सोमवार, 6 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 1

#मेरा_एकांतवास 1
एकांतवास की भी एक अपनी दिन चर्या है।शुरू शुरू में थोड़ी उलत पुलट हो जाता है, जगने और सोने का समय मे भारी परिवर्तन हो जाता है, दिन रात चक्र खुद पर लागू नहींहो पता, जब चाहो नींद ले लो फिर जब चाहो खूटूर पुटूर  कर लो।  लेकिन शनै शनै सब अपने स्थान पर आने लगता  है। वैसे तो मैं काशी में अकेले ही निवास करता हूँ लेकिन महीने का 20 से 25 दिन भ्रमण पर ही रहता है, कुछ कार्यवश और  कुछ घुमक्कड़ी के लिए। लॉक डाउन ने पूरी तरह एकांतवास  की सार्थकता को समझा दिया है।  tv पर कार्यक्रम भी मैं कम ही देखता था, न्यूज जो एक बार सुबह और एकबार शाम , बांकी तो सब पुनरावृत्ति ही होता है। इधर जब देखना शुरू किया तो यह समाचार मनोवृति को प्रभावित करने लगा। आप अगर बहुत ही गंभीरता से सोचेंगे तो भय और अवसाद में खुद को पाएंगे , देश दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है मानो कोई कहानी का हिस्सा हो। ऐसे में लगातार tv  समाचार से बचना आवश्यक है , सुबह शाम ही ठीक है।, सोशल मीडिया में प्रचारित ज्ञान सबका निजी है, वह उनकी खुद की तर्क, ज्ञान और अध्ययनशीलता पर आधारित है। आप इससे ऐसे लोगो की योग्य को भी समझ सकते है फिर उन ज्ञान का चयन भी अपने लिए कर सकते है। कुछ जानकारी बहुत प्रभावित करती है तो कुछ अफवाहों से मन व्यथित होता है। कुछ लोगो की वो तर्क जो जबरन लोगो पर थोपने जैसा होता है। जो खुद तो अनुपालित नही करते लेकिन सोचते है कि अगला मेरी बात से प्रभावित हो जाया करे। ऐसा नही होने पर उन्हें झुंझलाहट होती है।
चूंकि कोरोना ने लोगो को नए सिरे से जिंदगी जीना सीखा दिया है। मानव जीवन का महत्व भी समझा  दिया है। अपनो और परायो के बीच का अनोनाश्रय सम्बंध की परिभाषा भी बता रहा है।  अपनी ही जीवन का महत्व कितना है आज लोग  समझ रहे है। , तेजी से भागी जा रही जीवन रफ्तार को बेपटरी होने से रोक लिया है। प्रकृति को समझने का समय दिया है। आप जिस जीव जंतु से मुख मोड़ चुके थे उसकी मुस्कुराहट, हठखेलिया को समझने के लिए बाध्य कर दिया है। जिस अपनो को त्याग कर आप प्रवास के लिए मन बना लिया था आज फिर से वापस होने की मजबूरी बन आ रही है। आज आपको अपने बहुत अपने याद आ रहे है। जीवन और उसका अपनो से सम्बन्ध कितना महत्वपूर्ण है यह समझने के लिए कोरोना शायद आवश्यक था।। आज आसमान साफ है, तारो के बीच आप खुद को निहार सकते है। फर्राटा से भागी हुई गाड़िया थम गई है आप रुक कर आसपास निहार सकते है। ये धरती ये नदिया, ये रैना सब आपको आज सुंदर दिखेगा। बस वो भय का कारण बना रहेगा जिसकी आलीशन कमाई से आप खुश होते थे। जिसको मजदूरी के लिए बाहर भेजते थे या जो अपनो के पेट भरने के लिए अपनो से दूर हो जाते थे। आज सब आपस मे मिलकर रहना चाहते है , सब साथ मे जीना चाहते है, साथ मे मरना चाहते है। लेकिन आज साथ मे मरने वालों की संख्या नगण्य के बराबर है।आपकी सारी ऐश्वर्य अब किसी को प्रभावित नही करता , आपसे सब डरते है कही सात समंदर पार से ऐश्वर्य के साथ मौत तो नही लेकर परोस रहे।  ..फेसबुक पर कई मार्मिक प्रसंग देखने पढ़ने सुनने को मिला रहा है। , एक आठ वर्षीय बालिका आलीशन पलंग पर लेटी रौ रही है। उसके माता पिता दूर से ही सांत्वना दे रहे है। कोई सिर पर हाथ रखकर दुलारने वाला  नही। जिसके गोद  में कल तक खेल रही थी आज वो सब पास आने से डर रहे है ,आखिर उस 8 वर्षीय कन्या का क्या दोष है!!आज माता पिता अपने दिल के टुकड़े को छू नही सकता। उसे जीते जी किसी और के हवाले करने को तैयार है। स्वस्थ हो गया तो वापस नही तो  उसे फिर कभी नही देख पाएंगे ..ता उम्र उस रोती छटपटाती चेहरा ही याद रहेगा।
हम मनुष्य  भी तो प्राकृतिक सीमा को लांघ गए थे। फिर यह आरोप प्रत्यारोप तो हम अपनी खीझ मिटाने के लिए कर रहे है। 
खुद को ईमानदार और दूसरों को जिम्मेदार ठहराने के लिए कर रहे है। लेकिन आज तो आप भी दूसरों के लिए दुश्मन है और दूसरा भी आपके लिए , फिर क्या तर्क।.......
सरकार पहले चेती होती तो......यह एक आम धारणा बन गयी है सम्पूर्ण विश्व के लिए। लेकिन शायद हम आप भी पहले चेते होते तो। आसमान छूने के इरादे से अपनी जड़ उखाड़ लिए फिर तो आपको यह दिन देखना ही था। आज भी जो जड़ में है उन्हें अपने या अपनो के लिए इतनी चिंता नही, वो तो विश्व मानव की चिंता में व्यस्त है। अपने पुत्र  को काबिल बनाने के लिए अपने से गई दूर कर दिए और खुद रह गए अकेले। फिर जमाने को क्या दोष देना। वो काबिल तो बन गया लेकिन वह क्या वही पुत्र है जिसकी कल्पना कर अपने पाला पोसा था ?? अब इस घड़ी में उस पुत्र को भी और आपको भी सब याद आ रहा है। शायद माता पिता के साथ होते, और शायद इस घड़ी में पुत्र भी साथ होता। समय विकराल है न जाने अगके क्या होगा।  अगर समय वापस अपनी जगह लौट आये तब भी इन बातों को फिर से सोचने का विषय है कि हम क्यूँ दुसरो से अधिक अगके निकलने के लिए बहुतों को सताते है, बेईमानी करते है, जीव, प्रकृति का शोषण करते है??आज क्या मिल रहा है। आज भी लोग कल के लिए धन का दोहन कर रहे है। उन्हें लगता है हम इस मौके से भी अमीर बन जाएंगे!!!आज हर व्यक्ति को व्यक्ति की मदद की जरूरत है। चाहे आप किस आर्थिक वर्ग, धर्म या जाति के है। इन सभी विपत्तियों से बचे रहने के लिए भारतीय दर्शन ही उचित था , है और रहेगा। हमारा आहार विहार और संस्कार।
क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें