सोमवार, 22 जुलाई 2019

लाल होती मिट्टी

अमूमन शांत और कम बोलने वाला आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र आज विकास के नाम पर सभ्य दिखने वालों बहरूपिये लुटेरों के जकड़ में फंस गया है। बात विकास की थी,इनके आदिम युग वाली जनजीवन से बाहर निकाल कर शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोजगार देने की थी लेकिन जिम्मेदार इनकी बेशकीमती जंगल, खनिज और उपजाऊ जमीन इनसे छीनकर इनको प्रतिदिनसंगीन अपराधी घोषित कर जेल भेज रहे है,, इनके सदियों की आशियाना को उजाड़कर , कोई फार्म हाउस , स्कूल, आलीशान मकान, खेत, आश्रम, और व्यापार चला रहे है।  कथित समाजसेवी, सफेदपोश नेता, प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी, और व्यापारी अपना साम्राज्य स्थापित कर  इन्हें फिर से मजबूर कर नक्सली बनने को बाध्य कर रहे है। जबकि भोले भाले निरीह आदिवासी अब तक न तो लोकतंत्र ने अपने जीवन का अधिकार समझ पाए न ही मौलिक आवश्यकताओ तक पहुंच सके , 2004 तक घास की रोटी खाने वाले, नाले की पानी पीने वाले , और  अंधविश्वास में जीने वाले  ये जन जीवन अब भी जीवन के भौतिक दर्शन से परिचित नही है। जो है उसी को नियति समझ  जीवन यापन कर लेते है।
ऐसे में संगठित हो अपनी जमीन और अस्मिता की रक्षा के लिए जब भी आगे आता है उसे मौत ही मिलती है। यातनाएं ही दिया जाता है ,मानो वो जीवन न हो ,वो  भारत का मूल नही हो। कथित विकसित सभ्य और  भोले भाले आदिवासियों के बीच की लड़ाई में अक्सर ये पराजित ही जाते है।
आजादी के बाद से इनकी ही जमीन को इनके बिना विश्वास में लिए सभी बन्दरबाँट करते रहे । न तो इनको कभी मुआवजा दिया गया ,न ही इनसे इज़ाज़त ली गयी। सभी दल के सत्ता के नुमाइंदे इनके साथ ज्यादती ही करता रहा है। चालाक, दबंग, लोगो का शिकार होना इनकी नियति बन गयी है।न्याय के द्वार पर भी इनके सहयोग करने वाले कम ठगने और विरोधी के संग गठजोड़ वाले अधिक है। राजनीति और नेतृत्व विहीन ये आदिवासी राजनीतिज्ञों का शिकार होकर सबकुछ लुटा बैठे है ।ऐसे में इनकी आवाज अगर मीडिया की आवाज बनती है तो इनका जीवन भी देश के आम नागरिकों की हैसियत से हो जाएगी।
वर्तमान परिपेक्ष्य में अपनी मूल जमीन के लिए संघर्ष के दौरान 10  गरीबो की हत्या और 16 का घायल होना मीडिया और राजनीति की सुर्खियों में है । ये घटना न तो पहली है और नही आखिरी। जब तक सोनभद्र की लाखों हेक्टेयर जमीन को सफेदपोश , नेताओ, व्यापारियों के कब्जे से मुक्त कर मूल आदिवासियों को लौटाया नही जाता। हमारी 50 मिनट की  फ़िल्म "सांझ भईल" 2004 की बनी हुई है , ये उस समय की हालात को दर्शाती है कि अमूमन सामान्य जानकारी से दूर ये गरीब किस तरह सर्वे सेटलमेंट, समाजसेवी, प्रशासन, न्यायप्रणाली,पुलिस और दबंग की चक्रव्यूह में अपना सबकुछ गवां कर कालकलवित हो जाता है ,इनकी पीढ़ियों पर नक्सली की तमगा लगा दी जाती है जबकि नक्सली शब्द इन्हें मालूम भी नही है।
सोनभद्र  की लूट की तत्कालीन और वर्तमान परिस्थिति को समझने में  ये फ़िल्म सहायक होगी इस उद्देश्य से यह आपके समक्ष प्रस्तुत है।

मैंने सोनभद्र में1984 से छात्र जीवन से ही पत्रकारिता साप्ताहिक अखबार में लिख कर शुरु की, 1986  से आदिवासी गांवों का जीवन मेरे आकर्षण का केंद्र रहा है। इन्ही की जीवन से प्रभावित हो मैंने यह टेली फ़िल्म का निर्माण कम संसाधन और सामान्य तकनीक से किया। इसके बाद भी क्षेत्र के विकास के किये पुलिस की  कम्युनिटी कार्य मे सहयोग कर   इस क्षेत्र के  जनजीवन स्तर बदलने में सहयोग किया जिसके किये मुझे कई प्रसस्ति पत्र भी मिले। सड़क के विकास के साथ ही सोनभद्र के नैसर्गिक सौंदर्य को पर्यटकों तक पहुचाने के लिए निरंतर फोटो, लेख , भ्रमण , ब्रोशर और सेमिनार  के माध्यम से सोनभद्र को प्रचारित करने का कार्य किया। 2009 में आदिवासियों  को नक्सल गतिविधियों से दूर बच्चो को शिक्षा से जोड़ने के लिए 55 मिनट की एक फ़िल्म "राह आपन भाग्य आपन" का निर्माण किया जिसकी संकल्पना तात्कालीन पुलिस अधीक्षक रामकुमार जी थे। आदिवासियों के जीवन और कम्यूनिटी पुलिसिंग, मनरेगा की उपयोगिता,पर्यटन, शिक्षा आदि अपर अब तक मैंने 60 से अधिक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म का निर्माण कर  संबंधित विभागों और संस्थानों को देता रहा हूँ।

