#मेरा_एकान्तवास 39
आज युवाओं का प्यार मोबाइल फोन की पटरियों पर दम भरता है। एक्सप्रेस की तरह प्यार, इजहार, और तकरार , सब फटाफट हो जाता है। हमारे जमाने मे बहुत मशक्कत से अपनी बात सुनने वाली मिलती। भौरों किबतरः मंडराना पड़ता था।महीनों मेहनत करने पर लड़को को अक्सर उसकी आँखों पर निगाहे बनाये रखना पड़ता था। पलक का झपकना और उठाना ही मोबाइल का सिग्नल मिलने जैसा होता। अगर मेरे सामने अप्रत्यक्ष किसी से कुछ कह दे तो समझ लेते थे कि बात बन सकती है, या वो इंगेज है, आगे बढ़ो। लड़के अक्सर यह प्रयास मंदिर, अस्पताल या ट्रेन में करते। वैसे कल भी और आज भी ट्रेन का प्रेम स्टेशन तक ही रहता है। फिर तो न वो ट्रेन याद रहती है और न वो परी। बस किस्सा कहानी तक ही। आगे कुछ भी नही बढ़ता। ट्रेन में वही सीट पसन्द करता जिसके अगल बगल जवां लडकिया बैठी हो। कितने नाटक करने के बाद बगल वाली सीट पर जगह मिलती थी।यह छुपी हुई प्रत्याशा हर युवा की आदत में सुमार होती।
पटना से मुगलसराय लौट रहा था। रात के नौ बजे की ट्रेन थी गर्मी का महीना। प्लेट फार्म पर ही दो 17 18 साल की किशोरी अपनी मां के साथ बैठी थी। तीनो की सुंदरता और शारिरिक बनावट इतनी अच्छी थी कि मां भी बड़ी बहन जैसी ही लग रही थी। किसी सम्भ्रांत परिवार की फैशनेबल मां बेटी थी। मैं भी वही बगल में ब्रीफ केस पर टेक लगाकर बैठ गया। फिर उसकी मां ने ही मुझे टोकी -आपको कहाँ जाना है
मैंने कहा -मुगलसराय
रिजर्वेशन है आपका... जिज्ञासावश पूछी शायद
नहीं.पापा का रेलवे पास है, कहीं भी बैठ जाऊंगा,जहां जगह खाली होगा। पासधारी आश्रित स्टूडेंट के लिए इतना तो छूट दे देते है टीटी ई...मैंने पूरी आत्मविश्वास से उसे बताया, मानो ट्रेन में बिना रिजर्वेशन चलना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।
"कोई नही आप मेरे साथ चलिए, मेरा चार सीट कन्फर्म है। इनके पापा नही जा पा रहे किसी कारण वश, मुझे कानपुर तक जाना है, आप साथ रहेंगे तो थोड़ा सम्बल जैसा रहेगा। लड़कियो के साथ सफर में घबराहट होती है। "महिला की इस बात से मुझे युवा होने का गर्व महसूस हुआ। मैंने एक टक दोनों लड़कियों की सौंदर्य को देखा, साधारण नयन नक्स में बला की सुंदर थी। बिल्कुल माँ जैसी ही थी। दोनों ने मुस्कुरा कर शायद साथ चलने को निवेदन कर रही हो। मैं भी खुद पर गर्वान्वित हो रहा था। जहां एक लड़की घास नही डालती वहाँ दो दो परी, बहुत खुश नसीब समझने लगा खुद को।
चार पांच दैनिक सफर वाले लड़के भी इर्दगिर्द घूमने लगे थे। अजीब ढंग से उसे निहारते और इधर उधर खड़े होकर हसने लगे। अब मैं इसे नोटिस करने लगा था। लेकिन मुझे क्या लेना देना।
फिर सोचा यह तो अब मेरी जिम्मेदारी है। यानि मैं इसे अपना हक समझने लगा, और उन आवारा टाइप के लड़कों को घूर कर देखने लगा। लेकिन उन लड़कों का नियत भी ठीक नही लग रहा था। फिलहाल तो मैं लड़कियों का सानिध्य पाकर खुद को फिल्मी हीरो समझ रहा था।
तूफान एक्सप्रेस ट्रेन आई और हम सब उसी कोच में बैठ गए जहां उन तीनों का कन्फर्म सीट था।
