बुधवार, 20 मई 2020

क्या मैं मजबूर नही!!

मैं अमीर नही
मैं मजदूर नही 
तो क्या
मैं मजबूर नही
20 लाख करोड़ में
मेरी कोई हिस्सेदारी नही
2 रुपये किलो राशन नही
पेंशन, राहत का धन
मेरे खाते में नही
इंदिरा आवास मुझे नही
 बाढ़ राहत, किसान राहत से
कोई सरोकार नही
मनरेगा में रोजगार नही
नाम लिखवाकर घर बैठे पैसे पर
अधिकार नही

शुक्रवार, 8 मई 2020

मेरा एकान्तवास 42

#मेरा_एकान्तवास 42
कोरोना संकट में लॉक डाउन का दूसरा चरण खत्म होने वाला था 3 मई को लेकिन उससे दो दिन पहले ही गृह मंत्रालय ने इसे 14 दिन और बढ़ा दिया यानि लॉक डाउन का तीसरा चरण 17 मैं तक रहेगा। डंकर मन विचलित हो गया था।रोजगार के खातिर बिहार से पलायन कर रोहित ने यही एक 15 हजार रुपये की नौकरी कर रहा था, पार्ट टाइम में एक दुकान पर 5 हजार की और वैकल्पिक व्यवस्था थी। गांव में हर महीने 7 से 8 हजार रुपया बचाकर भेज दिया करता था। लेकिन इस लॉक डाउन ने 40 दिनों में खस्ता हाल कर रखा था, गांव जाने की कोई व्यवस्था नही था, पता नही नौकरी बची रहेगी या नही, फिर गांव में भी तो रोजगार नही है, इसलिए रोहित ने लॉक डाउन खुलने का इंतज़ार करना उचित समझा। लेकिन ये क्या लॉक डाउन का तीसरा पार्ट भी शुरू होने की घोषणा हो गयी। मन बेचैन था, साथ मे रहने वालों का भी यही हाल था। 3 मैं को सरकार की ओर से एक राहत भरी खबर आई कि कल से 10 से पांच कुछ दुकानों के साथ शराब की दुकान मतलब वाइन शॉप भी खुलेगी। मन मे एक कौतूहल से होने लगा, लगभग दो महीने हो गए थे मदिरा पान के, लेकिन क्या जरूरर। फिर लगा कि पहला दिन कुछ बोतल खरीद लिया जाय तो एक बहादुरी होगी। साथियों के साथ पीने का आनंद और दुकान खुलते ही शराब खरीद लाने का जो बहादुरी लोगो की बीच सुनाया जाएगा तो एक अमीर होने का अनुभव मिलेगा। फिर क्या था रोहित ने योजना बना डाली।   बटुआ में 500 रुपये का एक नोट था, कुछ फुटकर भी, और आय की अनिश्चितता बरकरार थी। 3 साथियों से दो दो सौ रुपये सम्मलित कर कुल जमा आठ सौ रुपये लेकर कश्मीर गेट पर एक वाइन शॉप पर सुबह 8 बजे ही लाइन लगा दिया।
दिन के दस बजे और माता जी के जयकारे के साथ वाइन शॉप खुल गई, लोग ताबड़तोड़ आर्डर देकर बोतल खरीदने लगे। सुबह जल्द आने के कारण रोहित का नम्बर भी आने वाला ही था। जैसे जैसे दुकान का काउंटर नजदीक आने लगता, उत्साह और बीटल की प्यास और तीव्र होने लगती। बस अब क्या रोहित से आगे 5 ही खरीददार  शेष थे, पीछे तो न जाने कईं किलोमीटर का लाईन लगी थी।  उतावलापन अब चरम पर था कि मोबाइल की रिंग टोन बज उठा , झट मोबाइल जेब से निकाला ,शायद दोस्तो का हो, और उसे  खुश खबरी बता दे , लेकिन ये क्या फोन तो गाँव से माँ का था। 
रोहित ने झट फोन उठाया और बोला " माँ प्रणाम!!अभी थोड़ी देर में कॉल करता हूँ, अभी व्यस्त हूँ।
 खुश रहो बेटा, रोहित ,बस इतना कहना था कि तुम शराब खरीदने घर से मत निकलना। बहुत बड़ी यह महामारी है। टीवी पर दिखा रहा है कि बहुत भीड़ है, लोग सट सट के खड़े है। बेटा ऐसा मत करना। 
माँ ने चिंता के साथ हिदायत देते हुए बोली।
 नही माँ! तुम निश्चिंत रहो, बाद में फोन करना।
रोहित ने झूठ बोलने की असफल प्रयास किया था।
मां ने फिर कहा "ठीक है! इसलिए बोल दिए कि सुबह ही गांव में बहुत जोर आंधी तूफान आया था, एस्बेस्टस वाला पूरा छत उड़ गया है। पश्चिम का दीवार भी गिर गया है, उसमे तुम्हारे छोटका बेटा संजू का बायां पैर  दबकर टूट गया है। हम लोग अस्पताल में है। अच्छा बाद में फोन कर लेना।" माँ मोबाइल काटने ही वाली थी कि रोहित बोल उठा, ""कितना चोट लगा है संजू को??
 बस पैर ही टूटा है, बहुत चिल्ला रहा है। डॉक्टर साहब प्लास्टर कर रहे है। बेटा, वहाँ पैसा बचाकर रखना, घर पर अब कुछ रुपया भी नही बचा है, गेंहू बेचकर डॉक्टर साहब को फीस दूंगी, तब तक उधार रहेगा। बेटा घर भी छवाना पड़ेगा। दीवार की भी मरम्मत करवाना है, तुम्हारी बीवी भी बीमार है, बेटा पैसा जरूर बचाकर भेजना, शराब नही पीना।
रोहित दुकान की काउंटर तक पहुंच चुका था। सेल्स मैन ने पूछा कौन सा ब्रांड कितना चाहिए"
रोहित एक हाथ से मोबाइल पकड़ा था और दूसरे हाथ से वो आठ सौ रुपया निहार रहा था। । एक टक दुकान के शोकेस में लगें बोतलों को देखा और फिर बिना कुछ बोले लाइन से निकल गया।
 दुकानदार ने घूरते हुए बोला हद है जब नही लेना था तो घण्टो लाइन में खड़ा ही क्यूँ था।
पीछे वाले ग्राहक ने कहा""पागल है साला! पक्का वाला दारूबाज नही है।"
©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 41

