बुधवार, 22 अप्रैल 2020

मेरा एकांतवास 23

#मेरा_एकांतवास 23
छात्र जीवन कई गमो से बेगाना होता है , हाईस्कूल के बाद कि पढ़ाई के लिए मैं बाबूजी के साथ रेलवे कॉलोनी में रहा करता था। पूर्व रेलवे की कालोनी चोपन एक  परिवार जैसा ही था जिसका जिक्र पहले ही कर चुका हूं, हमउम्र के दोस्त  अपने सगे से भी अधिक संवेदनशील हुआ करते थे,  छोटा सा कस्बा , कुछ गिने चुने दुकानों का बाजार हुआ करता था चोपन ,  अमूमन हर एक चीज के एक दो ही दुकान हुआ करता था, आबादी भी कम था तो दुकान का भी कम ही होना लाजमी था। मुख्य सड़क के दोनों किनारे  कुछ दर्जन भर दुकान को मार्किट कहते थे। वही चोपन बस स्टैंड भी हुआ करता था, जिस कारण 24 घण्टे रौनक बना रहता था। उसी में कन्हैया स्वीट उस जमाने की जुहू चौपाटी हुआ करता था,  वह असज भी उसी रौनक से है लेकिन वो वाली जमघट का अभाव है ,जहां हर युवा और बुजुर्ग शाम को वहां जरूर पहुँचते, समोसा, नमकीन और चाय के लिए।  हम मित्र अक्सर नमकीन के साथ हाफ चाय से ही काम चला लेते थे, हाफ चाय या कट चाय उस समय का एक प्रचलित फैशन था,हर दिन का चाय के पैसे देने की बारी अलग अलग लोगो की होती थी। वास्तव में चाय न भी पिये तो वहाँ पहुँचना एक आदत में सुमार था। बाद में वही एक क्लब बन गया था फ्रेंड्स सोसायटी, जहां बैठकी होती। और कैरम चलता।
 ऐसे ही एक शाम हम मित्रो के संग गप्प में मशगूल थे कि तभी  एक  बस ओबरा से बनारस जाने वाली आकर रुकी।  रुकते ही दो तीन लोग एक 12 साल के बच्चे को चोर चोर कह कर पीटने लगे, देखते देखते पूरा भीड़ उसपर टूट पड़ा, जिसे मौका मिला हाथ साफ करने लगा। मेरे साथ मित्र  Rajesh Sharma  भी था हमलोगों ने उस लड़के को घेर कर खड़ा होगये, जोर से चिल्लाया ,""पहले बताओ चोरी किसकी हुई?किसकी पाकिट मारी गयी ?"लोग एक दूसरे को देखने लगे  कुछ क्षण बाद एक सज्जन ने बोला मेरा जेब कटा है,!राजेश न पूछा कितना पैसा था आपके जेब मे ? 300 रुपये उस सज्जन ने कहा ,  फिर हम लोगो ने कहा इसके कपड़े और जेब चेक कीजिये? चेक किया लेकिन पैसा उसके पास नही था। फिर हमने कहा , अनायास ही आप सब इसे क्यूँ मारे जा रहे हो??
भीड़ में किसी ने कहा कि ये सब(यानि हम लोग) भी मिले हुए है!फिर हम लोगो ने उसे अपना परिचय दिया ,और उसने भी धमकी देते हुए बोला कि कभी ओबरा में दिखना तो बताऊंगा। खैर हम लोगो की हस्तक्षेप से उस कथित चोर लड़के की जान तो बच गई , अन्यथा भीड़ की पिटाई से जान भी जा सकती थी।  पता नही वो कौन था? लेकिन सजा की भी एक सीमा होती है, मैं दावा नही कर सकता की वह  निर्दोष था या उसके और भी साथी रहे हो लेकिन  उसका भाव दयनीय था, वह जान की भीख मांग रहा था ऐसे में उसका जान बचना जरूरी था। गुस्से में किसी का जान लेना कौन सी बहादुरी है। काश पालघर ने भी कोई खुद पर रिश्क लेकर इन साधुओं  की जान की भीख मांगने की करुण विलाप सुन लिया होता तो शायद देश के सिर इतना बड़ा कलंक नही लगता। भीड़ का एक अलग मनोविज्ञान होता है ,उसमे सावधानी से अपनी बात भी रखनी चाहिए , किसी को तो रिस्क लेना ही पड़ेगा।
©nitesh
क्रमशः

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