रविवार, 24 दिसंबर 2017

निःशब्द

टूटता रहा हर उम्मीदों की मोती
हम भी टूटे भरोसा भी टूटा
टूट गया हर आस्था ओ विश्वास
सुबक कर रोना, फिर खुद को संभालना
रुन्धती गले मे टूटती  रही सांस
पल पल धोखा, पल पल चोट
हर मासूमियत में दिखता खोट
स्वयं का
यह अपराध बहुत गम्भीर है
सहज सरल प्रेम में किसी को पिरोना
ज़ख़्म खाकर उसके सपनो को ढोना
@nitesh

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

आज का ओबरा

सोनभद्र/प्रदेश का प्राचीन उर्जाधानी, जहां एक पूरा परिवार बसता है, छोटे बड़े हज़ारो क्वार्टर, अब कुछ घर भी बनगए है, चूल्हे जरूर अलग अलग जलते है, लेकिन स्वभाव, प्रेम ,सुख दुख सब के सब एक जगह ही है, यही कारण है कि अवैध खनन वाले भी मेरे परिवार के, प्रदूषण वाले भी हमारे परिवार के, मुफ्त के जल पिलाने वाले भी परिवार के बोर्ड के गाड़ियों से डीजल निकल बेचने वाले भी , और अपने खून पसीना बहाकर बिजली बनाने वाले भी हमारे परिवार के, राशन उधार देने वाले और फर्जी बैंक के नाम पर पैसा हड़पने वाले भी हमारे परिवार के, बड़े बड़े ओहदे पर रहने वाला भी हमारा ही है और हीरोइन पीकर बर्बाद होने वाला भी हमारा है, हम सब मिलकर सबका चिंता करते है। मुझे याद नही की ओबरा में पैसे के अभाव में किसी की इलाज रुक गयी हो ,या दवा के अभाव में कोई मर गया हो! सब एक दूसरे के सुख दुख में शामिल है, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह लेकिन सामाजिक कार्य और सर्व हित के लिए सब एक है,आलोचना होती है लेकिन किसीका विरोध नही। मिल बांट कर खाना  यहां की रीति है। तभी तो ओबरा एक परिवार है। पारवारिक प्रेम का नतीजा है कि लोग नॉकरी से रिटायर होने के बाद भी यहां से जाना नही चाहते। जो किसी वजह से बाहर चले गए वो आज भी दूर बैठकर भी सबका हाल समाचार पूछते रहते और यहां के लोग भी उन्हें उसी तरह याद करते मानो कोई अपना ही किसी शहर में कमाने गया है। मुझे नही लगता भारत मे शायद इस तरह का कोई दूसरा शहर हो !!!
लेकिन विगत वर्षों में कुछ खास बुनियादी बदलाव आया है ,वो या तो राजनीतिक सामाजिक कारण हो या फिर पीढ़ी का अंतर। पहले शिक्षा के क्षेत्र में ओबरा का नाम प्रदेश में शीर्ष पर था आज फिस्सडी है, पहले चिकित्सा के लिए सदैव तत्पर रहने वाला डॉक्टर आज नदारद है, खेल और एथेलेटिक्स में हमारा परचम राष्ट्रीय स्तर पर था आज घर मे भी कमजोर है,साहित्य और सांस्कृतिक समृद्धि में भी आज सेंध लग गयी है, अपनी नॉनिहलों के लिए चिन्तित समाज आज इनसे बेफिक्र है। ना जाने क्यों नही हम अपनी इस विरासत को बचाने के लिए प्रयासरत नही है?  हम खुदको मजदूर के काम करने के लिए आंदोलनरत है लेकिन खुद को शिक्षा में पहले वाली गौरव पाने के लिए लापरवाह है। इलाज़ के लिए ऐसे डॉक्टर की तलाश से मरहूम है  जैसे वो डॉक्टर हमारे अभिवावक जैसे होते थे। कल साधन नही था लेकिन सुविधा थी आज साधन है लेकिन सुविधा नही है। हमे फिर से एक साथ बैठ कर इस पुरातन गौर को वापस लाने के लिए प्रयासरत होना पड़ेगा, अमे अपने विशाल परिवार को बचाना पड़ेगा , हमे अपने होनहार बच्चों से प्यार करना पड़ेगा, उसे चाचा चाची ,भैया दीदी वाली बोल सिखाना पड़ेगा, उस अदब को फिर से वापस लाना पड़ेगा जिससे ओबरा शिक्षा में प्रदेश का सिरमौर हुआ करता था ।
©नितेश

