बुधवार, 17 दिसंबर 2025

वो आख़िरी कुछ दिन

::जीवन के आख़िरी पाँच महीना ::


जेल या कालापानी से अधिक यातना वाला दिन था वो ,जहाँ मुख से आवाज निकालना भी मौत का दावत देना जैसा था ।है तो यह नितांत व्यक्तिगत लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में यह एक सामाजिक सरोकार की घटना भी है इसलिए लिखना पड़ रहा है ।

किडनी फेल और छाती में इंफेक्शन कारण जिंदगी मौत से जूझते हुए मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली में एक महीना बीत चुका था ,इंश्योरेंस और नगद पैसा लगभग खत्म हो चुका था ,चूँकि प्रतिदिन वाहन सत्तर हज़ार से एक लाख रूपी खर्च हो रहे थे सो डॉक्टर से निवेदन किया गया की अब डिस्चार्ज करदे और यहीं दिल्ली में रहकर रूटीन में आपके अस्पताल से दवा लेंगे और डायलिसिस करवायेंगे !डॉक्टर ने कृपा की और डिस्चार्ज कर दिया ।स्तिथि अब भी नाजुक ही था ,बोल नहीं पा रहे थे हिलना डुलना भी असंभव था ,पेशाब की नली लगी थी ,खाने के लिए नाक में भी आहार नली लगी थी ,नित्यक्रिया भी बिस्तर पर ही निर्भर था ।ऐसे में दिल्ली में कहीं रहने की जगह चाहिए थी ,मेरा छत्तीस साल का बड़ा बेटा दिल्ली में ही हल्दीराम में बड़े पद पर कार्यरत है और परिवार लेकर रहता है ,वो दीगर बात है कि पिछले एक महीना में शायद एक आध बार ही मुझे देखने आया होगा अन्यथा दोनों छोटे बेटे ही सेवा में तन मन और धन से लगे थे ,मेरे भाइयों ने और छोटे बेटे ने बड़ी मान मनौवल के बाद उसे अपने यहाँ आश्रय देने को राजी किया वो भी इस शर्त पर कि मैं एक पैसा खर्च नहीं करूँगा ।खैर ये तय हुआ कि बड़ा रखेगा और डायलिसिस के लिए लें  जायेगा और लाएगा लेकिन पैसा नहीं देगा ,दूसरा केयर टेकर का पेमेंट करेगा और सबसे छोटा जितनी दवा लगेगी उसका खर्च वहन करेगा ।जब सब तय हो गया तो दोनों अपने अपने काम पर लौट गए ।मैं तीन जनवरी को हॉस्पिटल से उसके घर लाया गया !

     घर पर दो फिट चौड़ाई का एक बिस्तर मिला जो रोगी के लिहाज से उपयुक्त नहीं था ,कभी हाथ तो कभी पैर ख़ुद बख़ुद नीचे गिर जाता था ,दो तीन दिन उसे अपनी    सामएसयए ा बताई लेकिन बेटे ने इग्नोर कर दिया ।दो दिन तो डायलिसिस के लिए ले गया लेकिन लोटने के लिए केयर टेकर से बोल दिया की कैब कर के वापस आ जाना ।फिर या रोज की रूटीन हो गई मैं ख़ुद कैब करके जाता और केयर टेकर के सहारे वापस आता ।अब भोजन की समस्या होने लगी ,खाने की अगर नली एक सप्ताह में बाहर निकल दिया गया ।इम्युनिटी शून्य था सो डॉक्टर ने हाई प्रोटीन खाने को बोला था और थोड़ा थोड़ा चार से पाँच बार खाना था ।दवा भी समय से खानी थी ।अब सुबह का नास्ता कभी बारह बजे तो कभी तीन बजे मिलता ,दोपहर का भोजन कभी शाम पाँच बजे या फिर रात दस बजे ही एक साथ ,दवा और शरीर को हैवी डाइट चाहिए था ,इसके अभाव में रिकवर नहीं हो पा रहा था ,छोटे डन बेटे ने कभी कभार ऑनलाइन भेजना शुरू किया ।कभी को मेरे कमरे में आता भी नहीं था सो समस्या बढ़ती जा रही थी ,लेकिन भाइयों ने और बेटों ने फ़ोन से नित्य संपर्क बनाये रखा था ,भाइयों मेरे अकाउंट में पैसे भी भेजने शुरू कर दिए कि खुच मंगा कर खा लीजिएगा ।