#मेरा_एकान्तवास 41
व्यक्ति को सम्मान की चिंता सबसे ज्यादा अपनो के बीच ही होता है, खुद की सम्मान को बचाने के लिए कितने स्वांग रचना पड़ता है। गांव हो या शहर ,व्यक्ति आसपास टोले मुहल्ले में सम्मान है तो मनोबल बना रहता है, सम्मान भी जीवन की सफलता से ही होता है, आप की आय कितनी है, आप कितनी अच्छी जॉब करते है, आपका व्यवसाय कितना समृद्धि है, आप कितनी उच्च शिक्षा ले रहे है आदि आदि..। इन्ही कारणों से लोग गांव से भी पलायन करते है।गांव वाले इन चीजों पर बहुत ध्यान देते है। मैं जब भी गांव जाता हूँ तो लोग बहुत प्रेम से मिलते है, सभी प्रवासी की चर्चा होने लगती है, लोग यह सोचकर मिलने भी आते है कि समझ जाएं कि मैं ने कितनी उपलब्धि हासिल कर लिया है।अक्सर मैं गांव जाता हूँ तो एक सप्ताह तक ही रह पाता हूँ, किसी पारिवारिक आयोजन के कारण सम्भव हुआ तो 15 से 20 दिन का रुकना हुआ। एक बार बिहार में शूटिंग होने के कारण 3 महीना मुझे गांव से दूर ही रुकना पड़ा, इस कारण बहुत जल्दी जल्दी गांव में मैं दिखने लगा।  एक दो सप्ताह की शूटिंग ब्रेक में मैं गांव पर ही आ जाता। आज भी गांव में बहुत कम ही लोग जानते है कि मैं फिल्म निर्माण से भी रिश्ता रखता हूँ,  अक्सर मुझे गाँव मे दिखने से मेरे करीबी पट्टीदार परेशान होने लगे। धीरे धीरे टोले मुहल्ले में भी मैं चर्चा का विषय होने लगा। बात घर तक छन कर आई कि मेरा कोई जॉब था शहर में जो छूट गया या निकाल दिया गया। सब मैं बेरोजगार गांव में ही जीवन निर्वाह के लिए आ गया।  बात जोरो से फैली और मेरे घर वाले डिफेंस लेने लगे । मां ने तो कई पड़ोसियों से झगड़ा कर ली,  फिर तो अचानक एक सम्भ्रांत ईर्ष्या के ठीकेदार ने मुझसे पूछ ही बैठा"बहुत दिन गांव में रह गए इस बार। शहर में रोजगार छीन गया क्या???
मैं मुस्कुराया और सम्भल कर उत्तर दिया ""हाँ, कुछ ऐसा ही है , बहुत दयनीय हो गया हूँ, कुछ रोकड़ा मुझे मेरे घर पहुँचा दीजिएगा!
अजीब सा मुँह बनाया और आगे चल दिया, अंदर ही अंदर वो ईर्ष्यावश प्रसन्न हो रहा था।
मुझे समझ नही आ रहा था कि घर मेरा , यह गांव भी तो मेरा ही है, जीवन यापन के लिए पर्याय खेती है पूर्वजों का दिया हुआ, हर चीज़ में स्वालम्बन होने लायक तो गांव में भी हूँ ,फिर यहाँ के लोगो को मैं  खटकता क्यूँ हूँ???
शायद अब लोग मुझे अपना नही प्रवासी ही समझ लिया है । फिर तो मैं जब भी समय मिलता हर महीने या दूसरे महीने ही गांव जाने लगा, जा जाकर लोगो से दुआ सलाम करने लगा, लोगो का हाल चाल लेने लगा। कुछ को  तो फोन से भी उपस्थिति दर्ज कराने लगा। अब शायद लोगों में ये बात नहो ।लेकिन अपने ही गाँव मे बेगाना होना काफी दुखदायी था।©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 40

