सोमवार, 6 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 5

#मेरा_एकांतवास 5
अकेलेपन  में मैं अक्सर क्लासिकल इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक सुनना पसंद करता हूँ। वही सारा दिन सुन भी रहा हूँ। वैसे मुझे न तो गाना गाने आता है और नही कोई भी इंस्ट्रूमेंट बजाने लेकिन सुनने में बहुत आनंद उठा लेता हूँ।बहुत प्रयास के बाद भी गाने और बजाने सिख नही पाया। आधुनिक संगीत में  भी कुछ कम्पोजिशन पसन्द आता है, पाश्चात्य तो बिल्कुल नही। कुछ अर्थपूर्ण मैथीली और भोजपुरी जिसमे मिट्टी की खुशबू मिलती है उसे भी सुन्ना पसंद करता हूँ। कभी कभी कुछ गाने इतने कर्णप्रिय हो जाते है कि अपनी मूल आदत भी भूल जाता हूं, एक गीत *सांसों की माला में..... इतना पसंद आया कि बार बार सुनने की लिए एक म्यूजिक सिस्टम खरीद लाया। दोस्तो और परिवार  में  मज़ाक का कारण भी बना कि एक गाने के लिए ये पागल पन!! लेकिन मेरा मानना है कि जो मन को तृप्ति दे उसे तन की तृप्ति की तरह ही पूर्ति करनी चाहिए। संगीत जीवन की जरूरत भी है , मेडिटेशन का तरीका भी, कई असह्य पीड़ा की दवा भी है। लेकिन आपको जो पसंद हो। जिससे आपको आंतरिक ऊर्जा मिले। कुछ लोग गाकर तो कुछ बजाकर आनंद लेलेते है तो मैं सुनकर। श्रोता का होना भी जरूरी है। आधुनिक इवेंट, का कॉन्सर्ट में जाना अच्छा नही लगता लेकिन क्लासिकल कॉन्सर्ट को जरूर अटेंड करना चाहता हूं, मौका मिलता है तो नाटक प्ले देखना नही चुकता। , नाटक का अभिनय जीवन की विभिन्न रंगों से तत्काल परिचित करवाता है। आप यदि ईश्वर द्वारा मिला एक मात्र मनुष्य जीवन को बेहतर तरीके से जीना चाहते है ।सौ विभिन्न जीवन को एक ही जीवन काल मे जिन चाहते है तो अभिनय करना सीखना चाहिए या नाटक देखनी चाहिए। कम समय मे कई जिंदगी जीने का एक अनोखा प्रयोग है नाटक और इसका अभिनय।  रुपहले पर्दे का अभिनय शायद आपको उतना प्रभावित न करे लेकिन नाटक का अभिनय अभिनय कर्ता अभिनेता की जिंदगी को अंदर तक शुद्ध कर देता है।  पर्दे पका अभिनय टुकड़ो में तकनीकी रूप से सवांरा रहता है ,लेकिन रंगमंच विशुद्द  कसौटी पर जांचा अभिनय होता है। अभिनेता उस चरित्र को बखूबी जीता है, पर्दे के अभिनेता में वो समर्पण का अभाव होता है, ,फ़िल्म और संगीत की तकनीकी उपलब्द्धि के कारण यह मौलिक स्वरूप कमजोर हो रहा है। वस्तुतः आज भी अभिनय,कला, और संगीत का मौलिक रूप ही हमसबको प्रभावित करती है।

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