अमूमन शांत और कम बोलने वाला आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र आज विकास के नाम पर सभ्य दिखने वालों बहरूपिये लुटेरों के जकड़ में फंस गया है। बात विकास की थी,इनके आदिम युग वाली जनजीवन से बाहर निकाल कर शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोजगार देने की थी लेकिन जिम्मेदार इनकी बेशकीमती जंगल, खनिज और उपजाऊ जमीन इनसे छीनकर इनको प्रतिदिनसंगीन अपराधी घोषित कर जेल भेज रहे है,, इनके सदियों की आशियाना को उजाड़कर , कोई फार्म हाउस , स्कूल, आलीशान मकान, खेत, आश्रम, और व्यापार चला रहे है। कथित समाजसेवी, सफेदपोश नेता, प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी, और व्यापारी अपना साम्राज्य स्थापित कर इन्हें फिर से मजबूर कर नक्सली बनने को बाध्य कर रहे है। जबकि भोले भाले निरीह आदिवासी अब तक न तो लोकतंत्र ने अपने जीवन का अधिकार समझ पाए न ही मौलिक आवश्यकताओ तक पहुंच सके , 2004 तक घास की रोटी खाने वाले, नाले की पानी पीने वाले , और अंधविश्वास में जीने वाले ये जन जीवन अब भी जीवन के भौतिक दर्शन से परिचित नही है। जो है उसी को नियति समझ जीवन यापन कर लेते है।
ऐसे में संगठित हो अपनी जमीन और अस्मिता की रक्षा के लिए जब भी आगे आता है उसे मौत ही मिलती है। यातनाएं ही दिया जाता है ,मानो वो जीवन न हो ,वो भारत का मूल नही हो। कथित विकसित सभ्य और भोले भाले आदिवासियों के बीच की लड़ाई में अक्सर ये पराजित ही जाते है।
आजादी के बाद से इनकी ही जमीन को इनके बिना विश्वास में लिए सभी बन्दरबाँट करते रहे । न तो इनको कभी मुआवजा दिया गया ,न ही इनसे इज़ाज़त ली गयी। सभी दल के सत्ता के नुमाइंदे इनके साथ ज्यादती ही करता रहा है। चालाक, दबंग, लोगो का शिकार होना इनकी नियति बन गयी है।न्याय के द्वार पर भी इनके सहयोग करने वाले कम ठगने और विरोधी के संग गठजोड़ वाले अधिक है। राजनीति और नेतृत्व विहीन ये आदिवासी राजनीतिज्ञों का शिकार होकर सबकुछ लुटा बैठे है ।ऐसे में इनकी आवाज अगर मीडिया की आवाज बनती है तो इनका जीवन भी देश के आम नागरिकों की हैसियत से हो जाएगी।
वर्तमान परिपेक्ष्य में अपनी मूल जमीन के लिए संघर्ष के दौरान 10 गरीबो की हत्या और 16 का घायल होना मीडिया और राजनीति की सुर्खियों में है । ये घटना न तो पहली है और नही आखिरी। जब तक सोनभद्र की लाखों हेक्टेयर जमीन को सफेदपोश , नेताओ, व्यापारियों के कब्जे से मुक्त कर मूल आदिवासियों को लौटाया नही जाता। हमारी 50 मिनट की फ़िल्म "सांझ भईल" 2004 की बनी हुई है , ये उस समय की हालात को दर्शाती है कि अमूमन सामान्य जानकारी से दूर ये गरीब किस तरह सर्वे सेटलमेंट, समाजसेवी, प्रशासन, न्यायप्रणाली,पुलिस और दबंग की चक्रव्यूह में अपना सबकुछ गवां कर कालकलवित हो जाता है ,इनकी पीढ़ियों पर नक्सली की तमगा लगा दी जाती है जबकि नक्सली शब्द इन्हें मालूम भी नही है।
सोनभद्र की लूट की तत्कालीन और वर्तमान परिस्थिति को समझने में ये फ़िल्म सहायक होगी इस उद्देश्य से यह आपके समक्ष प्रस्तुत है।
मैंने सोनभद्र में1984 से छात्र जीवन से ही पत्रकारिता साप्ताहिक अखबार में लिख कर शुरु की, 1986 से आदिवासी गांवों का जीवन मेरे आकर्षण का केंद्र रहा है। इन्ही की जीवन से प्रभावित हो मैंने यह टेली फ़िल्म का निर्माण कम संसाधन और सामान्य तकनीक से किया। इसके बाद भी क्षेत्र के विकास के किये पुलिस की कम्युनिटी कार्य मे सहयोग कर इस क्षेत्र के जनजीवन स्तर बदलने में सहयोग किया जिसके किये मुझे कई प्रसस्ति पत्र भी मिले। सड़क के विकास के साथ ही सोनभद्र के नैसर्गिक सौंदर्य को पर्यटकों तक पहुचाने के लिए निरंतर फोटो, लेख , भ्रमण , ब्रोशर और सेमिनार के माध्यम से सोनभद्र को प्रचारित करने का कार्य किया। 2009 में आदिवासियों को नक्सल गतिविधियों से दूर बच्चो को शिक्षा से जोड़ने के लिए 55 मिनट की एक फ़िल्म "राह आपन भाग्य आपन" का निर्माण किया जिसकी संकल्पना तात्कालीन पुलिस अधीक्षक रामकुमार जी थे। आदिवासियों के जीवन और कम्यूनिटी पुलिसिंग, मनरेगा की उपयोगिता,पर्यटन, शिक्षा आदि अपर अब तक मैंने 60 से अधिक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म का निर्माण कर संबंधित विभागों और संस्थानों को देता रहा हूँ।