#मेरी_अनुभूति #मेरा_एकान्तवास 40
मैंने बहुत प्रयास किया कि मै कुछ करूँ, कुछ नया, कुछ अलग, कुछ बेहतरीन, कुछ जीवन यापन लायक, कुछ सम्मानित होने लायक, कुछ पीढ़ियों के लिए, कुछ अपनो के लिए, कुछ अपने लिए.....सम्भव नही।  आप सोच सकते है बेहतर करने को, आप प्रयास करसकते है बेहतर करने के लिए, आप दो कदम चल सकते है बेहतरी के लिए, लेकिन सफलता आपके हाथ हो ये जरूरी नही। जिसने भी कहा कि कठिन परिश्रम से सफलता हासिल की है वो केवल कठिन परिश्रम किया है सफलता तो किसी और ने दिया है, बहुतेरे कठिन परिश्रम करते है लेकिन सभी सफल नही होते, कितनो ने तो सारी उम्र लगा दी, किसी की जीवन की आखिरी पड़ाव में सफलता मिली तो किसकी शुरुआत में हीं। सफलता सदैव नियंता के हाथ है, हमे तो बस उस पथ पर कार्य करना है। आपको किस कार्य मे सफलता मिलेगी यह भी नियंता के हाथ ही है। कभी आपकी रुचि ही सफल हो जाती है तो कभी अनचाहा कार्य ही आपको शोहरत दिला देता है। लेकिन किसी न किसी पथ पर निकलना तो पड़ेगा ही। यह दुनिया अंधेरे में टटोलने जैसा है। सैकड़ो जी जान लगा कर सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी करते है और चंद कदमो से बहुतेरे चूक जाते है, वही कुछेक साधारण परिश्रम से सीमित संसाधनों में भी प्रथम प्रयास में सफल हो जाते है। चर्चा सदैव सफलता की होती है, कभी किसी ने असफलताओं की किसी से नही की। सफलता और असफलता का श्रेय कर्ता की ऊपर तय कर दी जाती है। जबकि सब नियंता यानि ईश्वर के हाथ है। हम तो कार्य ही करते है। हमे क्या करना है, किस रास्ते जाना है , कब अवसर मिलेगा और अवसर का लाभ कैसे उठाना है, ये सब पहले से तय है। आपका आलस्य, क्रोध पाप , पुण्य, प्रसन्नता,निराशा, हानि ,लाभ, प्रतिष्ठा, निंदा,घृणा,आरोप ये सब पूर्व निर्धारित है ,बस हमे उसकी भूमिका अदा करना है, नित्य प्रति तो यही अदा करता हूँ।

मेरी छोटी मोटी खुशी और बड़ी से बड़ी निंदा, तिरस्कार सभी का जिम्मेदार मैं खुद को निर्धारित नही करता। और ना ही मैं खुशी से झूम उठता हूँ ना ही निंदा या तिरस्कार से विचलित होता हूँ।यह तो मेरी नियति का दिया हुआ उपहार है। समय का फेर है। मेरा कुछ भी नही। कुछ बेहतर,कुछ अच्छा करने की इच्छा सबको सदैव रहती है,और इस अवसर का इंतज़ार भी रहता है, बस आपको अवसर तो मिले। बुरा करना और बुरे राह पर चलना भी इतना आसान नही।आप किसी अपराध को अंजाम देना चाहते है लेकिन वह भी तभी सम्भव होगा जब नियति चाहेगी। सम्भव है आप पछके ही गिरफ्त में आ जाएं, जिसे आप क्षति पहुचना चाहते है वो आपको अवसर ही न दे। आप जिसकी हत्या करना चाहते है वह आपको निर्धारित समय पर मिले ही न, या आप मौके पर पकड़े जाएं, या फिर आपका हथियार साथ न दे। इसकी भी सफलता आपके हाथ नही है ,बस आप इस कार्य के पथ पर चल पड़े है ,अंजाम तो नियति के ही हाथ है। 
आप बस कार्य करें, लेकिन खुद को उसका जिम्मेदार न समझे। वह कार्य उचित हो या अनुचित। बहुत बुरे कार्य के बाद भी लोग प्रसन्नता पूर्वक जीवन का सफर पूरा कर लेते है, और अच्छे कार्य के बावजूद भी जेल में रहना पड़ता है। बुरे कार्य के लिए  दंडित होना या जेल हो जाना एक आत्मसंतुष्टि तो देती है लेकिन निर्दोष होने पर निराशा और क्रोध मिलता है, लेकिन दोनों स्तिथि में आपका कोई दोष नही। आप तो बस एक भूमिका में है।आध्यात्मिक होना भी आपके बस में नही है , वैराग्य भी आपके बस में नही है। सब बुद्ध भी नही बन सकता। राम बनना राम का बस में नही था वह भी पूर्व निर्धारित था। राम की सभी मनोदशा भी पूर्व निर्धारित था। इस तरह हमारी भी अलग अलग घटनाक्रम पूर्व निर्धारित है।इसलिए किसी पाप, पुण्य, अच्छा बुरा से क्या घबराना, क्यूँ निराश होना , मुझे तो बस निर्धारित पथ पर चलते जाना है। जो प्रसंशा, सम्मान या घृणा और तिरस्कार मिल रहा है वास्तव में वह आपको नही मिल रहा , वह तो आपकी नियति को मिल रहा है जो पूर्व निर्धारित है। इसलिए निराशा हताशा का कोई कारण नही।दुःख का कभी कोई कारण नही । स्वयम को प्रोत्साहित ही करना श्रेयस्कर है।©nitesh

मेरा एकान्तवास 38

#मेरा_एकान्तवास 38
उम्र लम्बी नही जीवन बड़ा होना चाहिए। ये वाक्य अक्सर सुनता रहा हूँ,लेकिन  इन शर्तों पर जीने वाले आकाश में कुछ नक्षत्र की तरह ही होते है। बाबूजी के रेलवे से अवकाश के बाद मैं चोपन से ओबरा जाकर रहने का मन बना लिया, और  यही रहकर  रचनाधर्मिता का कार्य करने लगा। इस क्रम में कई स्थानीय विभूतियों से परिचय होना स्वाभाविक ही था। अधिक तर लोग प्रोत्साहित करते तो बहुतेरे मेरे आलोचक भी थे।  कुछ हजार लोगों का कस्बा ओबरा का जीवन पावर हाउस और पत्थर व्यवसाय ओर ही आधारित रहा है, इससे इतर रोजगार वालों का कोई स्थान नही रहा, उसमे मैं भी था। आर्थिक रूप से सम्पन्न सम्पूर्ण कस्बा एक परिवार जैसा ही रहा है। मुझे याद नही कोई भी गरीब लाचार दवा के लिए पैसे के अभाव में चल बसा हो। किसी भी गरीब का इलाज या दुर्घटना होने पर मिनटों में लाखों रुपये लोग सहयोग करके पीड़ित की समुचित इलाज उपलब्ध कराया जाता रहा है, ऐसे दर्जनों उदाहरण इस कस्बा की सामर्थ्य की कहानी लिखती है। वैसे तो यहाँ हर दूसरा आदमी वरिष्ठ समाजसेवी है , इस समाजसेवी के पीछे इनका अप्रत्यक्ष मोह भी है। परंतु इस धरती पर कुछेक ऐसे भी नक्षत्र रहे है जिसे ओबरा के इतिहास के साथ जुड़ने का सौभाग्य मिला है,स्व0 पंडित सुदामा पाठक और  स्व0 अनिल सिंह जेसी, 
उस दिन ओबरा का परियोजना चिकित्सालय  और उसके 3 किलोमीटर के दायरे में कदम रखने का जगह नही था, ओबरा और उसके आसपास के गांव के हर गरीब अमीर के आंखे नम हो गयी थी। जब क्रूर काल ने उन्हें दुर्घटना का शिकार बनाकर अल्प समय मे ही अपने साथ ले गया था।सबके मुख से यही तो निकल था कि अच्छे लोगो को शायद ईश्वर को भी जरूरत है।स्थानीय जन को देखकर ऐसा लगता मानो यह कस्बा अनाथ हो गया हो।
कुछ भी तो नही थे अनिल सिंह, न जन प्रतिनिधि, न विधायक सांसद, न ही औरों से अधिक धनाढ्य। न ही ताकतवर, न ही दबंग, और न ही दिखावे का साधन। एक सामान्य मृदुभाषी, मिलनसार, हर लोगो को दर्द को खुद का दर्द समझने वाला और एक सफल व्यवसायी।इस छोटे से परिचय के साथ एक बड़ा नाम था जेसी, यानी जूनियर चेम्बर। वो जूनियर चेम्बर के एक कर्मठ और अति सक्रिय कार्यकर्ता थे, इन्होंने आसपास के कई गांवों में जो उस काल मे आदिम युग की तरह जीवन निर्वाह करने को मजबूर थे उनके लिए यह एक भगवान की तरह थे। स्थानीय लोगो के सहयोग से  न जाने कितने सामाजिक कार्य किये।शायद ही कोई समस्याग्रसित व्यक्ति हो जिसने उनसे अपनी बात कही हो और उसका समाधान न हुआ हो। आर्थिक मदद के अलावा भी वह हर समस्या में जनता के बीच खड़े मिलते।  मिलनसार व्यक्तित्व के कारण मुझे नही लगा कि किसीसे कभी विवाद रहा हो। इन कारणों से शासन प्रशासन में भी अच्छा सम्मान था इनका। बहुतेरे आज भी इस तरह की समाज सेवा करते है लेकिन इसके लिए वह पहले ही समाज को बता देते है कि वह विधायक या किसी अन्य पद की चुनाव की तैयारी चल रही है, वे अपने किसी अप्रत्यक्ष एजेंडा के तहत ही सेवा भाव मे लगे रहते है ,इसलिए उनका सम्मान भी समाज मे नकली ही रहता है,  से तभी तक चर्चा में रहते है जब तक उनका सिक्का खनकता है। ऐसे लोगो के मृत्यु पर भी वही रुदाली कर पाते जो इनका परजीवी होते है। बाद में वही ढेरो शिकायत लेकर बाटने को तैयार रहते है, यह गरीब जनता अपनो को बेहतर पहचानती है। लेकिन अनिल सिंह जेसी इन उम्मीदों से अलग थे, निष्काम सेवा में विश्वास रखना ही उनका एक अलग छवि था। ऐसे वो सभी साधारण आदमी को पसन्द करते और उसके साथ कार्य मे लग जाते जो जमीन पर गरीबो के लिए कार्य करते। अपने इन गुणों के कारण ही वह दवा और डॉक्टर के साथ आदिवासी गांवों में पहुँच जाते।  गाँव की प्रगति के लिए योजना बनाते और उसपर कार्य करते।उन व्यवसायियों और सामाजिक लोगो के लिए भी दिन रात खड़े रहते जो समाज के सहयोग में रहता। अभी जनता को उनका भरपूर प्यार मिला भी नही था कि भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिए, बदले में स्थानीय जनता ने केवल आंसू ही समर्पित कर पाया था।  कम उम्र में भी उन्होंने लम्बा जीवन जिया बस यही एक सुकून है बहुतेरे धनाढ्य है और हो सकते है,लेकिन सीमित संसाधन में जनता की हृदय में स्थान बनाना आसान काम नही था कि उनके जाने के दशकों बाद ही लोगों उसी आदर सम्मान से उन्हें याद करते है। आज ऐसे ही नक्षत्र पुरुषों के कारण सोनभद्र का दक्षिणांचल धन्य है ©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 37

#मेरा_एकान्तवास 37
आज की नौनिहाल और नई पीढ़ी बचपन का आनंद कहाँ ले पाए जो हमारे जमाने मे था, बेशक खिलौने इलेक्ट्रॉनिक नही थे, फोन असली नही थे लेकिन मिट्टी का दो प्याला या माचिस की खाली डिब्बा में छेद करके उसे धागा से जोड़कर आपस मे बात करके जो खुशी मिलती वो आज एक लाख के एप्पल मोबाइल से भी नही मिलती। मिट्टी में उछल कूद कर धूल धूसरित होकर जो आननद आता वो आज हजारो के डनलप गद्दे पर भी नही आता, नही जॉन्सन के बेबी पावडर में मिलता।, उस दिनों बच्चों को चूसने के लिए भी प्लास्टिक निप्पल की जगह रंगीन लकड़ी ही चूसकर खुश होना पड़ता। कांच की गोली(कंचा) खेलना, दस पैसे के सिक्के को गुच्ची में पिलाना, सिगरेट के डिब्बे को फाड़कर ताश के गड्डी बनाना, साइकल की टायर को लकड़ी से हाँकना। मिट्टी से ही हाथी, घोड़े, सेव, आम,संतरा, आदि बना कर अपनी कला का परिचय देना...उफ्फ कितने काबिल थे हम!एक कविता उस समय बहुत प्रसिद्द था, "मरे तो लकड़ी ,जिए तो लकड़ी , .. देख तमाशा लकड़ी का ....." पहली बार साइकिल चलाना भी मैं सीट पर बाजू रख कर हाफ पेडल मारकर  सीखा था, कक्षा 5 में साइकल की सवारी पढ़ कर अपनी हालात याद आने लगती।एक बार इसी तरह हाफ से फूल पेडल मारते हुए कैंची ही साइकल चला रहा था कि एक सफेद रंग का गली का कुत्ता ने काट खाया। जांघ में में चुभाया हुआ उसके तीन दांत का निशान अब भी है। उस समय कुत्ता काटने और उससे उतपन्न रेबीज एक खतरनाक बीमारी होता था। कुछ लोगो ने सलाह दिया कि झाड़फूंक कराओ। लेकिन मेरे अभिभावक डॉक्टर के शरण में जाना उचित समझा, उनदिनों कुत्ता काटने पर 14 मोटी वाली सुई पेट मे लगती थी। प्रति एक दिन बाद मुझे खाली पेट धनबाद रेलवे अस्पताल में सुई लगवाने जाना पड़ता। कंपाउंडर जानवरो की तरह  मेरे पेट की चमड़ी को चुटकी से पकड़ कर उसमे मोटी सुई चुभो देते। दर्द से मैं कितना चिल्लाया था वो अस्पताल के छत को आज भी याद होगा। सात सुई नाभि के एक तरफ तो सात दूसरी तरफ, पेट नही क्रिकेट का पिच हो गया था मेरा। उन दिनों कुत्ता काटने पर रेबीज से लोग कुत्ते की तरह भौंक भौंक कर मर जाते थे। फिर वो जिसे काट ले उसका भी वही हाल होता। मैंने तो पारम्परिक नुक्शा भी अपनाया था, सात कुँआ में जाकर झांका भी था।अब तो कुँआ ही मिलना मुश्किल है। मिट्टी के गोले से झार फूंक भी करवाया, उस मिट्टी के गोले से कुत्ते का सफेद बाल निकलता था। कई दिनों के बाद जब बाल निकलना बंद हो गया तो यह मान लिया गया कि विष खत्म हो गया।डॉक्टर ने कहा था कि 14 दिन के अंदर अगर कुत्ता मर गया तो समझिए आपको रेबीज असर कर गया ,और वो कुत्ता पागल रहा होगा। नही तो इंजेक्शन लगवाने की भी कोई जरूरत नही। अब 15 दिन उस गली के आवारा कुत्ते का निगरानी कौन करे, सो इंजेक्शन लगवाना ही उचित था। बचपन की इस खेल खेल में कुत्ता भी अपना खेल खेल गया, बाद में तो मैं , बिच्छु, और साँप का भी शिकार हुआ। अब तो हालात ये है कि आदमी के अलावा किसी और का जहर काम ही नही करता। बस अब आदमी से ही डरता हूँ, जिसका अभी तक कोरोना की तरह कोई वैक्सीन नही बना है। ©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 36

