती और न ही सेफ क्या सुझाया मसाला ही डालती फिर भी जो स्वाद उसमे मिलता आज ढूढने से नही मिलती। मक्के की मोटी मोटी रोटी , धुंआ, मिट्टी, राख से मिश्रित होती  लेकिन कोई भी बीमारी का खतरा नही रहता। हां पवित्रता इतनी होती कि सुबह शाम दो बार गोबर से निपा जाता था। आज तो शिक्षित  शहरी अपने बच्चों को इस तरह के पकवान के आसपास भी फटकने न दे।
उन्हें पता था कि मुझे क्या क्या पसन्द है। वो उसका बहुत खयाल रखती थी , मेरे जाते ही मौसम अनुसार बथुआ का साग,भुनी हुई अरहर की दाल, मक्के की रोटी,लहसुन मिर्चा की चटनी, मट्ठा,दही चूड़ा, बैगन बड़ी की सब्जी,  और खीर बनाया करती। इतने समान को भी बड़ी प्रेम से सहेज कर लाती। जो खुद के घर नही होता पड़ोस से उधार मांग के लाती , "पोता आया है उसे खिलाना है"फिर बिन दांत वाली कपोल से मुस्कुराने लगती। 80 की उम्र हो गयी रही होगी  लेकिन चश्मा कभी नही पहनी। आखिरी समय मे जरूर बोल रही थी कि सुई में धागा डालने में मुश्किल हो रही है। तनिक तुम ही सुई में धागा डाल दो। चलते समय  समय कच्चा मूंगफली की दाना, गरी, छुहारा, किसमिस देती, ।चरखा काटकर जो बदले में खादी भंडार से कपड़ा मिलता उसे कहती कि ले जाओ इसका बुशर्ट सिलवा लेना। और मैं मुस्कुराकर मना कर देता।, हाँ खादी भंडार की बेडसीट मुझे बहुत पसंद था। चरखा से धागा कातने के बदले जो खादी भंडार से मिलता वही उनकी जमा पूंजी होता था।उसी से वह अमीर बनी रहती। भंडार वाले को बददुआ भी देती कि समय से पैसा नही दिया नही तो पोता को और भी कुछ खरीद कर देते। और मैं यह सुनकर लालची जैसा हो जाता। मेरे छोटे छोटे बालो को भी चुल्लू भर तेल डाल कर मालिस कर देती। , मना करने पर भी गर्म तेल से पैर दबाने  लगती। बोलती बच्चों को खेलने में पैर दर्द करने लगता है, मालिस कर देंगे तो पांव हमेशा मजबूत रहेगा। मेरी माँ को जब यह सब पता लगता तो इन करतूतों से बहुत चिढ़ती थी। लेकिन मुझे तो बहुत अच्छा लगता। इसलिए जब भी मौका मिलता दादी के पास चला जाता।। 
 जैसे ही बड़ा होकर कुछ सक्षम हुआ दादी चल बसी। उन्हें गंगा स्नान करने , काशी ,प्रयाग, अयोध्या जाने का बहुत मन था। जो अधूरा ही रह गया। इससे ज्यादा तो वो मुझसे उम्मीद भी नही की थी। उन्हें तो बस मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा पसन्द था। जिसे वह बार बार चूमना चाहती। और मैं धन्य हो जाता। ..... काश उन्हें मैं इन तीर्थो पर घुमा लाता। आज भी जिस किसी तीर्थ पर जाता हूँ वहाँ वो याद आ जाती है। ,... दादी काश तुम भी मेरे साथ यहां होती।©nitesh
क्रमशः

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