गुरुवार, 5 अगस्त 2021

तनिक थम जा

ये भोर तनिक थम जा रात चल रही है
उनींदी पलको में उसकी याद पल रही है
तू क्या जाने सपनो की कहानी
एहसासों में उनकी ये उम्र ढल रही है

जज्बात

 मुझसे मेरा शब्द रूठ गया


बहुत ख्वाहिश नही थी 

चाँद सितारों की

ना सोने चांदी की 

मेडल पाने की 

बस बिन बन्धन उछलकूद कर सकूं

धरा की आँचल में  हरीतिमा निहार सकूं

न जाने कैसे किस पग मेरा

दिल की एक धड़कन टूट गया

फिर मुझसे

मेरा शब्द रूठ गया


अभी तो शेष जीवन का लक्ष्य साधा था

खुद से खुद को देशाटन का वादा था

कुछ अपलक ही तो निहार पाया था

न जाने किन  अपराध से 

मेरा मुझसे

 रब रूठ गया

फिर मुझसे

 मेरा शब्द रूठ गया


अब यह अवशेष लेकर क्या करूँगा

पग बन्धन तोड़ न पाऊंगा

आश्रित जीवन का मोल कहाँ

 सांस जहाँ निर्बाध चले

अब वो पल क्षण कहाँ

परन्तु

नियति को सहना है

जो है भाग्य में उसे भोगना है

जो निश्चय है उससे डर कैसा 

जो कड़ियां

टूट गया सो टूट गया


फिर मुझसे मेरा शब्द रूठ गया

©nitesh

गुरुवार, 27 मई 2021

बचपना

 बचपना

 मुझे कोई हक नही था उससे प्रेम करने का, लेकिन उसका एकतरफा प्यार कभी कभी बहुत आकर्षित करता था। उसका चहकना,मचलना बे वजह मेरे करीब आने का  बहाना ढूढना, घण्टो धूप में इंतज़ार करना, और मेरे ही खातिर शिक्षकों से डांट सुनना... इन तमाम हरकतों के बाद कभी कभी तरस तो आती थी लेकिन प्यार नही....

फिर उसने मौका निकाल कर बता ही दिया कि

 "क्या आपको मेरी इतनी मजबूरी नही दिखती?अब क्या चाहते है मर जाऊं तब आपको यकीन होगा कि मैं आपसे प्यार करती हूं.."

..."किसने कहा था प्यार करने को"

..."ये तो कोई बात नही हुई ...मुझे हो गया तो हो गया, अब मैं क्या कर सकती हूं....सच बताऊं मुझे आपको देखे बेगैर चैन नही आता , बस कभी कभार मुझसे बातें कर लिया कीजिये, मुझे आपसे कुछ नही चाहिए बस मुझसे नजरें न फेरा करे ,मुझे एक नजर देख लिया कीजिये।"

...गज़ब पागलपन है...इससे क्या फायदा

.....फायदा नुकसान आप समझे लेकिन मेरी जिंदगी का सवाल है!....आप मुझसे बिल्कुल प्यार न करें लेकिन मुझे जिंदा देखना तो चाहते होंगे ...तो फिर एक नजर देखने मे क्या हर्ज है

 उसकी यह बेकरारी ,पागलपन न चाहते हुए भी कई दिनों तक परेशान करता रहा। अब न चाहते हुए भी उस पर नजर पड़ ही जाती, फिर आहिस्ता आहिस्ता यह एक आदत सा हो गया, जब भी वो आसपास से गुजरती तो मैं भी मुस्कुरा पड़ता। 

संयोग अच्छा था मैं रोजगार के कारण वो शहर छोड़ आया। फिर वो आज का वक़्त नही था जहां संचार माध्यम सांसो के साथ साथ चलती है। हम तो बहुत दूर आ गए थे, वो न जाने कहाँ!!

आज वर्षो बाद सोशल मीडिया पर नाम और शक्ल से मिलती जुलती प्रोफाईल को मित्रता का निवेदन भेज दिया था,  बहुत जल्दी ही स्वीकृति भी मिल गई। मन मे गजब का उत्साह और तूफान सा था, नजरो के सामने वो बेइंतहा प्यार वाली छवि घूमने लगी थी, हाँ आज मन कर रहा था कि बात चलेगी तो दिल खोलकर बात कर लूंगा, प्रेम का कोई दीवार नही होता। प्रेम तो बस प्रेम होता है शर्त बस इतना है कि हृदय में उपजना चाहिए , मन की व्याकुलता में यह फसल जब खूब लहलहाने लगती है तब ही प्रेमी अमीर होने लगता है। मैंने तो कभी उसकी सुंदरता को निहारा ही नही था ,बस उसकी पागलपन को ही देखा था। आज अगर अवसर मिले तो सौंदर्य भी निहार लूंगा उसकी तस्वीर में।  मोबाईल नम्बर का आदानप्रदान हुआ ,और फिर उसकी खनकती स्वर विद्युत  की गति से मन को छूने  लगा।

कैसे है सर??

ठीक हूँ...तुम कैसे हो??

..मैं भी ठीक हूँ, ...इतने दिन बाद..हम याद आये

...नही नही !कोई सम्पर्क सूत्र नही था

...कोई बात नही आप ठीक तो है!

...हाँ बिल्कुल ठीक हूँ, तुम्हारा प्यार जो मेरे साथ है

....हा हा ...मेरा प्यार!

...क्यूँ इसमें मजाक क्या है

.....सर ये तो बिल्कुल ही मजाक है.....आप बचपना के पागलपन को प्यार समझ बैठे। वो नासमझी की एक उदाहरण थी। प्यार तो सोच समझकर किया जाता है।  जीवन की सच्चाई इस प्यार व्यार से बहुत आगे है।खुद में जीना सीखिए सर्, खुद के भरोसे जीने लगेंगे तो दूसरों को जीने की सही नसीहत भी देने लगेंगे। दुसरो की यादों  के भरोसे जीना छोड़ दे ,जो वर्तमान है वही प्यार है।

    शायद वो सच कह रही थी, उसे तो ज्ञान आ गया था, अज्ञानी तो मैं हो गया था। बचपना में तो मैं ही जी रहा था।

©nitesh

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

जंगलों में

अजीब सा सवाल है मुझ पर
मैं जंगलों में क्या कर रह हूँ?
मैं पुरातन गांवों में 
क्यूँ भटक रहा हूँ?
इन पगडंडियों में
इन पत्थरों में 
क्या ढूंढ रहा हूँ?
इस उजाड़ बियावान में
क्यूँ तप रहा हूँ?

हाँ हाँ
तुम भी तनिक आ कर देखो
अभाव में कितने सुकून है 
यहाँ
तुम सा बोझिल 
भीड़ में खड़ा अकेला
कोई नही है यहाँ
देखता हूँ मिट्टी में सने
अपनी बचपना को यहाँ
चिथड़े कपड़ो में चुहल बाजी करती
अपनी जवानी यहाँ
ललाट की लकीरों पर
पढ़ता हूँ अपने बुजुर्गों की
संघर्ष की कहानियां
मिट्टी की चूल्हे में दिखती है
माँ की हाथों की रोटियां
कुंआ की डोर बंधी बाल्टी से
निकलता है जल 
जिससे सिंचित हुआ था
पूर्वजो की जवानी
पत्थरो पर दिख जाती है
अतीत की कहानी
झुर्रियों की लेख में है
दादी की वो मीठी लोरी
आज भी पनघट पर है
अल्हड़ सी छोरी
यही तो दिखता है
अपना बुजुर्ग
मेरी जवानी 
और गुजरा हुआ
बचपना......!!
©nitesh