गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

मेरा एकांत शांत वास 1

#मेरा_एकांत_शांतवास 1
मानव हूँ और मानव मन बहुत ही चंचल होता है, एकदम हवाओ से भी तेज। घर की दीवारों में कैद ये लगने लगा था शायद  इस दुनिया मे अकेला मैं ही बचा हूँ, एकांत, शांत क्लांत , सन्नाटा , चारो तरफ सांय सांय चलने वाली हवा डराने लगी थी। सकारात्मक विचार लाने की बहुत कोशिस की लेकिन लगा कि किसी को देख तो लूं, किसी को मुस्कुराते देख तो लूं, कहीं कोई किलकारियां तो सुन तो लूं, किसी गाड़ी को चलने की आवाज ,हवा में  कौंधते हवाई जहाज की आवाज , किसी की गन गुनाने की आवाज ........ कुछ भी सुन नही पा रहा था , उम्मीदों की दीया जलाए रखने के लिए इस तरह की तेल बाती का होना जरूरी है। खिड़कियों से चिड़ियों का मधुर संगीत अब डराने लगा है। , धूप छांव, बादलों की गड़गड़ाहट तो जान ही निकाल लेगा।  क्या मौत का भय से भी अधिक भय आज जिंदा रहने में है?सोच कर और भी मन व्याकुल हो रहा था। और एक झटके में दरवाजा खोलकर बाहर सड़क पर आ गया। ... वीरान पड़ी सड़के और भी डरावनी लगने लगी , व्याकुल हो चारो तरफ कुछ क्षण निहारता रहा, कुछ नही था बाहर भी , मानो यहां भी एक अदृश्य दीवारों ने घेर रखा है।  उफ्फ!! ट्रेन बस , अन्य गाड़िया भी तो नही चल रही , न जाने वो लोग कहाँ गए,  जो भीड़ बनाते थे,जो एक दूसरे को देखजर मुस्कुरा देते थे, किसी का हालचाल पूछ लेते थे, सबसे सबका सम्पर्क कट गया है, कैसे अपनो के बिना लोग जी रहे,  मुस्कुराये बैगेर भी कोई जी सकता है क्या!!सिर उठाकर आसमान की ओर देखने लगा। नीला आसमान मानो मुझपर मुस्कुरा रहा था , नीला आसमान  कुछ ज्यादा ही नीला था मानो स्वर्ग आरपार दिख रहा हो।  सोचा कुछ और दृष्टि लगाऊं कुछ दिख जाए लेकिन एक डरावनी आवाज सुनाई दी , यह एक सायरन की आवाज थी .... न जाने  यह एम्बुलेंस था या पुलिस .. उल्टे पांव अपने घर मे आकर खुद कैद हो गया। टीवी का रिमोर्ट दबा दिया...  कोरोना से मरने वालों की आंकड़ा बढ़ गयी थी , पोजेटिव मरीजो की आंकड़ो में बेतहाशा बढ़ोतरी हो  रही है। दुनिया  संकट की मुहाने पर आ रही  है , फिर कहाँ से लाऊं पोजेटिव विचार !!बन्द कर दिया टीवी , क्लासिकल इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक ऑन करके  फिर दीवारों से  आज बात करने लगा। मैं ही था और मेरी तन्हाई। ©nitesh
क्रमशः

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

मेरा एकान्तवास 35

#मेरा_एकान्तवास 35
प्रेम एक अदृश्य शक्ति होता है, वह दिखाई नही देता लेकिन उसका सम्बल सबसे मजबूत होता है। प्रेम जताने के लिए  किसी उपमा उपधान की जरूरत नही पड़ती। मेरी दादी जिनके प्यार स्नेह  को मैं आजीवन भूल नही पाऊंगा। लोग कहते है कि माँ का प्यार अधिक छाप छोड़ता है मनुष्यो पर ,परन्तु  इसके इतर भी बहुत सारी सम्बन्ध की डोर इससे अधिक मजबूत हो जाते है। दादी गांव की पुरातन संस्कारो की धरोहर थी। बाबा के जीते जी उन्होंने समय की नियति से उपजे अभाव को देखा था, और उनके जाने के बाद तो वह भी जाता रहा। एक सन्यासिनी , तपस्विनी की तरह शेष जीवन को जिया। मेरे बाबूजी उनके इकलौते पुत्र थे। दो बुआ अपनी गृहस्थी में उलझी रहती थी। बाबूजी नौकरी के चलते सदा बाहर ही रहते।बाबूजी हमलोगों के देखभाल के कारण या स्वाभाविक मजबूरी के  कारण दादी पर कम ही ध्यान देते। मां तो शायद बिल्कुल भी नही। वो गांव में अकेले रहती। उस समय घर और गृहस्थी भी  अभाव की तंग गलियों से चलता था। लेकिन सब के बाद भी उनका प्यार स्नेह माला माल कर देता था । उनके पास आज की तरह स्नेह जताने के लिये चाकलेट, कुड़कुड़े, चिप्स, आइसक्रीम नही था, खनखनाती सिक्के भी नही थे। जिससे बच्चे खुश हो जाता। लेकिन उनका वात्सल्य स्नेह भाव का शब्द हृदय में अक्षरशः स्थायी होने लगता। झोपड़ी नुमा कच्चा मकान, और उसके एक कोने में पड़ा मिट्टी का चूल्हा उसपर काला बहुत काला दो या तीन बर्तन। लकड़ी का कठौती, ढक्कन, पलटा , फूल की थाली, ग्लास, कटोरी यही मोटी जमा पूंजी था उनके पास। फूल की कटोरी में परोसा गया दूध जिसके स्वाद से ज्यादा आनंद नाक डूबने में आता।   दादी के हाथ का बना खाना का स्वाद किसी भी फाइव स्टार भोजन से बेहतर था। न तो शानदार रेसिपी पढ़कर बनाती और न ही सेफ क्या सुझाया मसाला ही डालती फिर भी जो स्वाद उसमे मिलता आज ढूढने से नही मिलती। मक्के की मोटी मोटी रोटी , धुंआ, मिट्टी, राख से मिश्रित होती  लेकिन कोई भी बीमारी का खतरा नही रहता। हां पवित्रता इतनी होती कि सुबह शाम दो बार गोबर से निपा जाता था। आज तो शिक्षित  शहरी अपने बच्चों को इस तरह के पकवान के आसपास भी फटकने न दे।
उन्हें पता था कि मुझे क्या क्या पसन्द है। वो उसका बहुत खयाल रखती थी , मेरे जाते ही मौसम अनुसार बथुआ का साग,भुनी हुई अरहर की दाल, मक्के की रोटी,लहसुन मिर्चा की चटनी, मट्ठा,दही चूड़ा, बैगन बड़ी की सब्जी,  और खीर बनाया करती। इतने समान को भी बड़ी प्रेम से सहेज कर लाती। जो खुद के घर नही होता पड़ोस से उधार मांग के लाती , "पोता आया है उसे खिलाना है"फिर बिन दांत वाली कपोल से मुस्कुराने लगती। 80 की उम्र हो गयी रही होगी  लेकिन चश्मा कभी नही पहनी। आखिरी समय मे जरूर बोल रही थी कि सुई में धागा डालने में मुश्किल हो रही है। तनिक तुम ही सुई में धागा डाल दो। चलते समय  समय कच्चा मूंगफली की दाना, गरी, छुहारा, किसमिस देती, ।चरखा काटकर जो बदले में खादी भंडार से कपड़ा मिलता उसे कहती कि ले जाओ इसका बुशर्ट सिलवा लेना। और मैं मुस्कुराकर मना कर देता।, हाँ खादी भंडार की बेडसीट मुझे बहुत पसंद था। चरखा से धागा कातने के बदले जो खादी भंडार से मिलता वही उनकी जमा पूंजी होता था।उसी से वह अमीर बनी रहती। भंडार वाले को बददुआ भी देती कि समय से पैसा नही दिया नही तो पोता को और भी कुछ खरीद कर देते। और मैं यह सुनकर लालची जैसा हो जाता। मेरे छोटे छोटे बालो को भी चुल्लू भर तेल डाल कर मालिस कर देती। , मना करने पर भी गर्म तेल से पैर दबाने  लगती। बोलती बच्चों को खेलने में पैर दर्द करने लगता है, मालिस कर देंगे तो पांव हमेशा मजबूत रहेगा। मेरी माँ को जब यह सब पता लगता तो इन करतूतों से बहुत चिढ़ती थी। लेकिन मुझे तो बहुत अच्छा लगता। इसलिए जब भी मौका मिलता दादी के पास चला जाता।। 
 जैसे ही बड़ा होकर कुछ सक्षम हुआ दादी चल बसी। उन्हें गंगा स्नान करने , काशी ,प्रयाग, अयोध्या जाने का बहुत मन था। जो अधूरा ही रह गया। इससे ज्यादा तो वो मुझसे उम्मीद भी नही की थी। उन्हें तो बस मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा पसन्द था। जिसे वह बार बार चूमना चाहती। और मैं धन्य हो जाता। ..... काश उन्हें मैं इन तीर्थो पर घुमा लाता। आज भी जिस किसी तीर्थ पर जाता हूँ वहाँ वो याद आ जाती है। ,... दादी काश तुम भी मेरे साथ यहां होती।©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 34

जितनी सन्नाटा बनारस की गलियां लॉक डाउन में है उतना तो दंगे की समय कर्फ़्यू में भी नही था। बनारसियों का मिजाज घुमक्कड़ी और अड़ी बाजी की रही है , लेकिन गली बिल्कुल सुनसान है। 65 वर्षीया फूलमती अपनी बड़ी बहू के साथ चार कमरे के दोमंजिला मकान में  लॉक डाउन का पालन कर रही है, सुना है बाहर पुलिस बहुत धड़ पकड़ कर रही है।  बगल के मदनपूरा मुहल्ले में कोरोना वाले को पुलिस डॉक्टर पकड़ कर ले जा रही है। बाहर से बनारस आने वालों की खुफिया जानकारी हासिल कर उसे पकड़ कर ले जा रही है इलाज के लिए ,साथ मे घर वालो पर मुकदमा उफ्फ!!ये क्या हो रहा है भगवान !फूलमती को अपने 26 साल के बेटे संतोष की चिंता है, वह दिल्ली में बिल्डर के यहां बिजली का काम करने गया था। पिछले कई दिन से उसका फोन भी स्विच ऑफ बता रहा था,  लॉक डाउन के दूसरे तीसरे दिन बात तो हुई थी, उसका मन घबरा रहा था, वह बनारस आना चाहता था, लेकिन माँ ने ही मना किया था, प्रशासन की धड़पकड़ देखकर।  चारपाई पर लेटे लेटे बेटे की उधेड़बुन में व्यस्त थी कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। दिन का समय था लेकिन  धड़कन बढ़ गयी, आजकल पता नही कौन दरवाजे पर कैसे छूकर चला जाये, कहीं कोई थूक ही न लगा दे और कोरोना घर के अंदर आ जाये। रोज मोबाइल पर ऐसी वीडियो देख रही थी। फूलमती ने बहु से कहा देखो कोई बाहर दरवाजा खटखटा रहा है। पूछो कौन है?क्या चाहिए ?
बहु न कहा -आप ही देख लीजिए, पता न कौन हो?? मुझे तो आजकल हर आदमी से डर लगने लगा है।
न चाहते हुए भी फूलमती धीरे धीरे  दरवाजे के पास गई , दरवाजा बिना खोले ही बोली कौन हो??
 माँ..........
शब्द सुनते ही फूलमती की कलेजा हिलोरें मारने लगी , मां की ममता की ज्वार फूटने लगा उसने फिर जोर की आवाज लगाई 
"बहु संतोष आया है...दौर कर पानी साबुन लेकर आओ।"
अरे सच्ची.....आश्चर्य से बोली लेकिन दूसरे ही पल स्वर बदल गया
रुकिए माता जी.. पता नही देवर जी किन किन लोगों से मिलकर आये होंगे, उनकी जांच जरूरी है नही तो हमलोग भी....!
 बहु की बातें सुनकर फूलमती का उछल रहा कलेजा एकदम से बैठ गया।
बोली-- अपना बेटा है वो कोई भी बीमारी अपने मां के लिए नही ले सकता " 
तभी बाहर से  आवाज आई .. मां मैं दिल्ली से पैदल चलकर आया हूँ, थक गया हूँ ,बहुत भूख लगी है दरवाजा खोलो
बहु भाग कर आई और फूलमती की हाथ पकड़ते हुए बोली, आप ऐसी गलती न करें।  देखते नही कोरोना वायरस भी दिल्ली से ही फैला है, क्या जाने देवर जी के साथ कोरोना भी आया हो ,इन्हें पहले अस्पताल में जांच करवाइए।  बिना जांच में वायरस का डर तो रहेगा ही पुलिस अलग हम सब पर मुकदमा कर देगी।
फूलमती मन मसोस कर रह गई। अंदर से बोली कबीर चौरा अस्पताल से पहले जांच करा लो बेटा।
 माँ अब शरीर मे इतना जान नही बची है कि अस्पताल तक जा सकूँ! बड़ी ही मार्मिक स्वर था संतोष का।
थोड़ी हिम्मत बनाइये ,एकबार जांच करा कर आ जाइए। सब के लिए ठीक रहेगा""भाभी ने भी आवाज दी।
फिर संतोष की आवाज नही आई, शायद वह अस्पताल के लिए चला गया हो , यह सोचकर फूलमती और उसकी माँ निश्चिंत हो गई थी।
लगभग दो घण्टे बाद एक एम्बुलेंस की सायरन की आवाज सुनाई दी, लेकिन सास बहू दोनों में किसी की हिम्मत नही हुई दरवाजा खोलने की, मन आशंकाए से भर गया था, बाहर कुछ आवाज हो रहा था। पुलिस ने दरवाजा खटखटाया , और आवाज लगाई संतोष तुम्हारा लड़का था, 
 फूलमती का हलक सुख गया , मश्किल से बोल पाई 
जी,
वो दिल्ली में रहता था क्या?
जी
 घबराने की बात नही है उसे 14 दिन के आईशोलेशन वार्ड में रखा गया है, रिपोर्ट आते ही सब बता दिया जाएगा।
बहु और सास एक दूसरे की मुंह देखते रह गए।©nitesh
क्रमशः

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

मिल बैठे है पूरा परिवार

आ गए है अब अच्छे संस्कार
अब मिल बैठे है पूरा परिवार
हंसी ठिठोली और बातों की पोटली
छुटकी खूब बोलती है तोतली
भाभी भी माथे पर  पल्लू डाल ली है
हॉस्टल वाली मुन्नी भी रसोई सम्भाल ली है
टाइम से अब दवा मिलती है माता जी को 
 चाय के लिए हर घण्टे पूछा जाता है पापा जी को
 मोबाइल  से अब खीझ होने लगी है
मोबाइल पर पिंकी का प्यार उबाऊ लगने लगा है
खोज खोजकर रिश्तेदारों का फोन लगने लगा है
कब किसकी शादी थी
कौन चिढ़ने का आदि था
सब पर चर्चा होने लगी है
कौन  किताब लिए सो जाता था 
 कौन लूडो में बेइमानी करता था
किसकी चुगली चलती थी
किसकी किसकी गलती थी
दादी नानी के क्या क्या पसन्द थे 
मम्मी पापा कितने पाबंद थे 
 हमारी स्वतंत्रता ने हमे अपनो से दूर किया था
 मोबाइल ने सम्बन्धो को मिटाने को मजबूर किया था
 सारे गीले शिकवे दूर हो रहे है
हम आपस मे फिर एक हो रहे है
सब इस कोरोना का ही तो कमाल है
अपनी रिस्तो में ही हम मालामाल है
मृत्यु का भय  जीवन को करीब ला दिया
अपनो संग अभाव में ही जी लेंगे 
यह सुंदर गुण सीखा दिया।
©nitesh

चर्चा क्या नया करूँ

हालात सब एक जैसा ही है
चर्चा क्या नया करूँ
हम सब अपने घरों में कैद है
मन तो आज भी आजाद है
कैसे इसे काबू करूँ
सपनो वाली कहानियां ही ठीक है
कभी तुम मिलो कभी हम मिले
कमबख्त नींद आ जाये 
और सपना देखा करूँ
भय मौत से नही भविष्य से है
दो रोटी की चिंता में
कैसे खुद को समझाया करूँ
चूल्हे की आंच मंद्धिम पड़ रहा है
दीवारे सिमट रही है
हाथ पांव बंध सा गया है
जिम्मेदारियों से अलग कैसे 
किसी भी पल तुझे याद करूँ
हालात सब एक जैसा ही है
चर्चा क्या नया करूँ।
©nitesh

