मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

मेरा एकान्तवास 30

#मेरा_एकान्तवास 30
 मैं इंटरमीडिएट का छात्र था, कुछ ही दी पहले बिहार से यूपी में पढ़ने आया था। कालोनी का वातावरण बिल्कुल एक परिवार जैसा था ,सो जल्दी ही सबसे घुलमिल गया।  ढेर सारे चाचा चाची भैया दीदी मिल गए।  हमसे छोटे उम्र के लड़के लडकिया भी सम्मान देने लगे थे। मेरे पड़ोस में एक घर छोड़कर चाचाजी के दो बेटे दो बेटियां थी।  सभी मुझसे एक से 6 साल तक की छोटे ही थे, चाची जी बहुत ही निष्ठावान थी ,बहुत मानती थी मुझे, उनकी दोनों बेटियां बहुत सुंदर, चंचल थी , जैसे ही मुझे देखती दरवाजे, पेड़, फूलों की झाड़ी में छुप जाती। सुबह और दोपहर अक्सर झाड़ू लगाने  निकलती और मैं बोल देता, "मेरे घर भी लगा देना झाड़ू, हाँ दो चार बर्तन भी है उसे भी माज देना"... फिर क्या झाड़ू पटक  कर भाग जाती।   मुश्किल से ही कभी मेरे सामने पड़ती। दरवाजे से निकलने से पहले इत्मीनान हो जाती की मैं बाहर तो नही हूँ। छुटकी तो और भी सुंदर थी यही कोई 13 या 14 साल की रही होगी।  ईश्वर ने बड़ी फुर्सत में उसे सांचे में ढाला होगा। मंद्धिम और नीली आंखे, बड़ी बड़ी बाल दूधिया गोरापन, इसी उम्र में संस्कार भी बड़ो जैसा ,क्या मजाल कि कभी सिर उठा कर चले , स्कूल आते जाते गर्दन झुकी ही रहती। अचानक से कभी रास्ते मे मिल जाती तो टोक देता कि गर्दन टूट जाएगी, कोई पीछे से ठोकर मार देगा।  "
फिर तो वो शर्म से गर्दन और झुका लेती मानो कोशिस कर रही हो कि यही गड्ढा हो जाये और उसमे छुप जाए। मुझे आज भी याद है बाजार में मैं किसी दुकान के पास खड़ा था, वो उधर से स्कूल से आ रही थी ,मुझे देखकर वह गुमटी के पीछे छुप गयी.. और तब तक छुपी रही जब तक मैं वहाँ से हट नही गया।
दोनों बहनों का स्वभाव जान गया था इसलिए  मैं भी उसे मौका कम ही देता , लेकिन कभी कभी चिढ़ाने के लिए शरारत कर लेता। वो दोनों मेरे साइकिल का ख्याल रखती थी ,अगर  साइकिल बाहर खड़ी है तो वो सचेत हो जाती कि हम घर पर ही है। अगर साइकल नही है तो तितलियों की तरह फुदकने लगती। मैं उसके घर पर भी जाता और चाची से पूछता छुटकी पढ़ रही है कि नही"
 चाची कहती "तुम ही पूछ लो"
फिर तो पहाड़ ही गिर पड़ता , न जाने किस दरवाजे के पीछे चिपकी रहती  , क्या मजाल जो वो सामने आ जाये।
 अच्छा ऐसे लड़के लड़कियो को चिढ़ाने में बहुत मजा आता था। कुछ दिनों बाद मुझे ही तरस आने लगा कि परेशान नही करना चाहिए।  और उसे चिढ़ाने से बचने लगा।
समय बीतता गया  एक साल बाद ही बड़ी की शादी हो गयी।  उसमे छुटकी गज़ब की सजी थी लेकिन मैं उससे बचकर रह रहा था ,अन्यथा वो अपनी ही बहन की शादी में छुपकर बैठ जाती।  लेकिन मुहल्ले की लड़के लडकिया उसे ही निहार रहे थे।बला की सुंदर लग रही थी  किसी की नज़र न लगे। मैंने मन ही मन कहा था।
 उस शादी के बाद मैं बाहर पढ़ने चला गया था, लगभग साल भर बाद लौट कर आया, और पूर्व की तरह ही दरवाजे पर खड़ा था। बहुत इंतज़ार किया लेकिन कोई झाड़ू लगाने बाहर नही निकली। फिर सोचा, बड़की तो चली गई ससुराल ,छुटकी अवश्य निकलेगी। घण्टो बीत गए ,शाम तक छुटकी की दर्शन नही हुई। मेरी  बैचेनी बढ़ने लगी।बड़ा मन था उसे देखने का। वो सुंदर मुखड़ा याद करने लगा, सोचा साल भर में और निखर गई होगी। रहा नही गया और मैं चाची से मिलने उनके घर ही चला गया।  दोनों लड़के ओरणं किये, बड़े समनं के साथ बिठाए, चाय नमकीन भी आया लेकिन ... छुटकी नही दिखी!!
आखिरकार पूछ ही लिया छुटकी कहाँ है ?आजकल पढ़ रही है कि नही??
 सब चुप !!! फिर चाची ने आवाज लगाई ,देखो नितेश भैया आये है। नमस्ते तो कर लो ।
 अचानक से प्रकट हुई और जोर जोर से हँसने लगी, अजीबो गरीब आंख मुँह घुमाने लगी, बोली 
नमस्ते ,क्या हाल है भैया!!
एकदम से पत्थर हो गया था मैं। यह क्या रंग है यह क्या रूप। विधाता ने ये क्या किया!!
फिर वो तेज कदमो से अंदर गयी और कुछ जोर से आवाज आई। कुछ तोड़ दी थी वो ,दोनों भाई दौर कर  उसे संभालने गए।
 पता चला था छुटकी की मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। डॉक्टर कुछ और कह रहे थे और आसपड़ोस के लोग किसी प्रेत की साया बता रहे थे। मुहल्ले के लोग भी बहुत परेशान थे। घर वालो की हालत कल्पना से बाहर थी। पता नही किसकी नज़र लग गयी उसे।रात को बदहवास घर से निकल जाती थी , खुद की कपड़े फाड़ लेती थी ,सबका जीना मुश्किल हो गया था।  बहुत डॉक्टर ,और झाड़फूंक वाले से दिखाए थे  लेकिन कोई फायदा नही हुआ ।
 
