मिथिला के दो युगों के कवि विद्यापति और नागार्जुन में मैं नागार्जुन को ज्यादा पढ़ना पसन्द करूँगा। जिन्होंने मानव वृति का उल्लेख अपने कविता में किया। भाग्य और कर्म के बीच का गिद्ध को पहचाना। जिन्होंने समाज को उसीका आईना उसी को सौंप कर विद्रोही बने। ता उम्र अपनी कलम को किसी के आगे गुलाम नही होने दिया। विद्यापति जिन्होंने श्रृंगार और भक्ति, को समाज का मुख्य स्तम्भ माना, भक्ति पूर्ण साहित्य व्यक्ति /समाज को अपनी ही नियति में बाँधे रखा जबकि नागार्जुन ने इस बन्धन को तोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये अलग बात है कि स्वामिभक्त के अभाव में नागार्जुन अंतिम समय तक दर दर भटके। विद्यापति के सहयोगी साक्षात शिव थे तो नागार्जुन के सहयोगी साक्षात नारायण।
हम बाबा विद्यपति को पूजते हैं लेकिन नागार्जुन को समझते है, बस इतना सा अंतर है। क्यों न विद्यापति समारोह का रंगारंग उत्सव की जगह नागार्जुन का भी मानव उत्सव हो??
सोमवार, 27 मई 2019
कालजयी कवि नागार्जुन
बुधवार, 22 मई 2019
अपील
#अपील
कल चुनाव परिणाम आ रहे है, स्वतंत्र भारत का सबसे ज्यादा रोमांच रखने वाला यह परिणाम यह बताने के लिए काफी है कि हम अपने देश से और लोकतांत्रिक व्यवस्था से कितना प्रेम करते है।इस जीत हार को अपने जीवन का हिस्सा मानकर चलना पड़ेगा। असहमति को दुश्मन की तरह न देखे ये भी लोकतंत्र की एक भूमिका है इसके बेगैर लोकतांत्रिक व्यवस्था मूर्त रूप नही ले पाएंगी। नेता आपस मे कभी नही लड़ते ,उनके विचारधारा लड़ती है, उन सबके व्यक्तिगत सम्बन्ध आपस में मधुर है। इस लिए पिछले दिनों चुनाव के बयानों, आरोप प्रत्यारोप, अफवाह इन सबको मिटा दें,जो भी परिणाम मिले उसे स्वीकार करें, सरकार जिसकी भी बनेगी वो आपकी ही होगी, सम्पूर्ण समाज समुदाय पर इनकी नीतियां बराबर की हिस्से में लागू होगी। देश महत्वपूर्ण है और उससे पहले आपका प्रेमपूर्वक समाज का रहना महत्वपूर्ण है। अपनी रोजी रोजगार ,पढ़ाई, व्यवसाय, चुनोतियाँ को सम्भाले, देश सम्भालने वाला कल के बाद मिल जाएगा। हम सुखी रहेंगे, शांत रहेंगे, मिलजुल कर रहेंगे तो देश समृद्ध रहेगा। परिणाम की प्रतीक्षा और उसे सहज उत्साह पूर्वक स्वीकार करने के लिए तत्पर रहते हुए आप सभी मित्रों को शुभकामनाएं, जयहिंद
आपका भाई/मित्र
नितेश भारद्वाज
गुरुवार, 16 मई 2019
गोडसे-देश भक्त या हत्यारा
1948 में गोडसे हत्यारा था, ठीक उसी तरह जैसे भगत सिंह आतंकी थे, लेकिन समय ने इनके विचारों के समर्थन में हुजूम बना दिया और बहुसंख्यक के लिए भगत सिंह आज़ादी के परवाने है और गोडसे देश भक्त। दोनों का कृत निजी तो कत्तई नही था, गांधी के विचारों के अनुनायी के लिए गोडसे आतंकी और हत्यारा है, भगत सिंह भी उपद्रवी है, लेकिन इसके विपरीत विचारधारा वालों के लिए दोनों ही देश प्रेमी है। ....देश को सम्भल कर चलना पड़ेगा कि सम्भव है भविष्य में इंदिरा गांधी का हत्यारा और राजीव गांधी का हत्यारा भी देश भक्त न हो जाये। इस गलती की शुरुआत गांधीवादी सोच ने किया था, भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद आज इन सिद्धांत के षडयंत्र का शिकार नही हुआ होता तो, आज भी गोडसे सर्वमान्य हत्यारा होता, या गांधी मारा ही न गया होता।
चुनाव में आदिवासियों की उम्मीद
