#कुछ_इस_तरह
आज फिर तुम याद आई
सावन में भींगती हुई तुम
और हाथ हिला कर विदा करने की
वो आखिरी दृश्य
आज फिर याद आई
वर्षो वर्षो बाद आज
मेरे एक पोस्ट पर
तेरी अंगुलिया स्पर्श कर गई
मानो तुम फिर अतीत की
टूटते दरवाजे पर आहिस्ता से
एक दस्तक देकर चली गयी
इस एकांत की अमराई में
एक मंद्धिम बयार आईं
आज फिर तुम याद आई
तुम्हारा विस्मरण और
मेरा स्मरण करना
दोनों ही नियमबद्ध था
न कोई शर्त था न कोई रिश्ते
न यात्रा था न पड़ाव
एक दृष्टि प्रतिबद्ध था
एक बार फिर तूने
एक आभासी शिष्टाचार निभाई
फिर तुम याद आई।
©nitesh
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