बुधवार, 25 मार्च 2020

भारतीय दर्शन में कोरोना

कोरोना का भारतीय दशर्न
 भारतीय दर्शन के परिपेक्ष्य में आज प्रकृति के साथ मानव जीवन का दिनचर्या का बेमेल तालमेल का परिणाम है कोरोना जैसा  महामारी। आज हम पूरी तरह मानने को विवश है कि आत्मा  जीव के स्थूल शरीर से , मोह ,लोभ पाप पुण्य से अलग है। आज आपके पास या दूर रह रहे बेटे को यह महामारी गिरफ्त में ले ले तो आप भी उसे अपनी जान की दुश्मन समझेंगे ,उसे उसके हाल पर छोड़ देंगे। मृत्यु होने पर  अंतिम संस्कार करने से डरेंगे,लोग साथ नही आएंगे।  न  ही आपके साथ ऐसा कुछ हो तो आपके पास भी कोई नही मदद के लिए पहुँचेगा। फिर तो आप किस पुत्र और सगे सम्बन्धियो के लिए  छल कपट से धन कमाकर  सुख समेटने की कोशिश की? यह कौनसा सुख है जब तो समर्थ होते हुए भी अपनो के बीच नही रह सकते उसे स्पर्श तक नही कर सकते।  जीवन यापन के लिए किसी का सहयोग नहीं ले सकते।  नौकर चाकर  सहयोगी अनुचर  ड्राइवर आदि आदि का सुख प्राप्त नही कर सकते, लोग अपने अनुचर सहयोगियों यहां तक भोजन  बनाने वालों से भी दूर रहने लगा है । अब जो है उसे ही समाप्त होते देख सकते है। सौंदर्य और सृजन सभी अब  किसी काम का नही। सभी साधन आपके लिए था जो आज किसी उपयोगिता के लिए नही है,  अकूत धन होते हुए भी डॉक्टर के सामने बेबस है।  सोने चांदी की दीवार काटने को दौड़ रही है।  घर की चादर दिवारी में भी डर लग रहा, हर दरवाजा से मौत की आहट आती दिखाई दे रही है ,सब सुख सभी अहंकार, सभी कुछ आप से दूर है। बस सुखों का अतीत का स्मरण ही आपको कुछ दिन जिंदा बना रखा है। 
  तनिक सोचने की जरूरत है कि आज मानव को छोड़कर हर जीव प्रसन्न और भय विहीन है, प्रदूषण मुक्त वातावरण,, एकदम साफ आसमान ... हर तरफ चिड़ियों की चहचहाहट, मानव निर्मित शोर से दूर  कितना खुश है प्रकृति !!! कितना मुस्कुरा रहा है। श्मशान और कब्रगाह भी अब उदास नही खुश है , आप वहां जाकर भी अपनी मौत के लिए चिंतित नही होते थे, अपने सुख के लिए इस प्रकृति का कितना दोहन किया था । कितनी हत्याएं की थी भोजन के लिए जीवों का। कितना छल किया था अपने पुत्रों को धनवान सामर्थवान बनाने के लिए। कहाँ है , वो सामर्थ्य, वो  अविष्कार, जिस से  सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देने के लिए मानव ललकार रहा था। जिन अपनो पर अहंकार था वो कहाँ है, वो क्या कर सकता है?? कौन इस तड़पती जिंदगी को बचा सकता है। कौन है जो एक दूसरे पर हंस सकता है??अब कौन फर्क दिखा सकता है अमीरी गरीबी का ? क्या  विश्व का मानव अपनी गलतियों पर कभी पछताएगी। या सर्वनाश होने तक यूँ ही अहंकार में जीती रहेगी?
 आहार विहार और संस्कार ही भारतीय दर्शन की मूल अवधारणा है।,  हमारी संस्कार में सभी जीवों के प्रति दया और प्रेम है। हम सांस्कारिक रूप से प्रकृति प्रेमी है,  विश्व आज अपनी मूल संस्कृति से दूर होता चला गया, भारत भी अपनी दर्शन को भूलने लगा था , नतीजा महामारी जैसा नियंत्रक उत्पन्न होता है। आज मानव के अतिरिक्त सभी जीव बहुत प्रसन्न है। जब जब मानव सत्ता कमजोर पड़ने लगती है  प्रकृति प्रसन्न होने लगती है , जीव पशु पक्षी , पेड़पौधे सब खुशहाल होने लगता है।   हमने अपने मूल संस्कार भूल गए, आहार विहार भूल गए, अपनी दिनचर्या को अपनी सुख सुविधा के अनुसार ढलने की कोशिश की, भोजन और प्रजनन को प्राकृतिक की जगह प्रायोगिक बना दिया, अपनो से सम्बन्ध आत्मीय न होकर व्यवसायिककर दिए, समर्थ को अपना मित्र उर लाचार को घृणा की दृष्टि से देखने वाले मानव आज देख लो हर लोग तुमसे डर रहा है और सभीबसे तुम डर रहे हो।अगके बढ़ने की इस दौड़ में अपने बहुत कुछ चीजो को खो दिया। कि अदृश्य प्रकृति प्रदत्त संसाधनों को अपने कदमो तले मसल दिया , तो ये हाहाकार उचित ही है। हमे अपनी इस दुर्दांत महामारी के जिम्मेदार  हम ही है,कदाचित मान लेते। 
आज  संकट मनुष्य पर है  किसी अन्य जीव पर नही।प्रकृति ने अपनी मूल स्तिथि में लौटने की पर्यास कर रही है,  मनुष्य दया विहीन हो  शोषक ,कपटी  होगा तो  एक समय ऐसा ही दृश्य देखने को मिलेगा। चिंतन का विषय है, आज विश्व मानव अपने सर्वोच्च विकास के अंतिम पाँवदान पर पहुंचकर  भी हतोत्साहित है ऐसे में भारत का दर्शन ही  बची खुची मानव  जीवन को आगे ले जा सकता है, अपनी आहार विहार और संस्कार को भारतीय दर्शन के अनुसार अपनाने की कोशिश कीजिये। भारतीय दर्शन में ही आधुनिक विज्ञान समाहित है , इसे सम्पूर्ण विश्व ने माना है और मानने को बाध्य होगा। आज विश्व हाय हेलो ,चुम्बन से  नमस्ते की ओर लौट गया है,  आगे भी ऐसे ही हर विषय पर लौटना  पड़ेगा।@nitesh
#क्रमश....

गुरुवार, 19 मार्च 2020

मुट्ठी भर रेत


#मुट्ठी_भर_रेत
बस रेत का ही बना पाता हूँ महल
द्वार पर कुंडी लगने से पहले
लहरों में 
फिर से विलीन हो जाता है  महल
फिर कोशिशें करता हूँ
लहरों से जूझता हूँ
थकता हूँ पर हारता नही
कोशिश अब भी करता हूँ
हार नही मान सकता
लेकिन समर्पित करता हुँ
इन लहरों को अपना जिद्द
हर बार मिटने के लिए 
जमा करता हूँ रेत
हाँ लहरों की पहुंच से दूर
बना लेता एक महल
लहरों से इतर जुनून तो है 
परन्तु वो रेत कहाँ
जिससे तैयार हो महल

तू थम तो जा 
बस एक पल और थम जा
मैं निहार तो लूं अपने सपनो को
बड़ी उम्मीदों से मुझे 
इस काबिल बनाया है
इसे मिटने से पहले 
बन तो जाने दो
एक पल ही सही
इसकी गोद मे सो जाने तो दो
हाँ एक बार मेरा नाम
पुकार लेने तो दो।
मेरा प्रणाम स्वीकार कर तो लेने दो
सब कुछ समर्पित कर दूंगा
बस धूप खिल जाने तो दो।
©nitesh bhardwaj

सोमवार, 16 मार्च 2020

स्वमूल्यांकन

दशकों के चिंतन मनन के उपरांत इस निष्कर्ष पर खुद को पहुंच पाया कि व्यक्ति अपनी सफलता असफलता का जिम्मेदार उसका प्रकृति प्रदत्त स्वभाव होता है, इन गुणों में परिवर्तन कर खुद को समाज और वातावरण के अनुकूल ढाल सकता है ,परन्तु जो ऐसा करने में असफल रहता है वो सदैव ही असफल रहता है। संसार परिवर्तन शील है और हमे भी परिवर्तित होते रहने चाहिए, जिद्द और स्थिर स्वभाव स्वयं को चिता की तरह जलाता है,मुझमे विद्द्यमान गुण प्रेम, मोह,लोभ, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष ,आदत सभी स्थायी रहे हैं, किसी भी काल खंड या बदलते परिस्थितियों में भी यह बदलने में असमर्थ रहा है, इस कारण सम्पूर्ण जीवन असफल रहा , 
केवल सांस लेना ही जीवन नही है, आपके जीवित रहने से किसी अन्य सगे सम्बन्धी ,समाज ,देश या प्रकृति को आपसे लाभ नही,आप से अपेक्षा नही तो आप का जीवन असफल है, आप स्वयं के लिए भी नही है, व्यक्ति का समाज में समायोजन उपरोक्त कारण से ही होता है।
अपने स्वभाविक गुण को समय और परिस्थिति के अनुसार बदलने में असमर्थ है तो आपको आर्थिक स्तर पर भी असफल ही रहना पड़ेगा, किसी भी व्यवसाय ,या नौकरी में सफलता नही मिलेगी। लोग वस्तुनिष्ठ से प्रभावित हो आपसे जुड़ते है ,व्यक्तित्व तो आपका ही होता है वो नितान्त निजी है।हर व्यक्ति का अपनी अपेक्षा है और उसकी अपेक्षा के अनुकूल होने पर ही आपका सामंजस्य स्थापित सम्भव है,और बिना सामंजस्य स्थापित के कोई भी कार्य या सम्बन्ध सफल नही हो सकता ,ऐसी परिस्थिति में आप कोई भी आर्थिक लाभ के कार्य नही कर सकते। कदाचित इन्ही कमियों के कारण सम्पूर्ण जीवन सभी आयामो में अभावों से जूझना पड़ा है।
आर्थिक स्वालम्बन ही आपको सभी सम्बन्धो से जोड़े रखता है, अन्यथा आप समाज और सम्बन्धियो पर बोझ रहते है।आप निक्कमा और कायर होते है, आपके सभी उत्कृष्ट विचार, कार्य अनुकरणीय नही होता, और आर्थिक समृद्धि के लिए परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाना ही सफलता है ।अपनी नैसर्गिक गुणों से भी तालमेल बिठा कर रखना आवश्यक है।जो ऐसा नही कर सकता वही जीवन मे असफल है या यूं कह लीजिए असफलता का यही कारण है।
अब प्रश्न स्वयं का है कि इस तरह के अपरिवर्तनीय गुणों वाले व्यक्ति का सामंजस्य सम्भव है??? कदाचित नहीं ,ऐसे लोग सदैव आलोचना , निंदा,अफवाहों, कलंकित होते रहने के श्रेणी में आते रहते है।ऐसे लोगो का कोई मित्र सखा नही होता,इन्हें समय रहते समाज से अलग स्वयं में जीना चाहिए, अपनी आंतरिक अनुभूति में आनंद ढूढना  चाहिए, वाह्य जगत इनके लिए अनुकूल नही है।किसी एकांत में निवास करना, ध्यान, योग तप आदि ही ऐसे लोगों के लिए उचित है।अन्यथा सदैव पड़तारित होते रहना पड़ेगा। मुझे भली भांति यह स्मरण रहता है कि मेरे सगे और आर्थिक रूप से सबसे सफल सम्बन्धी ने ताना देते हुए कहा था कि आपकी औकात एक रुपये की नही है, भीख में भी कोई एक रुपया नही दे सकता फिर कोई आपको इज़्ज़त क्यों करें,और आप किसी को नसीहत किस आधार पर दे सकते है, आपके नसीहत का क्या मतलब है?..........अब तक आपने क्या किया आपकी जगह कोई और होता तो डूब मर गया होता।"
