कोरोना का भारतीय दशर्न
भारतीय दर्शन के परिपेक्ष्य में आज प्रकृति के साथ मानव जीवन का दिनचर्या का बेमेल तालमेल का परिणाम है कोरोना जैसा महामारी। आज हम पूरी तरह मानने को विवश है कि आत्मा जीव के स्थूल शरीर से , मोह ,लोभ पाप पुण्य से अलग है। आज आपके पास या दूर रह रहे बेटे को यह महामारी गिरफ्त में ले ले तो आप भी उसे अपनी जान की दुश्मन समझेंगे ,उसे उसके हाल पर छोड़ देंगे। मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार करने से डरेंगे,लोग साथ नही आएंगे। न ही आपके साथ ऐसा कुछ हो तो आपके पास भी कोई नही मदद के लिए पहुँचेगा। फिर तो आप किस पुत्र और सगे सम्बन्धियो के लिए छल कपट से धन कमाकर सुख समेटने की कोशिश की? यह कौनसा सुख है जब तो समर्थ होते हुए भी अपनो के बीच नही रह सकते उसे स्पर्श तक नही कर सकते। जीवन यापन के लिए किसी का सहयोग नहीं ले सकते। नौकर चाकर सहयोगी अनुचर ड्राइवर आदि आदि का सुख प्राप्त नही कर सकते, लोग अपने अनुचर सहयोगियों यहां तक भोजन बनाने वालों से भी दूर रहने लगा है । अब जो है उसे ही समाप्त होते देख सकते है। सौंदर्य और सृजन सभी अब किसी काम का नही। सभी साधन आपके लिए था जो आज किसी उपयोगिता के लिए नही है, अकूत धन होते हुए भी डॉक्टर के सामने बेबस है। सोने चांदी की दीवार काटने को दौड़ रही है। घर की चादर दिवारी में भी डर लग रहा, हर दरवाजा से मौत की आहट आती दिखाई दे रही है ,सब सुख सभी अहंकार, सभी कुछ आप से दूर है। बस सुखों का अतीत का स्मरण ही आपको कुछ दिन जिंदा बना रखा है।
तनिक सोचने की जरूरत है कि आज मानव को छोड़कर हर जीव प्रसन्न और भय विहीन है, प्रदूषण मुक्त वातावरण,, एकदम साफ आसमान ... हर तरफ चिड़ियों की चहचहाहट, मानव निर्मित शोर से दूर कितना खुश है प्रकृति !!! कितना मुस्कुरा रहा है। श्मशान और कब्रगाह भी अब उदास नही खुश है , आप वहां जाकर भी अपनी मौत के लिए चिंतित नही होते थे, अपने सुख के लिए इस प्रकृति का कितना दोहन किया था । कितनी हत्याएं की थी भोजन के लिए जीवों का। कितना छल किया था अपने पुत्रों को धनवान सामर्थवान बनाने के लिए। कहाँ है , वो सामर्थ्य, वो अविष्कार, जिस से सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देने के लिए मानव ललकार रहा था। जिन अपनो पर अहंकार था वो कहाँ है, वो क्या कर सकता है?? कौन इस तड़पती जिंदगी को बचा सकता है। कौन है जो एक दूसरे पर हंस सकता है??अब कौन फर्क दिखा सकता है अमीरी गरीबी का ? क्या विश्व का मानव अपनी गलतियों पर कभी पछताएगी। या सर्वनाश होने तक यूँ ही अहंकार में जीती रहेगी?
आहार विहार और संस्कार ही भारतीय दर्शन की मूल अवधारणा है।, हमारी संस्कार में सभी जीवों के प्रति दया और प्रेम है। हम सांस्कारिक रूप से प्रकृति प्रेमी है, विश्व आज अपनी मूल संस्कृति से दूर होता चला गया, भारत भी अपनी दर्शन को भूलने लगा था , नतीजा महामारी जैसा नियंत्रक उत्पन्न होता है। आज मानव के अतिरिक्त सभी जीव बहुत प्रसन्न है। जब जब मानव सत्ता कमजोर पड़ने लगती है प्रकृति प्रसन्न होने लगती है , जीव पशु पक्षी , पेड़पौधे सब खुशहाल होने लगता है। हमने अपने मूल संस्कार भूल गए, आहार विहार भूल गए, अपनी दिनचर्या को अपनी सुख सुविधा के अनुसार ढलने की कोशिश की, भोजन और प्रजनन को प्राकृतिक की जगह प्रायोगिक बना दिया, अपनो से सम्बन्ध आत्मीय न होकर व्यवसायिककर दिए, समर्थ को अपना मित्र उर लाचार को घृणा की दृष्टि से देखने वाले मानव आज देख लो हर लोग तुमसे डर रहा है और सभीबसे तुम डर रहे हो।अगके बढ़ने की इस दौड़ में अपने बहुत कुछ चीजो को खो दिया। कि अदृश्य प्रकृति प्रदत्त संसाधनों को अपने कदमो तले मसल दिया , तो ये हाहाकार उचित ही है। हमे अपनी इस दुर्दांत महामारी के जिम्मेदार हम ही है,कदाचित मान लेते।
आज संकट मनुष्य पर है किसी अन्य जीव पर नही।प्रकृति ने अपनी मूल स्तिथि में लौटने की पर्यास कर रही है, मनुष्य दया विहीन हो शोषक ,कपटी होगा तो एक समय ऐसा ही दृश्य देखने को मिलेगा। चिंतन का विषय है, आज विश्व मानव अपने सर्वोच्च विकास के अंतिम पाँवदान पर पहुंचकर भी हतोत्साहित है ऐसे में भारत का दर्शन ही बची खुची मानव जीवन को आगे ले जा सकता है, अपनी आहार विहार और संस्कार को भारतीय दर्शन के अनुसार अपनाने की कोशिश कीजिये। भारतीय दर्शन में ही आधुनिक विज्ञान समाहित है , इसे सम्पूर्ण विश्व ने माना है और मानने को बाध्य होगा। आज विश्व हाय हेलो ,चुम्बन से नमस्ते की ओर लौट गया है, आगे भी ऐसे ही हर विषय पर लौटना पड़ेगा।@nitesh
#क्रमश....