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

क्या विकास के लिए नक्सलिज़्म जरूरी है

सोनभद्र के सुदूर आदिवासी ग्रामीण अंचल में आज जो कुछ भी विकास दिख रहा है वो नक्सली गतिविधियों का देन है। सरकार  गरीब जनता की भलाई के लिए जो भी योजना बनाती थी वो शहर और कुछ जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के जेब तक ही रह जाता था। अनपढ़ ,भोले भाले गरीब आदिवासी इन सब योजनाओ से अनभिज्ञ थे, अभाव और दुःख को अपनी नियति समझ बैठे थे ,ऐसे में पड़ोसी राज्य से नक्सलियों का आमद इनके दुखती रग पर मरहम लगाना शुरू किया,स्थानीय जनता किसी भी अपराध से अनभिज्ञ थे , इन्हें तो भूख से सूखती पेट की आंत को तर करना था,इसलिए अपने कर्मठ बच्चे को इस कार्य मे लगा दिया , जब ये भोले भाले युवा आदिवासी जिसे लोग नक्सली कहने लगे ,  वो भी छोटी मोटी घटना करना सीख लिए,सरकार की नुमाइंदे और उसकी हमदर्द को निशाना बनाया जाने लगा तो हुक्मरानों की आंखे खुली ,फिर विकास के लिए जंगल पहाड़ में उतरने लगे। पुलिस ने विकास का ज़िम्मा उठाया औऱ राजस्व व सम्पन्न जनता के सहयोग से विकास की पहिया चलानी शुरू कर दी , उसमे भी  राजस्व विभाग ,वन विभाग , और जिन्हेंविकास करने का जिम्मा था उनके अफसरान भी लूट करने में पीछे नही रहे , फिर भी पुलिस की सक्रियता से आदिम युग मे जीने वाले आदिवासियों को लोकतंत्र को समझने  और उसमें भागीदारी  रास आने लगी । तत्कालीन पुलिस व्यवस्था से विकास की पहिया लुढकने लगी। परन्तु वही जहाँ इन्हें नक्सलियों की गोली से भय था , नया नक्सली पैदा होने से भय था ।बाँकी का वह क्षेत्र आज भी अपने भाग्य और नीयति को ही कोस रहा है।
तो क्या विकास के लिए नक्सलिज़्म ही जरूरी है?क्या अपनी प्रारंभिक जरूरतों के लिए भी बंदूक उठाना जरूरी है ?या विनाश का भय दिखाना जरूरी है ?नही तो चंद दिनों के लिए बाहर से आये ये जिला के अधिकारी ,खनन ,और प्राकृतिक दोहन में अपने हिस्सेदारी लेने में ही समय बिता देते है ।फिर उनका स्थानांतरण और फिर से एक नया अधिकारी करोड़पति बनने आ जाते है । बाहर से आये अधिकारी और ब्यापारी  वैध अवैध धन कमाकर अन्यत्र भेज देते है,और समेट कर चल देते है , इसतरह सोनभद्र के विकास का नित्य चीरहरण होता रहता है ।सरकार के नुमाइंदे निजी लाभ वाले योजनाओ पर बकुल ध्यान लगाएं बैठे रहते है । बड़े के लापरवाही से मातहत भी खूब फायदा उठाते रहते है ,नतीजा शिक्षा व्यवस्था, जल, और बिजली  विभाग के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अछूत से लगता है।
आज स्थिति यह है कि जनपद नक्सली मुक्त है, पुलिस और प्रशासन आराम  की नींद में है , पुनः उन गरीब आदिवासियों के हिस्से से  हुक्मरानों के बच्चों के खिलौने और सैर सपाटे हो रहे है,जिम्मेदार खनन की हिस्सेदारी और छीनाझपटी में ब्यस्त है , आरोप प्रत्यारोप जारी है लेकिन वो क्षेत्र आज फिर हाशिये पर है । फिरसे किसी मेहमान का इंतज़ार है ।   हो सकता है गए हुए मेहमान वापस आ जाये लेकिन हर हाल में पीड़ा फिर से सोनभद्र का जंगल ही सहेगा , प्रशासन फिर से सक्रिय हो कर बजट बढ़वा लेंगे , लेकिन आज का बजट का कोई माईबाप नही है ।तो क्या मौलिक सुविधाओ के लिए ,, सरकार की तंद्रा तोड़ने के लिए बंदूक उठाना  और भयाक्रांत करना जरूरी है??क्या ये सब इसके बिना सम्भव नही ????
©नितेश