        एक दी मौका पाकर बेटे से बोला कि ये बिस्तर बदल दो और खाने कुछ सुधार कर दो ताकि जल्दी रिकवर होकर चलें जाएं ।लेकिन हुआ उल्टा पति पत्नी ने मुझे जमकर फटकार लगाई ।बोला आप यहाँ से चले जाइए ,आप से मेरा कोई लगाव नहीं है ,आपने मेरे लिए किया ही क्या है ?कितना शांति से हमलोग रह रहे थे आपके आने से रोज पत्नी से क्लेश होता है ।

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया ।मैंने बोला -:क्षमता के अनुसार पढ़ाया जनेऊ किया ,सामाजिक दृष्टि से तुम्हारी शादी की ।कभी चौराहे पर तुम्हें कटोरा लेकर भीख नहीं मंगवाया ।आज मेरी मजबूरी है इसलिए तुम्हें हर हाल में मेरी मदद करनी पड़ेगी ,खुशी से या मजबूरी में ही सही ।

खूब बहसा बहसी के बाद दो दिन बाद किराए पर बिस्तर तो आ गया लेकिन खाने की रूटीन वही रहा ,अब खास बात ये रहा कि खाने में सब्जियां दस से पंद्रह दिन पुराना फ्रिज से निकल कर गर्म करके देने लगे ।तबीयत फिर से बिगड़ने लगी ।जोर जोर से खाँसी और उल्टी होने लगा ।

मैं अस्पताल ले चलने को गिड़गिड़ाता रहा लेकिन वो ले नहीं गया ।मजबूरी में बीच वाले बेटे को फ़ोन किया वो आकर हॉस्पिटल में भर्ती कराया ।एक सप्ताह के इलाज के दौरान बीच वाले ने बड़े बेटे को बुलाया और समझाने की कोशिश की लेकिन वो फिर उखड़ गया !उसने कहा :- मुझे आपसे कोई हमदर्दी नहीं है जिसको हमदर्दी है वो अपने साथ ले जाए ,मैं मेरी पत्नी इनको देखना नहीं चाहता ,इनके बीमार होने से मेरा सुख चैन खत्म हो गया है ।

मैंने पूछा तुमने किया क्या पैसे तो सब दूसरे खर्च कर रहे है “

उसने कहा आप पर खर्च करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं है ,जिसे खर्च करना है वो करे और आपको रखे ,मैं गुस्साया तो वहाँ से भाग गया ।

खैर मैं भी निर्लज्ज मैं दुबारा उसी के घर गया ,मेरी मजबूरी भी थी ,पहले ही जैसा व्यवहार बना रहा ,ना कोई पूछने आता ना कोई देख भाल ।केयर टेकर खाना लेकर दे जाता ,जिस दिन केयर टेकर लेट या छुट्टी कर देता उस दी पानी को भी तरस जाता ।कभी कभी तो बिल्कुल खाना ही बंद कर दी जाती  ।मैं पूछता तो बताते कि उसका आज तबियत ठीक नहीं था ।

मैंने कहा अगर यह बता दिए होते तो भूखे रहने के बजाए बाज़ार से खाना मंगवा लेता ।

अब दो महीने होने को था ,बड़े बेटे ने सभी सम्बन्धियों को फ़ोन करके बोलने लगा कि इन्हें कहीं ले जाए हम इन्हें एक पाल भी रखना नहीं चाहते ।बीच वाला बेटे से तो बहस कर लिया कि तुम हीं यहाँ रखे हो ले जाओ !

उसने मना किया तो उसे बोल दिया कि जीवन में मेरे दरवाजे पर तुम कभी मत आना ।

एक बार मुझे साँस की समस्या हो गई ,ऑक्सीजन बिल्कुल नीचे आ गया ।स्थिती गंभीर हो गई ,आनन फ़ानन में केयर टेकर के साथ को अस्पताल पहुँचा डॉक्टर ऑक्सीजन लगाया और फिर से भर्ती की सलाह दी ।उसने डॉक्टर से साफ़ साफ़ कहा कि ना तो मेरे पास पैसे है ना समय इसलिए मुझे इन्हें घर ले जाने दें ।छोटे बेटे से फ़ोन कर के बताया कि पापा की स्थिति क्रिटिकल है और अब मुश्किल है ।उसने छूटते ही बोला कि इतना मेहनत से हम लोग बचाए है अगर अब भी पापा को कुछ हुआ तो तुम्हारी लापरवाही समझी जाएगी और मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं,थोड़ा सहमा जरूर लेकिन भर्ती नहीं कराया ।हाँ मुझे उस हाल में भी बहुत भला बुरा कहा ।और मैं आँसुओं से सराबोर घर लौट आया ।

