#मेरा_एकांतवास 10
अंतर्वेदना में तो आज मध्यम वर्ग है, उसकी पीड़ा न तो गरीबो में है और नही अमीरों की तरह दो जून की रोटी खा सकता है। दांत भी नही निपोड सकता , चूँकि कल तक खाते पीते परिवार बनने का स्वांग रच रहा था, इज़्ज़त को बनाने में गरीबी छुपा रहा था, अपनी भूख में कटौती कर बच्चों को पढा रहा था, बेटी की शादी के लिए रकम जमा करने में सभी अरमानों का बलि चढ़ा रहा था, मुश्किल से एक नई चादर खरीद लाने पर बार बार पड़ोसियों को दिखा रहा था, ताकि कोई उसे अभाव में जीने वाला न समझे, कोई उसके परिवार के मुखिया को अदूरदर्शी या निकम्मा न समझे। पूरा परिवार अपनी वेदना पर मुस्कुराहट की चादर से ढक रखा था , आज तो वह तिजोरी भी तार तार होने को है। न सरकारी इमदाद मिलने वाला है ,और न पड़ोसी ही कुशल क्षेम पूछने वाला है,न ही किसी की दृष्टि इनकी ओर जाने वाला है, रिश्तेदार भी गर्व से ही पूछते है ,"आपको तो कोई परेशानी नही होगी खाने पीने की?"और न चाहते हुए भी कहना पड़ता है कि हम ठीक है, बुजुर्ग की बीमारी, बेटे की पढ़ाई, बिटिया की शादी की चिंता , रोज का पेट भरने का यह नियमित कार्य, इसमे यह कोरोना संकट ,खुद की ही बनाई हुई अस्मिता में उलझकर रह गया है। किस से कहे ? कैसे कहे?... इस समाज मे कल भी तो जीना है, कल की उलाहना ,ताना से भी डर लगता है, फिर किसी से मुंह खोलने पर मना कर देना, जीते जी मृत्यु के समान है।, जमा पूंजी भी घटते चाँद की तरह खत्म हो रहा है, बस यह लॉक डाउन खत्म हो जाये!! कहीं बढ़ गया तो.....?? मरकज जमात के बढ़ते मरीजो से तो और भी गुस्सा आता है, उसे लोग पक्ष विपक्ष में, आरोप प्रत्यारोप में बहस कर लेते है, लेकिन यह केवल उसी के कारण आगे बढ़ गया तो ऐसे परिवार का क्या होगा , जिसे किसी जाति धर्म,वर्ग से कोई लेना देना नही है इसे तो अपने परिवार की दो जून की रोटी से मतलब है ,जो आज तक इज़्ज़त से खिलाता रहा है कल भी खिलाने की जद्दोजहद रहेगा ...लेकिन कैसे?....किस से कहे अपनी अंतर्वेदना!!हम किसी वर्ग, धर्म में नही आते।@nitesh
क्रमशः
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