छुटकी को ऊपर बड़की को बीच मे और माँ को नीचे वाली सीट पर लेटने को बोला था मैं। बगल की नीचे वाले सीट पर मैं बैठ गया। बहुत खुश था मैं कि कुछ बाते बढ़ाना शुरू करूँ, ताकि लड़कियां प्रभावित हो ,और मां का विश्वास जीत सकूँ।........लेकिन ये क्या प्लेटफार्म पर विचरने वाला आधा दर्जन आवारा लड़के इसी कोच में सवार हो गए और मेरे सीट के इर्दगिर्द बैठ गए। उन लोगो की हरकत देख उसे उसके हद में रहने की हिदायत दी। फिर एक ने मुझे अजीब ढंग से खड़ा कर पूछा... तुम्हारा रिजर्वेशन है"
मैंने कहा है --है न.. चारो सीट तो मेरा ही है
होशियार न बनो अपना सीट देख लो , नही तो तुम्हारा रिजर्वेशन मैं कर दूंगा। ...बहुत ही डरावने ढंग से बोला था उसने
दूसरे ने धक्का देते हुए कहा जाकर कही और बैठ।
बहुत मुश्किल था। मैं अकेला और वे 6 की संख्या में।
एक ने ऊपर वाले सीट के ऊपर छुटकी लड़की के पास बैठ गया
,एक बीच वाली सीट पर पैर रख कर आधी सीट कब्जा कर लिया, तीनो मां बेटी सहमने लगी थी। मुझे अपना ताकत और बुद्धि वाली हीरोपंती दिखाना था। लेकिन अकेला था, लड़कियों के चक्कर मे मार भी खाना उचित नही था। ...फिर मैं क्या करूँ..इन सबका तो फिलहाल मैं ही एक भरोसा था।
मैं जोर जोर से चिल्ला कर डांटने लगा उन सब को ताकि बगल के सहयात्री भी मेरा सहयोग करेंगे। लेकिन किसी ने मेरी चिल्लाहट को संज्ञान नही लिया। और मैं फिर असहाय होगया। एक ने मेरे गर्दन पकड़ कर धकियायते हुए कोच की गेट तक ले गया और नीचे धकेलने से पहले ही छोड़ दिया।
मैं इधर उधर असहाय किसी की मदद के लिए निगाहे दौड़ा रहा था। बगल की कोच में टीटीई था उसके पास जाकर कम्प्लेन किया कि कुछ मदद करे, किसी जी आर पी को बुलाये।
उसने कहा, कुछ नही होगा सब डेली पसेंजर है, अगले स्टेशन पर उतर जाएंगे। आप थोड़ा धैर्य रखें। ज्यादा हीरोपंती दिखाएंगे तो वे सब आपको क्षति पहुँचा देंगे। उठाकर नीचे फेंक देंगे।यहां लालू राज है कुछ भी नही होगा। मुझे भी खतरा मोल नही लेना, मैं भी रोज इसी गाड़ी में चलता हूँ और नौकरी करना है। सभी लोकल लड़के है। थोड़ा बर्दास्त कर लीजिए।
ठीक है लेकिन वे सब उन लड़कियों को.....
मैं बहुत ही घबराते हुए कहा
कुछ नही होगा ,आप मेरे पास ही बैठिए
अजीब है.... मन ही मन असमंजस में उस टीटीई को देखता रहा।
गाड़ी दानापुर जंक्शन पर रुकी और वो सभी लड़के उतर गए। गाड़ी चल दी, मैं राहत का सांस लिया। लेकिन इस बीच जो हुआ था वो खुद की लाचारी वाली घटना मुझे कोस रही थी।
मैं फिर उस सीट पर गया, वही मेरा ब्रीफकेस भी था।
तीनो मां बेटी बदहवास थी , आसपास अब कोई नही था
बस इतना ही बोली कि"ऐंन वक़्त पर आप भी छोड़कर चले गए"
मैं टीटीई केपास गया था.... बात पूरी भी नही कर पाया
वे तीनों फफक कर रोने लगी
मैं असहाय था, कुछ नही कर सकता था। मानो मुझे काठ मार गया हो।
मैं सोचता रहा कि आज ये मेरी बहन, या भाभी भतीजी होती तो मैं क्या करता।......
इतना असहाय तो कभी नही हुआ था मैं।
©nitesh
क्रमशः