बुधवार, 17 जुलाई 2019

जमीनी विवाद में 10 की हत्या

सोनभद्र की घोरावल थाना के मूर्तिया गांव में 10 लोगों की हत्या और 24 लोगो  का घायल होना, जनपद ही नही प्रदेश के लिए चिंता का विषय है, प्रश्न केवल ये नही है कि कानून व्यवस्था ही असफल है ,प्रश्न ये भी है कि स्थानीय और जिले के जिम्मेदार राजस्व विभाग इसे रोक सकता था।
पुलिस की नजरिये से देखा जाए तो एक बहुत बड़ी विफलता है कि 32 ट्रैक्टर से 300 लोगो की कब्जा करने की तैयारी और ये सभी का मौके पर पहुंच जाना स्थानीय और जिले की पुलिस पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या सब इस घटना के लिए पहले से मैनेज थे?? अपराधियो को भेज कर घटना का या जमीन कब्जा होने का इंतज़ार कर रहे थे?? क्या इसे समय रहते रोका नही जा सकता था ???
खैर ये तो तात्कालिक उपाय था लेकिन सोनभद्र में जो कभी मुफ्त का जमीन हुआ करता था आज समय के साथ बेशकीमती हो चला है उसे आदिवासियों के ही से अलग सफेदपोश ,दबंग, और राजनीतिक रुतबा वालो के नाम कर  भविष्य की बड़ी बड़ी घटना को जन्म देने का काम सर्वे सेटलमेंट और राजस्व विभाग ने किया है। अनुमानतः डेढ़ लाख हेक्टेयर सरकारी और गैरसरकारी जमीन को इन लोगो ने कब्जा कर रखा है। सरकारी नुमाइंदे रिश्वत खाकर सरकारी जमीन की खोजखबर नही लेते वही गरीब अपनी बेबसी के कारण अपनी ही पुस्तैनी जमीन से हाथ धो बैठते है। अब जब ये बेशक़ीमती होने चला है तो इन  गरीबो के पीछे भी कोई स्वार्थवश खड़ा हो गया है (इस घटना से ताल्लुक नही) नेपथ्य से कब्ज कब्जा की लड़ाई शुरू हो गयी है, ऐसे में ये घटना न तो पहली है और न ही आखिरी सोनभद्र के परिपेक्ष्य में। पूर्व और वर्तमान की जिम्मेदारों को जबतक जेल भेजने की कारवाई नही होगी ये घटना होती रहेगी , लोग मूकदर्शक बनकर देखते रहेंगे।
मूर्तिया गांव की घटना राजनीतिक दें नही है ये अधिकारियों ,कर्मचारियों की उपज है, इनपर अगर करवाई नही होती तो सांप की लकीर पीटने से क्या फायदा?सोनभद्र राजनीतिक और सामाजिक संवेदना शून्य है , यहाँ केवल सम्वेदनायें अवैध खनन, परिवहन के हिस्से के लिए उपजती है , ऐसे में कुछ मानवाधिकार सरीखे संघठन ,आगे आकर इनकी लड़ाई लड़कर इन क्रूरता से इनकी रक्षा करवा सकती है। नेता तो इसमें भी अपनी आर्थिक स्वार्थ ही ढूढेंगे।

रोया है आज बाढ़ भी

बहुत रोया है आज बाढ़ भी
थम सा गया पानी का वेग
धरती भी कांप गयी
मानवता का हृदय भी
आज छलनी हो गया
जब मछली की जाल में
एक मासूम का मृत शरीर
मुस्कुराता हुआ बाहर निकला

माँ की स्तनों से चिपका लाल
काल के गाल में समा गया
अकेले ही नही था बाढ़ का वारिस
उसकी माँ, बहन और भाई भी थे
सबकी लाशें आयी
पानी से उतारकर
लेकिन वो लाल अब भी
बाहें फैला कर
माँ की गोद मे जाने को जिद्द कर रहा था
पानी मे कितना गोते लगाया होगा ये
डूबते हुए भी अपनी माँ भाई बहन को
तलाशा होगा
किलकारियां मारी होगी
लेकिन काल को दया नही आई
कुछ कर तो नही सकता मानव
पर आज बहुत कोशा है सबने
क्रूर काल को,बाढ़ को
खुद को और जिम्मेदार को
बहुत रोया सबने
हृदय सूख सा गया था ,
धड़कने थम सी गयी
पानी मे फेंके जाल से निकला
ये मुस्कुराता नोनिहाल का शव
को देखकर ।
©नितेश भारद्वाज