#मेरा_एकान्तवास 36
ग्रामीणों में भावनात्मक एकता एक अदृश्य डोर से बंधी रहती है ,कालांतर में गांव पर भी शहर की आबोहवा पहुँचने लगी है, अब लोग नितांत निजी जिंदगी जीने लगा है, उन्हें अपनी पुरातन संस्कार कबाड़ की टोकरी लगता है। मुझे आज भी याद है जब मैं सहपाठियों के साथ गांव के ही हाईस्कूल से पढ़ कर लौट रहा था, उस समय मैं 9th का स्टूडेंट था, बड़ी क्षेत्रफल वाले मेरे गांव की उत्तर छोर पर था यह स्कूल।लगभग 2 किलोमीटर प्रतिदिन चलकर स्कूल जाता और वापस आता। रास्ते मे एक चौक पड़ता था, कदम के पेड़ होने के कारण यह कदम चौक के नाम से विख्यात है, जहां से लोग बस पकड़ते थे, आज भी यह चौक आबाद है। वहाँ उस समय चौक पर 6 से 7 दुकानें ही हुआ करती थी, जिसमे दो साइकल मरम्मत की एक मिठाई की , एक दो पान तम्बाकू की। एक डॉक्टर साहब का क्लिनिक था फुस का। लगभग 15 किलोमीटर की दूरी में यही डॉक्टर साहब लोगो के जीवन रक्षक थे।  मरीजो के साथ सहृदयता के साथ पेश आते तो कभी दवा सही नही लेने पर बुजुर्गों की तरह बेतरतीब डांटते भी। आज इसी क्लिनिक पर बहुत जमावड़ा लगा था। युवा, बुजुर्ग महिलाएं सब घेरे खड़ी थी। समझ मे नही आ रहा था कि ऐसी कौन सी अनहोनी हो गई कि पूरा गाँव यही जमा हो गया! सब एक दूसरे से खुसूरफुसर कर रहे थे लेकिन हम विद्यार्थियों को कोई बताने को तैयार नही,  भीड़ में अंदर जाकर देखने की साहस भी नही था, शायद बड़े लोग डांट देते ।एक बूढ़ी दादी छाती पीटते बड़बड़ा रही थी कि , अन्याय हो गया 24 /25 साल के अमुक युवक को गेहूमन सांप काट लिया। अब क्या होगा!हे दैव अनर्थ हो गया। मुंह से झाग भी दे रहा है, कैसे बचेगा!!!
 गांव में अक्सर साँप काटने वाले पीड़ित का इलाज झाड़ फूंक से ही किया जाता था लेकिन यह एक अच्छी पहल थी कि लोग डॉक्टर के यहाँ ले आये थे। साँप बहुत जहरीला था, जहर तेजी से फैल रहा था, एक सज्जन को देखा नीम का कुछ पत्ता भी लेकर आये। खबर लगी कुछ देर में कई गांव से ओझा भी आने वाले है झाड़ फूंक के लिए। हर लोग दुआ कर रहे थे। यह समाचार लेकर मैं घर पहुंचा। लेकिन घर मे पहले से पता चल गया, मुझसे महिलाएं ताज़ा खबर चाह रहीं थी। रात हो गई लेकिन इलाज चल रहा था , झाडफूंक भी जारी था, डॉक्टर साहब कुछ भी साफ साफ कहने की स्थित में नही थे। उस रात पूरे गांव में शायद ही किसी के घर ठीक से खाना बना हो , बड़ा गांव और सभी पल पल भाग कर चौक पर जा रहे थे, लौटने वालो से लोग पकड़ पकड़ कर हालात का जायजा ले रहे थे। दूसरे दिन भी इलाज जारी था। पूरे गांव में लोगों की सांस अटकी थी।हरलोग अपने अपने तरीके से देवी देवता की मनौती मानने लगे। मेरे जीवन की यह पहली ही घटना थी कि हजारो लोग किसी के  जान बचाने के लिए प्रार्थना कर रहे हो। इसके बाद अमिताभ बच्चन के लिए भी शहरों में ऐसी प्रार्थना और हवन किया गया।पूजा पाठ, प्रार्थना, हवन पूजन का यह दौर चार दिन तक चलता रहा। चार दिन तक यह तनाव भी बना रहा ,चौथे दिन डॉक्टर साहब ने उम्मीद जता दी तब जाकर पूरे गाँव मे शांति हुई। महिलाएं घर से निकल कर देवी पूजन करने गईं। लोग बाग देखने को उमड़ने लगे।बाद में मैं इन्हें जब भी देखता हूँ इनको मुझे इनका पुनर्जन्म ही याद आता है। वे आज भी सम्पूर्ण गांव में सम्मानित , और सार्वजनिक हित के लिए एक मृदुभाषी, सामाजिक व्यक्तित्व है।आज भी नवरात्रि पर दुर्गा पूजा में हवन पूजन और प्रसाद वितरण करते मिल जाएंगे। ईश्वर द्वारा प्रदत्त पुनर्जन्म का उपहार को आज भी बखूबी निभा रहे है। जीवन कितना मूल्यवान होता है,  और ग्रामीण परिवेश के यह पारिवारिक रिश्ता का डोर कभी कितना मजबूत हुआ करता था, आज बस इसे स्मरण ही कर सकते है। व्यवहारिक में अब वो दिन कहाँ!!©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 39