उसका ताना और गुस्सा भी जायज था, मुझे बुरा बहुत लगा परन्तु वो कह तो सत्य ही रहा था, फिर मेरी स्थिति उस बीमार की तरह था जिसका कोई अंग खराब हो और उसे कोई अपंग होने का ताना दे रहा हो। सब कुछ तो था मेरे पास सभी गुण थे सभी सोच भी थे परंतु सामंजस्य और स्वयं को बदलने की प्रवृत्ति नही था। बहुत आँसू निकले थे लेकिन उसके कथनों पर नही अपनी असफल स्वभाव पर , खुद पर, .......आखिर इन बहुतेरे फरेब को अपने अंदर समेट क्यूँ नही पाया था मैं। शायद मैं इस तरह का अकेला हूँ या और भी असफल व्यक्ति का कारण भी यही है इस सोच में कुछ उम्र और निकल गयी लेकिन हम वहीं रहे इस जलालत भरी कीचड़ में चलते रहे। हाँ इस बीच मैंने यह जरूर सीख लिया था कि आप स्वयं में खुश रहना सीख लें तो दूसरा भी आपको सुखी सम्पन्न समझने लगेंगे, आपकी आर्थिक कमियों और जलालत भरी जिन्दगी पर ध्यान नही देंगे। परन्तु आप तो वही रहेंगे जो सगे सम्बन्धी समझते रहे है।......पैसा बहुत कुछ है ये आपके पास नही तो आप कुछ भी नही , इसको कमाने के लिए ईमानदारी ही नही सबकुछ करना पड़ता है जो आपको पसंद हो या न हो।
 जीवन जीना है, अपनी पहचान के साथ जीना है, लोगो के सामने एक अस्तित्व के साथ प्रस्तुत होना है तो आपको फरेबी बनना पड़ेगा अन्यथा आप बेकार है ,आपकी सारी सोच और संस्कार जिसे आप अच्छा समझते है वो सब  बेकार है, बेमतलब है।और अपनी जीवन जीने के लिए , अपनी अस्तित्व बचाने के लिए , अपने सगे सम्बन्धियो ,परिवार की भविष्य को बनाने के लिए अपनाया गया कोई भी फरेब गलत भी नही है, करना चाहिए जो नही किया पूरी जिंदगी जलालत भरी होती है।
अब जब मेरे पास बहुत कम समय बचा है, शायद कुछ बचा भी न हो ऐसे में अब कुछ भी नया होना सम्भव नही है। ना अब स्वभाव में न ही नैसर्गिक गुणों में बदलाव होने वाला ही है। हैं इस बीच अपनी घुटन के बीच बहुत तप करके कुछ चीजों से दूर होना सिख लिया ,उन चीजों से भी दूरी बनाना सीख लिया जिसे मनुष्य के लिए जीते जी सम्भव नही है । अब किसी भी व्यक्ति ,वस्तु और स्थान से मोह खत्म हो गया , लोभ पूर्णतः समाप्त होने में समय है,वस्तुतः लोभ कुछ उम्मीद उत्पन्न करने लगता है कदाचित इस कारण समाप्त होने में समय लगता है। जिन चीजों से छुटकारा नही मिल पा रही है वो है  द्वेष इस बाबत स्वयम को तपाने में लगा हूँ जिस दिन सफल हो जाऊं शायद स्वयम को जी लूंगा। सुख दुख,मान अपमान, लाभ हानि, अब मुझे प्रभावित नही करती। बस द्वेष से मुक्ति चाहिए। इसे प्राप्त कर लिया तो शायद यही उपलब्धि मेरे जीवन के लिए होगा,चूँकि जीवन नितांत एकांकी होता है, अकेले आना और जाना होता है तो तमाम असफलता सफलता में जीवन को मृत्यु तक बिना किसी मोह लोभ अपेक्षा, उम्मीद अधूरा सपने को पहुंचा दें तो इसे ही हम जीवन की सफलता समझ लेंगे। दुबारा इस लोक में न आना पड़े तो यह उपलब्धि होगी।वैराग्य की इस स्तिथि औरों को लिए पराजय जैसा दिखना हो सकता है लेकिन मैं ये मानने को बाध्य हूँ कि मैं कुछ भी नही जो है,जो हुआ और जो होने वाला है वो सब पूर्व निर्धारित है हम तो बस निर्धारित राह पर चल रहे है।
@नितेश भारद्वाज