रविवार, 14 जुलाई 2019

नाम से डरती है

(1)
देहरी पर बैठी वो
गुमसुम सी एकटक
मुझे निहार रही थी
मौन शब्द में न जाने
क्या विचार रही थी,
तेज से मद्धिम प्रकाश में
हम विदा हो रहे थे
वो यूँ ही एक टक थी
सांवली सलोनी मुखड़ा
दिल मे बसाए आ तो गया था
लेकिन उस देहरी पर ही
कुछ छोड़ आया था
लम्हो बाद गया था
आज फिर ढूढने उसे
सिवा निशान के कुछ था नही
वक़्त है  वो
बदलना तो नियति थी
बदल गयी
कल वो दिल मे थी
आज किसी और की हो गयी

(2)
मुद्दतों बाद वो यूँ मिली जैसे
मातम में अपने मिलते हो
बहुत शौक जताया
ढाढस बंधाया
कुछ जख्मो को सहलाया
कुरेदा
और कुरेदने की वादा कर गई
अपनी अहसासों की
उपस्थिति दर्ज कराती रही
किसी और की है वो
ये बताती रही
दुआएं बहुत दी वो
मेरे सलामती का
बिन साथ जीने की नुख्सा
बताती रही

(3)
अब वो
मेरे इल्ज़ाम से डरती है
मेरी थी कह तो लेती है
किसी बदनाम से डरती है
भरोसा करती है
भरोसा दिलाती नही
किसी ओर के भरोसे से भी
डरती है

प्यार पाना नही खोने का नाम है
एक अहसासों से जीने का नाम है
तू ना सही 
तेरी बन्द आंखे ,मौन शब्द
बची जिंदगी के लिए बहुत है
वो मेरे नाम से भी डरती है।

शनिवार, 13 जुलाई 2019

सुकूँ

मैंने अभाव को भी देखा है
धन की बहाव को भी देखा है
सुकूँ इस मे भी नही
सुकूँ उस मे भी नहीं
भूख से बिलखते बच्चे
एक खुराक दवा की जरूरतें
फटेहाली में पत्नी का तंज
ढकने को बेटियों का तन
परेशान सा
उस इंसान को भी देखा है

नोटो की गड्डियों की ढेर
रिश्वत काली कमाई वाली
अफसर
जमाखोरी ,नोटो की बिस्तर वाले
फर्जी बनिया,पत्रकार,दलाल
डॉक्टर
सबकी माथे पर
एक चिंता की लकीर देखा है

इनकी बच्चो की भूख
तो उनके बच्चों की शौक
इनकी जरूरतें तो उनकी अय्यासी
इनकी स्त्री की पारिवारिक चिंता
उनकी स्त्री की खरीददारी
इनके साथ साथ रहने से अनबन
उनके एक पल के साथ के लिए घुटन
इनकी चूल्हे चौकी की दिनचर्या
उनके सामाजिक स्टेटस की चर्चा

सुकूँ न इधर है न उधर है
एक को अभाव से निकलना है
दूसरे को बहाव में डूबने से बचना है
उसे बहुत मसक्कत से मिलती है रोटियां
इनका हर दिन बर्बाद हो जाती  है रोटियां
कुछ भी तो नही है
न सुकूँ इधर है
न सुकूँ उधर है
हर पल जिसके होठो पर मुस्कान है
सुकून में आज वही इंसान है
©नितेश भारद्वाज

रविवार, 7 जुलाई 2019

स्पंदन

तेरा स्नेह
मेरे लगभग सुख चुकी
हरीतिमा की पल्लव पर
ओस की एक बूंद है
या फिर पहली बारिश की फुहार
समझ मे नही आ रहा इसे
सहेजूँ या इसमे भींग जाऊं
हवा की आवारगी सा मुझे
बहका रही है तेरी बातें
बिन कारण जग रही है ये रातें
न कोई  डोर न कोई बंधन
न कोई आशा न कोई स्पंदन
न कोई उम्मीद न  मौन की भाषा
न खोने का भय न कोई अभिलाषा
फिर क्यूँ.. क्यूँ क्यूँ
अपनो सी हो तुम
नव पल्लव हो तुम
सुखी डाल पर टिक नही पाओगी
तेरी रस फुहार से
कुछ हरा नही हो पायेगा
हाँ कुछ उकेरा जाएगा मृत पत्थर पर
जख्मो के निशान, लगभग मिट चुकी
कहानियां,
निःशब्द अकथनीय  भावनाएं
जिसे न तो पढ़ पाओगी
न समझ पाओगी
तुम में तूफान से जूझने की
अभी अपार शक्ति है
लेकिन  तिनको को रोक रखना
तेरे बस की बात नही
लौट जाओ
हाँ लौट जाओ उन हरीतिमा के वनों में
जहां तेरी कद्र है
लोगो की फिक्र है
श्रुति है संकल्प है
जहां सम्भावनाये है, सम्वेदनाएँ है
जीवन है, उम्मीद की किरण है
तेरी स्नेहिल वर्षा का आलिंगन है।
©नितेश भारद्वाज