मेरा एकान्तवास 30

#मेरा_एकान्तवास 30
 मैं इंटरमीडिएट का छात्र था, कुछ ही दी पहले बिहार से यूपी में पढ़ने आया था। कालोनी का वातावरण बिल्कुल एक परिवार जैसा था ,सो जल्दी ही सबसे घुलमिल गया।  ढेर सारे चाचा चाची भैया दीदी मिल गए।  हमसे छोटे उम्र के लड़के लडकिया भी सम्मान देने लगे थे। मेरे पड़ोस में एक घर छोड़कर चाचाजी के दो बेटे दो बेटियां थी।  सभी मुझसे एक से 6 साल तक की छोटे ही थे, चाची जी बहुत ही निष्ठावान थी ,बहुत मानती थी मुझे, उनकी दोनों बेटियां बहुत सुंदर, चंचल थी , जैसे ही मुझे देखती दरवाजे, पेड़, फूलों की झाड़ी में छुप जाती। सुबह और दोपहर अक्सर झाड़ू लगाने  निकलती और मैं बोल देता, "मेरे घर भी लगा देना झाड़ू, हाँ दो चार बर्तन भी है उसे भी माज देना"... फिर क्या झाड़ू पटक  कर भाग जाती।   मुश्किल से ही कभी मेरे सामने पड़ती। दरवाजे से निकलने से पहले इत्मीनान हो जाती की मैं बाहर तो नही हूँ। छुटकी तो और भी सुंदर थी यही कोई 13 या 14 साल की रही होगी।  ईश्वर ने बड़ी फुर्सत में उसे सांचे में ढाला होगा। मंद्धिम और नीली आंखे, बड़ी बड़ी बाल दूधिया गोरापन, इसी उम्र में संस्कार भी बड़ो जैसा ,क्या मजाल कि कभी सिर उठा कर चले , स्कूल आते जाते गर्दन झुकी ही रहती। अचानक से कभी रास्ते मे मिल जाती तो टोक देता कि गर्दन टूट जाएगी, कोई पीछे से ठोकर मार देगा।  "
फिर तो वो शर्म से गर्दन और झुका लेती मानो कोशिस कर रही हो कि यही गड्ढा हो जाये और उसमे छुप जाए। मुझे आज भी याद है बाजार में मैं किसी दुकान के पास खड़ा था, वो उधर से स्कूल से आ रही थी ,मुझे देखकर वह गुमटी के पीछे छुप गयी.. और तब तक छुपी रही जब तक मैं वहाँ से हट नही गया।
दोनों बहनों का स्वभाव जान गया था इसलिए  मैं भी उसे मौका कम ही देता , लेकिन कभी कभी चिढ़ाने के लिए शरारत कर लेता। वो दोनों मेरे साइकिल का ख्याल रखती थी ,अगर  साइकिल बाहर खड़ी है तो वो सचेत हो जाती कि हम घर पर ही है। अगर साइकल नही है तो तितलियों की तरह फुदकने लगती। मैं उसके घर पर भी जाता और चाची से पूछता छुटकी पढ़ रही है कि नही"
 चाची कहती "तुम ही पूछ लो"
फिर तो पहाड़ ही गिर पड़ता , न जाने किस दरवाजे के पीछे चिपकी रहती  , क्या मजाल जो वो सामने आ जाये।
 अच्छा ऐसे लड़के लड़कियो को चिढ़ाने में बहुत मजा आता था। कुछ दिनों बाद मुझे ही तरस आने लगा कि परेशान नही करना चाहिए।  और उसे चिढ़ाने से बचने लगा।
समय बीतता गया  एक साल बाद ही बड़ी की शादी हो गयी।  उसमे छुटकी गज़ब की सजी थी लेकिन मैं उससे बचकर रह रहा था ,अन्यथा वो अपनी ही बहन की शादी में छुपकर बैठ जाती।  लेकिन मुहल्ले की लड़के लडकिया उसे ही निहार रहे थे।बला की सुंदर लग रही थी  किसी की नज़र न लगे। मैंने मन ही मन कहा था।
 उस शादी के बाद मैं बाहर पढ़ने चला गया था, लगभग साल भर बाद लौट कर आया, और पूर्व की तरह ही दरवाजे पर खड़ा था। बहुत इंतज़ार किया लेकिन कोई झाड़ू लगाने बाहर नही निकली। फिर सोचा, बड़की तो चली गई ससुराल ,छुटकी अवश्य निकलेगी। घण्टो बीत गए ,शाम तक छुटकी की दर्शन नही हुई। मेरी  बैचेनी बढ़ने लगी।बड़ा मन था उसे देखने का। वो सुंदर मुखड़ा याद करने लगा, सोचा साल भर में और निखर गई होगी। रहा नही गया और मैं चाची से मिलने उनके घर ही चला गया।  दोनों लड़के ओरणं किये, बड़े समनं के साथ बिठाए, चाय नमकीन भी आया लेकिन ... छुटकी नही दिखी!!
आखिरकार पूछ ही लिया छुटकी कहाँ है ?आजकल पढ़ रही है कि नही??
 सब चुप !!! फिर चाची ने आवाज लगाई ,देखो नितेश भैया आये है। नमस्ते तो कर लो ।
 अचानक से प्रकट हुई और जोर जोर से हँसने लगी, अजीबो गरीब आंख मुँह घुमाने लगी, बोली 
नमस्ते ,क्या हाल है भैया!!
एकदम से पत्थर हो गया था मैं। यह क्या रंग है यह क्या रूप। विधाता ने ये क्या किया!!
फिर वो तेज कदमो से अंदर गयी और कुछ जोर से आवाज आई। कुछ तोड़ दी थी वो ,दोनों भाई दौर कर  उसे संभालने गए।
 पता चला था छुटकी की मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। डॉक्टर कुछ और कह रहे थे और आसपड़ोस के लोग किसी प्रेत की साया बता रहे थे। मुहल्ले के लोग भी बहुत परेशान थे। घर वालो की हालत कल्पना से बाहर थी। पता नही किसकी नज़र लग गयी उसे।रात को बदहवास घर से निकल जाती थी , खुद की कपड़े फाड़ लेती थी ,सबका जीना मुश्किल हो गया था।  बहुत डॉक्टर ,और झाड़फूंक वाले से दिखाए थे  लेकिन कोई फायदा नही हुआ ।
 
 समय की घड़ियां तेजी से चलती रही। अब मैं बहुत दूर था, वो सारी कालोनी तोड़ दिए गए थे , सभी लोग रिटायरमेंट के बाद अपने अपने आवास बदल लिए थे, लेकिन लगभग 15 साल बाद एक बार फिर पिछले दिनो  उनके यहां जाने का मन किया। बहुत मन बनाकर पता पूछते हुए नए घर मे गया। चाचा चाची दुनिया से विदा ले चुके थे, दोनों भाई अपने परिवार बसाकर अलग था।  बड़े वाले ने पूर्व की भांति ही सम्मान दिया , उसके बच्चे और पत्नी भी मेरे बारे में जानकर बहुत खुश हुए ,मैंने भी बड़ो की तरह हक जताया।  बच्चों को पहली बार देख रहा था। वो सब भी बड़े हो गए थे ।मैंने पूछा छुटकी कहाँ है?? कैसी है। 
 बोला - यहीं है, पहले से कुछ बेहतर है लेकिन 20 प्रतिशत ही। रेगुलर दवा चलती है, अपना ख्याल  कर लेती है,  सहमी हुई कदमो से एक बार फिर छटकी सामने आई, दोनों हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी। एक टक निहारते रही , एक दम शांत, सहमे चेहरे में दो दशक पहले की सारी स्मृतियां दिखने लगी और मैं भी स्तब्ध देखता रहा।   आंखे गड्ढे में चली गई थी, होठ सुख चुके थे, वो अप्रतीम सौंदर्य की प्रतिमा धूल धूसरित हो चुका था।
 मैं कुछ नही बोल पाया। शायद कुछ देर और रहता तो रो देता। मुंह चुराकर बहाने बनाकर वहाँ से चला आया।करता भी क्या सबकुछ अपने बस का तो नही©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 29

#मेरा_एकान्तवास 29
सिंह साहब बहुत चिंतित थे सुबह ही फोन आया था ,54 की उम्र गुजार रहे सिंह साहब के लिए कोरोना एक तूफान की तरह साबित होने वाला था , बहुत कुरेदने पर जो चिंता जाहिर की वह शायद यकीन करने लायक नही था।।
 एक बेटे एक बेटी की पिता सिंह साहब का बड़ा बेटा हैदराबाद में एक  आई टी कम्पनी में अच्छे पोस्ट पर कार्यरत है,  इसी साल एक  मार्केटिंग प्रोफेशनल लड़की से शादी तय हुई है, लॉक डाउन के चक्कर मे शादी की तारीख तय नही हो पा रही है,लॉक डाउन से पहले ही मेरे साथ बनारस में शादी के लिए खूब  मार्केटिंग किये थे, आखिर परिवार की पहली शादी है, उत्सव भी शानदार होनी चाहिए, तैयारियां पूरी है, लड़की वाले भी जल्दी ही निर्वाह करना चाहते है , दोनों पक्ष सरकार के अग्रिम निर्देश का इंतज़ार कर रहे है।दूसरी सन्तान  बेटी पुणे में एम बी ए कर रही है । घर पर पति पत्नी ही  लॉक डाउन का सहारा है। पति पत्नी मिलकर खाना बनाना और  खाते पीते समय बिता रहे है।  परंतु एक नई चिंता सताने लगी है, अभी कोई डॉक्टर भी सलाह के लिए तैयार नही है  समय निकलते जा रहा है, ऐसे में अब सिंह  साहब अपने परिवारिक सदस्यों और रिस्तेदारो में मुंह दिखाने के लायक नही रहे । आखिर आने वाली दुल्हन क्या बोलेगी कि मेरे आने के साथ ही मेरा देवर जन्म लिया है!!लोग क्या बोलेंगे?? चिंता में सिंह साहब आज दुबले हुए जा रहे है। जो भी हो लॉक डाउन में सब हरि इच्छा।© nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 28

#मेरा_एकान्तवास 28
 घर मे कैद रहते हुए शारिरिक कार्य एकदम से रुक जाता है इसलिए वैकल्पिक व्यायाम जरूरी हो गया है। कुछ लोग जो सम्पन्न है अपने घर के जिम में व्यायाम कर लेते है , कुछ छतों ओर बैठकर कसरत योग करते है। जिसे ये सब नही नसीब है और एक कमरे में कैद है उसके लिए चोरी छुपे इधर उधर टहलना पड़ता है। कुछ दिनों से सांध्यकालीन विचरण को मैं भी निकल रहा हूँ। आज कुछ दूर सुनसान सड़को पर निकल गया था। दूर सड़क किनारे एक पुरानी  घर के पास से गुजरा तो समझ मे आया कि यह कोई मंदिर है इसमे न जाने कौन से देवता निवास करते है। लोहे के जाली से अंदर झांका तो लाल सिंदूर लगा 2 फुट का पत्थर पड़ा था। बिन सोचे समझे हाथ जोड़ कर नमन किया।  मंदिर नुमा कोई भी  भवन देखकर माथा अपने आप झुक जाता है। यह बचपन से मिला संस्कार है , लेकिन इसमें अभी मैंने सुधार किया है। मैं जहां रहता हूँ वहाँ 100 मीटर दूर एक मकान की छत के एक कोने में  एक मंदिर  नुमा गुम्बद वाला कमरा है। यह घर से पूरब की ओर है ,इसलिए पिछले दो साल से सुबह उठकर सूर्य देवता के साथ उस मंदिर नुमा भवन को भी नतमस्तक  कर लेता था शायद 84 कोटि में कोई देवता उसमे भी निवास करता हो, लेकिन पिछले महीने उस मकान में जाने का सौभाग्य मिला , मकसद था किसी मित्र के लिए किराए का मकान ढूढना। उस छत पर भी गया और मकान मालिक जो पेशे से डॉक्टर है उनकी पत्नी से उस गुम्बद नुमा कमरे के बारे में  जानना चाहा। तब जाकर पता चला कि ऊपर के किराएदारों के लिए है  शौचालय है। .... जिसे पिछले दो वर्षों से सवेरे सवेरे नमन करता था।  खैर यह भी एक मनोवैज्ञानिक कारण है। सम्बद्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत।
यही कारण  था कि उस सुनसान मंदिर के भीतर झांकने के बाद ही मैंने श्रद्धा से उस पत्थररूपी देवता को नमन किया। कई मिनट तक अंदर झांकता रहा शायद कुछ समझ सकूँ! सहसा अंदर से आवाज आई और मैं सावधान हो गया। 
"तुम डर रहे हो...  मैं  सदियों से अंदर हूँ लेकिन डरा नही , तुम तो डर से घर मे कैद हो । तुम्ही क्यों पूरी दुनिया मौत के भय से आज घर मे कैद है।  हर तरफ हर धर्म के मानने वाला  मानव  हाँथ उठा कर जीवन की भीख मांग रहा है, न कोई भाषा ,न कोई देश की सीमा, न धर्म, न जाति, न अमीर न गरीब,  सभी आज केवल और केवल जीवन की भीख मांग रहे है। किसी को आज धन नही चाहिए। जीवन की सफलता नही चाहिए। पुत्र नही चाहिए, नॉकरी नही चाहिए, सुख और ऐश्र्वर्य नही चाहिए, सभी को मात्र जीवन चाहिए। सभी जीना चाहता है आज। सभी को मृत्यु से भय है। एक अनदेखा दुश्मन से भय है। ... क्या तुम मानव हार गए।  कल तक प्रकृति का दोहन करके  मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लिए थे, फिर आज भय क्यूँ ?
 मैंने  असंख्य लोगो को यहाँ से गुजरते देखा है। सदियों से सभी को मरते देखा है।  बड़ी बड़ी सपने और उम्मीदों को पूराकर यहाँ सिर नवाने वाले को भी मरते देखा है।  कोई बचा नही है, कुछ समय पर कुछ समय से पहले  सभी चले गए। लेकिन मैं आज भी हूँ। इसलिए कि पत्थर हूँ।  ,मजबूत हूँ , सदियों का साक्षी हूँ। इसीलिए लोग मुझे देवता समझते है। न कोई राग है न द्वेष बस समभाव से सदियों से पड़ा हूँ। तुम पूजते हो ,स्वार्थ में, लोभ में, दुख में ... फिर कहाँ !!!
 मुझे ये सारी बात बकवास लग रही थी , यह सत्य तो सब जानते है फिर नया क्या था!! यह सब मुझे क्यूँ बताये जा रहा था।मैंने कहा -- कुछ नया नही है ये बातें, तुम यही बैठे सब देखते रहे हो देखते रहोगे यह तुम्हारी नियति है। मानव है हर रंग में जीना चाहता है। हर परिस्थिति में जीना जानता है, तुम्हे पूजता है ताकि तुम इन साहस का साक्षी रहो। ...आज तुम्हे मानव का यह विकास देखा नही जा रहा इसलिए शायद ताना दे रहे हो। हम फिर जीतेंगे। एक बार मृत्यु पर फिर विजय होगा, तुम बस सदियों गिनते रहो।
फिर मैं चलने लगा ।
 मेरी आखिरी बात सुनते जाओ 
वो भी बता दो शायद कुछ नया हो। झुंझला गया था मैं
""आज जिस भाव, संस्कार,आचरण,प्रेम और उम्मीद से घर मे जी रहे हो न..बस इसी संकल्प से आगे भी जीने की अपेक्षा रखोगे तो शायद तुम्हे कोई हरा नही सकता। मानव जिसदिन इस संकल्प को तोड़ने की कोशिश करता है यह विकट परिस्थिति स्वतः आ जाती है"
 मैं वापस लौट आया था, लेकिन अब तक सोच रहा हूँ कि शायद सबकुछ सत्य ही सुना हूँ। गलत वक़्त नही गलत हमारी आचरण हो गयी थी। लॉक डाउन मेरी जिंदगी की एक सीख है।सदैव स्मरण रखने योग्य है।
©nitesh
क्रमशः

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

मेरा एकान्तवास 26

#मेरा_एकांतवास 26
 70 वर्षीय महेश बाबू आज वृद्धा आश्रम के तंग कोठरी में पड़े पड़े अपने अतीत को कुरेद रहे थे। फिर गहरी सांस लेकर मुस्कुराये। अकेले में विचारों के प्रवाह में मुखमंडल पर भी आभा टपक पड़ती है। फिर वापस कमरे से दरवाजे की ओर एकटक देखने लगे।अभी थोड़ी देर पहले ही तो टीवी पर समाचार देखकर अपने कमरे में लगे 6x3 की लकड़ी की चौकी पर लेटे थे। महेश बाबू का अतीत बहुत ही सुंदर था, दो बेटे का सुखी परिवार।  पत्नी 25 साल पूर्व ही साथ छोड़ गई थी।  दोनों बेटे अपनी पत्नी के साथ खुशी खुशी जीवन यापन कर रहे थे बड़ा बंगलोर में तो छोटा दिल्ली में। दोनों के पास दो दो कमरे का शहरी फ्लैट था।  पत्नियों का आदर करते हुए बेटों ने पिता को अपने साथ रखना मुनासिब नही समझा।  बेटों के यह अप्रत्यक्ष अनादर के कारण महेश बाबू गांव में भी रहना उचित नही समझे, गांव के दरवाजे पर हर आने जाने वाला ताना देकर चला जाता। ""जिसके दो दो होनहार पुत्र वो इस हाल में जीये!!जरूर कोई पूर्व जन्म का पाप होगा""...ये सब सुन सुन कर तंग आ गए थे।  अपनी बची खुची जमा पूंजी लेकर वृद्धा आश्रम में ही  शेष जीवन गुजारना उचित समझा।  बेटो ने कभी कभार फोन कर लेता था लेकिन महेश बाबू का मन इन सब से टूट चुका था वो अब किसी बेटों का या अपनो का फोन नही उठाते। स्वयं में मस्त रहना सीख लिए थे। एकांतवास में जीवन की सच्चाई को भलीभांति समझने लगे थे।  6 वर्ष हो गए थे इस आश्रम में रहते हुए। हर ईंट चौखट इन्हें अपना लगने लगा था। हाँ एक बात की भय सदा रहती कि आखिरी वक्त कैसे बीतेगा। खुद की मृत्यु की खबर से मेरे अपनो पर क्या प्रभाव पड़ेगा?  लेकिन इसका भी हल था कि जब जीते जी जिसे हम पसन्द नही तो मरने पर  अंतिम संस्कार के लिए अपनो को बहुत कष्ट उठाना पड़ेगा। अब एक ही चिंता थी कि अंतिम संस्कार में अपनों को कोई कष्ट न हो। कोई मृत शरीर पर भी ताना ना दे जाए। 
टीवी पर कोरोना का खबर से रोज आहत होते थे महेश बाबू । लेकिन आज टीवी समाचार देखकर आने विस्तर पर गए तो न जाने बहुत खुश थे।  दरवाजे पर टकटकी लगाए देख रहे थे मंद मंद मुस्कुरा भी रहे थे। आखिरकार नही रह गया और उठकर दरवाजे से बाहर जाने लगे। चौकीदार न कहा  रात हो रही है कहाँ जाना छह रहे है??बाहर लॉक डाउन है। पुलिस पकड़ लेगी। "
फिर क्या करेगी पुलिस??महेश बाबू उत्सुकता से पूछा।
 "बस पकड़ कर किसी अस्पताल में  14 दिन के लिए कोरोनटाईन कर दिया जाएगा। उसमे कोई कोरोना का मरीज हुआ तो आपको भी हो जाएगा " चौकीदार ने डराते हुए महेशबाबू से कहा। 
तब ठीक है""  काश!! मेरी मृत्यु कोरोना से ही हो जाता""
 महेश बाबू बोलते हुए आगे बढ़ने लगे  चौकी दर ने बांह पकड़ कर सहारा देते हुए अंदर लाने की कोशिश करने लगा।
इतनी बड़ी महामारी से आप क्यूँ मरना चाहते है। हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है। "
एक कुर्सी पर लगभग जबरदस्ती बिठाते हुए चौकीदार ने कहा।
 महेश बाबू एक बार फिर मुस्कुराये और बोलने लगे:
आज ही टीवी में देखरहा था ,कोरोना से मरने वालों के अंतिम संस्कार में उसका कोई अपना नही जाता। सरकार की व्यवस्था से ही अंतिम संस्कार होता है। किसी कफ़न या रस्मोरिवाज की जरूरत नही पड़ती। फिर मेरे जैसो के लिए तो ऐसा ही मौत उचित है। जहां अपनो को मेरे मृत्यु का पता न चले। जहां अंतिम संस्कार के लिए किसी को कष्ट उठाना न पड़े। किसी रस्मोरिवाज के नाम पर चंद रुपये खर्च न करना पड़े। इससे अच्छा मौत और क्या हो सकता है। भला हो कोरोना का। 
चौकीदार की आंखे डबडबा गयी। बस इतना ही कहा था उसने" मैं हूँ ना अंतिम समय तक के लिए""
©nitesh bhardwaj
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 25

