रविवार, 24 दिसंबर 2017

निःशब्द

टूटता रहा हर उम्मीदों की मोती
हम भी टूटे भरोसा भी टूटा
टूट गया हर आस्था ओ विश्वास
सुबक कर रोना, फिर खुद को संभालना
रुन्धती गले मे टूटती  रही सांस
पल पल धोखा, पल पल चोट
हर मासूमियत में दिखता खोट
स्वयं का
यह अपराध बहुत गम्भीर है
सहज सरल प्रेम में किसी को पिरोना
ज़ख़्म खाकर उसके सपनो को ढोना
@nitesh

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

आज का ओबरा

सोनभद्र/प्रदेश का प्राचीन उर्जाधानी, जहां एक पूरा परिवार बसता है, छोटे बड़े हज़ारो क्वार्टर, अब कुछ घर भी बनगए है, चूल्हे जरूर अलग अलग जलते है, लेकिन स्वभाव, प्रेम ,सुख दुख सब के सब एक जगह ही है, यही कारण है कि अवैध खनन वाले भी मेरे परिवार के, प्रदूषण वाले भी हमारे परिवार के, मुफ्त के जल पिलाने वाले भी परिवार के बोर्ड के गाड़ियों से डीजल निकल बेचने वाले भी , और अपने खून पसीना बहाकर बिजली बनाने वाले भी हमारे परिवार के, राशन उधार देने वाले और फर्जी बैंक के नाम पर पैसा हड़पने वाले भी हमारे परिवार के, बड़े बड़े ओहदे पर रहने वाला भी हमारा ही है और हीरोइन पीकर बर्बाद होने वाला भी हमारा है, हम सब मिलकर सबका चिंता करते है। मुझे याद नही की ओबरा में पैसे के अभाव में किसी की इलाज रुक गयी हो ,या दवा के अभाव में कोई मर गया हो! सब एक दूसरे के सुख दुख में शामिल है, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह लेकिन सामाजिक कार्य और सर्व हित के लिए सब एक है,आलोचना होती है लेकिन किसीका विरोध नही। मिल बांट कर खाना  यहां की रीति है। तभी तो ओबरा एक परिवार है। पारवारिक प्रेम का नतीजा है कि लोग नॉकरी से रिटायर होने के बाद भी यहां से जाना नही चाहते। जो किसी वजह से बाहर चले गए वो आज भी दूर बैठकर भी सबका हाल समाचार पूछते रहते और यहां के लोग भी उन्हें उसी तरह याद करते मानो कोई अपना ही किसी शहर में कमाने गया है। मुझे नही लगता भारत मे शायद इस तरह का कोई दूसरा शहर हो !!!
लेकिन विगत वर्षों में कुछ खास बुनियादी बदलाव आया है ,वो या तो राजनीतिक सामाजिक कारण हो या फिर पीढ़ी का अंतर। पहले शिक्षा के क्षेत्र में ओबरा का नाम प्रदेश में शीर्ष पर था आज फिस्सडी है, पहले चिकित्सा के लिए सदैव तत्पर रहने वाला डॉक्टर आज नदारद है, खेल और एथेलेटिक्स में हमारा परचम राष्ट्रीय स्तर पर था आज घर मे भी कमजोर है,साहित्य और सांस्कृतिक समृद्धि में भी आज सेंध लग गयी है, अपनी नॉनिहलों के लिए चिन्तित समाज आज इनसे बेफिक्र है। ना जाने क्यों नही हम अपनी इस विरासत को बचाने के लिए प्रयासरत नही है?  हम खुदको मजदूर के काम करने के लिए आंदोलनरत है लेकिन खुद को शिक्षा में पहले वाली गौरव पाने के लिए लापरवाह है। इलाज़ के लिए ऐसे डॉक्टर की तलाश से मरहूम है  जैसे वो डॉक्टर हमारे अभिवावक जैसे होते थे। कल साधन नही था लेकिन सुविधा थी आज साधन है लेकिन सुविधा नही है। हमे फिर से एक साथ बैठ कर इस पुरातन गौर को वापस लाने के लिए प्रयासरत होना पड़ेगा, अमे अपने विशाल परिवार को बचाना पड़ेगा , हमे अपने होनहार बच्चों से प्यार करना पड़ेगा, उसे चाचा चाची ,भैया दीदी वाली बोल सिखाना पड़ेगा, उस अदब को फिर से वापस लाना पड़ेगा जिससे ओबरा शिक्षा में प्रदेश का सिरमौर हुआ करता था ।
©नितेश

