तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रघुवीर लाल और के सत्यनारायणा ने पुलिस बल के साथ जंगलो में प्रवेश कर नक्सलियों को चुनौती देना प्रारम्भ किये। जनता से संवाद करना प्रारंभ कर दिया, लोग बाग अब पुलिस को जानने लगे, आईपीएस के.सत्यनारायणा ने तो नक्सलियों के गतिविधियों को बारीकी से अध्ययन कर उस पर एक वृहद पुस्तक भी लिखी "दुश्मन को पहचानो" बाद में यह पुस्तक बाद के पुलिस अधिकारी और देश के विभिन्न नक्सल क्षेत्र के पुलिस के लिए उपयोगी साबित हुआ। इसके बाद पुलिस अधीक्षक जो शैक्षणिक रूप से आई आई टी इंजीनियर थे आईपीएस रामकुमार ने नक्सल क्षेत्र में बुनियादी बातों पर शोध और अध्ययन कर एक रूपरेखा तैयार किया। जिससे यहाँ की आदिवासियों की जीवनशैली में बदलाव हो।बुनियादी ढांचों में विकास हो और लोग मुख्य धारा से जुड़ सके। एक तरफ तो इन्होंने कम्युनिटी पुलिसिंग पर जोर लगा दी,लोगो के बीच साइकल,राशन,बर्तन और जरूरत की समान का मुफ्त विरतण शुरू करवाया,तो दूसरी तरफ आदिवासियों के बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित करवाया इस से सम्बंधित एक फ़िल्म "राह आपन भाग्य आपन" बनाकर जनजागरूकता की।इन्होंने केंद्र सरकार को कई विकास कार्य की मसौदा को भेजा जिसे गृहमंत्रालय ने त्वरित स्वीकृति दे दी। परिणाम स्वरूप नक्सल क्षेत्र में सड़क,पुल बनना प्राम्भ हो गया,चांचीकला का पुल,पटवध बसुहारी सड़क मार्ग, पनौरा बसुहारी मार्ग, मांची आदि की सड़क इन्ही का प्रयत्न रहा है। वर्तमान में अपर पुलिस महानिदेशक श्री रामकुमार अपने उस काल को स्मरण करते हुये आज भी कहते है कि--------
बाद के आईपीएस प्रीतिंदर सिंह जो मूल रूप से एम बी बी एस डॉक्टर थे सोनभद्र की चार्ज लेने के बाद इस कार्य को बड़ी तल्लीनता से आगे बढ़ाया, कार्यकाल की सम्पूर्ण योजना नक्सल क्षेत्र का विकास करना मुख्य रहा। स्वयं की रुचि लेकर सड़क का निर्माण करवाना, समर्पण कर चुके नक्सलियों को रोजगार मुहैया करवाना, उनके शादी व्याह में मदद करने के साथ स्वयं सम्म्लित होना, ड्राविंग प्रशिक्षण दिलवाना, पुलिस में नौकरी दिलवाने के लिए अलग से शिक्षा और कोचिंग करवाना, हर परिवार को उनके दैनिक जरूरत की समान सरकार और उद्योगपतियों के सहयोग से मुहैया करवाना, सामान्य और गम्भीर बीमार लोगो को त्वरित इलाज पुलिस के स्वयं के खर्चे से अथवा किसी सम्पन्न से सहयोग लेकर करवाना, किसी भी गरीब और मजबूर की आवश्यकतानुसार मदद करना। चूंकि उनकी पत्नी भी डॉक्टर थी सो वे भी सप्ताह में दो दिन नक्सल क्षेत्र में से देती थी।
ये वो काल था जहां जिलाधिकारी पंधारी यादव और डॉ प्रीतिंदर सिंह आपसी तालमेल से नक्सल क्षेत्र में भरपूर कार्य किये। पुलिस को राजस्व विभाग और वन विभाग का सहयोग मिला,और जनपद विकास की पथ पर सरपट दौड़ने लगा। दूसरी तरफ पुलिस तेज तर्रार इंस्पेक्टर के सहयोग से ताबड़ तोड़ इनकाउंटर और समर्पण कराने लगे। आईपीएस रामकुमार के समय जहां कुख्यात नक्सली शत्रुघ्न मारा गया तो डॉ प्रीतिंदर सिंह के समय कमलेश चौधरी का इनकाउंटर कर नक्सलियो की रीढ़ लगभग पूरी तरह तोड़ दिए। अब एक भी नक्सली घटना की चर्चा बंद हो चुकी थी, ताबड़तोड़ नक्सल क्षेत्र में विकास कार्य शुरू हुए। ततकलों अपर पुलिस महानिदेशक बृजलाल जी ने इस क्षेत्र का दौरा कर यहां एक मजबूत अमन चैन का विश्वास भी जगा गए। बाद के युवा सामाजिक सरोकार रखने वाले आईपीएस दीपक कुमार आदिवासियों और जनपद के लोगो मे जनसंवाद कर काफी लोकप्रिय हुए पूर्व के कार्य को मूर्त रूप देते रहे , कम्युनिटी पुलिसिंग के कार्यो को और भी त्रीव गति प्रदान कर चरम तक लेजाने में कठिन प्रयास किये।, बाद में इपस मोहित अग्रवाल की कार्यशैली भी आदिवासियों को पसंद आई, हालांकि उनके कार्यकाल कम ही रहा परन्तु अमित छाप छोड़ने में सफल रहे, इसके बाद आईपीएस सुभाष दुबे के कार्यकाल नक्सलियों के ताबूत का आखिरी कील साबित हुआ, इनके कार्यकाल में एक दशक से जनपद में आतंक मचाने वाले मुन्ना विश्वकर्मा सहित आधा दर्जन कुख्यात नक्सली जेल के सलाखों के पीछे चले गये और सोनभद्र सहित चंदौली, मिर्जापुर नक्सल विहीन हो नव विहान के गीत गाने लगे।