#मेरा_एकांतवास 25
8 वर्ष का था उस समय , नवरात्रि का पहला दिन था शायद, लेकिन मैं तो नवरात्रि का मतलब भी नही जानता था।  उस दिन किसी के साथ देवी मंदिर चला गया था , लौटते समय मंदिर के पास दो रुपये का लाल वाली नोट मिला। बहुत खुश हुआ था मैं , उस समय का दो रुपये आज के 200 रुपये से अधिक का था। बहुत कुछ खरीद सकता था उस से। खिलौनों से घर भर सकता था, तार पर ऊपर नीचे उछलता हुआ बन्दर वाला खिलौना। हाथ की अंगूठा से टिक टाक बजाने वाला खिलौना ,बांसुरी,लेमनचूस, लट्टू, दालमोट , लाल वाला बर्फ(आइसक्रीम) ये सब भी हफ्ता भर खा सकता था। कई सपनो को सजाते घर पहुंचा था मैं। धनबाद के पाथरडीह कोलवासरी कालोनी में रहता था उस वक़्त , मुझे याद है मुहल्ला में सिंह साहब के यहाँ पहली ऑटोरिक्शा आया था, बाबूजी भी खरीदना चाहते थे लेकिन 9000 रुपया जुटाना असम्भव था। बच्चों को सफेद शर्ट नील पैंट में स्कूल जाते देख बहुत तरसता था, मैं तो खाकी वाला पैंट में ही खुश था जो बाबूजी के ड्यटी वाला कपड़ा को काटकर घर मे ही सिला जाता था,जिसे फटने पर चिप्पी लगा कर  महीनों चलाते थे। झोला में किताब और अमरूद चबाते हुए सरकारी पाठशाला पहुंच जाते थे। खैर  उस दिन मैं अचानक अमीर हो गया था 2 रुपये पाकर। घर आया और खुश खुश माँ को बताया।  लेकिन यह क्या माँ तो बिल्कुल खुश नही हुई। बोली आज नवरात्रि का पहला दिन है कुछ ऐसा वैसा वाला यह रुपया न हो, डर लग रहा है। उस नोट को अलग रैक पर रख दिया गया , हाथ मुंह धोकर खाया फिर खेलने चला गया , रात को हल्की बुखार आयी ,और अगले दिन बुखार 102 हो गया , माँ कहने लगी कि ये सब उस दो रुपये का कमाल है। 
पूरा घर परेशान। बड़ा लड़का जो था खानदान का। उस समय बुखार लगने पर कुछ नही दिया जाता खाने को बस गर्म पानी । बहुत मुश्किल था, भूख से मन छटपटाने लगा, 2 दिन बीत गया लेकिन बुखार जाने का नाम नही लेता , मैंने भी चुपके से चुरा चुरा कर अमूल दूध का पावडर दो दो चमच्च  खाना शुरू कर दिया।  मजा आने लगा, एक तो आम का अचार भी खाया था। तीसरे दिन रेलवे अस्पताल में डॉक्टर से दिखया गया। डॉक्टर ने बताया कि टायफाइड हो गया है, आँत का बुखार है। मैं तो डर ही गया सोचा अमूल पावडर ने तो आंत में इंफेक्शन  फैलाया तो नही। फिर इंजेक्शन लगने लगा, उस समय इंजेक्शन से इतना डर लगता जितना आज ऑपरेशन से नही,टेबलेट भी खाने को मिला लेकिन अन्न के नाम पर कुछ नही ।एक टाइम पाँव रोटी, या फिर ब्रिटेनिया को दो बिस्किट बस।20 दिन से ज्यादा रहा बुखार दीवाली आने वाली थी। तांत्रिकों के पास भी  मुझे ले जाया गया, हर तांत्रिक  ने अपना अपना तरीका अपनाया। कई ताबीज गले मे लटक गए थे। मिर्च और लोहमान की धुंआ से मुहल्ले के भी दुष्ट आत्मा भाग गया होगा।आखिर कर उस दो के नोट को मंदिर में चढ़ा दिया गया।  टायफाइड ठीक हो गया।  पथ्य में रोटी को पानी मे भींगा कर , परवल को भूनकर उसकी भरता बनाकर खाया था, बिना तेल का। पथ्य के 3 दिन बाद पुराना चावल को गिला कर के माड़ के साथ खाया था। छठ तक तो स्वस्थ हो गया था  ,लेकिन उछल कूद नही कर सकता था। परन्तु वो  वाला 2 रुपये के नोट हाथ से निकल गया था।  आज भी कोई रुपया कहीं गिरा मिलता है तो उठाने से पहले वो सारी घटना याद आने लगती है। फिर किसी बगल वाले से कहता हूं कि उस नोट को उठा ले।©nitesh
क्रमशः

मेरा एकान्तवास 24

#मेरा_एकांतवास 24
बहुत कम लोगो को याद होगा भाप इंजन वाली रेलगाड़ी की सफर। जिन्हें याद है वो आज की एक्सप्रेस जिंदगी से कहीं बहुत अधिक आनंद लिए थे इन सफर का। काला सफेद धुंआ उगलती ,छुक छुक करती रेलगाड़ी जीवन का मधुर संगीत था। यात्रा का नाम सुनते ही उन दिनों एक रोमांच होता था रेलगाड़ी का सफर।  मेरे जैसे कुछ छात्रों का नित्य का दिनचर्चा बनगया था यह छुक छुक।  चोपन से मिर्ज़ापुर हर एक दिन के अंतराल पर या कभी कभी नित्य क्लास करने कन्हैयालाल बसंतलाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय (KBDC जो बाद में KBPG हो गया)  जाना होता था, बाबूजी के रेलवे पास जिंदाबाद था मेरे लिए। इसके बाद भी कोई दिक्कत हो तो कालेज का id कार्ड काम कर जाता, नही तो चाचा कहने पर सब समस्या हल हो जाती। आज की तरह sir कहने की चलन उस जमाने मे कम ही था, चाचा जी कहने से बड़ी से बड़ी समस्या हल हो जाती थी।  चुनार से गोमो वाली दोपहर की पैसेंजर ट्रेन वापसी का होता था।  दक्षिणाचल कि लगभग सभी लोगो को यह ट्रेन याद होगा ।  चुनार स्टेशन का वह गर्म पकौड़ी भी हर यात्रियों का पसंदीदा स्नेक्स था। बस प्लेटफार्म 5 पर पकोड़ी ही मिलता था लेकिन स्वाद में वर्षो तक कोई अंतर नही आया, वेंडर पकौड़ी का हाफ फ्राई तो घर से ही लाता लेकिन फूल फ्राई करके ताज़ा ताज़ा चटनी के साथ बेचता। मुझे आज तक याद नही कि कभी वेंडर के पास पकौड़ा बच गया हो। अक्सर यात्रियों को नही मिल पाता। चुनार से गाड़ी खुलने के बाद सरसोग्राम में इंजन पानी लेता ,फिर खूब भाप बनाकर अर्धवृत्ताकार रेल लाइन से गुजरते हुए पहाड़ चढ़ता , इंजन की मेहनत देखते बनती थी। कभी धुंआ उड़ेलता तो कभी खूब भाप फेकता। आखिरकार लुसा स्टेशन पहुँचकर सकून मिलता। वहाँ का नन्हा नन्हा तिकोना शुद्ध खोए का पेड़ा खाने को मिलता, गाड़ी खड़ी होते ही दुकानदार की तरफ लोग दौड़ पड़ते। एक दुकान भी तो होता था। दूसरा छोटे छोटे समोसा बेचता तीखी चटनी के साथ। फिर वही नल का पानी, या ,घड़ा रखकर पियाऊ वाला रेलकर्मचारी पिलाता। यह सब काम के लिए इतना समय मिलता जितने में स्टेशन मास्टर के कार्यालय से पोटर ड्राइवर को टोकन देने और पानी पिलाने जाता। उस जमाने मे रेलवे का सिग्नल आज की तरह बिजली वाला इलेक्ट्रॉनिक नही था। रेलवे के नियम के अनुसार मैदानी भागों में सिग्नल नीचे की ओर झुका होता, तो ड्राइवर चलने का संकेत मान लेते थे लेकिन पठारी और पहाड़ में इसे क्षैतिज रेखा में खड़ा हो तब हरा यानि चलने का संकेत माना जाता। रात के समय मिट्टी तेल वाली दीपक ही डाला जाता था संकेत के लिए जो सिग्नल के अनुसार लाल या हरा हो जाता। पीला का कोई ऑप्शन नही था उन दिनों।  घाटियों से गुजरती हुई यह छुक छुक ट्रेन प्रतिदिन के लिए एक नयी कहानी ही गढ़ता। 
एक बार चुनार स्टेशन पर गाड़ी खुलने में समय रहते हम मित्रो ने अपने बैग और गमछा सीट पर रखकर स्टेशन से बाहर एक नम्बर प्लेटफॉर्म की ओर पकौड़ा से अलग कुछ खाने को निकले। नास्ता पानी करते समय का अंदाजा नही रहा, कमबख्त घड़ी भी तो नही था आने पास।वापस आने पर ट्रेन जा चुकी थी। दिन के 2 बजे के बाद ट्रेन देर शाम ही मिलती। परेशानी बढ़ गयी ,उसमे पुस्तक वाली बैग और गमछा भी ट्रेन में ही चला गया। अब मिलना शायद मुश्किल ही था। रोना आ गया था अपनी गलतियों पर।  बहुत ही मुश्किल था उस जमाने मे एक गमछा भी, और कॉपी किताब तो महंगे थे ही। ऊपर से डांट पड़ती सो अलग। स्टेशन मास्टर के पास रुआँसा सा मुंह लेकर पहुँचा। खैर कई बार चाचा जी कहने पर उन्होंने अगली स्टेशन को कंट्रोल के माध्यम से ओवर ओवर करके सूचना दी। और हमलोगों की बैग और गमछा सुरक्षित  हो गया। थोड़ी देर बाद वही चाचा जी एक मालगाड़ी से हमलोगों की जाने की व्यवस्था भी कर दिए। गार्ड वैन में बैठ कर आनंदमयी सफर किये हमलोग। हम आगे जा रहे थे और रेल की पटरी पीछे छूटती जा रही थी। लेकिन उसदिन लुसा का पेड़ा खाने को नही मिला।
©nitesh
क्रमशः

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 23

#मेरा_एकांतवास 23
छात्र जीवन कई गमो से बेगाना होता है , हाईस्कूल के बाद कि पढ़ाई के लिए मैं बाबूजी के साथ रेलवे कॉलोनी में रहा करता था। पूर्व रेलवे की कालोनी चोपन एक  परिवार जैसा ही था जिसका जिक्र पहले ही कर चुका हूं, हमउम्र के दोस्त  अपने सगे से भी अधिक संवेदनशील हुआ करते थे,  छोटा सा कस्बा , कुछ गिने चुने दुकानों का बाजार हुआ करता था चोपन ,  अमूमन हर एक चीज के एक दो ही दुकान हुआ करता था, आबादी भी कम था तो दुकान का भी कम ही होना लाजमी था। मुख्य सड़क के दोनों किनारे  कुछ दर्जन भर दुकान को मार्किट कहते थे। वही चोपन बस स्टैंड भी हुआ करता था, जिस कारण 24 घण्टे रौनक बना रहता था। उसी में कन्हैया स्वीट उस जमाने की जुहू चौपाटी हुआ करता था,  वह असज भी उसी रौनक से है लेकिन वो वाली जमघट का अभाव है ,जहां हर युवा और बुजुर्ग शाम को वहां जरूर पहुँचते, समोसा, नमकीन और चाय के लिए।  हम मित्र अक्सर नमकीन के साथ हाफ चाय से ही काम चला लेते थे, हाफ चाय या कट चाय उस समय का एक प्रचलित फैशन था,हर दिन का चाय के पैसे देने की बारी अलग अलग लोगो की होती थी। वास्तव में चाय न भी पिये तो वहाँ पहुँचना एक आदत में सुमार था। बाद में वही एक क्लब बन गया था फ्रेंड्स सोसायटी, जहां बैठकी होती। और कैरम चलता।
 ऐसे ही एक शाम हम मित्रो के संग गप्प में मशगूल थे कि तभी  एक  बस ओबरा से बनारस जाने वाली आकर रुकी।  रुकते ही दो तीन लोग एक 12 साल के बच्चे को चोर चोर कह कर पीटने लगे, देखते देखते पूरा भीड़ उसपर टूट पड़ा, जिसे मौका मिला हाथ साफ करने लगा। मेरे साथ मित्र  Rajesh Sharma  भी था हमलोगों ने उस लड़के को घेर कर खड़ा होगये, जोर से चिल्लाया ,""पहले बताओ चोरी किसकी हुई?किसकी पाकिट मारी गयी ?"लोग एक दूसरे को देखने लगे  कुछ क्षण बाद एक सज्जन ने बोला मेरा जेब कटा है,!राजेश न पूछा कितना पैसा था आपके जेब मे ? 300 रुपये उस सज्जन ने कहा ,  फिर हम लोगो ने कहा इसके कपड़े और जेब चेक कीजिये? चेक किया लेकिन पैसा उसके पास नही था। फिर हमने कहा , अनायास ही आप सब इसे क्यूँ मारे जा रहे हो??
भीड़ में किसी ने कहा कि ये सब(यानि हम लोग) भी मिले हुए है!फिर हम लोगो ने उसे अपना परिचय दिया ,और उसने भी धमकी देते हुए बोला कि कभी ओबरा में दिखना तो बताऊंगा। खैर हम लोगो की हस्तक्षेप से उस कथित चोर लड़के की जान तो बच गई , अन्यथा भीड़ की पिटाई से जान भी जा सकती थी।  पता नही वो कौन था? लेकिन सजा की भी एक सीमा होती है, मैं दावा नही कर सकता की वह  निर्दोष था या उसके और भी साथी रहे हो लेकिन  उसका भाव दयनीय था, वह जान की भीख मांग रहा था ऐसे में उसका जान बचना जरूरी था। गुस्से में किसी का जान लेना कौन सी बहादुरी है। काश पालघर ने भी कोई खुद पर रिश्क लेकर इन साधुओं  की जान की भीख मांगने की करुण विलाप सुन लिया होता तो शायद देश के सिर इतना बड़ा कलंक नही लगता। भीड़ का एक अलग मनोविज्ञान होता है ,उसमे सावधानी से अपनी बात भी रखनी चाहिए , किसी को तो रिस्क लेना ही पड़ेगा।
©nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 22

#मेरा_एकांतवास 22
  शांत क्लांत और सन्नाटे  में यह बात  मनमस्तिष्क में हलचल मचा रखा है कि कैसे कुछ लोग दो साधुओं को पीट पीट कर मार डाला। एक निरीह  जन पर लाठी डंडे से ताबड़ तोड़ हमला ,वो भी तब तक जब तक वह मर नही गया, पुलिस के हाथ पकड़ कर इधर उधर भागते रहा शायद पुलिस के सहारे जान बचाना चाह रहा था, लाचार पुलिस भी कुछ नही कर पाया , वह भी वर्दी में भी एक इंसान ही था , उसे भी मौत ने घेर रखा था। आखिर यह उन्माद क्यूँ था। दो साधु गाड़ी से ड्राइवर के साथ अपने गुरु के मृत्यु पर आखिरी दर्शन को जा रहे थे, आश्रम से निकलने से पहले दूर दूर तक इस हदशे का आशंका भी न रह होगा।   इतना सोच होगा कि कोई पुलिस रोकेगा तो इनकी गेरुआ वस्त्र में सरल जीवन उसे भली भांति बता देगा कि वह लॉक डाउन में क्यों निकला है, उसे विश्वास था कि चेक पोस्ट पर वह बच निकलेगा , लेकिन आम जनता ही इस निरीह लोगो का दुश्मन हो जाएगा यह तो सम्भव ही नही था, आज सम्भव होकर देशवासियों के लिए हतप्रभ हो गया। तनिक सोचिये जान निकलने तक कितना शारीरिक और मानसिक वेदना सहना पड़ा होगा।
वास्तव में भीड़ का एक अलग मनोविज्ञान होता है, भीड़ का उन्माद आसानी से नही रोका जा सकता। उन्माद अपने लक्ष्य तक पहुचे शांत नही होता।   यह घटना शायद एक बड़ी जनसंख्या को उन्मादी भीड़ बना दिया है,  आज इस तरह के शक्ल सूरत वाले भीड़ देखकर सहसा ही भय उतपन्न करता है , जरूरी नही कि सभी भीड़ उन्मादी हो। लेकिन अपने ही देश मे हर जगह सुरक्षित घूमना मुश्किल होने लगे तो चिंता का विषय है।   कानूनी प्रावधान देश मे सजा दिलाने में  दुरूह कार्य है , तब तक न जाने कितने  नई घटना न हो जाये।  तारीख और जिरह के बाद न्याय आते आते हम सब भूल जाते है। यह उन्माद का भीड़  योजनाबद्ध है या अनायास??  अगर किसी योजनाबद्ध है तो निश्चित ही एक बड़ा तबका उन्मादी हो रहा है , फिर तो कानून को सख्त होना पड़ेगा।  लोगो मे विश्वास की जड़ को मजबूत के बनाने के लिए  भरपूर प्रयास करना चाहिए। आम नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए। घटना पर राजनीति समाज मे जहर घोलना है, और चुप रहना घटना का मौन समर्थन है। न जाने हम कब सच स्वीकार करने के लिए तैयार होंगे, कब तक वोट के खातिर दलालों के चंगुल में फंसते रहेंगे। हमे अपनी आजादी कब मिलेगी।  जब हम अपने देश को अपना ही कह सके। उम्मीद है  लोग  सहानुभूति पूर्वक स्तिथि सामान्य कर सके। प्रतिक्रियात्मक की जगह स्वीकारात्मक विचारधारा का प्रवाह हो। अन्यथा हम अपने ही देश मे लाचार होकर रह जाएंगे।अखंडता, निर्भीकता , सहानुभूति ,समरसता सब तार तार होने लगेगी, भय में जीना किसी देश की जनता के लिए गुलामी से अधिक पीड़ादायक है। हमे भय से बाहर निकलकर जीना पड़ेगा। यह काम केवल और केवल चुनी हुई सरकार ही कर सकती है बिना किसी लाभ हानि पर विचार किये।©nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 21