#मेरा_एकान्तवास 39
 आज युवाओं का प्यार मोबाइल फोन की पटरियों पर दम भरता है। एक्सप्रेस की तरह प्यार, इजहार, और तकरार , सब फटाफट हो जाता है। हमारे जमाने मे बहुत मशक्कत से अपनी बात सुनने वाली मिलती। भौरों किबतरः मंडराना पड़ता था।महीनों मेहनत करने पर लड़को को अक्सर उसकी आँखों पर निगाहे बनाये रखना पड़ता था। पलक का झपकना और उठाना ही मोबाइल का सिग्नल मिलने जैसा होता। अगर मेरे सामने अप्रत्यक्ष किसी से कुछ कह दे तो समझ लेते थे कि बात बन सकती है, या वो इंगेज है, आगे बढ़ो। लड़के अक्सर यह प्रयास मंदिर, अस्पताल या ट्रेन में करते। वैसे कल भी और आज भी ट्रेन का प्रेम स्टेशन तक ही रहता है। फिर तो न वो ट्रेन याद रहती है और न वो परी। बस किस्सा कहानी तक ही। आगे कुछ भी नही बढ़ता। ट्रेन में वही सीट पसन्द करता  जिसके अगल बगल जवां लडकिया बैठी हो। कितने नाटक करने के बाद बगल वाली सीट पर जगह मिलती थी।यह छुपी हुई प्रत्याशा हर युवा की आदत में सुमार होती।
पटना से मुगलसराय लौट रहा था। रात के नौ बजे की ट्रेन थी गर्मी का महीना। प्लेट फार्म पर ही दो 17 18 साल की किशोरी अपनी मां के साथ बैठी थी। तीनो की सुंदरता और  शारिरिक बनावट इतनी अच्छी थी कि मां भी बड़ी बहन जैसी ही लग रही थी। किसी सम्भ्रांत परिवार की फैशनेबल मां बेटी थी। मैं भी वही बगल में ब्रीफ केस पर टेक लगाकर बैठ गया। फिर उसकी मां ने ही मुझे टोकी -आपको कहाँ जाना है
मैंने कहा -मुगलसराय
रिजर्वेशन है आपका... जिज्ञासावश पूछी शायद
नहीं.पापा का रेलवे पास है, कहीं भी बैठ जाऊंगा,जहां जगह खाली होगा। पासधारी आश्रित स्टूडेंट के लिए इतना तो छूट दे देते है टीटी ई...मैंने पूरी आत्मविश्वास से उसे बताया, मानो ट्रेन में बिना रिजर्वेशन चलना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।