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

क्या विकास के लिए नक्सलिज़्म जरूरी है

सोनभद्र के सुदूर आदिवासी ग्रामीण अंचल में आज जो कुछ भी विकास दिख रहा है वो नक्सली गतिविधियों का देन है। सरकार  गरीब जनता की भलाई के लिए जो भी योजना बनाती थी वो शहर और कुछ जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के जेब तक ही रह जाता था। अनपढ़ ,भोले भाले गरीब आदिवासी इन सब योजनाओ से अनभिज्ञ थे, अभाव और दुःख को अपनी नियति समझ बैठे थे ,ऐसे में पड़ोसी राज्य से नक्सलियों का आमद इनके दुखती रग पर मरहम लगाना शुरू किया,स्थानीय जनता किसी भी अपराध से अनभिज्ञ थे , इन्हें तो भूख से सूखती पेट की आंत को तर करना था,इसलिए अपने कर्मठ बच्चे को इस कार्य मे लगा दिया , जब ये भोले भाले युवा आदिवासी जिसे लोग नक्सली कहने लगे ,  वो भी छोटी मोटी घटना करना सीख लिए,सरकार की नुमाइंदे और उसकी हमदर्द को निशाना बनाया जाने लगा तो हुक्मरानों की आंखे खुली ,फिर विकास के लिए जंगल पहाड़ में उतरने लगे। पुलिस ने विकास का ज़िम्मा उठाया औऱ राजस्व व सम्पन्न जनता के सहयोग से विकास की पहिया चलानी शुरू कर दी , उसमे भी  राजस्व विभाग ,वन विभाग , और जिन्हेंविकास करने का जिम्मा था उनके अफसरान भी लूट करने में पीछे नही रहे , फिर भी पुलिस की सक्रियता से आदिम युग मे जीने वाले आदिवासियों को लोकतंत्र को समझने  और उसमें भागीदारी  रास आने लगी । तत्कालीन पुलिस व्यवस्था से विकास की पहिया लुढकने लगी। परन्तु वही जहाँ इन्हें नक्सलियों की गोली से भय था , नया नक्सली पैदा होने से भय था ।बाँकी का वह क्षेत्र आज भी अपने भाग्य और नीयति को ही कोस रहा है।
तो क्या विकास के लिए नक्सलिज़्म ही जरूरी है?क्या अपनी प्रारंभिक जरूरतों के लिए भी बंदूक उठाना जरूरी है ?या विनाश का भय दिखाना जरूरी है ?नही तो चंद दिनों के लिए बाहर से आये ये जिला के अधिकारी ,खनन ,और प्राकृतिक दोहन में अपने हिस्सेदारी लेने में ही समय बिता देते है ।फिर उनका स्थानांतरण और फिर से एक नया अधिकारी करोड़पति बनने आ जाते है । बाहर से आये अधिकारी और ब्यापारी  वैध अवैध धन कमाकर अन्यत्र भेज देते है,और समेट कर चल देते है , इसतरह सोनभद्र के विकास का नित्य चीरहरण होता रहता है ।सरकार के नुमाइंदे निजी लाभ वाले योजनाओ पर बकुल ध्यान लगाएं बैठे रहते है । बड़े के लापरवाही से मातहत भी खूब फायदा उठाते रहते है ,नतीजा शिक्षा व्यवस्था, जल, और बिजली  विभाग के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अछूत से लगता है।
आज स्थिति यह है कि जनपद नक्सली मुक्त है, पुलिस और प्रशासन आराम  की नींद में है , पुनः उन गरीब आदिवासियों के हिस्से से  हुक्मरानों के बच्चों के खिलौने और सैर सपाटे हो रहे है,जिम्मेदार खनन की हिस्सेदारी और छीनाझपटी में ब्यस्त है , आरोप प्रत्यारोप जारी है लेकिन वो क्षेत्र आज फिर हाशिये पर है । फिरसे किसी मेहमान का इंतज़ार है ।   हो सकता है गए हुए मेहमान वापस आ जाये लेकिन हर हाल में पीड़ा फिर से सोनभद्र का जंगल ही सहेगा , प्रशासन फिर से सक्रिय हो कर बजट बढ़वा लेंगे , लेकिन आज का बजट का कोई माईबाप नही है ।तो क्या मौलिक सुविधाओ के लिए ,, सरकार की तंद्रा तोड़ने के लिए बंदूक उठाना  और भयाक्रांत करना जरूरी है??क्या ये सब इसके बिना सम्भव नही ????
©नितेश