#मेरा_एकांतवास 21
 गांव जीवों का सम्पूर्ण दुनियां होता है ,जबकि शहर का जीवन टुकड़ो टुकड़ो में होता है।शहर में सुखों का रसास्वादन हम चम्मच में कर पाते है जबकि गांव खुशियों का दरिया है। शहर में बदलते परिवेश के आनंद लेते है जबकि गांव वालों के लिए वो चकाचौन्ध लगता है, चकाचौन्ध देखना तो चाहते है लेकिन उसमें रमन नही चाहते। उन्हें सदैव भय बना रहता है कि कहीं इसमे हमारी पीढियां गुम न हो जाये। गांव के जीवन मे पेड़ पौधे से लेकर हर जीव के लिए हृदय में स्थान रहता है जबकि शहरी को ब मश्किल खुद के लिए  चिंता करने में पेशोपेश होना पड़ता है। प्रेम का वास्तविक स्वरूप भी गांव में ही दर्शन होते है ,शहर में तो प्रेम व्यावसायिक ही होता है, वर्षो का सम्बन्ध चंद रुपये के लिए तार तार हो जाता है। शहर हम सम्पन्न होने को जाते है लेकिन गांव हम जीने के लिए रह जाते है, जहां अपनी पुरखो का इतिहास  कण कण में बिखरा पड़ा है।  हर वो व्यक्ति जिसका जड़ कभी गांव से जुड़ा रहा है, अपने बच्चों में बड़ा चाव से कहानियां सुनाता है ,लेकिन कान्वेंट शिक्षित बच्चों को वो दकियानूसी लगता है, बोर होने लगता है।  भारत के हर गांव में लगभग एक जैसी ही कहानी रही है, इसलिए जब मैं अपनी गांव की किस्सा शुरू करता हूँ तो सभी को अपने जैसा ही लगता है। वो धूल उड़ाती पगडंडी। किसी भी वातानुकूलित से ज्यादा शीतल आम का बगीचा, पीपल का पेड़ और उससे जुड़े दर्जनों कहानियां। बांस की झुरमुट  जिसमे दिन में भी लोग डर कर रखते थे, वो कुँआ जिसका पानी आज की विसलेरी से ज्यादा शुध्द होता था।  हर गांव में आधा दर्जन से भी कम पेट्रोमेक्स जिसे एक दूसरे से मांग कर उत्सव में काम चलाया जाता था, पेट्रोमेक्स का जलना यानि कुछ खास बात होना। हर गांव में कम्युनिटी शामियाना   जिसे जरूरत पर उपलब्ध कराया जाता था, गुलाबजल का फब्बारा भी गांव में एक दो ही होता था, इसी तरह पालकी, चवर, बैलगाड़ी, और शाही ड्रेश भी सभी लोगो के लिए कम्युनिटी ही होता था।  
आज से ज्यादा गरीब होते थे ग्रामीण , लेकिन  भूख से मरने की घटना कम ही होता था, किसी का अकाल मृत्यु सम्पूर्ण गांव के लिए अशुभ माना जाता था, गांव में आने वाले विपदा,प्राकृतिक प्रकोप भी किसी अपराध या पाप का  प्रतिक्रिया समझा जाता था।
एक बार मेरे गांव के कुछ लोग बंदर के आतंक से परेशान हो गए ,फिर किसी तरह दो बंदरो को पकड़ कर उसे जिंदा ही जमींदोज कर दिया गया, यही कोई 1983 का अप्रैल का महीना था ,घटना के एक सप्ताह के अंदर ही गांव में जोरदार आंधी तूफान के साथ 250 ग्राम तक के ओले पड़े , सम्पूर्ण गांव के खपरैल छत बर्बाद हो गया, कई पेड़ पौधे उखड़ गए, किसानों का रवि फसल बर्बाद हो गया, इन सब मे एक खास बात यह थी कि सारी आपदा मेरे ही गांव की सीमा तक थी। आस पड़ोस के गांव के किसी छत को कोई नुकसान नही हुआ। बुजुर्गों ने उस बन्दर का जमींदोज करने की सजा बताया।  विज्ञान और मौसम का कुछ भी कारण हो ओले गिरने का लेकिन गांव वाले अपनी गलती भी सहज स्वीकार कर लेते है ,ये एक बड़ी बात थी ,  काश आज भी हम अपनी गलती को सहजता से स्वीकार कर लेते तो शायद बहुत सारी मुसीबतों से बच जाते।©nitesh
क्रमशः

बहुत मजबूत हो गया हूँ मैं


सुनो तो!!!
बहुत मजबूत हो गया हूँ मैं
जिन जिन बातों से डराते थे तुम 
उन सब पर विजय प्राप्त कर लिया हूँ मैं
तन्हा रहना और मुस्कुराना 
खुद से खुद की बाते करना 
अपनी अनुशासन खुद तय करना
हर एक पल में खुशियां तलाशना
प्रतिपल खुद के लिए कुछ काम तलाशना
इन सबसे अपने लिए कुछ पाना
बैगेर किसी की तन्हा जीना सीख लिया हूँ मैं
चिड़ियों के संग जगना 
तारो के संग सोना 
खुली हवाओ में जी भर कर उछलना
तेज धूप में तपाना
पेड़ो की छांव में  गहरी सांस लेना
व्यंजनों की भरमार 
जो खुद से किया था तैयार
इन सब से तृप्त मानव हो गया हूँ मैं
न उम्मीद न अपेक्षा न ईर्ष्या न द्वेष
न मोह न लिप्सा न लोभ न तृष्णा
न आने जाने का दुख ,न भविष्य की योजना
प्रकृति की नियमो में बंध गया हूँ मैं
सुनो तो
बहुत मजबूत ही गया हूँ मैं
©nitesh

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

जिक्र

(1)
किन किन बातों का जिक्र करूँ
हर पाँवदान पर फिसलता रहा हूँ
कभी अभाव से 
कभी किसी की प्रभाव से 
कभी खुद की स्वभाव से

(2)
उम्मीद ने कभी हार नही माना
यूँ हम बिखर जाएंगे 
कभी सोचा तो नही था
तुम जानो या न जानो
दोस्तों और दुश्मनों के दिल मे
यूँ हम सवँर जाएंगे 
ये भी कम तो नही था

(3)
जब जब तुम ईर्ष्यालु हुए 
मुझे लगा कुछ तो है मुझमें
तुम मेरी चर्चा सरेआम करते रहे
मैं  मित्रो की परीक्षा 
अमित्रों की धैर्य पर खड़ा उतरता रहा
फिर तो अफवाहों ने भी जम कर कहा
कुछ तो है अब तुझ में

(4)
तुम बहुत बहुत सुंदर लगती हो
तस्वीर की तरह
तेरी मुस्कुराहट तेरी अदा 
क्या उम्दा है 
तकदीर की तरह 
हर किस्सा दूर का ही पसंदीदा होता है
अपना  किस्सा भी  होता है
किसी राहगीर की तरह।
©nitesh

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 20

#मेरा_एकांतवास 20
शायद अब कुछ लोगो को ही याद होगा कि  गेहूं या मक्का से आटा बनाना आज की तरह आसान नही था,  बड़े सवेरे उठकर महिलाएं  महिलाएं घरों मे हाथ से चक्की  चलाती थी ,  मुट्ठी भर अनाज दाल कर उसे पिसती रहती , कभी कभी एक ही चक्की को दो महिला मिलकर चलाती थी , साथ मे सुबह सुबह कुछ गीत भी गाती थी, ताकि काम करने में मन भी लगता और खुशी भी मिलती। इसी तरह से धान को ओखली या ढेंकी जो पैर से चलाई जाती थी उस से चावल निकाला जाता था,यानि धान कूटा जाता है, ऐसे ही चूड़ा की कुटाई छटाई होती थी,  बाद में मेरे गांव में एक सम्पन्न परिवार ने आटा पीसने की चक्की और धान कूटने का मशीन  लगाए,  इसमे भी थोड़े सक्षम लोग ही गेहूं धान पिसवाने या कुटवाने जाते थे, बांकी लोग हाथ चक्की का ही उपयोग करते। लोग अपनी गेंहू या धान मील(चक्की) पर रख आते।  जैसे ही मील चालू होता  लोग भाग कर मील तक जाते ताकि गेंहू पीस जाये। इस आटा चक्की वाले मील की खास बात यह थी कि उसके साइलेंसर पर एक डिब्बा लगा रहता जो कू कू की आवाज करता, और पूरा गांव समझने लगता कि  चक्की चालू है।यही चक्की का पहचान था और गांव की सम्पन्नता का द्योतक भी। उस समय चक्की चलना बड़ी व्यवसाय माना जाता था, बाद में तो हर टोले मुहल्ले में चक्की स्थापित हो गया जिस कारण गांव का पुरातन चक्की बन्द हो गया ,और ये व्यापार उस परिवार के लिए सामान्य बिजनेस हो गया जो स्टेटस के विरुध्द था। लेकिन आज भी चक्की का कू कू का आवाज गाँव मे होने का प्रतीक था, यह गांव का आवाज था जो आज के शोरगुल में कहीं गुम हो गया है।©nitesh
क्रमशः

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

वक़्त तो लगता है

गीली मिट्टी को सूखने में वक़्त तो लगता है 
वक़्त को बदलने में थोड़ा वक्त तो लगता है

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 19

#मेरा_एकांतवास 19
 सरकारी क्वार्टर और उसकी कालोनी का एक अलग संस्कृति होती है , न तो शहर जैसा न ही गांव जैसा। लेकिन उसमें भी सम्पूर्ण भारत मे रेलवे कॉलोनी की रहन सहन और संस्कृति लगभग एक जैसी ही है। अधिकतर रनिंग स्टाफ होते है ,कुछेक इंजीनियरिंग स्टाफ, लेकिन सब मे समानता यह कि छोटे छोटे कमरे में एक बड़ा संसार बसा लेते है,  अलग अलग प्रदेश से आये हुए , विभिन्न मजहब, जाति, रंग रूप, विभिन्न ओहदे वाले सभी कालोनी में एक परिवार जैसे बन जाते है। चाचा, चाची, भैया, दीदी,  गोलू,भोलू, लड्डू डब्बू, सब एक जैसे  शब्द गूँजने लगते है,  जब मैं रेलवे कॉलोनी में बाबूजी के साथ रहने आया तो , लगा मेरे अभिभावक केवल पिताजी ही नही सम्पूर्ण कालोनी के वो लोग है जो बाबूजी के साथ ड्यूटी करते है, सबका आदर  अपने परिवार के सदस्य जैसा ही करना पड़ता,  सबके सामने अलग से फैशनेबुल बनना या तेज आवाज में बोलना भी मुश्किल ही था, शायद यही कारण था कि कोई बुरी आदत या नशा पत्ती नही सीख पाया। बाबूजी के साथ मैं अकेले रहता था, पढ़ने के खातिर । उस जमाने मे कई चीज आज की तरह उन्नत नही था, खाना बनाने के लिए प्रतिदिन कठिन प्रयोजन करना पड़ता। लोहे के चादर से बना चूल्हा में अंदर की तरफ मोटी परत की मिट्टी चढ़ाई जाती थी  ,जिसे प्रतिदिन गीली मिट्टी से पोता जाता था ,फिर उसमें थोड़ा सा मोबिल युक्त जुट डाला जाता था , जो रेलवे से ही निकला कबाड़ रहता था ,उस जुट के ऊपर चार से छः लकड़ी डालकर कोयला बोझ दिया जाता था फिर नीचे से आग लगा दी जाती थी , कोयला का धुंआ खत्म होने तक इंतजार करना पड़ता था, आंच आने पर झटपट खाना बना लेने की जल्दी होती थी, बिना कुकर दाल भी देर से बनती थी, इसलिए अरहर की जगह मूंग मसूर का दाल ज्यादा पसंद था,। कभी खाना बनाने के बीच मे आंच कम हो जाये तो फिर कोयला डालना पड़ता और कमसे कम 30 मिनट के बाद ही पुनः आंच आता। ऐसे में खाना बनने में बिलम्ब हो जाता। ऐसे अवसर पर अक्सर बाबूजी से डांट सुनना पड़ता। ज्यादा व्यंजन के लिए दो चूल्हा जलाना पड़ता, बाद में तो डांट से बचने के लिए एक्स्ट्रा चूल्हा बोझकर रखा रहता था।
रात को खाने के बाद टहलना एक रूटिंग था, इसी दौरान खाश मित्रो से गप्प करते समय ही नही पता चलता। उस समय पढ़ने का टाइमटेबल खाने से पूर्व का ही होता था , या फिर सुबह सवेरे, आज कीतरह  मजदूरों की तरह पढ़ाई करने वाले कम ही होते थे,फिर मैं तो औसत विद्यार्थी ही था। कालोनी में बड़े पुरुष महिला जो चाचा चाची थे उनका प्यार किसी कीमत पर अपने माता पिता से कम नही था,  एग्जाम के समय तो कई लोग अपने घर मे मुझे बुलाकर खिलाते।
कालोनी में खेल भावना भी सभी को एक सूत्र में बांधे रखता, हर युवा किसी न कि किसी खेल से जुड़ा रहता, कुछ आलसी मेरी तरह सांस्कृतिक कार्यक्रम में व्यस्त रहते । आखिर कालोनी में इसकी भी जरूरत रहती थी। चार आना ,आठ आना चंदा करके  खेल मैदान में पर्दे पर फ़िल्म दिखाने की व्यवस्था भी कर लेते थे। एक फ़िल्म को किराए पर लाते लेकिन कुछ रेलवे के पार्सल वाले चाचा जी के सहयोग से सिनेमा हाल तक जाने वाले रील को भी पहले यही देख लेते। यानि एक रात में दो फ़िल्म देखते। फ़िल्म देखने के लिए चटाई या टाट लेकर पहुंचते।  चंदा में पैसा कम पड़ता तो मुंगफली बेचने वाले दुकानदार से भी टैक्स वसूल कर लेते।  कालोनी ग्राउंड में फ़िल्म देखने का वो अंदाज आज के किसी भी मॉल संस्कृति से बेहतर और रोचक हुआ करता था।वो था बचपन....!@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 18

#मेरा_एकांतवास 18
 किसी जमाने मे गांव की समझ , संस्कार, संस्कृति, शिक्षा , अनुशासन आज की शहरों से बेहतर हुआ करता था। लोगो मे एकरूपता होती थी ,सामाजिक कार्य मे बढ़ चढ़ कर  भाग लेते थे, इन्ही सामाजिक सरोकार की अनुपम कृति थी गांव का एक पुस्तकालय। मिट्टी और  मिट्टी के गारे से जुड़ा इट के पाए पर खड़ा एक विशाल भवन । बीच मे एक बड़ा हाल, दोनों तरफ दो कमरा, भवन के दोनों तरफ 60x 10 फिट का बरामदा, साथ ही 2 विस्वा का कैम्पस। 60 की दशक में इसे गांव के जन सहयोग से तैयार कराया गया था, किसी ने जमीन दिया ,किसी ने श्रम दान किया,  किसी छप्पर के लिए लकड़ी, बांस तो किसी ने खिड़की दरवाजा। उस समय के युवा इसे बड़ी शिद्दत से तैयार किये थे। बहुतेरे ज्ञानवर्धक, मूल्यवान पुस्तक भी रखा गया था , लोग पढ़ने भी आते थे। बाद में शायद एक होमियोपैथिक के डॉक्टर को भी रखा गया था। समय बदलते गया कुछ दिन तक उसमे  एक स्कूल भी चला , लेकिन सामूहिक सोच से बनाने वाले युवा अब बुजुर्ग हो चले थे, नई सोच के नई पीढ़ी को शायद इसकी जरूरत नही समझ आई। और एक समय ऐसा निर्धारित हुआ कि किसी ने खिड़की उखाड़ा, किसी ने दरवाजा, आते जाते लोग एक एक ईट भी लेते गए ,  फिर इसे गिरने दिया गया,और विशाल भवन धराशाही हो गया,लोग छप्पर का खपड़ा और लकड़ी बांस तक भी उठा ले गए, गांव के प्रतिष्ठित जिम्मेदार मूक देखते रह गए। जिन लोगो ने जमीन दिया था उसकी तीसरी पीढ़ी ने उस जमीन को एक दूसरे को बेच दिया, इसतरह एक सामूहिक सोच वाली श्रम का धरोहर नष्ट हो गया। अब तो नई पीढ़ी शहरी हो गया है इसलिए शायद इस तरह के सामूहिक  या कम्युनिटी वर्क की जरूरत समाप्त हो गयी है, हम नितांत स्वयं में सिमट कर रह गए है। निजी लाभ ही सर्वोपरि है। धन्य थे हमारे पूर्वज जो अपनी भावी पीढ़ी के लिए अच्छी सोच रखते थे लेकिन आज की पीढ़ी  इस धरोहर का कद्र करना भूल गयी। तभी तो हम अक्सर कहते है अब गांव भी शहर से बदतर है।©nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 17