"कोई नही आप मेरे साथ चलिए, मेरा चार सीट कन्फर्म है। इनके पापा नही जा पा रहे किसी कारण वश, मुझे कानपुर तक जाना है, आप साथ रहेंगे तो थोड़ा सम्बल जैसा रहेगा। लड़कियो के साथ सफर में घबराहट होती है। "महिला की इस बात से मुझे युवा होने का गर्व महसूस हुआ। मैंने एक टक दोनों लड़कियों की सौंदर्य को देखा, साधारण नयन नक्स में बला की सुंदर थी। बिल्कुल माँ जैसी ही थी। दोनों ने मुस्कुरा कर शायद साथ चलने को निवेदन कर रही हो। मैं भी खुद पर गर्वान्वित हो रहा था। जहां एक लड़की घास नही डालती वहाँ दो दो परी, बहुत खुश नसीब समझने लगा खुद को।
चार पांच दैनिक सफर वाले लड़के  भी इर्दगिर्द घूमने लगे थे। अजीब ढंग से उसे निहारते और इधर उधर खड़े होकर हसने लगे।  अब मैं इसे नोटिस करने लगा था। लेकिन मुझे क्या लेना देना। 
फिर सोचा यह तो अब मेरी जिम्मेदारी है। यानि मैं इसे अपना हक समझने लगा, और उन आवारा टाइप के लड़कों को घूर कर देखने लगा। लेकिन उन लड़कों का नियत भी ठीक नही लग रहा था। फिलहाल तो मैं लड़कियों का सानिध्य पाकर खुद को फिल्मी हीरो समझ रहा था।
तूफान एक्सप्रेस ट्रेन आई और हम सब उसी कोच में बैठ गए जहां उन तीनों का कन्फर्म सीट था। 
छुटकी को ऊपर बड़की को बीच मे और माँ को नीचे वाली सीट पर लेटने को बोला था मैं। बगल की नीचे वाले सीट पर मैं बैठ गया। बहुत खुश था मैं कि कुछ बाते बढ़ाना शुरू करूँ, ताकि लड़कियां प्रभावित हो ,और मां का विश्वास जीत सकूँ।........लेकिन ये क्या प्लेटफार्म पर विचरने वाला आधा दर्जन आवारा लड़के इसी कोच में सवार हो गए और मेरे सीट के इर्दगिर्द बैठ गए। उन लोगो की हरकत देख उसे उसके हद में रहने की हिदायत दी। फिर एक ने मुझे अजीब ढंग से खड़ा कर पूछा... तुम्हारा रिजर्वेशन है"
मैंने कहा है --है न.. चारो सीट तो मेरा ही है
होशियार न बनो अपना सीट देख लो , नही तो तुम्हारा रिजर्वेशन मैं कर दूंगा। ...बहुत ही डरावने ढंग से बोला था उसने
दूसरे ने धक्का देते हुए कहा जाकर कही और बैठ।
बहुत मुश्किल था। मैं अकेला और वे 6 की संख्या में।
एक ने ऊपर वाले सीट के ऊपर छुटकी लड़की के पास बैठ गया
,एक बीच वाली सीट पर पैर रख कर आधी सीट कब्जा कर लिया, तीनो मां बेटी सहमने लगी थी। मुझे अपना ताकत और बुद्धि वाली हीरोपंती दिखाना था। लेकिन अकेला था, लड़कियों के चक्कर मे मार भी खाना उचित नही था। ...फिर मैं क्या करूँ..इन सबका तो फिलहाल मैं ही एक भरोसा था।
मैं जोर जोर से चिल्ला कर डांटने लगा उन सब को ताकि बगल के सहयात्री भी मेरा सहयोग करेंगे। लेकिन किसी ने मेरी चिल्लाहट को संज्ञान नही लिया। और मैं फिर असहाय होगया। एक ने मेरे गर्दन पकड़ कर धकियायते हुए कोच की गेट तक ले गया और नीचे धकेलने से पहले ही छोड़ दिया।
 मैं इधर उधर असहाय किसी की मदद के लिए निगाहे दौड़ा रहा था। बगल की कोच में टीटीई था उसके पास जाकर कम्प्लेन किया कि कुछ मदद करे, किसी जी आर पी को बुलाये। 
 उसने कहा, कुछ नही होगा सब डेली पसेंजर है, अगले स्टेशन पर उतर जाएंगे। आप थोड़ा धैर्य रखें। ज्यादा हीरोपंती दिखाएंगे तो वे सब आपको क्षति पहुँचा देंगे। उठाकर नीचे फेंक देंगे।यहां लालू राज है कुछ भी नही होगा। मुझे भी खतरा मोल नही लेना, मैं भी रोज इसी गाड़ी में चलता हूँ और नौकरी करना है। सभी लोकल लड़के है। थोड़ा बर्दास्त कर लीजिए।
ठीक है लेकिन वे सब उन लड़कियों को..... 
मैं बहुत ही घबराते हुए कहा
कुछ नही होगा ,आप मेरे पास ही बैठिए
अजीब है.... मन ही मन असमंजस में उस टीटीई को देखता रहा। 
गाड़ी दानापुर जंक्शन पर रुकी और वो सभी लड़के उतर गए। गाड़ी चल दी, मैं राहत का सांस लिया। लेकिन इस बीच जो हुआ था वो खुद की लाचारी वाली घटना मुझे कोस रही थी।
मैं फिर उस सीट पर गया, वही मेरा ब्रीफकेस भी था।
तीनो मां बेटी बदहवास थी , आसपास अब कोई नही था
बस इतना ही बोली कि"ऐंन वक़्त पर आप भी छोड़कर चले गए"
मैं टीटीई केपास गया था.... बात पूरी भी नही कर पाया
वे तीनों फफक कर रोने लगी
 मैं असहाय था, कुछ नही कर सकता था। मानो मुझे काठ मार गया हो।
मैं सोचता रहा कि आज ये मेरी बहन, या भाभी भतीजी होती तो मैं क्या करता।......
इतना असहाय तो कभी नही हुआ था मैं।
©nitesh
क्रमशः

शनिवार, 2 मई 2020

इश्क अब भी जिंदा है

#इश्क_जिंदा_है
तू कहीं और  कैद 
मैं कहीं और कैद
वायरस का पर्दा से
झांकती है जिंदगी
हर झंझावातों में भी
तुझे 
तलाशती है जिंदगी
बेशक ये दौर मौत का है
इन रस्मो रिवाज में 
अब भी
इश्क ज़िंदा है

कुछ भी याद नही है
न तेरा रूठना
न तेरा मुस्कुराना 
इन सन्नाटों में आज
खुद को 
ढूंढती है जिंदगी
न इंतज़ार न बेकरार
इतनी कम जरूरतों में भी
भूख के लिए
भटकती है जिंदगी
हर चीज अनिश्चितता में है
सारी उम्मीदों पर पहरा
लॉक डाउन का है
लेकिन मंद्धिम पड़ रही धड़कनों में 
अब भी 
इश्क ज़िंदा है।
©nitesh

शुक्रवार, 1 मई 2020

ग़ज़ल लिख देता

नशीली नयनो की पलक झुक जाए 
तो ग़ज़ल लिख देता
फिर होठो पर शबनम बिखर जाए
तो ग़ज़ल लिख देता
पहर दोपहर रात तक हो रही थी बातें
बात पूरी हो जाये 
तो ग़ज़ल लिख देता
एक मुद्दत से ठहरी हुई है कुछ शब्द
जो कहना था एक दूसरे से
आज गर तू बोल जाए 
तो ग़ज़ल लिख देता
अक्सर मेंहदी से सजाती रही तुम 
इन हाथोंको 
मेरे हाथों में ये हाथ आ जाये
तो ग़ज़ल लिख देता
 यूँ ही तुम दुपट्टे की आड़ से झांकती रही 
 लाज की गहनों में लिपटती रही
कभी करीब आकर मुझसे
मेरे पहलू में सिमट जाए 
तो ग़ज़ल लिख देता।
©nitesh