इधर मुझे रोज़ ताना और जलील करने कार्य जारी रहा ।


एक बार बेटे की पत्नी को फ़ूड पॉइजन हुआ एक दिन हॉस्पिटल में भर्ती रहा ।लौट कर आया तो बोला मेरा पाँच महीने का गर्भस्थ शिशु आपके कारण ख़राब हो गया “

मैंने पूछा ऐसा कौन सा काम किया था जिससे ये स्थिति आई ?मेरे लिए तो कुछ करती नहीं !

उसने कहा आप यहाँ है यही उसका तनाव है कृपया करके अब भी आप चले जाइए “

और मैं मजबूर निर्लज्ज फिर भी नहीं गया वहीं रहा ।

अब विभिन्न प्रकार की यातनाएँ शुरू हो गई ,आठ गुना दस के करे में बंद रहता था ,पहले से थोड़ा रिकवरी होने लगी थी ।नित्य भाई और बेटे ऑनलाइन खाना और समान भिजवाना शुरू कर दिया था ।अब उसकी पाबंदी थी कि आपसे कोई मिलने नहीं आयेगा ।मैं आपसे ही परेशान हूँ आपके घरवालों को नहीं झेल सकता ।अब जिसको आना होता वो आधे एक घंटे के लिए बाहर से मिलकर चला जाता ,खाने पीनें से परहेज करने लगा उसके घर ।

अब बेतरतीब भोजन और यातना की मुझे आदत सी हो गई थी ,अब इसकी चर्चा या शिकायत भी करना ख़ुद में ठीक नहीं लग रहा था ,अब मेरी रूटीन तय हो गई थी ,डायलिसिस कराने ख़ुद केयर टेकर के साथ जाना ,छोटे बेटे से दवा का पैसा लेना ,बीच वाला केयर टेकर का पेमेंट करता था ,भाइयों के दिए पैसे से कैब करता और ऑनलाइन भोजन मंगाता ।तीन महीना बीत गई लेकिन बात फिर भी खत्म नहीं हुई ,मुझे हटाने का प्रयास अनवरत जारी था ,अगर मेरे दो और बेटे और चार भाई नहीं होते तो ये पति पत्नी मिलकर जान से मार देते ।

अब इन सब बातों में मेरी कोई रुचि नहीं थी ,मैं मानसिक रूप से तैयार हो गया था कि ये मेरी सजा है और इसे तब तक काटना है जब तक मैं वापस जाने लायक ना हो जाऊँ ।क़ैदी वाला स्वभाव हो गया था ,चौबीस घंटे शून्य में ख़ुद को तलाशता रहता ,शारीरिक और आर्थिक परेशानी से सामना कर रही रहा था लेकिन अब मानसिक पीड़ा अधिक होने लगी थी ,अक्सर सोचता कि मैं क्यों बच गया ,जिस लड़के को अकेला पाला वो ही अपनी पत्नी के साथ मुझे मारने पर तुला है ,मेरी लाचारी और मजबूरी का फायदा उठा रहा है ,मैं कितना बेशर्म हूँ कि इतनी बुरी तरह यातना जलील के बाद भी यही रह रहा हूँ ।पिंजरे में फ़सा एक मरणासन्न पक्षी तरह छटपटा रहा था ,तभी पता चल कि मेरे तीसरे नम्बर का भाई मेरे सेवा में आ रहा है ,आया और सीधे बोला कि हम खाना बना कर भैया को खिलायेंगे और आप सब को भी !