#मेरा_एकांतवास 17
बाबा के परलोक सिधारने के बाद मैं धनबाद से वापस गांव रहने आ गया था, यही कोई 11 वर्ष की उम्र रही होगी। गांव की आबो हवा मेरे लिए अचरज भरा था, चावल कैसे बनता है उस समय तक नही जानता था, बाद में तो शनै शनै यह भी जानने लगे कि मडुआ की खेती कैसे होती है, महुआ कैसे बिना जाता है,बहुत जल्दी ही अल्प उम्र में ही खेती किसानी भी जान गया था,  सब कुछ हल बैल और  मजदूर पर ही निर्भर था , हाँ,उस समय हर व्यक्ति का अपना मजदूर होता था खेती करने वाला ,बदले में उसे कुछ खेत और मजदूरी में अलग से भेंट भी मिलता था , जिसे  डिक्शनरी में बंधुआ मजदूर कह सकते थे। उस समय कृषि उपज आज की तरह उन्नत नही था, उस पर बाढ़ और सूखा लगभग हर तीसरे साल तबाह कर जाता था, दो जून के भोजन आज की तरह तो कत्तई नही मिलता था,  कुछ धनाढ्य शायद  दो तीन प्रकार के सब्जी खा लेते हो ,अन्यथा आम घरों में मेहमान आने पर ही ऐसी व्यवस्था हो पाती थी।  मिथिला में चूड़ा दही एक सामान्य और प्रतिष्ठित रेडीमेड भोजन था, लगभग हर घर मे यह तैयार रहता था, मेहमान का सबसे त्वरित स्वागत इसी से होता था,  मुझे इसका स्वाद प्रसाद के रूप में लगा। हर गांव में एक दो ठाकुरबाड़ी होता था, जहां नित्य सुबह शाम भोग लगाई जाती थी।मेरे घर के पड़ोस में एक ठाकुर बाड़ी था, शाम के भोग की जैसे ही घण्टी और शंख ध्वनि बजने लगता मैं ठाकुर बाड़ी की ओर भागता। भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी.... सुर में मिलाकर गाने लगता , कभी घण्टा या घण्टी भी बजाने लगता। फिर हथेली पर प्रसाद में 50 ग्राम चूड़ा दही और गुड़ और तुलसी दल मिश्रित मिलता।  वो प्रसाद मेरे लिए अमृत समान होता, मन की जितनी तृप्ति इस प्रसाद से होती  उतना किसी भी व्यंजन से नही । यही कारण है कि आज भी गांव से लेकर शहर तक मे जब  चूड़ा दही को भोजन के रूप में ग्रहण करता हूँ  तो वह ठाकुर जी का प्रसाद ही समझ मे आता है , बचपन मे मनमस्तिष्क में बैठा सम्बद्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत मुझे आज भी चूड़ा दही प्रसाद स्वरूप ही लगता है, हो भी क्यूँ न , इससे शुध्द कोई भोजन भी नही होगा । केले के पात पर चूड़ा हो ,दही हो, गुड़ या चीनी हो , साथ मे रसगुल्ला हो तो मिथिला का अप्रतीम भोजन कहलाता है, हर शुभ अवसर पर यह आज भी सर्वोच्च भोजन है, अब मौसम के अनुसार इसमे अचार, आम , सब्जियों को भी जोड़ दिया जा रहा है लेकिन रसगुल्ला इसका पर्याय अवश्य है। आप अगर मिथिला में जाये तो दही चूड़ा अवश्य खाये, चूड़ा दही से बेहतर है दही चूड़ा। जिसमे दही की मात्रा अधिक और चूड़ा की मात्रा कम होता है।
©nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 16

#मेरा_एकांतवास 16
 लॉक डाउन का प्रथम चरण अब समाप्ति की ओर है ,दूसरा चरण निश्चित ही प्रारम्भ होना है।, कमोबेश दुनिया घरों में सिमट गया है,  संशय , भय के बीच अपनी उम्मीद बनाये रखने के जद्दोजहद में जन्दगी अन्तर्द्वन्द में उलझा हुआ है, यह 21 दिनों में हर व्यक्ति की अपनी कहानी है, कुछ का उत्साहित हो सकता है लेकिन बहुतेरों के जिंदगी में मनोवैज्ञानिक बदलाव भी होने वाला है। ऐसे में मेरा अपना एकांतवास स्व में सिमटने वाला रहा है। नितांत अकेला ,प्रातः संध्या वेला में कुछ मानव दिख जा रहे थे ,चार मंजिल का मकान , जिसके भूतल पर मेरा निवास , लॉक डाउन के साथ सभी  घर बन्द कर अपने गंतव्य को चले गए ,  ,14 दिन बाद एक परिवार जो अपने मुखिया की आकस्मिक मृत्यु के बाद  सभी सदस्य क्रिया कर्म  के लिए गांव की ओर विदा हो लिए।  4000 वर्ग फिट के कैम्पस में अकेला तन्हा, न कोई आने वाला ,न ही कोई खोज खबर के लिए पूछने वाला। सवेरे से खुद को प्रेरित करना , कुछ बनाकर खा लेना,  फिर इस कमरे से उस कमरे भटकना , शुरू शुरू में  स्थिरता करने की कोशिश  किया था परन्तु प्रतिदिन का बढ़ती  कोरोना पोजेटिव की संख्या, और कुछ खास लोगो की लापरवाही चिंता का सबब बनने लगा, फिर खुद के समक्ष अकस्मात एक मृत्यु    जिन्हें मैंने ही अस्पताल पहुचाया था ,  मनः स्तिथि को एक दम से झकझोर दिया था , और अब तो शायद  एकांत में यह सच स्वीकार करने भी लगा, भय जैसी तो कोई बात नही परन्तु जीवन की वास्तविकता का दर्पण सदैव मुंह चिढ़ा रहा है,  जिस जीवन की  महत्व को कितना ही अहंकार से सजा रखा जाता है वह वास्तव में  एक दम पतली शीशा से भी कमजोर है , एक दिए की तरह है जिंदगी एक हल्की सी हवा का झोंका इसे बुझा सकता है।और इसे बचाने में कोई नही होता आपका अपना , आप स्वयं जलते है और बुझ जाते है, यह  संग्रह, मोह , अपेक्षा सब निरर्थक है । जीवन और मृत्यु  की जंग में हर आदमी जब हलकान हो तो ऐसे में अपना ही जीवन महत्वपूर्ण होता है, ऐसे में आप नितांत अकेले होते है, आम जीव की तरह आप इस धरती पर अकेला ही आना हुआ था और  जाना भी अकेला ही होगा, तो अकेला जीना मुश्किल कहाँ है।  इस 21 दिन में मुझे एकांत का एक मजबूत सम्बल मिला है ,  यह एक अमूल्य धरोहर है , स्वयं पर विजय प्राप्त करने की चरणबद्ध प्रक्रिया है ।  अगला चरण भी बेहतर होगा , मानव जीवन अपनी मूल स्वभाव में लौट आए यही उम्मीद है ।हाँ इन दिनों में मैं आध्यात्मिक तो नही अपितु प्रकृतिवादी हो गया हूँ।©nitesh
क्रमशः

रविवार, 12 अप्रैल 2020

तनिक फासले से चलना

मौत का मौसम है सम्भलकर रहना 
हर कोई संदेह में है 
तनिक फासले से चलना
कभी सोचा न था तेरे कदम रोक दिए जाएंगे
सहमा हुआ होगा चौखट
बाहर मौत मंडराएंगे
किसी के लिए चीखना भी गवारा न होगा
खुद की मौत पर एक कतरा भी न बहेगा
आज दहशत में है ये सारे साजो सामान 
न जाने किस पर मौजूद हो मौत का सामान 
हर तरफ दुश्मन मौत लिए खड़ा है 
इन वादियों से भी बचकर रहना
हर कोई संदेह में है
तनिक फासले से चलना
©nitesh

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

पूछ तो लो

बहुत तन्हा हूँ एक बार पूछ तो लो
अभी कोरोना से बचा हूँ
एक बार पूछ तो लो
हाल चाल लेने से नही फैलता 
ये वायरस
तेरा खबर ही जानना चाहता हूं
एक बार पूछ तो लो
अतीत के कई चित्र  उभरते है प्रति क्षण
हर बार उसमे तुम्हे ही देखता हूँ
एक बार पूछ तो लो
हर शख्स सिमट गया है घर मे 
सबको सबसे डर है
मैं तुमसे अब भी डरा नही हूँ
एक बार पूछ तो लो
कल शायद कुछ भी हो जाये
काल निकट भी आ जाये
शायद तुम्हे पता भी न चले 
इत्तला किये देता हूँ
एक बार पूछ तो लो
बहुत तन्हा हूँ 
एक बार पूछ तो लो
©nitesh

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 14

#मेरा_एकांतवास 14
आप कितना भी अपनी आत्मबल को मजबूत बनाये, कठोर और धैर्यवान बनने की कोशिश करें लेकिन सम्वेदनाओं को झकझोरने वाली घटना जल्दी मनस्थिति से मुक्त नही होता।, उन्हें  इस आपात स्तिथ में  मैं रात्रि 8 बजे के आसपास इरजेंसी में BHU अस्पताल छोड़ आया था, वापस आने पर बैचेन सा खुद को महसूस कर रहा था, नींद तो मुश्किल ही था। तभी रात को दो बजे एम्बुलेंस से उनका मृत शरीर आया। साथ मे थे एक पत्नी जो अभी अभी विधवा हुई थी, एक किशोरवय बेटा, और एक विधवा मां,इनसब के साथ मे एक दूर के बुजुर्ग रिस्तेदार। मेरे सामने की बरामदे पर उन्हें लेटा दिया गया जिसे बॉडी कहकर पुकारा जाने लगा।  रात के इस क्रूर अंधेरा में कोई नही आया , मां और पत्नी दो विधवा सुबक कर रो रही थी, बेटा हिम्मत बनाये हुए था। ।वो रिस्तेदार वही जमीन पर बैठ गया सुबह तक के इंतजार में, शव के अंतिम संस्कार के लिए कुछ अपने करीबी रिश्तेदार के इंतज़ार में इन्हें 70 किलोमीटर दूर से आना था , लॉक डाउन में परेशानी की सबब थी। दो बेटे में बड़े बेटे को पिछले साल उन्होंने अमेरिका भेज दिया था। छोटा साथ मे था ही।
मैं क्या करता !!पहले ही एकांतवास में था और अब !!मेरे सामने मृत शरीर पड़ा था सुबह होने में 4 घण्टे बचे थे ,  बस मुझे निहारना ही था,  मूक !!! मृतक के किस बात का चर्चा इन परिजनों से करके इन्हें ढांढस बंधाता!!! वो प्रोफेसर थे,दो लाख से अधिक का वेतन था, दो आलीशन अपार्टमेंट्स नुमा घर बनवाये थे, जिससे एक लाख की अतिरिक्त आमदनी थी। विदेशों में गेस्ट प्रोफेसर  का काम भी कर लेते थे जिससे साल के 7 से 10 लाख अतिरिक्त जुटा लेते थे। धन का संग्रह उनका बहुत बड़ा शौक था।  उन्हें अपने करीबियों में धनवान होने की प्रतिस्पर्धा थी। लेकिन भोग नगण्य था , कहते थे भोग में व्यस्त हो जाऊंगा तो क्या बचेगा।  साधारण भोजन तक कि कटौती रहती थी। अभी तक कि 20 साल की नॉकरी में उन्होंने साइकल या फिर पुरानी मोटर साइकिल से ही काम चलाये, 5 साल से ऊपर हो गया होगा कि कोई नया कपड़ा सिलवाया हो उन्होंने, मितव्ययिता की सीमा से बहुत आगे निकल गए थे, सुख साजोसामान की कोई वस्तु नही रखते। अभी तक वाटर फिल्टर की जरूरत नही समझा। समाजिक सरोकार भी नगण्य था, तीज त्योहार पर भी न किसी के घर जाते न कोई आता। कसी रिस्तेदारो को भी कभी कभार आते नही देखा। आसपड़ोस से तो सम्बन्ध बिल्कुल ही नही था। 6 साल पहले डाइबिटीज,हो गया था, ब्लडप्रेसर भी था, लेकिन दवा लेने और परहेज से बचते रहे, नतीजा किडनी फेल हो गई, विभागीय इलाज चलता रहा। विभाग की ओर से उच्च चिकित्सा के लिए मेदांता रेफर किया गया लेकिन वहाँ डॉक्टर से मिल भर आए ,भर्ती नही हुए कि यहां तीमारदारी कौन करेगा, और तीमारदार का खर्चा बढ़ जाएगा, मजबूरन सप्ताह में दो दिन डायलेसिस होने लगा। चारपहिया गाड़ी से डायलिसिस के लिए अस्पताल जाना खर्चीला लग रहा था सो प्रति 3 दिन पर  मोटरसाइकिल से जाते और डायलेसिस करवा कर चले आते। उस दिन जब अधिक रक्तस्राव होने लगा था तो मैं ले गया था अस्पताल ,लौटने पर बताया था कि 8 साल और जी लेता तो बच्चों के लिए कुछ और ठीक व्यवस्था हो जाती!!अपनी चिंता अब भी नही थी। और अब ...मिट्टी का ढेर पड़ा था , सभी ऊंची ऊची लक्ष्य,ख्वाहिशें, महल, बैंक बैलेंस, रसूख, अमीर बने रहने का कल्पना , लोगो से आगे दिखने की चाहत ...सब मेरे सामने ही राख बना पड़ा था।  मुझे लगा कि एक बार पूछ लूं कि इन अपार धन से आपको कौन सा सुख मिला, दुनिया मे शायद आप कुछ दिन और जी सकते थे , दुनिया को देख सकते थे अपनो को देख सकते थे। जितना दिन आपने जिया उतने दिन अपनी कमाई धन से कौन सा सुख लिया??जिसकी प्रतिस्पर्धा में आप आगे जा रहे थे वो आपके शव के इर्दगिर्द भी नही।जिसे सुख देने की चाहत थी, जिसके लिए संग्रह कर रहे थे वो आज आपके आखिरी समय मे पिता कहकर संबोधित भी नही कर सका।ये धन ये वैभव किस काम का। सब आपकी ही तरह शव बना पड़ा है।......लेकिन इन तमाम प्रश्नों के उत्तर देने के लिए बचे ही कहाँ थे,मृत, और बेबस शव ।
सवेरा हुआ आसपास के लोग बाहर से ही झांकते चले गए।सबकी जुबान पर यही चर्चा थी, बहुत कमाकर रख गए लेकिन अभाव में मर गए खैर छोटे वाले बेटे को भी नौकरी मिल ही जाएगी।।गांव से पांच लोग आए और दाहसंस्कार के लिए ले गए। 
आज 21 दिन की गृह कारावास में  पूरा देश आत्मावलोकन में है कि जीने के लिए कितनी जरूरते कम है, अधिक परेशान तो हम दिखाने के लिए रहते है। धन का संग्रह भी जरूरी है आपात काल के लिए, कुटुंब की सहायता के लिए, मजबूरों में दान के लिए, स्वस्थ जीवन के लिए। इन सब के बिना उपयोग के धन किस काम का!वह कब तक रुका रहेगा।©nitesh
क्रमशः

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 15

मेरे पड़ोस में एक  प्रख्यात विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहते है,  2 लाख से अधिक का मासिक वेतन है उनका, साल में विदेशों में  शैक्षणिक भृमण से भी 10 लाख जुटा लेते है, मासिक आय के लिए दो बृहद मकान बना रखे है। लाख रुपये उससे भी किराए का धन आ जाता है। लेकिन सादगी की परकाष्ठा  शायद इनसे अधिक कहीं न हो, आज भी 20 साल पुरानी मोटर साइकिल या कभी कभी साइकल ही इनकी सेवा करती है , 5 किलोमीटर तक का सफर पत्नी और पुत्र भी पैदल ही करता है,नए कोड़े पछले 10 सालों से नही खरीदे होंगे, घरेलू खान पान में कटौती पर पूरा ख्याल रखा जाता है,  कोई मेहमान न बन जाये इसलिए किसीके घर आते जाते नही। होली दिवाली भी घर के अंदर ही मनाते है,  बिल न बढ़ न जाये इसलिए 5 कमरों में एक ही बल्ब से काम चला लेते है, पड़ोस की महिला की ईर्ष्यावश एयरकंडीशन तो ले आये लेकिन 2 वर्ष में शायद दो घण्टे ही चला हो बेचारा, कभी कभार उनको एक सम्पन्न रिश्तेदार को आता देखता हूँ, कार से, आने साथ अपने पीने के लिए विसलेरी का बोतल और कुछ समोसा साथ ले आते है। गांव पर माता जी को पेंशन मिलता है, उसमे भी वो मांग लाते है कि इतना ज्यादा आपको जरूरत कहाँ है, दो बेटो में एक को अमेरिका भेज दिया है पढ़ने को लेकिन शर्त भी अजीबोगरीब, वहाँ रहने खाने की व्यवस्था खुद की पार्ट टाइम जॉब से करना है, वहीं किसी पैसे वाली लड़की से शादी करनी है, वहाँ ही बसने की कोशिश करना, लेकिन यह लिखित ले लिए कि भविष्य में यह उसके हिस्से में आने वाला मकान सम्पत्ति  का वह उपयोग नही करेगा और न ही बेचेगा, इसी के बदले उसे अमेरिका भेजा गया है। 
 इतनी मितव्ययिता  से परिवार कुपोषण का शिकार तो होगा ही ,  सरकारी टूर के पैसा बचा कर साधारण बोगी में यात्रा करना और  प्लेटफार्म के नल से घर से ले गए बोतल में पानी भर लेना, दो दिन तक घर रोटी और सुखी सब्जी से काम चलाना, यह सब स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव तो छोड़ता ही है। , पिछले कुछ दिन से बीमार रहने लगे, लेकिन किसी से बताने में भी मितव्ययिता बरतने लगे, अब रिपोर्ट आई कि उनके दोनों किडनी फेल हो गयी है। और सप्ताह में दो दिन डायलिसिस हो रहा है, ।  हर दो दिन पर पुत्र के साथ मोटरसाइकिल पर बैठकर जाते है डायलेसिस करवाने और फिर बेसुध उसी मोटरसाइकिल से वापस आ जाते है।,चारपहिया गाड़ी रखे नही है , और भाड़े की गाड़ी मोटरसाइकिल की खर्च से ज्यादा पड़ता है।
कुशल क्षेम पूछने पर उन्होंने बताया कि  बहुत परेशानी है प्रति डायलेसिस 5 से 6 हजार का खर्च है, वो तो मेरा विभाग वहन कर लेता है, वरना तो मैं मर ही गया होता। 8 साल और नौकरी बची है पूरा कर लेता तो बच्चों के लिए कुछ ठीक ठाक व्यवस्था हो जाती, मुश्किल लग रहा है, किडनी ट्रांसप्लांट का सोच रहा हूँ लेकिन सब साथ दे तब न।  बगल में बैठी पत्नी निरुत्तर रहती है, चूँकि किडनी देने का बारी इन्ही की है, चुप!!!फिर कहते है रोज रोज का यह डायलिसिस से यूनिवर्सिटी में पढ़ाने में भी मुश्किल है, किसी तरह 8 साल तो जीना ही पड़ेगा। थोड़ी देर में एक गहरी सांस खिंचकर कहते है , खैर मेरे जाने के बाद भी इसे कोई दिक्कत नही होनी चाहिए , यूनिवर्सिटी में कोई न कोई नौकरी तो मिल ही जाएगी, इस व्यवस्था को मेरी तरह ही सम्भाल ले तो जीवन मे परेशानी नही होगी।......मैं थका हारा वापस घर में कुर्सी पर बैठा सोच रहा हूँ कि जीने केलिए कितने पैसे चाहिए?? संचय और संग्रह जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्या ?जिसके लिए संग्रह कर रहे है उनकी भी तो कुछ जिम्मेदारी होगी  अपने जीवन  के प्रति ! क्या संग्रह का मोह जीवन और भारी पड़ने लगा है, लॉक डाउन ने तो सबको आईना दिखा दिया है कि हमारी मूलभूत आवश्यकता कितना कम है, बाकि तो हम दिखावे या संग्रह के लिए व्याकुल रहते है।  कहते है न धन का तीन ही श्रृंगार है, या तो भोग कर लीजिए, या दान करने की आदत बनाइये या तो वह नाश हो जाएगा, यही संचित धन आपके मृत्यु और मृत्युतुल्य पीड़ा का कारण बनेगा।©nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 15