रविवार, 8 मार्च 2020

दुख का कोई कारण नही


अक्सर सब कुछ वैसा नही होता जैसा आपको दिखता है,हर लिबास के पीछे की कहानी बहुत गहरा होता है, ये भी सच है कि हर व्यक्ति की अपनी कहानी ही सबसे वजनदार लगता है चूंकि वह दूसरी की जानने की कोशिश नही करता, व्यक्ति का एक जीवन सम्पूर्ण दुनिया है, जन्म से मृत्युपर्यन्त तक लोग मिलते है फिर बिछड़ जाते है और आखिरी में वह खुद ही बिछड़ जाता है। शुरू शुरू में मोहपाश बहुत शख्त होता है फिर यह नियति बन जाती है, समय के साथ हर बिछड़ते अपनो के साथ एक बूंद आंसू निकलती है और वही आँसू वैराग्य का बीज बोता रहता है। जो जितना संवेदनशील होता है उसका वैराग्य उतना ही पीड़ादायक होता है,बस वैसे ही जैसे जो बर्फ जितना कठोर हीग उसे पिघलने में वक्त लगेगा लेकिन पिघलेगा जरूर।
उच्च पद पर बैठा व्यक्ति हो अथवा सामान्य जन , सबकी अपनी कहानी है जिसे केवल और केवल वक़्त लिखता है,  कुछ लोग उस निर्धारित कहानी का पात्र बनकर जीते है कुछ खुद कहानी बन जाते है।  कुछ भी अलग नही होता  बासी रोटी का एक निवाला खानेवाला या विविध व्यंजन का भो करने वाला।  बस एक दूसरे को देखकर खुश होता है। तृप्ति दोनों को समान ही मिलती है , चुकी हमारी मनोभाव उसी अनुकूल ईश्वर बना देता है। सब वर्तमान से बेहतर ढूंढता है और इसी बेहतर ढूंढने के चक्कर मे वास्तविक आनंद से दूर हो जाता है। वास्तविक आनंद वह नही है जो आप ढूंढ रहे है ,जो ढूंढ रहे है अगर वो मिल भी जाये तो आप और दुखी होंगे, वस्तुतः वास्तविक आनंद भ्रम में है , आपकी जितनी भ्रम होगी आप उतने खुश होंगे भ्रम से अलग सब क्षणभंगुर है, इसका ज्ञान तो वैराग्य ही उत्पन्न करेगा, इसलिए जो भी भ्रम या वह है उसे जीवित रखिये आपकी जीवन यात्रा का सबसे बेहतरीन साथी यही है, जितने संत, आध्यात्मिक गुरु से मिलेंगे वो आपको एप भ्रम से दूर सत्य बताएगा और आप सांसारिक सुखों से दूर होने लगेंगे, वास्तविकता को जानने लगेंगे, वास्तविकता तो यही है कि हम अकेले आये है अकेले जाना है ,सब रास्ते मे मिल रहे हर पड़ाव के लोग है जो सांत्वना भर दे सकते कोई वास्तविक हो ही नही सकता यह प्राकृतिक नियम है।आध्यात्मिक गुरु भी आपका मोह भंग  ही करता है, जिस भ्रम से आपने सुख अर्जित किया है उससे वो दूर करता है , जबकि वो खुद भ्रम का आनंद ले रहा होता कि लोग उनकी बातें सुनकर शिष्य बन गए, पांव पुजवाने का उसे आनंद मिलता है  आखिरी में उसे भी इसी क्रिया से गुजरना पड़ता है
समय के बहाव के साथ यात्रा कीजिये, किसी पर न तो सपना विचार थोपिए और न ही किसी विचार से प्रभावित हो समय से पहले वहम तोड़कर सांसारिक सुख से वंचित हो जाएं। आपको जो पसन्द हो उसे तुरंत करे, जो न पसन्द हो उसके बारे में न सोचें। अच्छा बुरा कुछ भी नही होता , सब समय द्वारा  निश्चित है उसका आनंद ले,  हर पल परिस्थितियां बदलती रहती है जिस बदली हुई परिस्थि से आपको आनंद मिले उसे बेपरवाह  मुहब्बत करें

शनिवार, 7 मार्च 2020

नारी

#अंतरराष्ट्रीय_महिला_दिवस_पर
नारी तू जननी हो
मीत प्रीत संग तू
मातृ व भगनी हो
तू निर्माण हो तू उर्वरा हो 
तू मानवीयता का वसुंधरा हो
संस्कार संस्कृति का भंडार हो
ममता हो स्नेह हो 
छिन्न भिन्न हृदय का उम्मीद हो
तू पूजा हो पद्धति हो
परंपरा का श्रृंगार हो
तू धैर्य हो ,साहस और विश्वास हो
आशा हो उत्साह हो
तू छंद हो कविता हो
हर कहानी का किरदार हो
तू सभ्यता का प्रहरी
तू कोमल हृदय की मालकिन

तुम पर टिका पुरुष की महत्ता
तू ही जग पालनहार हो
©】nitesh

होली हो जाये

तेरा मन मुझसे मिल जाये
तो समझो होली हो जाये
तेरे रंगों में मैं रंग जाऊं
तो समझो होली हो जाये
असमानता,दूरियां और,खाइयाँ 
ये बीच दूरी पट जाए
तो समझो होली हो जाये
राग द्वेष लोभ क्रोध की 
होलिका जल जाए 
तो समझो होली हो जाये
प्रेम त्याग और तत्परता का 
वासन्ती बयार बह जाए 
तो समझो होली हो जाये
तू मेरी गुझिया मैं दही बड़ा
आओ कुछ मीठा हो जाये
तो समझो होली हो जाये
©nitesh bhardwaj