बेटे ने मना कर दिया कि ऐसा नही न होने देंगे जैसा और जब बना कर देगी तभी खाना होगा ।

लेकिन दूसरे दिन ही बेटे की पत्नी मैके चली गई और भाई ने दस दिन खूब सेवा की बढ़िया भोजन बनाकर समय से दिया नतीजा मैं ख़ुद की पैरों पर खड़ा होने लगा ।ये सुख ज़्यादा दिन रहा नहीं वो मायके से लौट आई और पूरे गुस्से में थी ।उसी दिन मेरा दोनों बेटा भी आ गया ,अब समस्या और बढ़ गई ,आने के दूसरे दिन आधे अधूरा खाना बना कर पति पत्नी दोपहर को सैर पर मिल गए हिदायत ये भी दे गई कि किचेन में कुछ नहीं बनेगा !

मेरा सब्र का बांध टूट गया मैंने फ़ोन पर बेटे से पूछा तुम लोग अक्सर ऐसा क्यों कर रहे हो ,किचेन में खाना नहीं बनाओगे तो ख़ुद से बनाऊँगा ,लेकिन जवाब बेटे की जगह उसकी पत्नी ने दिया कि मेरे किचेन कोई खाना भी बनाएगा ।

मैंने बेटे से कहा कि मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ तुम्हारी पत्नी से नहीं ,मेरा हक तुमपर है तुम्हारी पत्नी पर नहीं ,लेकिन उसकी पत्नी अनवरत मुझे मोबाइल पर अनाप शनाप बोलती रही ,मैं बार बार कहता रहा कि देवी जी मुझे आपसे बात नहीं करना मैं मैं बेटे से बात करना चाहता हूँ ,उसे ही डाटूँगा और उस पर ही मेरा हक है उसे आने दो तब बताता हूँ “।

उसने तुरन जवाब दिया कि यदि आप कुछ कहे तो मैं आप सभी कमरे में बंद कर के आग लगा दूँगा “अब ये दोनों ने मर्यादा की सीमा लांघ चुके थे ,अब मेरी मजबूरी हो गई थी जमाने को देखते हुए ।

मैं व्हील चेयर के सहारे पुलिस स्टेशन जाकर एक शिकायत पत्र दिया ,पुलिस ने कहा कि आपके बेटे को बुलाकर मैं समझाता हूँ आप क्या चाहते है ,मैंने कहा कि बस इतना की जब तक चलने लायक ना हो जाय मुझे आश्रय दिया जाय ।

      पुलिस स्टेशन से फ़ोन जाने पर सब सहम गए उस दिन वो  घर नहीं लौटे ,उसे भाइयों ने बुलाया लेकिन वो आया नहीं ।

  दूसरे दिन कुछ जाल बन कर पुलिस के पास पहुँचा,वहाँ जाकर बोला कि में लोग मेरा घर कब्ज़ा कर लिए है और मुझे बाहर कर दिए है ।खैर पुलिस सब समझ गई ,तब तक मेरा एक भाई और एक बेटा गंतव्य को जा चुका था ,अब समय बीतने लगा ,खाने की रूटीन में तो सुधार हुई लेकिन फ्रिज का बासी खाना मिलना अनवरत जारी रहा ।

अचानक एक दिन ऊब कर मैं ने कहा कि मैं बनारस जाना चाहता हूँ और कल की मेरी हवाई जहाज की टिकट है , दोनों पति पत्नी में एक ख़ुशी का झोका चलने लगा ,फ़्लाईट पकड़ने तक मेरी खूब आवभगत हुई और मैं व्हील चेयर के सहारे मैं अकेला बनारस आ गया ,यहाँ छोटे बेटे ने कार से रिसीव कर लिया था ।

क्रमशः पार्ट 2

वो आख़िरी कुछ दिन 2

गतांक से आगे पार्ट 2

मैं बनारस आ गया था ,लेकिन मेरा आना छोटे बेटे को भी अच्छा नहीं लगा कारण जो भी रहा हो,कहता तो ये था कि दिल्ली में इलाज बेहतर होती आपको लौटना नहीं चाहिए था ,बीच वाला भी अपने यहाँ देहरादून बुलाया लेकिन लेने नहीं आया ,उसके यहाँ मेरे लिए समस्यां भी थी कि उसकी नौकरी की व्यस्तता में वो मेरा देखभाल  नहीं कर सकता और अकेले उस पर आर्थिक बोझ भी पड़ता । खैर मैं बनारस में डायलिसिस कराने लगा ,थोड़ा प्यार से थोड़ा खीझकर छोटा वाला सेवा करता रहा ,डायलिसिस करवाता रहा ,अब  आर्थिक समस्या आने लगी ,बड़ा वाला बोला था कि यहाँ से चले जाइएगा तो हर महीने दस हज़ार भेज दूँगा लेकिन उसने दो महीने तक फ़ोन करके भी कुशल क्षेम नहीं पूछा ,बिच वाला भी दो महीने बाद मदद करना बंद कर दिया ।कारण यह था कि मैंने निर्णय लिया कि अगर बड़ा वाला मदद नहीं करता और इन दोनों से संभव हो नहीं पा रहा तो क्यूँ ना गाँव में अपने हिस्से की जमींन बेच दें ।यहाँ बीच वाले को लालच आ गई और कहा कि वो जमीन आपकी नहीं है पुश्तैनी है इसलिए नहीं बेचने दूँगा ..वैग़ैरह वैगेरह …!इस बात से नाराज उसने भी संबंध तोड़ ली ।अब मुझे केवल छोटे वाले बेटे के आश्रय पर जीना था ।तीन महीने बाद फिर मैं दिल्ली गया डॉक्टर से दिखाने ।अकेला सफ़र करना मुश्किल था ,छोटे ने फ़्लाईट पर बिठा दिया ।बड़े वाले को फ़ोन करता रहा लेकिन उसने उठाया नहीं बाद में स्विचऑफ कर दिया ।बीच वाले को मैसेज किया उत्तर आया की मुझे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल रही ।अब मैं दिल्ली महानगर में अकेला लड़खड़ाता भटकने लगा ,ख़ुद के सहारे चला नहीं जाता और भीड़ वाली शहर ।बड़े वाले के व्हाटसप पर मैसेज भेजा तो शाम को कॉल आया कि आप कहाँ है ?मैंने कहा हॉस्पिटल में ,उसका जवाब था फ्री हो जाइएगा तो घर आ जाइएगा । मैं हतप्रभ और लाचार था ,डायलिसिस करवाकर रात को एक बजे फ्री हुआ तो उसके घर पहुंचा लेकिन जाते ही बता दिया कि दूसरे दिन मेरी वापसी की टिकट है ,वे सब राहत भरी सांस ली और दूसरे दिन समय से एयरपोर्ट पहुँचा दिया ।

 खैर अब बनारस में हीं डायलिसिस और दवा करवाता रहा बीच बीच में दिल्ली डॉक्टर से दिखाने जाता रहा ।अब आर्थिक समस्या छोटे वाले पर आ गया ,उसका खीझ बढ़ता जा रहा था कि जब दो बड़ा आपका देखभाल या आर्थिक सहयोग नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूँ ?उन दोनों को अपने क्या कर लिया ? खैर उसकी ये बात मैं बचपना समझकर नजरंदाज कर देता रहा । ग्यारह महीना  हो  चुका  था  इस  गंभीर समस्या  se गुजरते  हुए ।दो भाई बीच बीच में आर्थिक मदद कर रहे थे लेकिन वो भी काफ़ी नहीं था झेलना छोटे वाले बेटे को ही था ।इस बीच मेरे कुछ शुभचिंतक मेरे मदद में मेरा आर्थिक सहयोग करने लगे ,जद्दोजहद में जिंदगी चलने लगी । हर दूसरे दिन डायलिसिस होनी थी और हर डायलिसिस के लिए इंतज़ाम करना दुर्लभ हो जाता लेकिन ईश्वर को जो मंजूर!

भाइयों ने भी थोड़ी  हाथ खिंचना शुरू कर दिया ,इधर गांव की जमीन बिक नहीं रहा था ,एक एक दाने और दवा का मुहताज होने लगा फिर ….