आज सोनभद्र का सुदूर आदिवासी अंचल के भ्रमण किया।चुनाव के बाबत इन मूल निवासियों से विचार जानने की कोशिश की। उत्तर भी वही था जिसका मुझे उम्मीद था। ये आदिवासी राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा नही है,इन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण अपनी जीवन से जुड़ी समस्या है। इस अंचल में विकास तो हुआ है काया पलट की तरह, इस विकास मे तीनो सरकार का योगदान है,अब ये सामान्य जिंदगी जीना चाहते है, भौतिक साधनों के साथ, ये भी नेता बनना चाहते है,इनके बच्चों को भी अधिकारी बनना है। इसलिए ये अपने समाज के नेता को ढूढते है। उन्ही की दिखाए रास्ते पर चलना चाहते है। और चुनाव पर गजब का चुप्पी बनाये हुए है,वो इस इंतज़ार में है कि मेरा नेता ,मेरे समाज का नेता मुझे भरोसा दिलाये।कोई भी दल ये दावा नही कर सकता कि आदिवासी का मत किसी एक पक्ष को ही मिलेगा। यह उनके स्थानीय और समाज के नेता पर निर्भर है। उनके लिए सभी दल एक जैसे ही है। हाँ मोदी का नाम खूब सुन रखा है ,ये दें इनकी हाथों में चिपका मोबाइल का है। लेकिन वोट इन्ही को दें जरूरी नही। नई पीढ़ी में गजब का उत्साह है, उन्हें तो मोबाइल वाला नेता ही पसंद है लेकिन बुजुर्गो को अपने जैसा कोई अपना नेता चाहिए ,उनकी आंखें ऐसे को ही अब भी ढूंढ रहा है। वे बताते है कि आज के लड़के (युवा नेता) न जाने क्या क्या समझा जाते है लेकिन कोई नही कहता कि कल तुम्हारा वृद्धा पेंशन चालू करवा देंगे।
लगभग 15 गांवों के घुमंतू में ये निष्कर्ष पर पहुंचा कि इन्हें अपना यानी अपने समाज के नेता की तलाश है जिसे ये अपनी बात बिना किसी भय या संकोच के कह सके।
©नितेश भारद्वाज
शनिवार, 4 मई 2019
राजनीतिक ब्रांडिंग
देखा जाय तो पिछले पांच साल में मोदी सरकार के पास एक काम के सिवा कोई और काम नही है जिसे वो जनता के बीच ला सके, वो काम है सरकार द्वारा मोदी नाम का मार्केटिंग और ब्रांडिंग। हम आप उसी ब्रांडिंग के शिकार है। जिस तरह किसी भी प्रोडक्ट का बार बार विज्ञापन देख कर उस प्रोडक्ट पर विश्वास करने लगते है और उसे खरीदना चाहते है (जैसे कभी मैगी हुआ करता था) वैसे ही बार बार ब्रांडिंग ,मार्केटिंग और विज्ञापन के जरिये जनता का माइंड वाश किया जाता है और मोदी मैजिक का ब्रांडिंग होता है जैसे "पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करें'" घड़ी डिटर्जेंट की तरह। आप हम उस मार्केटिंग का शिकार है, लेकिन दूसरा पहलू ये है कि इस से बेहतर प्रोडक्ट का न तो मार्केटिंग हुआ ना जनता के बीच प्रजेंटेन्स। छोटी छोटी पार्टिया इस प्रचार महाकुंभ में कहीं खो गयी।
आज देश को एक मजबूत नेता की जरूरत है जैसे कभी, चंद्रशेखर सिंह, अटल बिहारी, वी पी सिंह, जार्ज फर्नांडिस, गुलजारीलाल, राजनारायण सिंह आदि हुआ करते थे, आज इसकी कमी है , राष्ट्रीय क्षितिज पर पहुंचने वाला विरोधी दल का कोई दमदार नेता नही है, अखिलेश, मायावती, नायडू, ममता आदि क्षेत्रीय राजनीति से बाहर आना नही चाहते, फिर ये सरकार किसी को मजबूती से उभरने नही देना चाहता, आप दुख से, निराश होकर अपने उस नेता को ढूंढते है जो आपकी तरह मोदी की बराबरी करे लेकिन हताश फिर मोदी पर ही नज़र पड़ता है कारण है #ब्रांडिंग. आज ढेरो समस्या ,स्थानीय मुद्दे कूड़े की तरह इस शख्स के ब्रांड में दब गया है, इस मे हैम सब दोषी है, खास कर वो राजनीतिक दल जो कल आम जनता को खूब बेवकूफ बनाया था आज इस नाम के आगे मजबूती से अपने आप को खड़ा नही कर पा रहा है।कल तक जब केजरीवाल अछूता था तो मजबूत था लेकिन इनकी राजनीति भी इसी में समा कर रह गई। जनता को ये सदमा पहुँचा कर इतना अविश्वसनीय बना दिये कि कोई हार्दिक, कन्हैया या जिग्नेश को स्वीकार करने से घबरा रहा है। आज भी देश को कुछ मजबूत विचारधारा वाली नेता की जरूरत है जो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर खुद को जनता के बीच स्वीकृत हो।
© नितेश भारद्वाज