 समय की घड़ियां तेजी से चलती रही। अब मैं बहुत दूर था, वो सारी कालोनी तोड़ दिए गए थे , सभी लोग रिटायरमेंट के बाद अपने अपने आवास बदल लिए थे, लेकिन लगभग 15 साल बाद एक बार फिर पिछले दिनो  उनके यहां जाने का मन किया। बहुत मन बनाकर पता पूछते हुए नए घर मे गया। चाचा चाची दुनिया से विदा ले चुके थे, दोनों भाई अपने परिवार बसाकर अलग था।  बड़े वाले ने पूर्व की भांति ही सम्मान दिया , उसके बच्चे और पत्नी भी मेरे बारे में जानकर बहुत खुश हुए ,मैंने भी बड़ो की तरह हक जताया।  बच्चों को पहली बार देख रहा था। वो सब भी बड़े हो गए थे ।मैंने पूछा छुटकी कहाँ है?? कैसी है। 
 बोला - यहीं है, पहले से कुछ बेहतर है लेकिन 20 प्रतिशत ही। रेगुलर दवा चलती है, अपना ख्याल  कर लेती है,  सहमी हुई कदमो से एक बार फिर छटकी सामने आई, दोनों हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी। एक टक निहारते रही , एक दम शांत, सहमे चेहरे में दो दशक पहले की सारी स्मृतियां दिखने लगी और मैं भी स्तब्ध देखता रहा।   आंखे गड्ढे में चली गई थी, होठ सुख चुके थे, वो अप्रतीम सौंदर्य की प्रतिमा धूल धूसरित हो चुका था।
 मैं कुछ नही बोल पाया। शायद कुछ देर और रहता तो रो देता। मुंह चुराकर बहाने बनाकर वहाँ से चला आया।करता भी क्या सबकुछ अपने बस का तो नही©nitesh
क्रमशः

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