फिर एक दिन छोटे वाले ने भी जवाब दे लिया ।आप अपना देखे ,अपना कमाता हूँ अपना खाता हूँ अपने ढंग से जियूँगा ,आप अपना देख लीजिए ।

मेरा आख़िरी सहारा भी ख़त्म हो गया ।लेकिन हाँ तब से मैं बहुत मज़बूत हो गया ।चूँकि इस तरह के तिरस्कार की मैं आदि हो गया था ।

अब मैं ख़ुद से गिरते पड़ते डायलिसिस के लिए जाता हूँ ,दवा लेने जाता हूँ ,कोई सड़क पार करवा देता ,कभी गिर जाता हूँ तो कोई उठा देता है ।एक  कप  पानी  भी  ख़ुद  से  लाना  पड़ता  है ।दर्द  से  कराहता  हूँ  लेकिन  ख़ुद  से  करता  हूँ उसे  मेरी  कराह  तक  सुनना  पसंद  नहीं ।जबकि  सभी  को  बारी  बारी  अकेले  पाला  पोशा  हूँ अनाथ  बच्चों  की  तरह ।हाँ  ग़ैर  जो  मुझे  नहीं  जानते  वो  भी कभी कभी कोई दो सहानुभूति के शब्द बोल जाता है ।हाँ  जब कोई  पूछ  देता  है  कि  आपके  साथ  कोई  नहीं  है तब  कहते हुए  आँसू  निकल  जाते  है  कि  सब  था  अब  कोई  नहीं ।कुछ अच्छे कर्म बचे है सो कुछ शुभचिंतक आर्थिक सहयोग कर देते है ईश्वर उन्हें दुनियाँ का सारा ऐश्वर्य दे ।

इतनी लाचारी पर तो अब ख़ुद पर दया आती है ,कभी कभी लाचारी में बुरी तरह गिड़गिड़ाना पड़ता है ,आत्मसम्मान की चिता ना जाने कब की जल चुकी । ईश्वर से यही याचना है कि शीघ्र ही इस शरीर से मुक्ति दिला दें ।मेरे इस हालात पर अपनों के साथ कई योग्य मित्र ,जानने वाले ,या जिनके हम कभी चहेते हुआ करते थे सभी के सभी मुझे अदृश्य कर दिए ।कुशल क्षेम भी पूछना मुनासिब नहीं समझते जबकि किसी से कुछ मांगा नहीं ,जिससे मांगा वो दिया नहीं ।जो दिया वो किसको बताने से मना कर दिया । यही ईश्वर का अनुपम नाटक हो ।

आप शारीरिक पीड़ा सह सकते है लेकिन मानसिक वेदना आपको व्याकुल और विक्षिप्त बना देता है ।आज मैं उसी दौर में हूँ।

