#मेरा_एकांतवास 13
उन दिनों गांव में घर से दूर अलग एक दलान की व्यवस्था होती थी, पुरुष जन रात का भोजन करने के बाद यही सोने चले आते थे, घर पर पुरुष को ज्यादा समय बिताना सांस्कारिक निषेध था, दिन भर का सारा काम की व्यवस्था भी यही रहता था ,मसलन मवेशी पालना, अन्न संग्रह करना , हल बैल की व्यवस्था करना आदि आदि कृषि कार्य। कइयो परिवार में खुद का दलान नही होता था, वहां पुरुष किसी और के दलान पर जाकर सोते या समय बिताते। मेरे परिवार का भी एक समृद्ध दलान था , कच्चा मिट्टी का ही था लेकिन बंगला नुमा, कई किसान यहां दिन रात अपना समय बिताते हुए उम्र गुजार दिए, आज भी मेरे स्मरण में कई विभूतियों का स्मृति शेष है, बाबा के साथ के किसान हर जाति के हुआ करते थे लेकिन आपस मे सबसे पारिवारिक स्नेह था, प्रतिदिन रात को भोजन करने के बाद यहाँ आ जाते, लालटेन की मंद्धिम लौ में ,जाड़े के मौसम में घूर (अलाव) के पास पुआल के बीड़ा जो बड़ी ही कारीगरी से बना हुआ रहता उस पर बैठ तम्बाकू रगड़ते, गर्मी में चौकी, मचान आदि पर दूर दूर बैठा करते , तम्बाकू और सुपारी की कतरन को चूसते हुए पूरी खेत खलिहानी, शादी व्याह, गांव के हर घर का हाल समाचार पर बातें कर लेते फिर किसी एक को नींद आती और सब सो जाते। फिर सुबह दिनचर्या के अनुसार प्रातः 4 बजे से कार्य प्रारंभ।
अच्छा मैंने भी खूब आनंद लिया है इन प्राकृतिक संसाधनों का। घर का छप्पर बनना था, अपने यहाँ बांस की किल्लत थी सो दूसरे गांव से बांस खरीद लाया , ट्रांसपोर्ट के लिए उस समय बैल गाड़ी ही विकल्प था, कुछ दिन पहले ही मैंने अपनी बैल गाड़ी चलाना सीखा था, गड्ढों वाली सड़क पर हिचकोले के साथ गाड़ी हाँकना आसान काम नही था, आज तो मैं कार भी आत्मविश्वास के साथ सौ की गति में चला लेता हूँ,लेकिन उन दिनों 5 किमी की गति में भी बैलगाड़ी चलाना जोखिम भरा ही था, बता दें बैल गाड़ी का हैंडल या स्टेयरिंग हाथ मे पकड़ा हुआ रस्सी होता है , अगर बाए मुड़ना हो तो बाएं हाथ की रस्सी को थोड़ा आहिस्ते खीचिए बायां जुआ वाला बैल थोड़ा ठिठकेगा और दाएं जुआ वाले बैल को हांक दीजिये ,मुड़ गए आप और आपकी बैलगाड़ी। रोकना हो तो दोनों रस्सी खीचिए।लेकिन ड्राइव करते समय हमेशा मुंह से हँकारा लगाते रहिये ।बांस लाने के क्रम में जब बैलगाड़ी गड्ढे में फंसता तो कोई भी राहगीर हाथ बटा देता। मुझे लगता है उनदिनों बैलगाड़ी की सवारी आज की गाड़ी से ज्यादा राजशाही था, बैल को चुस्त दुरुस्त रखना एक जिम्मेदारी थी शानो शौकत के लिए।
दलान पर उपस्तिथि सभी लोग सामूहिक जिम्मेदारी निभाते थे ,एक दूसरे के कार्य में हाथ बटाते थे, कोई किसी का नुकसान होते नही देख सकता था। दलान के सामने से कोई भी राहगीर गुजरता तो लोग उसे बिना टोके नही रहते। गाँव नाम और कहाँ जाना है यह पूछ ही लेते। दूर से आ रहे बटोही को पानी और जलपान के लिए जरूर आग्रह करते, बिना जाति धर्म पूछे। बताते है कि मेरे परबाबा सदैव दोपहरी को कुआं के पास बाल्टी लेकर बैठे रहते। कारण यह भी था कि वो कुंआ से किसी और को पानी नही निकालने देते। खैर मैंने ही इस परंपरा को तोड़ दिया था ,और बाद में मेरे पट्टीदारों ने कुंआ ही जमींदोज कर दिया।
उस अभाव वाली जीवन मे कई आत्मीय रंग थे, खेत से आलू निकालकर भूनना और पत्थर वाली नमक के साथ खा लेना, भुट्टा तोड़ना और खा लेना, सबसे गुस्सैल होशियार रखवाले का आम तोड़ लेना ,कटहल तोड़ लेना, शिकायत के बाद मार खा लेना, फिर रोज रोज उन्हें चिढाना, नई नवेली दुल्हन के कमरे मे भी भौजी कहते हुए बेरोक टोक जाना ,और खूब आदर पाना, कोई भी आंगन हो उस आँगन के चाची, दादी, फुआ के लिए हम लाडले ही होते थे, राजकुमार ही दिखते थे। किसी ने अपने आंगन से यूँ ही बाहर जाने नही दिया। हाँ, हम उम्र की बहने ,भतीजी या बुआ चिढ़ाने से नही चूकती थी। बहुत बड़ा परिवार और बहुत बड़ा रिश्ता हुआ करता था अपना , एक अद्भुत संसार था, जुगाड़ू संसाधन के बाद भी तिल मात्र भी असुरक्षा की भावना नही थी। इतने बड़े गांव वाली परिवार में पूर्ण विश्वास वाला राजकुमार थे हम,जो आज एक या दो या तीन की संख्या में सिमट कर रह गया है। एक दूजे को देखकर मुंह फेरने के रिवाज में आ गए है, अब गांव पहुचते ही लोग पूछते है कबतक रहना है ,कब वापस जाना है, उम्मीद से ज्यादा रह गए तो कानाफूसी होने लगता है कि शायद अब ये बेरोजगार हो गया है, घर मे आकर अब ताना भी दे जाते है, काम धंधा बन्द हो गया क्या बाबू का?????उफ्फ!!!कहाँ से चले थे कहाँ आकर रुक गए है, काश फिर लौट जाते हम, यह अदृश्य लॉक डाउन भी 14 अप्रैल को ही खत्म हो जाता ! और हम एक विशाल हृदय के समंदर में गोते लगाते।
©nitesh
क्रमशः
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