#मेरा_एकान्तवास 28
घर मे कैद रहते हुए शारिरिक कार्य एकदम से रुक जाता है इसलिए वैकल्पिक व्यायाम जरूरी हो गया है। कुछ लोग जो सम्पन्न है अपने घर के जिम में व्यायाम कर लेते है , कुछ छतों ओर बैठकर कसरत योग करते है। जिसे ये सब नही नसीब है और एक कमरे में कैद है उसके लिए चोरी छुपे इधर उधर टहलना पड़ता है। कुछ दिनों से सांध्यकालीन विचरण को मैं भी निकल रहा हूँ। आज कुछ दूर सुनसान सड़को पर निकल गया था। दूर सड़क किनारे एक पुरानी घर के पास से गुजरा तो समझ मे आया कि यह कोई मंदिर है इसमे न जाने कौन से देवता निवास करते है। लोहे के जाली से अंदर झांका तो लाल सिंदूर लगा 2 फुट का पत्थर पड़ा था। बिन सोचे समझे हाथ जोड़ कर नमन किया। मंदिर नुमा कोई भी भवन देखकर माथा अपने आप झुक जाता है। यह बचपन से मिला संस्कार है , लेकिन इसमें अभी मैंने सुधार किया है। मैं जहां रहता हूँ वहाँ 100 मीटर दूर एक मकान की छत के एक कोने में एक मंदिर नुमा गुम्बद वाला कमरा है। यह घर से पूरब की ओर है ,इसलिए पिछले दो साल से सुबह उठकर सूर्य देवता के साथ उस मंदिर नुमा भवन को भी नतमस्तक कर लेता था शायद 84 कोटि में कोई देवता उसमे भी निवास करता हो, लेकिन पिछले महीने उस मकान में जाने का सौभाग्य मिला , मकसद था किसी मित्र के लिए किराए का मकान ढूढना। उस छत पर भी गया और मकान मालिक जो पेशे से डॉक्टर है उनकी पत्नी से उस गुम्बद नुमा कमरे के बारे में जानना चाहा। तब जाकर पता चला कि ऊपर के किराएदारों के लिए है शौचालय है। .... जिसे पिछले दो वर्षों से सवेरे सवेरे नमन करता था। खैर यह भी एक मनोवैज्ञानिक कारण है। सम्बद्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत।
यही कारण था कि उस सुनसान मंदिर के भीतर झांकने के बाद ही मैंने श्रद्धा से उस पत्थररूपी देवता को नमन किया। कई मिनट तक अंदर झांकता रहा शायद कुछ समझ सकूँ! सहसा अंदर से आवाज आई और मैं सावधान हो गया।
"तुम डर रहे हो... मैं सदियों से अंदर हूँ लेकिन डरा नही , तुम तो डर से घर मे कैद हो । तुम्ही क्यों पूरी दुनिया मौत के भय से आज घर मे कैद है। हर तरफ हर धर्म के मानने वाला मानव हाँथ उठा कर जीवन की भीख मांग रहा है, न कोई भाषा ,न कोई देश की सीमा, न धर्म, न जाति, न अमीर न गरीब, सभी आज केवल और केवल जीवन की भीख मांग रहे है। किसी को आज धन नही चाहिए। जीवन की सफलता नही चाहिए। पुत्र नही चाहिए, नॉकरी नही चाहिए, सुख और ऐश्र्वर्य नही चाहिए, सभी को मात्र जीवन चाहिए। सभी जीना चाहता है आज। सभी को मृत्यु से भय है। एक अनदेखा दुश्मन से भय है। ... क्या तुम मानव हार गए। कल तक प्रकृति का दोहन करके मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लिए थे, फिर आज भय क्यूँ ?
मैंने असंख्य लोगो को यहाँ से गुजरते देखा है। सदियों से सभी को मरते देखा है। बड़ी बड़ी सपने और उम्मीदों को पूराकर यहाँ सिर नवाने वाले को भी मरते देखा है। कोई बचा नही है, कुछ समय पर कुछ समय से पहले सभी चले गए। लेकिन मैं आज भी हूँ। इसलिए कि पत्थर हूँ। ,मजबूत हूँ , सदियों का साक्षी हूँ। इसीलिए लोग मुझे देवता समझते है। न कोई राग है न द्वेष बस समभाव से सदियों से पड़ा हूँ। तुम पूजते हो ,स्वार्थ में, लोभ में, दुख में ... फिर कहाँ !!!
मुझे ये सारी बात बकवास लग रही थी , यह सत्य तो सब जानते है फिर नया क्या था!! यह सब मुझे क्यूँ बताये जा रहा था।मैंने कहा -- कुछ नया नही है ये बातें, तुम यही बैठे सब देखते रहे हो देखते रहोगे यह तुम्हारी नियति है। मानव है हर रंग में जीना चाहता है। हर परिस्थिति में जीना जानता है, तुम्हे पूजता है ताकि तुम इन साहस का साक्षी रहो। ...आज तुम्हे मानव का यह विकास देखा नही जा रहा इसलिए शायद ताना दे रहे हो। हम फिर जीतेंगे। एक बार मृत्यु पर फिर विजय होगा, तुम बस सदियों गिनते रहो।
फिर मैं चलने लगा ।
मेरी आखिरी बात सुनते जाओ
वो भी बता दो शायद कुछ नया हो। झुंझला गया था मैं
""आज जिस भाव, संस्कार,आचरण,प्रेम और उम्मीद से घर मे जी रहे हो न..बस इसी संकल्प से आगे भी जीने की अपेक्षा रखोगे तो शायद तुम्हे कोई हरा नही सकता। मानव जिसदिन इस संकल्प को तोड़ने की कोशिश करता है यह विकट परिस्थिति स्वतः आ जाती है"
मैं वापस लौट आया था, लेकिन अब तक सोच रहा हूँ कि शायद सबकुछ सत्य ही सुना हूँ। गलत वक़्त नही गलत हमारी आचरण हो गयी थी। लॉक डाउन मेरी जिंदगी की एक सीख है।सदैव स्मरण रखने योग्य है।
©nitesh
क्रमशः
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