नई फसल है

मैं एक सुंदर फुल खिलता देखना चाहता था 

इसलिए 

गमलों में नियमित खाद और पानी डाला था 

पहली बार घने झाड़ के बीच 

काँटों को खिलता देखा 

हतप्रभ था 

तभी लोगों ने समझाया 

आबो हवा बदल गई है 

कई पौधों में फूल नहीं 

कांटे ही खिलते है 

स्वीकार तो करना ही पड़ेगा 

अंक में लेलो या 

बचकर निकल लो 

है तो अपने ही गमले का 

क्या हुआ खुशबू की जगह 

चुभन मिला तो 

ये नई आबोहवा का 

नई फसल है 

ये गमले में उग रहे नई नस्ल है 

©️nitesh bhardwaj

शनिवार, 1 नवंबर 2025

Pg

 मन भटकता है फिर आज पीपल के छाँव में 

वही बचपन की पगडंडी वाली गाँव में 

मिट्टी की टूटे खपरा से खेल लेते थे कई खेल 

कभी गुच्ची तो कभी पिट्ठू 

कभी नचा कर तोड़ डालते एक दूसरे की लट्टू 

कभी साइकल की पहिया तो कभी मिट्टी की बनाते रेल 

भैंस की पीठ बैठ करते हवाई सफ़र 

कभी पुआल के टाल में छुपा छुपी का खेल 

साँझ होते ही रंग बिरंगी दीयों की रोशनी में 

बैठ जाता स्लेट और खल्ली लेकर 

बहाने तरह तरह के बनाता 

कुछ बड़े बुजुर्गों को देखकर 

सवैया ढैया का सवाल सुनकर 

कभी नींद तो कभी भूख के बहाने 

भाग जाता दालान से घर बुझते दीये के तेल लाने 

दिन होते लाल चाय में डुबो कर खा लेता रोटी 

थोड़ी देर बाद ही मिलती माड़ भात या मक्के की रोटी 

चड्ढी या पेंट का मतलब नहीं जान पाया था 

अवसर पाते ही कुआँ या तालाब में खोलकर 

नहा लिया था 


मिट्टी का घर था उसमें खिड़की के नाम पर था झरोखा 

शीशम की चौखट में था भरी भरकम दरवाज़ा 

 किल्ली अनुपस्थित और उपस्थिति को दर्शाता था 

पसीने से लथपथ होने पर घड़े का पानी 

किसी एनर्जी ड्रिंक से कम ना था 

मिट्टी से खेलना 

मिट्टी में लोटना 

कहीं चोट मोच या खरोंच होने पर 

मिट्टी ही लपेटना 

तब किसी इंफेक्शन का डर ना था 


तमाम शैतानियों के बीच 

सीखनी होती थी गाम घर की संस्कार 

आगंतुकों को लौटा भर जल देकर ही 

मिल जाता था भरपूर प्यार 


जाने कहाँ गुम हो गए 

वो पगडंडी वो दीये वो चौखट 

वो किल्ली वो खेत खलिहान 

वो बैल की गले का रुनझुन 

वो सुबह की पराती 

वो दादी नानी की कहानी 

वो परियों का सपना वो राजा वो रानी 

ना जाने नल के आगे 

कब सुख गया कुएँ का पानी 

जी करता है 

फिर से झुका दूँ अपनी  माथा खड़ाऊँ वाले पाँव में 

मन भटकता है फिर आज पीपल के छाँव में ।

©️nitesh bhardwaj

गुरुवार, 22 मई 2025

एक गाँव चाहिए

 एक गाँव चाहिए 

जो शहर जैसा ना हो 

पीपल का छांव चाहिए 

जो खजूर जैसा ना हो 

सुविधा कम हो 

लेकिन पुरातन हो 

खुले आसमान हो 

बंद कमरे जैसा ना हो 

मिट्टी हो ,अँगीठी हो 

लीपा हुआ आँगन हो 

केला की पात हो 

मिट्टी का घड़ा हो 

द्वारे पर खाट हो 

गाय हो बछड़ा हो 

बैल की गले की घंटी हो 

एक अलाव हो 

पड़ोसी से लगाव हो 

मिट्टी  का  हो  या  फूस  का  हो 

परन्तु कंक्रीट का जंगल जैसा ना हो 

एक गांव चाहिए 

जो शहर जैसा ना हो 

-:क्रमशः 

©️nitesh bhardwaj

रविवार, 3 मार्च 2024

बसंत आते ही

कुछ पंक्तियाँ मैं भी लिख लेता था 

बसंत आते ही 

जैसे ही तुम गर्म शाल उतार 

कर दुपट्टा ओढ़ती 

सरसों की फूल सा शृंगार 

शब्दों से सजाने लगता 

पलाश की फूलों से 

तेरे गालों का रंग भरता 

कलकतिया गुलाब से अधर सजाता 

और अमराई  से तेरी गेसुओं की ख़ुशबू 

बसंती चुनरी से ख़ुद खेलने लग जाता 

हर साल यही लगता कि

यह सोलहवाँ फागुन है 

रात खुली आँखों से सपने बुनता 

और दिन मदमस्त अलसाई सी 

आज 

पता ही नहीं चलता कि 

कब फागुन का रंग चढ़ा और धूल गई 

किसे कौन याद रहा और 

कौन कब भूल गई ।

©️nitesh

गुरुवार, 18 मई 2023

मुझे

मुझे 

अब कोई बात बुरी नहीं लगती 

कोई हालात बुरी नहीं लगती 

सबके अपने अपने तौर तरीक़े है 

इसलिए कोई आदत बुरी नहीं लगती 


ना कोई सम्मान ऊँचा उठाता है मुझे 

ना अब अपमान नीचा गिराता है 

जो जिस मोड़ पर जैसे मिल जाए 

वैसे ही अपना लेता हूँ 

अब कोई शख़्स बुरा नहीं लगता 


ना किसी धर्म से कोई मतलब 

ना किसी जाति का मोह 

ना किसी का अनदेखापन 

ना किसी का दुत्कार की परवाह 

अब किसी की नफ़रत बुरी नहीं लगती 


ना अपनापन की चाह की चिंता 

ना किसी की ईर्ष्या की परवाह 

मिल जाओ तो ख़ुशी ना मिलो तो मस्त 

अब किसी की इंतज़ार बुरी नहीं लगती 


मुझे 

अब कोई बात बुरी नहीं लगती 

@nitesh