बाबूजी 17 साल के उम्र ने ही गांव से किसी अपनो के साथ पश्चिम बंगाल चले गए थे नौकरी के तलाश में, अंडाल में उन्होंने रेलवे की नौकरी जॉइन किया ,पूर्व रेलवे में 42 वर्ष नॉकरी करने के बाद  उत्तर प्रदेश  से अवकाश ग्रहण किये,  मुझे मैट्रिक के परीक्षा के बाद बाबूजी के साथ ही पढ़ने के लिए रहना पड़ा ,सो गांव की बहुत सी यादें बन्द पिटारी में ही रह गया।  बाबूजी के निधन के बाद  पिंड दान करने के क्रम में बाबा का भी पिंड दान करवाया गया। मन मे सहसा एक अदृश्य तरंगे उतपन्न हुई।  आज बाबा को भी अनुभव करने का दिन था। छोटा सा था,बहुत कम ही सानिध्य मिला था उनका लेकिन मेरे उपर उनका वात्सल्य वाला प्रेम बहुत छलका था। सवेरे दलान पर अवस्थित कुँआ पर स्नान करवाना , फिर मेरे माथे पर रामनामी चंदन करना, , साथ मे खाना खिलाना और खाने से पहले भोजन पर तुलसी दल रखना नही भूलना!  विदाई के समय डोरी वाला सफेद पजामा सिलवाकर देना, सोनार के पास जाकर 20 पैसे के सिक्का को तुड़वाकर अंगूठी बनवाकर देना,, रामु साहू से एक आना में दो मीठा पान का गिलौड़ी   खिलाना।  समूचे गांव में घूम घूमकर सबसे परिचय करवाकर खुद को गर्वान्वित होना,  और फिर सब की मुराद के अनुसार मुझे कोई न कोई हिंदी कविता सुनाना। भई अंग्रेजी उस समय क्लास 6th के बाद ही पढ़ाई जाती थी। मुझे याद है मेरे उपनयन संस्कार ने कितने व्यस्त हो गए थे बाबा, मेरे पहनने के लिए छोटी धोती के लिए 30 किलोमीटर दूर अपनी रेले साइकल से चलाकर मधुबनी खादी भंडार से लाये थे। ताकि मैं सुंदर बटुक दिख सकूँ। बड़ा गर्व था अपने इस पोते पर ,होता भी क्यों न!घर का सबसे पहला ही सन्तान था अपनी पीढ़ी का। वो आखिरी सम्मान ,प्रेम , आशीर्वाद, और स्वर्णिम स्मरण था, उन्होंने ने ही मेरे उपनयन संस्कार के ब्रम्हा यानी गुरु बने थे। और साल पूर्ण होने से पहले ही चल बसे थे, आखिरी समय मे हम मिल भी तो नही पाए। 57 साल की उम्र में जाना भी कोई जाना था, लेकिन एक अंधविश्वास ने उन्हें दुनिया छोड़ने पर मजबूर कर दिया 22 दिन की साधारण बीमारी के बाद वो दुनिया से विदा लेलिये।

मेरा एकांतवास 13

#मेरा_एकांतवास 13
उन दिनों गांव में घर से दूर अलग एक दलान की व्यवस्था होती थी, पुरुष जन रात का भोजन करने के बाद यही सोने चले आते थे, घर पर पुरुष को ज्यादा समय बिताना सांस्कारिक निषेध था, दिन भर का सारा काम की व्यवस्था भी यही रहता था ,मसलन मवेशी पालना, अन्न संग्रह करना , हल बैल की व्यवस्था करना आदि आदि कृषि कार्य।  कइयो परिवार में खुद का दलान  नही होता था, वहां पुरुष किसी और के दलान पर जाकर सोते या समय बिताते। मेरे परिवार का भी एक समृद्ध दलान था , कच्चा मिट्टी का ही था लेकिन बंगला नुमा,  कई किसान यहां दिन रात अपना समय बिताते हुए उम्र गुजार दिए, आज भी मेरे स्मरण में कई विभूतियों का स्मृति शेष है, बाबा के साथ के  किसान हर जाति के हुआ करते थे लेकिन आपस मे सबसे पारिवारिक स्नेह था, प्रतिदिन रात को भोजन करने के बाद यहाँ आ जाते,  लालटेन की मंद्धिम लौ में ,जाड़े के मौसम में घूर (अलाव) के पास  पुआल के बीड़ा जो बड़ी ही कारीगरी से बना हुआ रहता उस पर बैठ  तम्बाकू रगड़ते, गर्मी में  चौकी, मचान आदि पर दूर दूर बैठा करते , तम्बाकू और सुपारी की कतरन को चूसते हुए पूरी खेत खलिहानी, शादी व्याह, गांव के हर घर का हाल समाचार  पर बातें कर लेते फिर किसी एक को नींद आती और सब सो जाते। फिर सुबह दिनचर्या के अनुसार प्रातः 4 बजे से कार्य प्रारंभ।
अच्छा मैंने भी खूब आनंद लिया है इन प्राकृतिक  संसाधनों का। घर का छप्पर बनना था, अपने यहाँ बांस की  किल्लत थी सो दूसरे गांव से बांस खरीद लाया , ट्रांसपोर्ट के लिए उस समय बैल गाड़ी ही विकल्प था,  कुछ दिन पहले ही मैंने अपनी बैल गाड़ी चलाना सीखा था, गड्ढों वाली सड़क पर हिचकोले के साथ गाड़ी हाँकना आसान काम नही था, आज तो मैं कार भी आत्मविश्वास के साथ सौ की गति में चला लेता हूँ,लेकिन उन दिनों 5 किमी की गति में भी बैलगाड़ी चलाना जोखिम भरा ही था, बता दें बैल गाड़ी का हैंडल या स्टेयरिंग हाथ मे पकड़ा हुआ रस्सी होता है , अगर बाए मुड़ना हो तो बाएं हाथ की रस्सी को थोड़ा आहिस्ते खीचिए बायां जुआ वाला बैल थोड़ा ठिठकेगा और दाएं जुआ वाले बैल को हांक दीजिये ,मुड़ गए आप और आपकी बैलगाड़ी। रोकना हो तो दोनों रस्सी खीचिए।लेकिन ड्राइव करते समय हमेशा मुंह से हँकारा लगाते रहिये ।बांस लाने के क्रम में जब बैलगाड़ी गड्ढे में फंसता तो  कोई भी राहगीर हाथ बटा देता। मुझे लगता है उनदिनों बैलगाड़ी की सवारी आज की गाड़ी से ज्यादा राजशाही था,  बैल को चुस्त दुरुस्त रखना एक जिम्मेदारी थी शानो शौकत के लिए।
दलान पर उपस्तिथि सभी लोग सामूहिक जिम्मेदारी निभाते थे ,एक दूसरे के कार्य में हाथ बटाते थे, कोई किसी का नुकसान होते नही देख सकता था।  दलान के सामने से कोई भी राहगीर गुजरता तो लोग उसे बिना टोके नही रहते। गाँव नाम और कहाँ जाना है यह पूछ ही लेते।  दूर से आ रहे बटोही को पानी और जलपान के लिए जरूर आग्रह करते, बिना जाति धर्म पूछे।  बताते है कि मेरे परबाबा सदैव दोपहरी को कुआं के पास बाल्टी लेकर  बैठे रहते। कारण यह भी था कि वो कुंआ से किसी और को पानी नही निकालने देते। खैर मैंने ही इस परंपरा को तोड़ दिया था ,और बाद में मेरे पट्टीदारों ने कुंआ ही  जमींदोज कर दिया।
उस अभाव वाली जीवन मे कई आत्मीय रंग थे, खेत से आलू निकालकर भूनना और पत्थर वाली नमक के साथ खा लेना,  भुट्टा तोड़ना और खा लेना, सबसे गुस्सैल होशियार रखवाले का आम तोड़ लेना ,कटहल तोड़ लेना, शिकायत के बाद मार खा लेना, फिर रोज रोज उन्हें चिढाना, नई नवेली दुल्हन के कमरे मे भी भौजी कहते हुए बेरोक टोक जाना ,और खूब आदर पाना, कोई भी आंगन हो उस आँगन के चाची, दादी, फुआ के लिए हम लाडले ही होते थे, राजकुमार ही दिखते थे। किसी ने अपने आंगन से यूँ ही बाहर जाने नही दिया। हाँ, हम उम्र की बहने ,भतीजी या बुआ चिढ़ाने से नही चूकती थी। बहुत बड़ा परिवार और बहुत बड़ा रिश्ता हुआ करता था अपना , एक अद्भुत संसार था, जुगाड़ू संसाधन के बाद भी तिल मात्र भी असुरक्षा की भावना नही थी। इतने बड़े गांव वाली परिवार में पूर्ण विश्वास वाला राजकुमार थे हम,जो आज  एक या दो या तीन की संख्या में सिमट कर रह गया है।  एक दूजे को देखकर मुंह फेरने के रिवाज में आ गए है, अब गांव पहुचते ही लोग पूछते है कबतक रहना है ,कब वापस जाना है, उम्मीद से ज्यादा रह गए तो कानाफूसी होने लगता है कि शायद अब ये बेरोजगार हो गया है, घर मे आकर अब ताना भी दे जाते है, काम धंधा बन्द हो गया क्या बाबू का?????उफ्फ!!!कहाँ से चले थे कहाँ आकर रुक गए है, काश फिर लौट जाते हम, यह अदृश्य लॉक डाउन भी 14 अप्रैल को ही खत्म हो जाता ! और हम एक विशाल हृदय के समंदर में गोते लगाते।
©nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 12

#मेरा_एकांतवास 12
मेरे कई अभिन्न मित्र मुझसे सवाल करते है कि हमे सदैव घुमक्कड़ी पसन्द था, भ्रमण मेरा शौक था तो ऐसे में यह 21 दिन कैसा लग रहा है?? घुमक्कड़ी यात्रा मन की बहुत सी अतृप्त जिज्ञासा को तृप्त करती है, मेरा जीवन कितना मूल्यवान है, कितना महत्वपूर्ण है इसे आप प्रकृति के बीच जाकर समझ सकते है, जीवन की विभिन्न रंगों को समझ सकते है, जो हम नही कर सकते वो दुसरो के हौसलों में देख सकते है, जो मुझे कठिन, असम्भव, या आश्चर्य लगता है वो इन रंगों से इस यात्रा से हमे आसान लगने लगता है, विभिन्न  संस्कृति, रंग, वेश भूषा, पर्व त्योहार और रहनसहन का विविध रंग मुझे एक ही जीवन मे कई जन्मों का सुख देता है। फिर इस अनुभव से तैयार अतीत भविष्य का धरोहर बनता चला जाता है। यात्रा धार्मिक हो या पर्यटन का दोनों ही स्तिथि में जो मानसिक तृप्ति होती है वह  किसी पुस्तक या किसी चलचित्र की कहानियों से नही हो सकती। यात्रा में होने वाली घटना ,रोमांच सब जीवन को बहुरंगी बनाने में सहायक होता है, दूर बहुत दूर जब आप प्रकृति के गोद मे विचरण करने लगते है, उन्मुक्त स्वछंद उछलकूद करने लगते है तो वास्तव में प्रकृति के लिए तत्क्षण एक खिलौना होते है, प्रकृति भी आपसे खेलती है, यह प्राकृतिक साक्षात्कार आसान नही।जीवन का बहुमूल्य पाठ है आपका घुमक्कड़ी। 
अब हम घर मे है तो क्या यात्रा थम सा गया है ?? मित्रो के प्रश्न ने मुझे तनिक हिलाया था परन्तु नही आज भी मैं यात्रा में ही हूँ, अन्यर्यात्रा..हाँ अन्यर्यात्रा बाह्य यात्रा से और भी कठिन है, आप स्वयं में प्रकृति है और स्वयं ही आगंतुक, स्वयं का विस्तार भी कम नही है, कहाँ से शुरू कहाँ से खत्म पता नही। बहुत पथरीले कांटो युक्त सफर है तो कई सुंदर अनुभूति भी , आप अवलोकन करते रहिए, अपने और अपने से जुड़े सम्बन्धो पर आपकी क्रिया प्रतिक्रिया , आपका उचित अनुचित निर्णय भी इस अंतर्यात्रा का पड़ाव है, वहाँ ठिठक कर आनंद ले सकते है, आपके आसपास बिखरे वस्तु आपको आपसे जोड़ता है, फिर इसे त्यागना है इसके लिए भी रोमांच उतपन्न होता है, जो वस्तु आज आपके बहुत करीब है वो कल बहुत दूर होगा, जीवन को आसान बनाने में यह अंतर्यात्रा बहुत सहयोगी है, आपका एकांत भी आपका प्रिय मित्र हो सकता है यह तो मैंने इस एकांतवास में ही जान पाया। अभी तक एकांतवास की महत्ता पुस्तको, पुराणों और आध्यात्मिक कहानियों में ही सुना करते थे ,परन्तु अनुभव और साक्षात्कार का अवसर तो अभी ही मिला है। मैं आज भी और अभी भी घुमक्कड ही हूँ, कल वाह्य जगत में आज अन्तर्जगत में।@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 11

#मेरा_एकांतवास 11
आज मेरे गांव में सभी का घर पक्का का है, किसी भी वर्ग में कोई भी मकान कच्चा नही है, एक समय था कि मेरा घर सहित गांव के अधिकतर मकान कच्चा यानी मिट्टी का था या टट्टर का। ईंट और मिट्टी के गारे से बना मकान का परिवार धनी माना जाता था, और सम्पूर्ण पक्का वाले मकान का परिवार महाधनी या जमींदार माना जाता था। धनी माने जाने वाला तनिक शोषण प्रवृत्ति के हुआ करते थे , महाधनी वालो में यह प्रवृत्ति नही था । बाकी सभी कच्चा मकान वाले एकही परिवार जैसे थे, दो जून की रोटी बमुश्किल मिल पाता था, कच्ची सड़को पर धूल उड़ा कर चलना ही शानो शौकत था। लेकिन अदब, और संस्कार का आभूषण ग्रामीण परिवेश की पहचान थी। रिस्तेदार  किसी का भी हो  सम्पूर्ण गांव का मेहमान माना जाता था,  गरीबी थी, लोग कर्ज देते थे और पीढियां इन कर्जो में ही डूबी रहती थी, गेंहू यानि रवि की फसल के समय चावल खाने को तरसते थे और धान की फसल के समय रोटी खाने को , गांव के भोज के लिए हफ़्तों इंतज़ार रहता था, दरवाजे पर चाहर  दिवारी नही होती थी इसलिए कोई भी किसी के घर  कभी भी आ जा सकता था, शिकायत किसी को नही होती। अभाव था लेकिन तनाव नही था। लोगो को पूरा विस्वास था कि भोजन ईश्वर दे ही देंगे इसलिए आपस का प्रेम बना रहता था, आज भोजन है , सुख संसाधन है लेकिन प्रेम नही,कभी एक छत के नीचे रहनेखाने वाले आज टुकड़ो टुकड़ो में पक्के मकान में रह रहे है , पिता से पुत्र अलग है, भाई तो लाजमी ही है, चूँकि पत्नी ने सबके साथ रहने से मना कर दिया था, आज उन्हें कोई फर्क नही पड़ता कि बगल के कमरे में भाई भूखा है या पिता।, बड़ी सी चाहर दिवारी उसपर ग्रिल और उसके अंदर तन्हा tv के सहारे एकांत। बजुर्ग को छोडकर सभी प्रदेश में है कुछ कमाने तो कुछ पढ़ने के लिए ,जो है उन्हें दुसरो की खुशी या दुखी प्रभावित नही करता,  खुद का अकेलापन सालता बहुत है, परन्तु झूठी अकड़ में सब सहता जाता  है,  एक उम्मीद रहता है प्रवासी हुए पुत्र से ,..जिसकी लौ भी मंद्धिम पड़ती जाती है, और फिर आखिरी में तलाशता है वह पुराना गांव  अभाव था लेकिन तनाव नही था, खिलखिलाकर हंस लेते थे। आज गांव भी शहर से कम नही या यूं कहें बदतर है। शहर की तरह एकांगी तो हो गए है, फासले मतलब रखने में शहर जैसे तो हो गए लेकिन यह मानने को तैयार नही की मकान सबका पक्का क्यूँ है। स्थानीय राजनीति ,खाली समय का कोपभाजन, और हम किसी से कम नही की सोच में आज गांव भी तन्हा है।
जो कुछ कर रहे है वो लोग  तो गाँव से बाहर है ,जो कुछ नही कर रहे वो नजदीक के कस्बा और शहर में पुरखो का बड़ा सा प्लाट बेचकर छोटे से कंक्रीट के घोषले में आशियाना बना कर रह रहे है ,बस यह कहकर कि गाँव अब रहने लायक नही रहा,  एकांगी रहने की जिजीविषा अपने बुजुर्ग से अलग रहने का बहाना भी खूब ढूंढते है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए शहर आना पड़ा, वस्तुतः वो छुपाना चाहते है कि बहु को गांव रास नही आ रहा।
आज गाँव उन्ही को याद है, जिसने कच्ची सड़को पर धूल उड़ाया है, पुआल की ढेरों में खेला है, दादी या नानी से भूत की कहानी सुना है,खेतो में साग तोड़ा है, भुट्टा खाया है,और मुट्ठी भर धान या अनाज के बदले चॉकलेट या नमकीन खरीदा है,जिसने लालटेन की शीशा को बार बार साफ कर जलाया है , उसके फीते को कैची से काटा है ताकि तेज लौ हो सके। जिसे अपने शिक्षक की मार याद है ,जिसे अपने बुजुर्गों की डांट और अदब याद है। बांकियो कि लिए गांव एक पिछड़ा और बिगड़ा जगह  है आज, कस्बा ही सही घुटन ही सही एकांगी तो है अपना नितांत निजी  मिया बीबी और छोटे बच्चे के साथ।

