बुधवार, 22 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 22

#मेरा_एकांतवास 22
  शांत क्लांत और सन्नाटे  में यह बात  मनमस्तिष्क में हलचल मचा रखा है कि कैसे कुछ लोग दो साधुओं को पीट पीट कर मार डाला। एक निरीह  जन पर लाठी डंडे से ताबड़ तोड़ हमला ,वो भी तब तक जब तक वह मर नही गया, पुलिस के हाथ पकड़ कर इधर उधर भागते रहा शायद पुलिस के सहारे जान बचाना चाह रहा था, लाचार पुलिस भी कुछ नही कर पाया , वह भी वर्दी में भी एक इंसान ही था , उसे भी मौत ने घेर रखा था। आखिर यह उन्माद क्यूँ था। दो साधु गाड़ी से ड्राइवर के साथ अपने गुरु के मृत्यु पर आखिरी दर्शन को जा रहे थे, आश्रम से निकलने से पहले दूर दूर तक इस हदशे का आशंका भी न रह होगा।   इतना सोच होगा कि कोई पुलिस रोकेगा तो इनकी गेरुआ वस्त्र में सरल जीवन उसे भली भांति बता देगा कि वह लॉक डाउन में क्यों निकला है, उसे विश्वास था कि चेक पोस्ट पर वह बच निकलेगा , लेकिन आम जनता ही इस निरीह लोगो का दुश्मन हो जाएगा यह तो सम्भव ही नही था, आज सम्भव होकर देशवासियों के लिए हतप्रभ हो गया। तनिक सोचिये जान निकलने तक कितना शारीरिक और मानसिक वेदना सहना पड़ा होगा।
वास्तव में भीड़ का एक अलग मनोविज्ञान होता है, भीड़ का उन्माद आसानी से नही रोका जा सकता। उन्माद अपने लक्ष्य तक पहुचे शांत नही होता।   यह घटना शायद एक बड़ी जनसंख्या को उन्मादी भीड़ बना दिया है,  आज इस तरह के शक्ल सूरत वाले भीड़ देखकर सहसा ही भय उतपन्न करता है , जरूरी नही कि सभी भीड़ उन्मादी हो। लेकिन अपने ही देश मे हर जगह सुरक्षित घूमना मुश्किल होने लगे तो चिंता का विषय है।   कानूनी प्रावधान देश मे सजा दिलाने में  दुरूह कार्य है , तब तक न जाने कितने  नई घटना न हो जाये।  तारीख और जिरह के बाद न्याय आते आते हम सब भूल जाते है। यह उन्माद का भीड़  योजनाबद्ध है या अनायास??  अगर किसी योजनाबद्ध है तो निश्चित ही एक बड़ा तबका उन्मादी हो रहा है , फिर तो कानून को सख्त होना पड़ेगा।  लोगो मे विश्वास की जड़ को मजबूत के बनाने के लिए  भरपूर प्रयास करना चाहिए। आम नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए। घटना पर राजनीति समाज मे जहर घोलना है, और चुप रहना घटना का मौन समर्थन है। न जाने हम कब सच स्वीकार करने के लिए तैयार होंगे, कब तक वोट के खातिर दलालों के चंगुल में फंसते रहेंगे। हमे अपनी आजादी कब मिलेगी।  जब हम अपने देश को अपना ही कह सके। उम्मीद है  लोग  सहानुभूति पूर्वक स्तिथि सामान्य कर सके। प्रतिक्रियात्मक की जगह स्वीकारात्मक विचारधारा का प्रवाह हो। अन्यथा हम अपने ही देश मे लाचार होकर रह जाएंगे।अखंडता, निर्भीकता , सहानुभूति ,समरसता सब तार तार होने लगेगी, भय में जीना किसी देश की जनता के लिए गुलामी से अधिक पीड़ादायक है। हमे भय से बाहर निकलकर जीना पड़ेगा। यह काम केवल और केवल चुनी हुई सरकार ही कर सकती है बिना किसी लाभ हानि पर विचार किये।©nitesh
क्रमशः

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