शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

जंगलों में

अजीब सा सवाल है मुझ पर
मैं जंगलों में क्या कर रह हूँ?
मैं पुरातन गांवों में 
क्यूँ भटक रहा हूँ?
इन पगडंडियों में
इन पत्थरों में 
क्या ढूंढ रहा हूँ?
इस उजाड़ बियावान में
क्यूँ तप रहा हूँ?

हाँ हाँ
तुम भी तनिक आ कर देखो
अभाव में कितने सुकून है 
यहाँ
तुम सा बोझिल 
भीड़ में खड़ा अकेला
कोई नही है यहाँ
देखता हूँ मिट्टी में सने
अपनी बचपना को यहाँ
चिथड़े कपड़ो में चुहल बाजी करती
अपनी जवानी यहाँ
ललाट की लकीरों पर
पढ़ता हूँ अपने बुजुर्गों की
संघर्ष की कहानियां
मिट्टी की चूल्हे में दिखती है
माँ की हाथों की रोटियां
कुंआ की डोर बंधी बाल्टी से
निकलता है जल 
जिससे सिंचित हुआ था
पूर्वजो की जवानी
पत्थरो पर दिख जाती है
अतीत की कहानी
झुर्रियों की लेख में है
दादी की वो मीठी लोरी
आज भी पनघट पर है
अल्हड़ सी छोरी
यही तो दिखता है
अपना बुजुर्ग
मेरी जवानी 
और गुजरा हुआ
बचपना......!!
©nitesh