मेरा एकांतवास 10

#मेरा_एकांतवास 10
अंतर्वेदना में तो आज मध्यम वर्ग है, उसकी पीड़ा न तो गरीबो में है और नही अमीरों की तरह दो जून की रोटी खा सकता है। दांत भी नही निपोड  सकता , चूँकि कल तक खाते पीते परिवार बनने का स्वांग रच रहा था, इज़्ज़त को बनाने में गरीबी छुपा रहा था, अपनी भूख में कटौती कर बच्चों को पढा रहा था, बेटी की शादी के लिए  रकम जमा करने में सभी अरमानों का बलि चढ़ा रहा था,  मुश्किल से एक नई चादर खरीद लाने  पर बार बार पड़ोसियों को दिखा रहा था, ताकि कोई उसे अभाव में जीने वाला न समझे, कोई उसके परिवार के मुखिया को अदूरदर्शी या निकम्मा न समझे।  पूरा परिवार अपनी वेदना पर मुस्कुराहट की चादर से ढक रखा था , आज तो वह तिजोरी भी तार तार होने को है। न सरकारी इमदाद मिलने वाला है ,और न पड़ोसी ही कुशल क्षेम पूछने वाला है,न ही किसी की दृष्टि इनकी ओर जाने वाला है, रिश्तेदार भी गर्व से ही पूछते है ,"आपको तो कोई परेशानी नही होगी खाने पीने की?"और न चाहते हुए भी कहना पड़ता है कि हम ठीक है, बुजुर्ग की बीमारी, बेटे की पढ़ाई, बिटिया की शादी की चिंता , रोज का पेट भरने का यह नियमित कार्य, इसमे यह कोरोना संकट ,खुद की ही बनाई हुई अस्मिता में उलझकर रह गया है। किस से कहे ? कैसे कहे?... इस समाज मे कल भी तो जीना है, कल की उलाहना ,ताना से भी डर लगता है, फिर किसी से मुंह खोलने पर मना कर देना, जीते जी  मृत्यु के समान है।, जमा पूंजी भी घटते चाँद की तरह खत्म हो रहा है, बस यह लॉक डाउन खत्म हो जाये!! कहीं बढ़ गया तो.....?? मरकज जमात के बढ़ते मरीजो से तो और भी गुस्सा आता है, उसे लोग पक्ष विपक्ष में, आरोप प्रत्यारोप में बहस कर लेते है, लेकिन यह केवल उसी के कारण आगे बढ़ गया तो ऐसे परिवार का क्या होगा , जिसे किसी जाति धर्म,वर्ग से कोई लेना देना नही है इसे तो अपने परिवार की दो जून की रोटी से मतलब है ,जो आज तक इज़्ज़त से खिलाता रहा है कल भी खिलाने की जद्दोजहद रहेगा ...लेकिन कैसे?....किस से कहे अपनी अंतर्वेदना!!हम किसी वर्ग, धर्म में नही आते।@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 9

#मेरा_एकांतवास 9
जब आप किसी को अपना मानने लगते हो ,या जो नैसर्गिक रूप से अपना है, इनदोनो ही परिस्थितियों में आप उस पर अधिकार जैसा होने लगता है, आपको लगता है कि किसी भी परिस्थिति में वो आपका दिल नही दुखायेगा, यही चीज़ सामने वाले के साथ होता है और यही एक अदृश्य अपेक्षा एक दूसरे से अपनापन का सम्बंध को जोर से से पकड़े रहता है, लेकिन कोई भी इसकी अवहेलना करता है तो शनै शनै यह कमजोर होने लगता है, कुछ गलतफमी में तो कुछ जानबूझकर।  निकट सम्बन्धी पर यह अपनापन और इसके घेरे में रहना एक अनुशासन होता है , जीवन को अनुशासित रूप से चलने में बाध्य करता है, यही से एक संस्कार का निर्माण होता है, लेकिन जब अपनापन में प्रश्न चिन्ह आये तो यह चक्र टूटने लगता है। जिद्द , अहंकार , स्वार्थ , उन्मुक्तता इस अनुशासन चक्र को तोड़ता है ,फिर व्यक्ति एकांकी होने लगता है। समझौता, सामंजस्य,  और मोह ऐसे बांधने का भरसक प्रयास करता है,लेकिन जब एक बार इस परिधि से बाहर आ गया तो मुश्किल होता  है फिर से एक माला में पिरोना।
आज जब जीवन बचाने में सब बेचैन है , उसमे सबसे करीब का महत्वपूर्ण जीवन खुद का है ,संकट में  सब यह उम्मीद करते है कि यह अपनापन बना रहे ताकि एक दूसरे का जीवन बचा रहे, यह अपनापन का अधिकार है कि आपको एक दूसरे निर्देश दे रहे है, उम्मीद कर रहे है, परिधि से बाहर जाने पर आप एक दूसरे से अलग एकांकी हो जाएंगे, किसीको किसी से भावनात्मक सम्बन्ध नही रहेगा। आज फिर से संयुक्त परिवार की अवधारणा को बल मिलना शुरू हो रहा है, हमारी उन्मुक्तता, जिद्द, अहंकार, स्वार्थ सब अब जीवन संघर्ष में बौना लगने लगा है, जिस आभासी दुनिया, कृतिम सम्वेदना के सहारे खुद को जी रहे थे,  स्वम्भू समझ रहे थे आज सब धराशाही हो रहा है, आज किसी भी वस्तु से ज्यादा मूल्यवान है आपका खुद का जीवन है और यह भावनात्मक परिवार में ही सुरक्षित रह सकता है, जहां ,सुरक्षा, आत्मबल, संस्कार, और भरोसा बरकरार है।
एक बार पुनः सोचिये की हमने उस संयुक्त परिवार की देहरी को क्यूँ लांघकर कंक्रीट के घोषले में दुबक गए।
@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 8

#मेरा_एकांतवास 8
 मेरा एकांतवास भी एक यात्रा है, एकदम शांत वातावरण में जब सभी वैद्युत उपकरण को बंद कर 3 से चार घण्टे खुद से जूझता हूँ तो अतीत के अनुभव यात्रा से बाहर आता हूँ, इस चौराहे पर खड़ा भविष्य का एक सामान्य से साधारण सा लीक ढूंढता हूँ, वास्तव में जीवन यात्रा  जितना कठिन है उतना ही आसान भी , हर व्यक्ति ने अपनी जीने की कला खुद से तैयार की है, किसी की इस कला में अपनों ने भी रंग भरा है, लेकिन जो कला आपने खुद से बनाई है वह विशुद्द रूप से आपकी है, उस  लीक पर कोई दूसरा नही चल सकता।  आप जीते है और जीने की उद्देश्य तलाशते है,फिर उसपर जीना शुरू करते है, जिम्मेदारी भी एक बड़ी उद्देश्य बनाती है। उसे पूरा करने को ही जीना समझते है ,इसे ही जन्दगी समझ लेते है,यह जीवन यात्रा का सामान्य नियम है , लेकिन इन अनुभवों से सीखना , और उस जिम्मेदारी के प्रति मोहपाश होना  दोनों के बीच का संघर्ष ही जीवन संघर्ष है। खुद का आत्ममंथन हमे इन दोनों से दूर निकालता है। आवश्यकता, अपेक्षा , मोह ,लोभ , को अगर घटाने लगे तो क्रोध और वासना भी नही होगी,  फिर मन मे अजीब सी शांति मिलेगी , बहुत सारी इन वस्तुओं को इग्नोर कर दें , लोगो की बातों को अनसुना कर के भी आप खुद को शांत क्लांत कर सकते है, संवेदनशील मनोभाव को दूसरे का कटाक्ष बहुत उद्वेलित करता है, और चतुर लोग ऐसे सीधे साधे मनोभाव वालो के साथ यह कृत्य करते रहते है। अतः हमें इन चीजों को पहचानने की जरूत है।
अतीत की यात्रा से बाहर  एक सुखद पड़ाव होता है ,आप वहां से सकुशल आगे की यात्रा कर सकते है , बस तय करना है कि आपको ही चलना है बाकी लोग भी चल रहे है, इसलिए निश्चिंत होकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त संसाधनो के माध्यम से सफर तय हो सकता है।एक शोक जो आपको और डरा सकता है वो कि आपकी यात्रा के बाद आपका अस्तिव!शायद यह भय भी आपको क्लेश की दलदल में खड़ा कर देगा, वस्तुतः यह आपकी संस्कार में पिरोया हुआ भय है, लेकिन अतीत से अनुभव ले तो ये सब मिथ्या है, सहज रूप से किया हुआ कार्य स्वयं ही यात्रा के बाद का अस्तित्व है।, आपका निमित्तमात्र का कार्य भी अस्तित्व ही है और फिर इस अस्तित्व का अस्तित्व का भी उम्र बहुत अधिक नही होता। जब सब परिवर्तनशील है तो इस  भय पर चिन्ता क्यूँ।  बस सफर पर निकल पड़िये, बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी अपेक्षा का , यात्रा समाप्ति के बाद कुछ अवशेष नही रहता , जो रहता है दीपक की तरह वह भी बुझ जाता है , परिवर्तन की बारिस सबको मिटा देता है , फिर शोक कैसा।@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 7

#मेरा_एकांतवास 7
 भारतीय वातावरण में मनुष्य परिस्थितियों से बहुत जल्द सामंजस्य बिठा लेता है, हर व्यक्ति अब एक लक्ष्य के प्रति दिनचर्या बना लिया है, शुरुआत में जो समस्या थी हो आदत में समाहित हो खत्म हो गयी। , अब सबकुछ नए निर्देशो के पालन करने में है, अधिकतर लोग फुरसत में है तो मीडिया वाले उन्हें अपने ढंग से खुराक भीबड़े रहे है और सोशल मीडिया में उसकी काट ,इन सब के बीच बहस में उत्तेजना,निराशा ,हताशा फिर एक बड़ी उम्मीद कि इस संकट से निकल जाएंगे। 
हर आदमी का दिनचर्या एक नए ढांचे में समा गया है, सबसे खुशनुमा ढांचा ग्रामवासियों का है, सब दूर दूर भी है कोई भी अपनापन कम नही हो रहे, शहर में सब करीब करीब है और उन अपनापन का परीक्षा लिया जा रहा है, प्रेम प्रगाढ़ भी हो रहा है और समायोजित हो जीने की कला भी सिख रहे है,लेकिन यही मौका है जब सबको अपने बृद्ध जन बुजुर्गों की खास निर्देश वाली बातें, घटना याद आ रही है,लोग अपनो को याद कर घर मे एक संवाद कर के रहे है। सामाजिक विचारधारा वाले लोग समाज सेवा में भी लगे है,मेरे एक मित्र ने वीडियो कॉल से दिखाया कि कैसे पूरी फैमिली सिनेटाइजर और मास्क तैयार कर रहे है उसे बाटना है,हम हालात की ओर समायोजित होने को तैयार है,   संकट काल की समाप्ति पर बेशक हम आर्थिक धरातल पर थोड़े कमजोर होंगे लेकिन पारिवारिक और सामाजिक समरसता मजबूत होगी। हर दुखबको मिल बाट कर वहन करने की क्षमता में वृद्धि होगी। राजनीतिक परिदृश्य भी बदल होगा,  जनता किसी भी मजबूत तर्क में बंधने के बजाय अतार्किक बातों में उलझा हुआ मिलेगा।  सामूहिक सहयोग को  हम अपना नैतिक कर्तव्य समझने लगेंगे। आज जो हम अपने अधिकार के बारे में उद्वेलित तो रहते है लेकिन कर्तब्य के सम्बंध में अपना सब भूल जाते है। कुल मिलाकर यह कोरोनो जिंदगी को एक नए आयाम में गढ़ना शुरू कर दिया है।

मेरा एकांतवास 6

#मेरा_एकांतवास 6
आज खिड़की से बाहर देखा तो एक कौआ जो कभी विलुप्त था, (जी वही पुराना वाला कौआ अब तो सम्पूर्ण काले रंग के मिलते है कौआ काले के साथ गर्दन पर अलग श्यामल होता है) आज मुडेर पर बैठा मुझसे बातें करना चाह रहा था, उछल उछलकर बोल रहा था कि घर से निकलो , छुपकर क्यूँ बैठे हो??  मैं मुस्कुराया, और उसे बताया कि हम तुम्हारे लिए घर मे है ताकि तुम अब स्वतंत्र रूप  से विचरण कर सको,
ठहाके लगाकर बोला, - तुम मनुष्य बहुत चालाक हो , अपनी जिंदगी की खतरा बढ़ी तो प्रकृति याद आने लगे।, बहुत अभिमान था तुम्हे अपने ऊपर,प्रकृति का दोहन कर भगवान बनने लगे थे। अब छुप गए हो, अब तुम्हारा दुश्मन कोई नही बस आदमी ही है और वो भी तुम्हारे निकट करीबी। अब बचो बच गए तो रोटी खिलाना नही तो मैं नोच कर खा जाऊंगा"
उसकी यह अट्टहास मुझे अंदर तक डरा गया, सचमुच  हमारी अहंकार का अति ही तो है कोरोना का हमला, बहुत घमंड था चांद और मंगल तक पहुंचने का, बहुत घमंड था विज्ञान पर,  बहुत घमंड था अपनी काबलियत पर , तर्क और ज्ञान का , आज सब   अहंकार बेकार साबित हो रहा है, , हम भगवान ,अल्लाह सब का दुआ काम नही आ रहे , मंदिर मस्जिद, गुरुद्वारा सबके विधाता एकांतवास में चले गए, अब तो आजका भगवान बस डॉक्टर है जो जान बचा रहे है और पुलिस कोरोना के पास जाने के रोक रहे है। आज हम मजबूर है। 
कौआ ने फिर टोका क्या सोच रहे हो?? मैंने कहा तुम शायद ठीक कह रहे हो, आज तुम स्वतंत्र हो और मैं कैद में हूँ, बच गया तो रोटी नही तो तुम मानव गोश्त खाकर मस्ती करना। 
खुद ओर झुंझलाते हुए टीवी पर समाचार देखने लगा -मरकज से बाहर आये तल्बगी जमात के लोगो मे कोरोना की पुष्टि , कई राज्यो में पहुचाये कोरोना...उफ्फ!!कौआ तू जीत न जाना।
@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 5

#मेरा_एकांतवास 5
अकेलेपन  में मैं अक्सर क्लासिकल इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक सुनना पसंद करता हूँ। वही सारा दिन सुन भी रहा हूँ। वैसे मुझे न तो गाना गाने आता है और नही कोई भी इंस्ट्रूमेंट बजाने लेकिन सुनने में बहुत आनंद उठा लेता हूँ।बहुत प्रयास के बाद भी गाने और बजाने सिख नही पाया। आधुनिक संगीत में  भी कुछ कम्पोजिशन पसन्द आता है, पाश्चात्य तो बिल्कुल नही। कुछ अर्थपूर्ण मैथीली और भोजपुरी जिसमे मिट्टी की खुशबू मिलती है उसे भी सुन्ना पसंद करता हूँ। कभी कभी कुछ गाने इतने कर्णप्रिय हो जाते है कि अपनी मूल आदत भी भूल जाता हूं, एक गीत *सांसों की माला में..... इतना पसंद आया कि बार बार सुनने की लिए एक म्यूजिक सिस्टम खरीद लाया। दोस्तो और परिवार  में  मज़ाक का कारण भी बना कि एक गाने के लिए ये पागल पन!! लेकिन मेरा मानना है कि जो मन को तृप्ति दे उसे तन की तृप्ति की तरह ही पूर्ति करनी चाहिए। संगीत जीवन की जरूरत भी है , मेडिटेशन का तरीका भी, कई असह्य पीड़ा की दवा भी है। लेकिन आपको जो पसंद हो। जिससे आपको आंतरिक ऊर्जा मिले। कुछ लोग गाकर तो कुछ बजाकर आनंद लेलेते है तो मैं सुनकर। श्रोता का होना भी जरूरी है। आधुनिक इवेंट, का कॉन्सर्ट में जाना अच्छा नही लगता लेकिन क्लासिकल कॉन्सर्ट को जरूर अटेंड करना चाहता हूं, मौका मिलता है तो नाटक प्ले देखना नही चुकता। , नाटक का अभिनय जीवन की विभिन्न रंगों से तत्काल परिचित करवाता है। आप यदि ईश्वर द्वारा मिला एक मात्र मनुष्य जीवन को बेहतर तरीके से जीना चाहते है ।सौ विभिन्न जीवन को एक ही जीवन काल मे जिन चाहते है तो अभिनय करना सीखना चाहिए या नाटक देखनी चाहिए। कम समय मे कई जिंदगी जीने का एक अनोखा प्रयोग है नाटक और इसका अभिनय।  रुपहले पर्दे का अभिनय शायद आपको उतना प्रभावित न करे लेकिन नाटक का अभिनय अभिनय कर्ता अभिनेता की जिंदगी को अंदर तक शुद्ध कर देता है।  पर्दे पका अभिनय टुकड़ो में तकनीकी रूप से सवांरा रहता है ,लेकिन रंगमंच विशुद्द  कसौटी पर जांचा अभिनय होता है। अभिनेता उस चरित्र को बखूबी जीता है, पर्दे के अभिनेता में वो समर्पण का अभाव होता है, ,फ़िल्म और संगीत की तकनीकी उपलब्द्धि के कारण यह मौलिक स्वरूप कमजोर हो रहा है। वस्तुतः आज भी अभिनय,कला, और संगीत का मौलिक रूप ही हमसबको प्रभावित करती है।

मेरा एकांतवास 4

#मेरा_एकांतवास 4
 मन सदैव गतिमान होता है और जब खाली होता है तो इसकी गति बढ़ जाती है , उच्छंखल हो जाता है।कोरोना संकट ने जीवन के आयाम को नए सिरे से गढ़ना शुरू कर दिया है।, आप आज अपनो के बीच परिवार में है, परिवार के सदस्यों की बीच केवल वार्तालाप ही नही भाव सम्प्रेषण भी हो रहा है। मन मे आशक्ति का बंधन मजबूत हो रहा है। और इस बीच एक अदृश्य भय भी व्याप्त हो रहा। एक तरफ आपकी जमा पूंजी दूसरी तरफ आपकी समृद्ध आशक्ति, और इनसब के बीच यह संकट।  प्रतिपल एक छद्म आशंका घेरे हुए है।  यही कुछ आपके कमरों से सैकड़ो किलोमीटर दूर गरीब मजदूर के मन मे ज्वाला बन कर फुट रहा। वह अपनो को लेकर अपनो के बीच जाना चाहता है , उसकी एक मात्र  जमापूंजी उसकी अपनापन ही है। , वह कोई दृष्टिगत होने लायक नही है अदृश्य है ,अनुभव करने लायक है। वस्तुतः अपनापन और आशक्ति का जो चित्र उसके मन पर है कदाचित  आलीशन कमरों में बैठे अभिजात्य के लिए नही हो सकता।इन मजदूरों की स्तिथि उस बछड़े की तरह है जिसकी मां का थन दूध से लबालब भरा है और बछड़ा बन्धन तोड़कर अपनी माता तक पहुचना चाहता है,परन्तु पालक तो दूध निकाल लेने के प्रयोजन में व्यस्त है,उसे उस बछड़े की सम्वेदना से क्या लेना देना। उसे उसकी माता का दूध से लेना देना है। दूध समुचित मिल जाये इसलिए बछड़ा का तड़पना भी जरूरी है।
न्याय सिद्धान्त भावनाओ पर आधारित नही होता, वह तो बहुसंख्य जन की न्याय को प्रभावित होने की दशा को परिभाषित करता है। वो जन कल्याण के बृह्रत योजना का प्रतिनिधित्व करता है। दिल्ली की भीड़ और इसके बाद उसकी दशा हृदय विदारक हो सकते है, लेकिन बाद के क्रंदन से बड़ा नही। इसलिए शायद हम दुखी मन से ही सही लेकिन खुद को बचाने के लिए उस भीड़ से मुंह मोड़ने लगते है। चूँकि यहाँ पहली प्राथमिकता खुद को जीना है, फिर परिवार को ,फिर समाज को,फिर राष्ट्र को।,सब एक दूसरे से बड़ा है ,और यह भीड़ इसी बीच मे आकर फंसा है।.....आंख मुंडिये और सो जाइये ,ईश्वर से मनाइए सब सही हो,सुरक्षित हो ,यह हमारे जीवन के लिए भी सही है।@nitesh
क्रमशः

मेरा एकांतवास 3

#मेरा_एकांतवास 3
 दिनचर्या का क्रम का घालमेल से मानसिक स्तिथि पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है,कभी कभी लगता है कि मैं बीमारी की हालात में  ही घर मे हूँ। यह इसलिए की बाहरी  हर हरकत पर पाबंदियां लगी हुई है। लेकिन सोशल मीडिया की एक्टिव मित्रो को देखकर  दुनिया रफ्तार में लगती है। दिल्ली की भीड़ ने सहसा डरा दिया है। आरोप प्रत्यारोप उचित भी है । लेकिन भीड़ की भी एक अपना मनोविज्ञान होता है, बहुत आसानी से नही समझाया जा सकता जितनी आसानी से बहकाया जा सकता है।, अब तो यह बाढ़ फाटक तोड़ चली है ,समंदर में मिलने से पहले तक तो चिंता बनाये ही रखेगा। फेसबुक पर पोस्ट किया गया चुटकुला प्रहसन आरम्भ में तो ठीक लगता रहा लेकिन अब अप्रसन्नता की स्तिथि में यह भी उबाऊ ही कर रहा है। हर आदमी को जीवन की उपयोगिता शायद समझने लगी है। हर आयुवर्ग के  लोगो के लिए एक आत्मनिरीक्षण का समय है। हर वैचारिक लोगों के विचार और मन का शोधन का समय है। उदंडता पर भी स्वतः अनुशासन भी काम कर रहा है। ये तो अच्छा है कि रामायण और महाभारत जैसी सीरियल प्रारम्भ हो चुका है, जो भारतीय दर्शन के प्रतीक है, आज विश्व को केवल भारतीय दर्शन ही बचा सकता है,सामूहिक रूपसे इसका आनंद लें। अब शायद उन लोगो के संबध में भी विचार करना होगा जो घर से बाहर हमारे लिए कार्य कर रहे है, उनका इस समय सुरक्षित होना जरूरी है, पूरा समाज इन्ही लोगो के उम्मीद पर खड़ा है, आज उनकी ईमानदारी पूर्वक कार्य का इम्तिहान है , कल तक तो हमने बहुत सारी आरोपो से मढ़ते थे आज उनके लिए प्रोत्साहन की जरूरत है। हालात उनके लिए भी भारी है जिनके घर मे  कोरोना के अलावा है। अन्य सामान्य और गम्भीर रोगों से पीड़ित बच्चा और बुजुर्ग है।  
आज जरूरत है अपने मित्रों ,सेज सम्बन्धियों का मनोबल बढ़ाते रहे। यह 21 दिन में मानव के स्वभाव में बहुत परिवर्तन होने वाला है। विचार, प्रेम,विच्छोभ , क्रोध, मोह, लोभ, और कार्य के प्रति उत्साह में परिवर्तन होने लगेगा। , 8स लिए आपका एक दूसरे से सम्पर्क जरूरी है। इन सबके बीच मोबाइल ही एक उचित साधन है। आप किसीका कोई भला नही कर सकते चूँकि आप कह उसी स्तिथि में ऐसे में एक दूसरे का मनोबल बनाये रखना भी एक बदी समाज सेवा है। आप स्वस्थ, सुरक्षित रहे और दूसरों को भी रखे।यही कामना है।
क्रमशः

मेरा एकांतवास 2

##मेरा_एकांतवास 2
बाबूजी रेलवे से अवकाश प्राप्त कर गांव आ गए थे , यह उनका ही फैसला था। गाँव मे खेतीबाड़ी थी। लेकिन 42 साल तक रेलवे की नौकरी करने के बाद घर पर नए सिरे से एक काम मे लगना आसान नही था। वो बिल्कुल सामाजिक नही थे , किसी के दरवाजे आना जाना और देश दुनिया पर चर्चा करना उनके दिनचर्या में नही था, फिर समय को काटना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन उन्होंने एक भैंस  खरीद लाये। सभी बेटों को ये बात ठीक नही लगी। दूध तो खरीदकर भी उपयोग कर सकते थे । लेकिन उनका अपना ही तर्क था। कहते थे , भैस के बहाने के बार बार विस्तर से उठकर उसे चारा पानी देने जाना पड़ेगा। अंदर बाहर करने में भी कुछ शारिरीक श्रम होगा।।  सबने देखा कि जब उम्र और बढ़ने लगी तो स्टूल पर बैठकर चारा काटते और खिलाते, साइकल चलाते जहां नही चला पाते तब भी साइकल को पैदल ही ले आते लेकिन नित्य बाजार से ताजी सब्जी लाते। आखिरी समय भी साइकल से गिरने के कारण ही ब्रेन हेमरेज हो गया और हमलोगों को छोड़ परलोक चले  गए। आज लगता है कि एकांत के लिए भी कुछ कार्य अवश्य चाहिए ,खासकर जब आप सोशल कम हो तो।  मैं न तो कोई लेखक, पत्रकार या फ़िल्म बंधुओ के  जमात का हिस्सा रहा हूँ ,नही किसी ब्रांड से जुड़ कर कार्य किया । इसलिये सदैव स्वतंत्र ही रहा। किसी अखबार या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए काम करना मेरे बस की बात नही थी चूँकि जीवन यापन के लिए यह कार्यशैली मुझे भा नही पाया। स्वंतंत्र कार्य ही पसन्द था वही कर भी रहा हूँ ,इस लिए सामाजिक सरोकार के बाद भी अकेला ही हूं। ऐसे में एकांत वास में खुद को व्यस्त रहने की तरीका तैयार कर रहा हूँ। लोगों का पोस्ट पढ़ना, कुछ बचे हुए पुस्तक पढ़ना, और समय समय पर किचेन जाकर कुछ बनाकर खा लेना। वास्तव में खाली बैठने पर उटपटांग खाने का बहुत मन करता है। ये अच्छी बात है कि कुकिंग मुझे अच्छा भी लगता है ,और जरूरी भी। और जब खुद को ही बना कर खाना है तो बेहतर  क्यों न खाये। जो स्वास्थ्य के अनुरुप हो।  सामान्य दिनों के अपेक्षा फोन का आदान प्रदान भी कम ही है शायद लोग अपनो में व्यस्त है। हाँ देश दुनिया की खबर देश के विभिन्न कोने से फोन पर आ ही जाता है ,कुछ खबर पर खुद ही तहकीकात कर लेता हूँ। कुछ  पूर्व परिचित पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी एवम विश्वसनीय पत्रकार मित्र है जिसके सहारे तथ्यात्मक बातें फेसबुक मित्रो तक पहुँचा पाता हूँ।
आप भी खाली समय मे खुद को शारीरिक और मानसिक कार्यो में व्यस्त रखे।  मनोबल बनाये रखे।इस महामारी से सुरक्षित रहे।
क्रमशः

मेरा एकांतवास 1

#मेरा_एकांतवास 1
एकांतवास की भी एक अपनी दिन चर्या है।शुरू शुरू में थोड़ी उलत पुलट हो जाता है, जगने और सोने का समय मे भारी परिवर्तन हो जाता है, दिन रात चक्र खुद पर लागू नहींहो पता, जब चाहो नींद ले लो फिर जब चाहो खूटूर पुटूर  कर लो।  लेकिन शनै शनै सब अपने स्थान पर आने लगता  है। वैसे तो मैं काशी में अकेले ही निवास करता हूँ लेकिन महीने का 20 से 25 दिन भ्रमण पर ही रहता है, कुछ कार्यवश और  कुछ घुमक्कड़ी के लिए। लॉक डाउन ने पूरी तरह एकांतवास  की सार्थकता को समझा दिया है।  tv पर कार्यक्रम भी मैं कम ही देखता था, न्यूज जो एक बार सुबह और एकबार शाम , बांकी तो सब पुनरावृत्ति ही होता है। इधर जब देखना शुरू किया तो यह समाचार मनोवृति को प्रभावित करने लगा। आप अगर बहुत ही गंभीरता से सोचेंगे तो भय और अवसाद में खुद को पाएंगे , देश दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है मानो कोई कहानी का हिस्सा हो। ऐसे में लगातार tv  समाचार से बचना आवश्यक है , सुबह शाम ही ठीक है।, सोशल मीडिया में प्रचारित ज्ञान सबका निजी है, वह उनकी खुद की तर्क, ज्ञान और अध्ययनशीलता पर आधारित है। आप इससे ऐसे लोगो की योग्य को भी समझ सकते है फिर उन ज्ञान का चयन भी अपने लिए कर सकते है। कुछ जानकारी बहुत प्रभावित करती है तो कुछ अफवाहों से मन व्यथित होता है। कुछ लोगो की वो तर्क जो जबरन लोगो पर थोपने जैसा होता है। जो खुद तो अनुपालित नही करते लेकिन सोचते है कि अगला मेरी बात से प्रभावित हो जाया करे। ऐसा नही होने पर उन्हें झुंझलाहट होती है।
चूंकि कोरोना ने लोगो को नए सिरे से जिंदगी जीना सीखा दिया है। मानव जीवन का महत्व भी समझा  दिया है। अपनो और परायो के बीच का अनोनाश्रय सम्बंध की परिभाषा भी बता रहा है।  अपनी ही जीवन का महत्व कितना है आज लोग  समझ रहे है। , तेजी से भागी जा रही जीवन रफ्तार को बेपटरी होने से रोक लिया है। प्रकृति को समझने का समय दिया है। आप जिस जीव जंतु से मुख मोड़ चुके थे उसकी मुस्कुराहट, हठखेलिया को समझने के लिए बाध्य कर दिया है। जिस अपनो को त्याग कर आप प्रवास के लिए मन बना लिया था आज फिर से वापस होने की मजबूरी बन आ रही है। आज आपको अपने बहुत अपने याद आ रहे है। जीवन और उसका अपनो से सम्बन्ध कितना महत्वपूर्ण है यह समझने के लिए कोरोना शायद आवश्यक था।। आज आसमान साफ है, तारो के बीच आप खुद को निहार सकते है। फर्राटा से भागी हुई गाड़िया थम गई है आप रुक कर आसपास निहार सकते है। ये धरती ये नदिया, ये रैना सब आपको आज सुंदर दिखेगा। बस वो भय का कारण बना रहेगा जिसकी आलीशन कमाई से आप खुश होते थे। जिसको मजदूरी के लिए बाहर भेजते थे या जो अपनो के पेट भरने के लिए अपनो से दूर हो जाते थे। आज सब आपस मे मिलकर रहना चाहते है , सब साथ मे जीना चाहते है, साथ मे मरना चाहते है। लेकिन आज साथ मे मरने वालों की संख्या नगण्य के बराबर है।आपकी सारी ऐश्वर्य अब किसी को प्रभावित नही करता , आपसे सब डरते है कही सात समंदर पार से ऐश्वर्य के साथ मौत तो नही लेकर परोस रहे।  ..फेसबुक पर कई मार्मिक प्रसंग देखने पढ़ने सुनने को मिला रहा है। , एक आठ वर्षीय बालिका आलीशन पलंग पर लेटी रौ रही है। उसके माता पिता दूर से ही सांत्वना दे रहे है। कोई सिर पर हाथ रखकर दुलारने वाला  नही। जिसके गोद  में कल तक खेल रही थी आज वो सब पास आने से डर रहे है ,आखिर उस 8 वर्षीय कन्या का क्या दोष है!!आज माता पिता अपने दिल के टुकड़े को छू नही सकता। उसे जीते जी किसी और के हवाले करने को तैयार है। स्वस्थ हो गया तो वापस नही तो  उसे फिर कभी नही देख पाएंगे ..ता उम्र उस रोती छटपटाती चेहरा ही याद रहेगा।
हम मनुष्य  भी तो प्राकृतिक सीमा को लांघ गए थे। फिर यह आरोप प्रत्यारोप तो हम अपनी खीझ मिटाने के लिए कर रहे है। 
खुद को ईमानदार और दूसरों को जिम्मेदार ठहराने के लिए कर रहे है। लेकिन आज तो आप भी दूसरों के लिए दुश्मन है और दूसरा भी आपके लिए , फिर क्या तर्क।.......
सरकार पहले चेती होती तो......यह एक आम धारणा बन गयी है सम्पूर्ण विश्व के लिए। लेकिन शायद हम आप भी पहले चेते होते तो। आसमान छूने के इरादे से अपनी जड़ उखाड़ लिए फिर तो आपको यह दिन देखना ही था। आज भी जो जड़ में है उन्हें अपने या अपनो के लिए इतनी चिंता नही, वो तो विश्व मानव की चिंता में व्यस्त है। अपने पुत्र  को काबिल बनाने के लिए अपने से गई दूर कर दिए और खुद रह गए अकेले। फिर जमाने को क्या दोष देना। वो काबिल तो बन गया लेकिन वह क्या वही पुत्र है जिसकी कल्पना कर अपने पाला पोसा था ?? अब इस घड़ी में उस पुत्र को भी और आपको भी सब याद आ रहा है। शायद माता पिता के साथ होते, और शायद इस घड़ी में पुत्र भी साथ होता। समय विकराल है न जाने अगके क्या होगा।  अगर समय वापस अपनी जगह लौट आये तब भी इन बातों को फिर से सोचने का विषय है कि हम क्यूँ दुसरो से अधिक अगके निकलने के लिए बहुतों को सताते है, बेईमानी करते है, जीव, प्रकृति का शोषण करते है??आज क्या मिल रहा है। आज भी लोग कल के लिए धन का दोहन कर रहे है। उन्हें लगता है हम इस मौके से भी अमीर बन जाएंगे!!!आज हर व्यक्ति को व्यक्ति की मदद की जरूरत है। चाहे आप किस आर्थिक वर्ग, धर्म या जाति के है। इन सभी विपत्तियों से बचे रहने के लिए भारतीय दर्शन ही उचित था , है और रहेगा। हमारा आहार विहार और संस्कार।
क्रमशः

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

कुछ इसतरह

#कुछ_इस_तरह
आज फिर तुम याद आई
सावन में भींगती हुई  तुम
और हाथ हिला कर विदा करने की
वो आखिरी दृश्य
आज फिर याद आई 
वर्षो वर्षो बाद आज 
मेरे एक पोस्ट पर 
तेरी अंगुलिया स्पर्श कर गई
मानो तुम फिर अतीत की 
 टूटते दरवाजे पर आहिस्ता से
एक दस्तक देकर चली गयी
इस एकांत की अमराई में
एक मंद्धिम  बयार आईं
आज फिर तुम याद आई

तुम्हारा विस्मरण और 
मेरा स्मरण करना
दोनों ही नियमबद्ध था
न कोई शर्त था न कोई रिश्ते
न यात्रा था न पड़ाव
एक दृष्टि प्रतिबद्ध था
एक बार फिर  तूने 
एक आभासी शिष्टाचार निभाई
फिर तुम याद आई।
©nitesh