शनिवार, 25 नवंबर 2017

तेरा पन्ना

पढ़ भी लूं इस पन्ने को ,तो फिर जवाब कहाँ लिखूंगा।
इम्तिहान तो हक़ीक़त का है ,तो ये ख्वाब कहाँ लिखूंगा !

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

पर्यावण प्रदूषण का निजी लाभ

#सोनभद्र
पिछले 25 वर्षों में मुझे कोई भी एक ब्यक्ति नही मिला जो सचमुच सोनभद्र के प्रकृति,पर्यावरण, पर्यटन, और प्रदूषण को बचाना चाहता हो,,संरक्षित करना चाहता हो, जिसने भी इसके लिए आवाज लगाने की कोशिश की वो भी कालांतर में प्रकृति दोहन कर धन कमाने लगे, या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूपसे इस विषय पर आर्थिक संशाधन ढूढने लगे,राजनीतिक संरक्षण ,और राजनीतिक पहचान बनाने लगे ,परिणाम ये रहा कि सोनभद्र आज लोगो का झोली भरने में जीर्ण शीर्ण हो गया है , प्रदूषित होगया है, जंगली जीव विलुप्त हो रहे है,आने वाली पीढी के लिए संकट उत्पन्न हो रहा है, लेकिन चंद लोगों के लिए ये आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक लाभ लेने का साधन है । कुछ समय के लिए आने वाले जनपद के प्रशासनिक अधिकारी इनके शब्दजाल के शिकार हो जा रहे है, फिर से कथित पर्यावरण प्रेमी ,पर्यटन प्रेमी, समाज सेवी और राजनीति के धुरंधर बन जाते है ।

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मनोरंजन का घरेलू उद्द्योग

आज तकनीकी सुलभता के कारण रचमात्मक  सोच को बढ़ावा मिल रहा है , हर तरफ कुछ नया करने की ललक दिख रहा है, शिक्षित ही नही अशिक्षित लोग भी रचनात्मकता में भाग ले रहे है,यही कारण है कि देश मे मनोरंजन के क्षेत्र प्रतिदिन कुछ नया हो रहा है।मनोरंजन उद्द्योग महानगरों से निकल कर शहर और कस्बो में आ चुका है। क्षेत्रीय फ़िल्म , म्यूजिक एलबम और यू ट्यूब के लिए  आज जोर शोर से निर्माण कार्य चल रहा है।सफलता की परवाह किये बिना भी लोग आकर्षण के मोहपाश में पैसा और समय ब्यय कर रहे है।हरयाणवी, राजस्थानी,पंजाबी,भोजपुरी जैसे क्षेत्रीय फ़िल्म तो उद्द्योग का दर्जा पा चुके है और उसमें कइयों का भाग्य भी शिखर तक पहुच चुका है ,लेकिन इस आकर्षण में एक दूसरी पंक्ति के लोग भी है जो इस उद्द्योग के नाम पर युवाओ को बरगलाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है ,खास बात तो ये है कि जो इस मनोरंजन उद्द्योग में असफल हो गए है वही अपना ऑफिस खोल कर दुसरो को सफल बनाने की तालीम दे रहे है,और हर दिन असफल लोग कुछ और असफल गायक कलाकार निर्देशक और निर्मार्ता की फौज तैयार कर रहे है ,बिहार के तो कई जिले फ़िल्म और अल्बम के लिए गृह उद्द्योग बन चुके है ,अब ऐसे कला व्यवसाई का एक फ़ौज तैयार हो चुका है जो बाइज़्ज़त सरकार से अपनी मांगे रखने के लिए योजना बना रहे है।कई क्षेत्र में तो स्थिति ऐसी बन गयी है कि दर्शक कम है और कलाकार व निमार्ता निर्देशक अधिक।दरअसल इस तरह के मनोरंजन के घरेलू उद्द्योग  के पीछे का सबसे बड़ा कारण अकुशल बेरोजगार है। जिन्होंने ने शिक्षा के लिए ज्ञान से ज्यादा प्रमाणपत्र को महत्व दिया । कम पढेलिखे लोगो के लिए रोजगार का यह आसान तरीका समझ मे आने लगा, चमक और आकर्षण के कारण बेरोजगारों को इसमें लाना भी आसान रहता है।केवल बिहार यूपी में ही प्रति वर्ष 8000 नए गायक  और इतने ही अभिनेता अभिनेत्री इस घरेलू उद्द्योग को मिलता रहता है। जो अपने माता पिता की जमा पूंजी से स्टूडियो,कैमरा मैन ,कैमरा-!लाइट, सप्लायर,यू ट्यूब चैनल के उपलोडकर्ता और निमार्ता निदेशको के व्यापार को सुदृढ़ करता है।फिर यही असफल कलाजगत के लोग खुद को निमार्ता निर्देशक बन कर नए बेरोजगारों को मनोरंजन जगत के लिए तैयार करते है।
इस तरह के मनोरंजन के घरेलू उद्द्योग में निर्मित फ़िल्म तकनीकी और साहित्यिक रूप से बहुत कमजोर होते है जिसे निमार्ता खुद ही प्रदर्शन के लिए नही लाता, अगर कुछ पर्दे पर आ गया तो किराये के सिनेमा हाल में  प्रदर्शन के लिए भी कलाकारों से ही पैसा वसूला जाता है ,मुमकिन है कि दर्जन भर दर्शक मिल जाये लेकिन  इस फ्लॉप फिल्म के कई हीरो और हीरोइन इस बाजार के लिए तैयार हो जाते है।लगभग 95 प्रतिशत इस तरह के फ़िल्म बिना किसी प्रयोजन का बनता है जिसे प्रदर्शित नही किया जाता।यही हाल शार्ट फिल्मो का है, वो तो भला हो यू ट्यूब का जिसपर  लोग उपलोड कर अपनी  इतिश्री कर लेते है।आजकल कम्पनी के नाम पर बने यू ट्यूब चैंनल पर एक गाने के उपलोड का भी एक हज़ार से तीन हज़ार तक  नए गायको से वसूल कर लेते है।फिर बेसुरे और संगीत से दूर रहने वाले कथित गायको को भी ब्रांड गायक बनने का लॉलीपॉप दे दिया जाता है।
रुपहले पर्दे के मनोरंजन के इस खेल में बहुत तेज़ी लाखो युवा दिग्भर्मित हो रहे है, कई तो आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो रहे है , इस उद्द्योग के आड़ में यौन शोषण और सेक्स का ब्यापार भी तेजी से पांव पसार रहा है , दरअसल मनोरंजन का यह नशा जिसे एकबार लग जाये फिर वो यंहा से निकल कर कोई दूसरा रोजगार करने में खूद को सहज नही  पाता। इस कारण इसी धंधे में नए लोगो को फ़ौज तैयार करता है । कम पढेलिखे अभिवावक भी  अपने बच्चों पर इस तरह शार्ट कट सफल होने की उम्मीद में  पैसा खर्च करने लगते है।
मनोरंजन के इस घरेलू खेल में समय से संज्ञान नही लिया गया तो जल्द ही स्थिति भयावह हो जावेगी, युवा रोज ठगे जाएंगे और घर परिवार टूटता जाएगा।अपराध, सेक्स,और आत्महत्या जैसी हालात बढ़ने लगेंगे। इसलिए सरकार को इस पर पहल करनी चाहिए , क्षेत्रीय फ़िल्म और मनोरंजन के लिये भी अकादमी ,स्कूल खोलने चाहिए, योग्य कलाकार और  निर्माताओ को काम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करना चाहिए। ऐसे नियम बनने चाहिए कि क्षेत्रीय फिल्मो को आसानी से सिनेमा हाल में प्रदर्शित किया जा सके। फ़िल्म और मनोरंजन के क्षेत्र में जाने के लिए प्रशिक्षण और ऑडिशन की व्यवस्था सरकारी स्तर पर हो ताकि आर्थिक और यौन शोषण से बचा जा सके। क्षेत्रीय मनोरंजन  को भी लोक कला की तरह प्रोत्साहन और संरक्षण की आवश्यकता  है।अन्यथा यह घरेलू मनोरंजन उद्द्योग विषबेल साबित होगी।

100 का नोट

उस दिन मेरे जेब मे केवल 100 रुपया था, बैंक अकाउंट भी जीरो बैलेंस पर था,,फक्कड़ बना था, लेकिन ये मेरे लिये कुछ नया नही था, मेरा ये डाक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माण का धंधा ही कुछ ऐसा ही है , किसी महीने खाने पीने , गाड़ी में तेल भरवानेऔर मकान का किराया देने से भी अधिक कुछ मिल जाता था जिसे मैं अपनी रहाइशी समझता था,बाकि तो कई महीने तक तो फाकाकशी ही चलता है,लेकिन उस दिन का एक सौ का नोट मुझे देश का सबसे अमीर होने का अहसास दिला रहा था,लग रहा था मानो बड़े बड़े धन्ना सेठ भी मेरे जैसा ही है। जितना वो खर्च कर सकता उतना मैं भी ही हूँ। जी वो 8 नवम्बर का रात्रि के 8 बजे के बाद का हालात था। अमीर गरीब सब सामान्य थे ,सामान्य ही क्यूँ, अमीर लोगोंके लिए तो ये अकूत धन आत्महत्या या सदमे के कारण अस्पताल में भर्ती हो रहे थे।सुबह से बैंक के लाइन में सभी साधारण आम जन हो गए थे । लेकिन धन्य है भारत के लोग जल्दी ही जुगाड़ के कारण अपने रौब में लौटने लगे , फिर होने लगी राजनीति , नफा नुकशान की नाप तौल, अब एक साल बीत गया इस नाप तौल में, अभी तक निष्कर्ष तो नही निकल पाया, लेकिन आज तक कोई भी मेरे सामने सीना तान कर अमीरी दिखाने की कोशिश नही की, शान शौकत में भी बदले हुए नए नॉट का धौंस नही दिख पाया,। सच बताऊं आलोचकों का बस यही कष्ट है , पैसा तो सबने उल्टे सीधे तरीके से बदल लिए लेकिन कोई गर्व से अमीर जैसा दिखने की चमक नही बना पाया। बस यही खुशी मुझे आज साल भर से फाकाकशी में अमीर जैसा फील करवा रहा है, न जाने कब तक इस तरह का कथित अमीर बना रहूंगा।
©नितेश

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

वो तुम हो

वो सारे शब्द तश्वीर में बदल गयी,
लड़खडाती उम्मीदें  सम्भल गयी,
यादों की मरुभुमि में वो बरसी छम से,
मुर्झायी सी ये ज़िंदगी फ़िर से मचल गयी !!!

बुधवार, 1 नवंबर 2017

विमोचन के बहाने

विमोचन के बहाने.....
सोनभद्र में पत्रकार संगठन के विस्तार के क्रम में एक पत्रकार संगठन ने अपने पत्रकार परिचायिका का विमोचन कार्यक्रम  रखा , प्रमाणिकता और ब्रांडिंग के लिए अतिथि व मुख्य अतिथि भी थे,कुछ वयोवृद्ध पत्रकार के साथ संघर्षशील पत्रकारबन्धु भी उपस्थित रहे।खुशनुमा माहौल में हुए विमोचन कार्यक्रम में कई सुर्ख पल भी दिखने को मिला,
लीक पर चल रहे पत्रकारों से अलग संगठन एक लाबी की प्रक्रिया के तहत कई परम्परा से अलग होने का भी प्रयास था,  मसलन कलमकारों द्वारा मां सरस्वती का माल्यार्पण न होना, दीप प्रज्वलित न होना, लीक के पत्रकारों को हासिये पर रखना, ताज़्ज़ुब है पत्रकारों के हित के लिए बनने वाली संगठन कुछ खास लोगो के ब्रांडिंग के लिए कैसे हो सकता है ! फिर भी सभा मे उपस्थित 90 प्रतिशत पत्रकार जिले के कई अन्य पत्रकार संगठन के सदस्य भी थे,कुछ तो दो या उससे अधिक संगठन के सदस्य थे,निदेशक मंडल के सदस्य तो कई नामी गिरामी संगठन के पुरोधा भी थे। इससे बड़ा आश्चर्य ये की कोई भी निदेशक की उपस्थिति नगण्य थी, तो फिर इस तरह के संगठन की क्या आवश्यकता थी क्या पूर्व के संगठनसे उम्मीद खत्म था कि दोहरे संगठन की सदस्य बनना पड़ा या संगठन ही बनना पड़ा,गुफ्तगू में कई अन्य अनसुलझे सवाल भी थे ,लेकिन सवाल पत्रकारों के हित से जुड़ा था, इसलिए सबको चुप रहना ही मुनासिब था ,लेकिन इससे किसका हित होगा और किसका अहित ? यदि पत्रकारों का भला होता है तो आयोजक,और संयोजक को मेरी ओर से बधाई ,दिन दूना और रात चौगुना! मेरे जैसे निरीह के लिए लड़ाई लड़ें ,सबकी दुआ उनके साथ है!

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

कार्तिक पर्व के मायने

मैं बिहार के मिथिला से हूँ ,बचपना मिथिला भूमि की  धूल में बीता है,वहां की संस्कृति की बहुत सारी छाप आज भी स्मृति में शेष है ,वक़्त बदलता गया ,हम आधुनिक बनते गए ,गांव से शहर की ओर पलायन करते गए लेकिन वो पुरातन पर्व व उत्सव को भुला नही पाए जो पूरे समाज को एक सूत्र में बांध रखा था।हिन्दू पंचांग का कार्तिक माह यहाँ के लोगों के लिए उत्सव का माह होता था, खरीफ की खेती से निश्चिंत किसान धान की कटाई   का समय आने तक यानि कार्तिक पूर्णिमा तक लोग बाग गृहस्थ कार्य से इतर विभिन्न प्रकार के उत्सव में लग जाते थे, जीतिया, धन तेरस,दीपावली,गोधन,भर दुतिया,हुरा होरी, गोपाष्टमी,फिर छठ,सामा चकेवा, आदि कई अन्य पर्व औरआखिरी में कार्तिक पूर्णिमा तक उत्सव ही उत्सव रहता था ।फिर होता था धान की कटनी और गेंहू का बोआई ।
विभिन्न त्योहारों का इतिहास से कोई न कोई मतलब होता है ,हिन्दू त्योहार ,रीति रिवाजमें  उत्सव के साथ एक उद्देश्य भी छुपा  रहता है बेशक आज के परिवेश में वो शून्य दिखता हो,लेकिन पहले लोग इसी के सहारे जीवन चर्या को पटरी पर चलाते थे। पहले हिन्दू महिलाओ में एक गोदना का निशान होना आवश्यक होता था,एक बिन्दी ही सही लेकिन सभी महिलाएं गोदना गोदवाती अवश्य थी,इसके लिए सुअर की चर्बी में काला रंग डाल कर सुई के नोक से किसी अंग पर गोदा जाता था ,उद्देश्य था अतीत के आततायी मुसलमानों से बचने का तरीका, कोई भी मुसलमान गोदना वाली महिला को अपना हवस का शिकार नही बनाता,ठीक इसी तरह महिलाएं गले में ढोलना पहनती थी,जो चांदी का खोखला बना होता था और उसमें सुअर की हड्डी डाली जाती थी ,इस कारण भी ढोलना पहनी महिलाओं को आततायी  स्पर्श नही करते, उस समय हमलावर मुसलमानों से बचने के लिए ये एक रिवाज के तौर पे अपनाए जाने लगा था जो आज तक भी देखने को मिल जाता है,फैशन के दौर में आधुनिक महिलाएं इसे कम ही अपना रही है । ठीक इसी तरह दीपावली के बाद 'हुराहुरि'का खेल होता था , लोग अपने मवेशी को आततायी मुसलमानों से बचाने के लिए इस उत्सव का आयोजन करने लगे ,नुक्कड़ चौराहों पर किसान अपने मवेशी को सुअर के बच्चे जिसे 'पाहुर'कहते थे उससे लड़वाते थे ,सभी मवेशी अपने हूर (सिंघ) से उसे मारते थे ,जिससे सभी का मवेशी सुअर से स्पर्श होजाता था, ।इसतरह उत्सव के साथ साथ अपनी मवेशी की रक्षा भी कर लेते थे ,आज के दौर में ये उत्सव मिथिला के कुछ ही गांवो में बचा है ।
गांव की संस्कृति,पर्व,उत्सव,रीति रिवाज बेशक आज बासी और अनुपयुक्त लगे लेकिन जो रस, उल्लास,भाईचारा,और उत्साह उसमे है आज के आधुनिक क्लब या पूर्व नियोजित मेला या तथाकथित इवेंट में नही है ।मुश्किल है कि हम आज के मशीनी युग मे इसे सहेज कर रख पाएं। लेकिन अपने अतीत की इस वैभव को खोकर हम सब कुछ खो देंगे , हमे अपने पुरातन संस्कार संस्कृति,पर्व त्योहार, उत्सव,गीत,रीति रिवाज को बचा कर रखने के लिए भरपूर कोशिश करनी चाहिये,आज के युवाओं को भी आगे आना चाहिए , नही तो यह इतिहास भी बताने वाला कोई नही बचेगा।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

पत्रकार की हत्या

गाजीपुर में एक पत्रकार की हत्या हुई है । वह एक व्यक्ति भी था, किसी घर का चिराग भी था,अब वो इस दुनिया मे दुबारा नही आ सकता,लेकिन हम आप तो इस जग में है ।कब तक यूपी को जंगल राज बनाते रहेंगे?कब तक अपराधियो को पालते रहेंगे?कब तक एक दूसरे पर खीज निकालते रहेंगे? कब तक स्वयं की हत्या का इंतज़ार करते रहेंगे?अब तो योगी जी को बताइये की ये सपा सरकार नही है फिर हत्या,लूट,और बलात्कार का रेला क्यूँ??क्या यही राम राज है??
#पत्रकार !!!!सावधान अगला नम्बर कहीं आपका तो नही ?नींद में है तो जाग जाइये,सत्ता नही स्वस्थ समाज बनाइये,अपनो के दुःख में अपना बनिये।

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

वैराग्य

अपनो से जब आस टूटती है आँसू जब दो बूंद टपकती है
उसी दिन बन्धन टूटता है
उसी दिन वैराग्य पनपता है
दर्द में एक आध्यत्म उमड़ता है
उम्मीद में भी ईश्वर दिखता है
भ्रम का धुंआ छटता है
खुद का विश्वास बढ़ता है
जिस दिन विश्वास को लुटता है
उसी दिन वैराग्य पनपता है

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

मैथिल

मिथिला मेरी भावनाओ का उपज हो
मेरी संस्कारो की खेती हो
मेरे रोम रोम का स्पंदन हो
मधुर स्वर की स्फुटन से
नित्य नेह का बंधन हो।
तब मैं मैथिल कहलाऊं।
ना कोई लेख पत्र में समझाए
ना उत्सव में बुला मैथिल बनाए,
ना कोई जाति की अहसास कराये
ना कोई सीमा रेखा में मुझे दर्शाये
जब स्वयं पाग पहन इतराऊं
तब मैं मैथिल कहलाऊं।

आज के हम

आज से 40 साल पहले मैं मनुष्य को ईश्वर का अनमोल कृति समझता था। गांव में रहता था ,चेहरे तो कम दिखते थे,अनपढ़ होते थे लेकिन मेहनतकश और आदर्श होते थे , स्वतः सम्मान उत्पन्न होता था उनके लिए,भाषा और पहनावा से मन में श्रद्धा भाव उत्पन्न होता था ,बरबस सोचने को बाध्य होना पड़ता कि बड़े होकर इनके तरह ही बनूँगा।परन्तु आज लोग पढ़े लिखे ,और बड़े बड़े डिग्री वाले है ,लोगो की भीड़ भी बहुत है ,बड़े शहर में किसी ऊँचे स्थान से देखे तो कीड़े मकोड़े की तरह रेंगते नज़र आ ते है, भाव शून्य है, परिधान में भी कई प्रश्न है। ममता और श्रद्धा कहीं गायब है।फिर तो लगता है ईश्वर ने अन्य जानवरों की तरह मनुष्य को भी बनाया है ,संवेदना तो पशुओं के तुल्य भी नही रह गया,इस भीड़ में कहीं मनुष्य खो गया ।

शनिवार, 11 मार्च 2017

आज भारतीय जनमानस

आज भारतीय जनमानस को भूत भविष्य के चिंता से परे है, वो वर्तमान देखता है ,नितान्त वर्तमान,उसमे ही अपना स्वार्थ ढूंढता है ,उसे सामाजिक कार्यो में वो दिलचस्पी नही ,वो सामाजिक त्याग में भी कोई लगाव नही , उसे तो उत्साह और उत्सव में उत्सुकता है ,युवाओ को पिछड़ापन वाली इतिहास में भी कोई लगाव नही उसे आधुनिक भौतिकवादी संस्कृति से आकर्षण है  ।ये विशाल जनसमर्थन वाली जीत से तो हम निजी तौर पर यही समझ सकते है,लोकतंत्र में विपक्ष का कमजोर होना भी चिंता का विषय है , राजनीती में जनता का आकर्षण का पता न करना और पुराणी परिपाटी से राजनीती करना नवपीढ़ी को घिसीपिटी लगती है , वरना 70 वर्ष और 25 वर्ष से रास्ता बनानी वाली पार्टियों का हश्र अचानक से स्याह हो जाना नयी सोच को जन्म देती है ।फिर मणिपुर में इरोम के लम्बे संघर्ष को  केवल 90 लोगो का समर्थन भी ये बताने केलिए बहुत है कि हम वर्तमान स्वार्थ के लोकतंत्र है ,विचारधारा और इतिहास का नही । 2014 से  तमाम घटना क्रम  में राजनीती को अब नई पीढ़ी दिशा देने लगी है ,पुरनीये और उनके विचार हाशिये पर ढकेले जा रहे है । भविष्य के चिंता से दूर आज लोकतंत्र बहक सा गया है , आज आवश्यकता है इस पर बहस का ,लोकतंत्र को परिभाषित करने का ,खुद को समझने का , इस बात को भी समझने का कि बरगलाने और मुख्य मुद्दा से हटकर  आपकी बातों को कोई समझने वाला नही , जनता अब कल वाली नही है ,जनता वर्तमान वाली है ,जो आपका उपहार से प्रभावित नही होता वो वैचारिक उत्सव को ढूंढता है , जो आज और अभी का ताज़ा तरीन हो ।
©नितेश